Thursday, 9 August 2018

महानगरी के नायक | मनोहर श्याम जोशी


(1933-2006)

भारतीय सोप ओपेरा के जनक मनोहर श्याम जोशी 
 के जन्मदिवस  पर  पढ़िये...
'महानगरी के नायक'
का अंश 
ओ महानगरी, ओ महामाया!



महानगरी के नायकमें मनोहर श्याम जोशी जी के पात्र कोई प्रसिद्धि प्राप्त, आसमान को छूती हुई बुलन्दियों वाले केवल नायक ही नहीं बल्कि गन्दी हाफ पैण्ट-कमीज पहने, त्यौरियों पर आक्रोश और आँतों में अलसर धारण किए हुए, दर्जनों ट्रे एक साथ उठाये कैण्टीन से दफ़्तर और दफ़्तर से कैण्टीन जाता हुआ रंजन है। रेसकोर्स में घोड़ों की रेस खेलता ओमप्रकाश है, बाल काटने वाला नाई है, रेस्तराँ वाला शमशेर इत्यादि पात्र हैं, लेकिन उनके चेहरे पे चेहरा है। दिन में इतनी मेहनत करने वाला रंजन साँझ के रचे हुए होंठ, चिकन का कुर्ता, बढ़िया लट्ठे का पाजामा, जयपुरी पगड़ी में नज़र आयेगा, जो कि संगीत का विद्यार्थी व पारखी है।

संस्कृति और भारतीयता के नाम पर भी दो प्रकार के नायक हैं। एक वे, जो विदेशों की चमक-दमक से प्रभावित होकर देश छोड़ने के पक्षधर हैं, दूसरे अध्यात्म रूप में समृद्ध भारत तथा शिक्षा के क्षेत्र में भी कुछ अंग्रेज़ी के कायल और कुछ हिन्दी के पाद पखारने में विश्वास रखने वाले। या यूँ कहिए जवानी को आधुनिकता प्यारी है और बुढ़ापा अपनी प्राचीन धरोहर को लेकर रोता है।


पिछले इण्टरव्यू में हम धन्धों की बात कर रहे थे। बम्बई सचमुच धन्धों की नगरी है। यह बात और है कि कुछ को ये धन्धे ख़ासे गोरखधन्धे नज़र आते हैं। यहाँ ब्रीच कैण्डी में, जहाँ बैठकर मैं यह प्रस्तावना सोच रहा हूँ, इन धन्धों या गोरखधन्धों का कोई आभास नहीं है। सप्तमी का चाँद क्षितिज से काफ़ी ऊपर चढ़ आया है। भोर नीले सागर के एक छोटे-से टुकड़े पर चाँदनी बरसा रही है। सागर तट लगभग सूना है। यहाँ-वहाँ चट्टानों पर कुछ दुकेले जन प्यार कर रहे हैं और कुछ अकेले जन पगुरा रहे हैं। दूर की यह वासना मुझे कितनी सुहानी लग रही है! मेरी जेब में एक चिट्ठी है और मेरे मन में एक उदास-उदास-सी ख़ुशी है। मैं एक धुन गुनगुना रहा हूँ जो मुझे बहुत आते-आते याद आती है। मैं मन्त्रमुग्ध हूँ। शिला-सा शान्त हूँ। मेरी यही कामना है, लहरें आयें और मुझे तोड़ती रहें- धीरे-धीरे, बहुत धीरे-धीरे। लेकिन मैं जानता हूँ कि मुँह मोड़ते ही यह मन्त्र टूट जायेगा। वार्डन रोड की चहल-पहल मुझे चकाचौंध कर देगी। धन्धों की नगरी मन को अन्धा बना देगी। सागर के समीप चट्टानों पर उगा हर प्रेमपुष्प अधखिला ही मुरझा जायेगा। महानगरी का यह सकल सुख-स्नेह कल किसी कूड़ागाड़ी में इस्तेमालशुदा उपकरण-सा पड़ा पाया जायेगा। निर्मम है यह नगरी और इसका सिद्धान्त यही है, छह दिन बेतहाशा कमाओ और सातवें दिन उड़ाओ- गटर में छिपी हुई शराब और कोई वेश्या सड़क-छाप। जो आपका दिलबहलाव, वही दूसरे का रोज़गार। धन्धे से कोई पार नहीं अदला-बदली और व्यापार की इस नगरी में। निर्मम है यह नगरी, फिर भी हर कोई इसकी ओर खिंचा चला आता है। और जो आता है, वह फिर लाख चाहे, और कहीं न जाता है, न जा पाता है। क्या है रहस्य इस महामाया का? भेद सुनिये, सिने-लेखक और पत्रकार उमेश माथुर से-

बम्बई नगर एक जुआघर है। इस जुआघर में ब्लाइण्ड चाल ही चलती और फलती है। मेरी तरह अकसर लोग यहाँ सुख, सेहत, सुकून- सब कुछ हारते ही जाते हैं, मगर बाजी छोड़ नहीं पाते। मैं चार बार बम्बई से अलविदा कह चुका हूँ और चारों बार झूठा साबित हुआ हूँ। समझे भाई, यहीं सब कुछ हारे हैं, उसे वापस पायेंगे तो यहीं। कभी तो साला पत्ता पलटेगा। क्या? बस यही चक्कर है बम्बई का, और कुछ नहीं।यह कहकर उमेश अपना गुरुत्वाकर्षण केन्द्र कभी दायें, कभी बायें झुकाते हुए, मरी-मरी-सी चुटकियाँ बजाते हुए, कमरे में तेजी से चक्कर काटने लगे। चक्कर काटना उमेश का चहेता शगल है और चक्करउसका तकियाकलाम है। जब हम पहले बार बम्बई आये न, तो यही कैमरामैन बनने का चक्कर था अपना। साइन आफ द क्रासकी फोटोग्राफी देखी, मस्त हो गये। कोई बात है न! आर.डी. माथुर साहब एक दिन दिल्ली में किसी रिश्तेदार के यहाँ मिल गये। मैं उन्हें बोर करने लगा। वह बोले- अभी बच्चे हो, पढ़-लिख लो, तब बम्बई आना।मुझे बड़ा गुस्सा आया। यह आर.डी. माथुर साहब लाख नामी कैमरामैन हों, अपने को समझते क्या हैं? और मुझे समझते कहाँ हैं? तो इस चक्कर में हम मैट्रिक की फीस के पैसों से टिकट कटाकर बम्बई आ गये। घर से भागने का चक्कर अपना चलता ही रहता था, समझे हालात ही कुछ ऐसे थे। खै़र, तो बम्बई पहुँचे साहब, मुबारक से मिले। उसने रणजीत में एल.एन. वर्मा का एपरेण्टिस करवा दिया। न तनखाह, न चैन, नाम कैमरामैन। बैठे-बैठे कैमरा रिपोर्ट भरते थे। एक दिन उसमें खुरशीद ने नाम के आगे मिस लिख दिया, तो बगल में खड़े किसी मसखरे ने कहा- म्यां, नये आये मालूम होते हो, एक्ट्रेस भी कभी मिस हुई है?’ हीराबाग धर्मशाला में रहना और रोज़ रणजीत तक पैदल जाना-आना। दैनिक बजट महज चवन्नी का। इस चक्कर में बीमार-से रहने लगे। बम्बई से विदा ली। घर लौटे। फिर लाहौर गये। दो-तीन महीने पंचोली में रहे। मिस्टर मल्होत्रा के साथ असिस्टेण्टी का चक्कर चलाया। मगर बात कुछ बनी नहीं। प्रेम-पत्र लिखने का अकसर अभ्यास करते रहे थे। तो यह तय पाया कि कैमरे-वैमरे का चक्कर छोड़कर कलम के सिपाही बनें। हमारे नाम से एक संगीत-रूपक किसी मसखरे ने लिख दिया था। तो हमें मुफ्त की बधाइयाँ मिलने लगी थीं। खै़र साहब, इस चक्कर में हमने बधाइयों के लायक बनने की कोशिश की। दिल्ली आ गये। रेडियो-वेडियो के लिए लिखने लगे। शादी का भी चक्कर चलाया- प्रेमपूर्वक। घरबारी, संसारी हुए। ज़िन्दगी कुछ बनती नज़र आयी, लेकिन हमारी तो क़िस्मत ही साली उससे लिखी हुई है, समझे न! एक दुर्घटना से पत्नी का देहान्त हो गया। टूट गये भीतर से। दिल्ली छोड़ दिया। लखनऊ गये। वहाँ सरकारी फ़िल्म विभाग में नौकरी का चक्कर चलाया। बस-बस, वही आइडियल स्टूडियोज। वहीं थे हम साब। एक फिल्म लिखी, डायरेक्ट भी की। लेकिन वह चक्कर ही ख़त्म हो गया। हम रेडियो आर्टिस्ट सुशीला वैद्या की चिट्ठी लेकर बम्बई पहुँचे। ठाठ से दतिया पैलेस में ठहरे। ठाठ बड़े हमारे साहब। रहने के लिए आठ कमरे का महल, खाने के लिए पाव-उस्सल भी नहीं! दोस्तों की मेहरबानियों पर जिये। कुछ अपनी कारस्तानियों पर जिये। जब भूख का चक्कर बहुत परेशान करता, करीने से कपड़े-वपड़े पहनकर किसी बढ़िया होटल में जा बैठते। प्रेमपूर्वक खाना खाते। बिल देने के मौके पर जेब टटोलते हुए पाये जाते। पता लिखवा देते थे और फिर पता नहीं देते थे। तारा हरीश ने के.बी. लाल के यहाँ असिस्टेण्ट रखा दिया था। मजनू-मजनूकहा करता था अपने को। अगली पहली तारीख आयी कि उसने रुपये अस्सी देकर हमें रवाना कर दिया। तो हमने जूते ख़रीदे और लखनऊ तक के लिए टिकट। वहाँ चक्कर नहीं चला, तो घर पहुँच गये- वृन्दावन। घरवालों से हमारी यह खस्ता हालत देखी न गयी। आठ-नौ महीने जमकर हमारी सेवा हुई। हेल्थ- वेल्थ का चक्कर चला, समझे! तभी एम.ए. लतीफ साहब ने बुला लिया बम्बई। डार्लिंग फ़िल्म में पिचहत्तर रुपये माहवार पर असिस्टेण्टी की। पिचहत्तर रुपये से बम्बई में क्या बनता है! अँधेरी से एथ्रीलिमिटेड में बैठते और कहते- भई, वरली का टिकट दो।कण्डक्टर कहता कि वरली नहीं जाती, तो हम कहते हैं उतार दो।पार्ले में उतरे। ओटूपकड़ ली। कहा कि भिण्डी बाज़ार का टिकट दे दो। अगला कहता कि भिण्डी बाज़ार नहीं जाती। हम कहते कि उतार दो। इस चक्कर में जहाँ तक पहुँच गये, ठीक है। फिर विनोबा जी के चेले। बहुत बोर हुए। नये सिरे से कलम की नोक दुरस्त की। पहली फ़िल्म लिखी। राजपूत। ढाई सौ रुपये माहवार मिले। तबसे लेखक हैं, दूसरे लफ्जों में कड़के हैं। लाजवन्तीऔर शराबीजैसी फ़िल्में लिखते रहे और बीच-बीच में कंगाली का आलम लिखते रहे। ऐसे ही एक आलम में हम किसी के बालम बन बैठे। मलाड में हमारे मकान-मालिक की जो लड़की थी, उसे हम देखते थे और अकसर देखते ही रहते थे। प्रेम का चक्कर था साहब। और प्रेम में अपने सिफर हैं। फरुखाबादी खेल के कायल हैं। यानी हाथ पकड़ो और पूछो, क्या चक्कर है। चट मँगनी, पट ब्याह। सान्ताक्रुज स्टेशन की घड़ी के तले मिलते रहे और एक ऐसी घड़ी भी आयी कि कोर्ट में जा पहुँचे। कुबूल? कुबूल। बेकारी और बीवी, दोनों चीजें एक साथ निभाना, ख़ासा चक्कर था, साहब। लेकिन चलाया वह चक्कर। पिछले साल तो हम बोरिया-बिस्तर बाँधकर फिर वृन्दावन की कुंज गली में जा पहुँचे थे। फिर आ गये। हम तो बम्बई छोड़ दें, लेकिन बम्बई साली हमें नहीं छोड़ती!

मोटर ड्राइवर इनास लोबो बम्बई छोड़ना चाहते भी नहीं। आप बम्बई के हुस्न पर कुरबान हैं। कहते हैं-“हम डैली, कलकैटा और दूसरा बहुत शहर देकेला है मगर ऐसा माफिक, समझो, लड़की लोग किदर नई है। लड़की नई होने से जिनगी साला बेकार है। इधर हम दर मइना किसी को पकड़ता है। बयालिस रुपया का ख़र्च है, क्या? कैसा? कोई जाता दिके तो यह समझना पैला कि यह माल आता है कि नई? समझो सूरत में से मालूम होता कैसा? सीटी मारा, वह हँसा, क्या? माने दिल है उसका भी। दो दिन ऐसी किया, तीसरे दिन साथ-साथ चला, दोस्ती बनाया, क्या? पूछने का रजा किस दिन? उस दिन का दो बाक्स का टिकट निकालने का। कैसा? तीन तीन रुपये वाला। टैक्सी से ले जाने का। पाँच रुपया समझो टैक्सी और खाने-पीने का, फिर सेकेण्ड सो से सीधा ओटल। दिन भर काम करेगा तो आराम-मौज बी करेगा। क्या हुआ जो इक्कीस रुपये का ख़र्च, मौज की मज़ा। नई शादी बनायेला है मैं। समझो घर पर मदर है तीन ब्रदर हैं। फादर तो नहीं है। अच्छा सिस्टर भी समझो- एक। पन्द्रह साल तक मैं गाँव में था। ज़िला? मंगलूर। बीड़ी बनाता था, मजूरी करता था, समझो। बाई हमारा रुआब किया, तो गाँव से बाग गया। नेई लड़की लोग का कोई लफड़ा था नई। वह क्या था? जुआ-कुआ खेला कुछ ऐसा ही।

बाग के आया विदाउट। गाँव वाला इदर मिला नई बम्बई में। किसी को जानता भी नई था। पैसा भी नहीं था, क्या? कैसा? समझो भूखा मरके रहा। तो ओटल में काम किया। एक साल में कम से कम दस ओटल में नौकरी किया। अमको काम करना आता नेई। प्लेट-उलेट सब थोड़ता मैं। इसलिए हटाता था वह। उसका बाद मेकेनिक काम किया गाड़ी का, समझो छह महीना। मालिक ने ऐसे मुझे कपड़ा तोने को कहा, तो जकड़ा हुआ चोड़ दिया। मैरीन ड्राइव में समझो एक कम्पाउण्ड में सोता। वहाँ से भी दो मइन में अगाल दिया। अच्छा, फिर मैं सीधा गया दिल्ली। आठ-नौ आना था। एक घण्टा समझो, दो घण्टा ठैरा। ओटल में नौकरी देखा नई मिला। वापस बम्बई आया। कैसा? पूरा सात दिन में। टी.टी. आता, अगाल देता। सात दिन में भूखा रहा, क्या? बम्बई आके किसी कम्पाउण्ड में गया। गाड़ी तोने का धन्धा पकड़ लिया। ड्राइविंग सीख गया तो लाइसेंस निकाला। एक साल करके मंगलूर गया। उदर शादी किया। बीवी उदर ही चोड़ आया। रख दिया समझो रिजरवेशन करके। नरकिस का बाई था समझो अनवर उसेन। उसके पास ड्राइवरी किया। तभी समझो पहला लड़की मिला। गोवा का था। कैसा? अटरा साल का। उसको पता लगा मैं शादी किया, तो जकड़ा कर छोड़ दिया। फिर छोकड़ी मिला कारवार का। उसको कमसे कम दो मइना थी मेरे साथ। उसका बैन उठाकर ले गयी। तलाश किया, मिला नई। हाँ, शादी के बाद ही लड़की लोग पकड़ा। पहले समझेगा कैसा? कई जगह ड्राइवरी किया। फिर एक साहब मिला, उसका फिक्सेड काम नक्की बोला था। पगार अच्छा था, क्या? पच्चीस दिन के बाद समझो उसका हारट फेल हो गया। हमारा बुरा दिन आया। एक्सीडेण्ट हुआ, जुर्माना लग गया। चालू नौकरी अच्छा अपना। थोड़ा-बहुत पैसा जमा हो गयेला है, हमें दुकान निकालने का आइडिया है। फरुट का दुकान। बच्चा? एक नग निकाला है। तीन साल का लड़का है। बीवी? साथ में है। लफड़ेबाजी? समझो चलता है। कैसा? मइना में दो बार। बीवी नाराज़ कैसा होगा? उसको इन्दी पड़ेगा कैसा? कोई पड़ देगा तो हम कह देगा कहानीवाला ऐसा ही लिख देता है।

चार दिन जकड़ा होगा, समझो इसके लिए तुमको जूट क्यों बोलेगा हम। जो सच्ची बात होयेगा, वैसा कहेगा। अपना कमाता है, अपना उड़ाता है, किसी के बाप का नहीं।

पाप कैसा? जो करता नहीं ओ अन्सान दिखाओ। क्या? करता सब है, समझो, चुपाता है दूसरे से। हम चुपाता नई। कैसा? नरक में, अबी समझो, सबी तो जायेगा। हम भी चला जायेगा। अबी इदर तो मज़ा करो। कैसा?

रफूगर गुलाम हसन कश्मीरी भावुक प्राणी है। आपको बम्बई मार्का महीने की दो मोहब्बत में कोई आस्था नहीं। यहाँ तक कि मोहब्बत में भी आपकी आस्था डगमगा उठी है। बम्बई शहर में आप अपने को भुलाने के लिए, कहीं खो जाने के लिए, गरज यह कि गम गलत करने के इरादे से आये हैं। कहते हैं- मेरी सोला बरस की उमिर थी जब मैं गर से निकला। जिकर यह बारा साल पहले का। डाकूमिण्ट्री फ़िल्म शिरिनगर कश्मीर में दिकाता था सरकारी गाड़ी। मेरी बहेन का लरका साथ में लेकर में देकता था उसको। लरका बहुत कुबसूर्त था। बगल में एक नाजनीन उसको प्यार किया, बात किया। फिर न वो पिक्चर देकती है, न मैं देकता हूँ। ऐसा दिलचस्प बात हुए आँकों-आँकों में कि हम एक दूसरे के हो गये। वह बहुत बड़ा आदमी का लरकी। उससे फिर मुलाकात नहीं हुआ। दिन-ब-दिन में बिमार होता जाता हूँ। न कोई हिकीम इलाज कर पाता है, न डाक्टर। दरगाओं में जाकर सिजदे में रोया में। कबी बताया नहीं किसी को कुछ। मोलवी अता साब मुझसे पूछते हैं, बचा, क्या हुआ तुमको? मेरी आँकों से आँसू गिरने लगा। वह बोले, तुम छुप रहो, तुमारे दिल का हाल हम पर जाहिर है। ये दो दवा हैं, एक अबी लो, दूसरा कल। दवा लेने से कुछ फारगी हुआ मुजे। शिरिनगर की हर मंजर मेरे को काटने धौड़ता था। मैं अमरतसर चला गया। एक मीने उदर रहा। बुखार में पड़ा रहा। झीझा हमारा उदर आता था वापिस बुलाने, इस वजह से दिल्ली भाग गया। सात मीना उदर रहा। उदर चाचा आया, यानि के अंकल मेरा। मेरे से सब पूछा, क्या तकलीफ बचा तुमें? में बोल सका नहीं। रेवाज दूसरा है मेरे मुलुक का। ऐसे लव के बात उदर कहते नहीं। आतवार शाम को हमें शिरिनगर निकलना था, आतवार सुबह में बम्बई का टिकिट निकाला। शुरू में बहुत तकलीफ उठाये। में अपने मुलुक के रेवाज में रहता था। हिन्दुस्तानी जूबान भी साफ़ नहीं था। एक वाकिफ के साथ काम किया रफू का। आठ-नौ सौ रुपया जमा किया। फिर वार्डन रोड, पार्टनरशिप में दोकान निकाला। पार्टनर बदमास, जुआ खेलता, दारू पीता। वो मेरे पर कर्जा डाल के चला गया मुलुक। मैंने मिहनत से नयी दोकान चलाया। सात-आठ कारीगर भी कड़े कर दिये। एक रानी मेरे को कारपीट रफू का काम देने लगे पेडर रोड में। आडर यह निकालती है कि कश्मीरी पोंचें तो कोई रोको नहीं, सीधा मेरा कमरा में आने दो इसे। जब में जाते हैं तो सिंगार करते होते हैं। हाल पूचते हैं प्यार से। पसीने चूटते हैं उनका हुस्न देककर। लेकिन जभी वह पीठ पर हाथ रखकर कहते हैं, बचा, तुम गबराओ मत, हम तुमें अमदाबाद ले जायेगा, ज़ारों का काम दिलायेगा, इंसान बनायेगा, तो मैं समझता हूँ, ये माँ हैं मेरी। मैं मुलुक जाता हूँ। एक मीने में लौटने का वादा करके। लेकिन मुझसे देरी होता है। रानी साबा चला जाता है। कम्मर टूट गया मेरा। में सीदा सिनेमा जाता हूँ। एक के बाद एक तीनों शू देकता हूँ फ़िल्म बरसातका। मेरा आदत, सोबत बिगड़ता है। लोक कहता है तुम हीरो है, दलीप कुमार। में फिलिम लाइन वालों के पास जाता हूँ, वह हँसते हैं मेरा जुबान सुनकर। तो इदर इप्टा कोम्पनी जाइन कर लिया मैंने। ड्रामा में काम किये, जुबान सुधरा। फिलिम में एक्स्ट्रा रहे। एक बड़ा रोल मिला, स्टण्ट फिलिम में, लेकिन बेमार हो गया। हफ्ते के अन्दर तीन दिन बेमार, एक हज़ार कर्जा चढ़ा। बाड़ा नहीं दे सका। बदन पर सूट, पेट में काना नहीं। एक दिन एक अँगूठी मिली चाँदी की। मैं भूका था। अँगूठी बेची तो चार आना मिला कुल। एक आने की माचिस लिया, एक आने की बीड़ी। दो बन्द पाव लिए, समुन्दर किनारे बैठा। सूके पाव काये, आँसू से हलक तले उतारे। सोचता हूँ, यहीं मर जाओगे, अपनी मीट्टी में दफन नहीं मिलेगा। मैं मुलुक गया, बेन की मँगनी में। मुझे देखकर कुशी मातम में बदल गया। मेरे बाप ने कहा, यहीं रहो, कसीदाकारी का कारखाना है अपना, उसे देखो। में शायद रह जाता लेकिन हमशेरे की बात लेकर हमारा बाई ताना मारा। तुम परदेसी गर की बातों में क्यों बोलता? मेंने सोचा यहाँ मेरा कोई हक नहीं। छुपछाप दिल्ली गया में। कश्मीर के लोकों के साथ रहा। वहाँ सामने एक लरकी रहती थी, मुसलमान की। रोज़ चिलमन उठाकर देकती। में उसको लेटर लिखता हूँ रोजीना, दे नहीं पाता। बात भी होता नहीं। बस देकता है दोनू। फिर एक दिन देकता बी नहीं। आवाज़ सुनता हूँ, बस रोने का। और फिर चिलमन से एक हाथ निकलता है, मेंदी रंगा हाथ। अँकूठी देकता हूँ अँगुली में। फिर भी इस बात को आगे बढ़ाना चाती है वह लरकी। में कहता हूँ, बेफुजूल है। बर्तन ठोंस फेंक देती है, कहती है, एक बार आ जाओ पर। में ख़ुदा का नाम लेकर जाता हूँ। सारे लव लेटर दे आता हूँ। पढ़ती है वह, झरोखे में बैठकर, और रोती ही जाती है। मेरा आँसू भी थमता नहीं। कुछ लिखती है वह लरकी कहती है, उदर आओ गुस्लकाने की तरफ। वहाँ वह रखती है एक डिब्बे में एक कत, एक रोमाल, कुछ निशानियां मोहब्बत के। में जब तक आइस्ता आइस्ता उदर पोंचू, लरकी का बेन उठा लेती है, डिब्बे को। माँ-बाप को पता चलता है। में नमाज में बैठ जाता हूँ। बाप कालियाँ देकर चला जाता है। में लरकी से कहता हूँ इशारे से, चलो कोरट में जाएँ, निकाह कर लें। लेकिन लरकी पर पहरा है। मुजे कश्मीरियों ने गर से निकाल दिया है। मेरा कोई नहीं अपना, दिल का दर्द ही साती है। तो में फिर बम्बइ आता हूँ। मिहनत की रोटी कमाता और खाता हूँ। अपने आथ से काम करके। अच्छा-बुरा जो भी होगा, यही होगाμइसी परदेस में, शिरिनगर से बहुत बहुत दूर। यही मर्जी है मालिक की। मोहब्बत के लिए जिया हूँ में, उसी को तरसता एक दीन मर जाऊँगा। शायद वहाँ, दूसरी दुनिया में सची मोहब्बत हो।

गुलाम हसन का बयान रुँधे कण्ठ और डबडबायी आँखों में कहीं खो गया। मुझे अजहद चिढ़ हुई अपनी भावुकताहीन आधुनिकता से जिसके पास संकोच ही संकोच है, सहज सहानुभूति नहीं। चन्द्रकान्त मयेकर न गुलाम हसन की तरह भावुक है, न मिस्टर लोबो की तरह चालू है। मैं जिस गेस्ट हाउस में रहता हूँ, उसमें चन्द्रकान्त जनता की सेवा में नियुक्त हैं। चन्द्रकान्त का चेहरा-मोहरा और बातचीत कुछ ऐसी है कि वह निम्न मध्यवर्ग की बजाय मध्यवर्ग का प्रतिनिधि मालूम होता है। गेस्ट हाउस के अन्य नौकरों के बीच वह साफ़ अलग नज़र आता है। इस इण्टरव्यू के लिखित बयान देना ज़्यादा उचित समझा। आप भी पढ़िये- 1957 साल में मैं स्कूल से निकला, क्योंकि गरीबी के कारण मुझे स्कूल छोड़ना पड़ा और 1960 में मैं बम्बई आया। नौकरी के लिए बम्बई में 15 दिन बिगाड़ा। और उसके बाद मेरा एक दोस्त तुकाराम सोनकर मुझे जे.जे. अस्पताल में जाते समय मिला। मैंने उसको परिस्थिति क्या थी- यह बताया। उसने हम को नौकरी के लिए कुमकुम ले गया। मुझ को उसके जगह में लगाया। मैं वहाँ दो महीने रहा। मेरा एक लड़की से प्रेम था। उसकी वजह से मैं कुमकुम से निकला। लड़की के साथ पूना चला गया। मैं और वह दो-तीन साल साथ में रहे। उधर रोगार अच्छा नहीं था, इसलिए फिर बम्बई आ गया। गेस्ट हाउस में नौकरी फिर शुरू किया। मैं हिन्दी परिक्षा में बैठा और पहिला आया। मेरे पास पैसा जमा होने के बाद में मैंने दादर में एक खोली लेकर मेरे प्रेमिली को उधर रखा। मैं गेस्ट हाउस में ऐसा छोटा नौकरी करता हूँ, यह उसको मालूम नहीं। थोड़ा और पैसा होने से मैंने प्रेमिली को एक साड़ी भी ली। मेरा उसका प्रेम कभी हुआ कि जब मैं स्कूल में था, तब हम दोनों एक दूसरे को देखे थे। पहले देखकर हँसने लगी। बाद में बोलना शुरू हुआ। फिर एक दिन वह मुझे बोले कि चन्दू, तेरा प्रेम मेरे पास है। मगर मेरी इच्छा है कि हम दोनों बाहरगाम जायेंगे। तो हम पूना रहा, ख़ूब मज़ा की। लेकिन जब पैसा भी नहीं रहा तो लौटना ही पड़ा। नौकरी लगते ही मैंने मेरे दोस्त सोनू से बीस रुपया उधार लेकर मेरी प्रेमिली के लिए रासन भर दिया। जो कुछ हो सकता है, होता है, उसके लिए करता हूँ। हम दोनों का यह प्रेम-प्रकरण मेरे माता-पिता को अब तक मालूम नहीं है। एक बार मैं सैनिक में जाने का विचार था। लेकिन वजन कम होने से हुआ नहीं। मिल में मजदूरी भी मैं किया। लेकिन इज्ज़त, पैसा, शान्तता कहीं देखा नहीं। नोकरी मैं अच्छा ढूँढता हूँ लेकिन नौकरी कहाँ भी मिलती नहीं वैसी। मेरा अब नाइलाज है। जो सहारा है, बस प्रेमिली की है। उसका फोटू अपने बटुए में हमेशा रखता हूँ। वही हिम्मत बँधाता है।

हिम्मत बँधानेवाली की तलाश में हैं हमारे एक उत्तर भारतीय मित्र। कपड़े की फेरी करते हैं, लेकिन रहते किसी और ही फेर में हैं। अब तक उनकी

कोशिश कामयाब नहीं हुई है। नाकामयाबी का इतिहास उन्हीं से सुनिये-

नाँव हमार हय सुन्दर सिंह। गाँव अकौनी, डाकखाना बरनापुर, ज़िला गोंडा क रहयवाला हई हम। बम्बई हम आयेन पइसा कमाये, रोजिगार करे वास्ते। खेती? जमीन त काफ़ी हय बाकी त खेती अकेले के बस क नाहीं। यह से जमीन दै दिहिन अधिया पर, बँटाई पर। घर में केहू नाहीं हय। महतारी-बाप के मरे 4-5 साल होइ गवा। शादी? शादी नाहीं भवा। पइसा क तंगी रहा, यह से केहू आपन बिटिया देबय बदे तैयार नाहीं भवा। हाँ, कबौं-कबौं कोरियात जरूर रहेन। एक दाई मन बिगड़ा त आम देइके एक ठे मेहरारू फँसावत रहेन, तब तक हमार एक ठे दोस्त आय पहुँचा। ऊ पहिलै से ताड़े रहा, पेड़े के आड़े छिपा बैठा रहा। जैसैं हमार सब काम फिट भवा तैसैं ऊ मौहरायेस- हे हमहूँ हई। सब खेलि बिगड़ि गवा। बना काहे नाहीं। गाँव में भी बना अउर बहरे भी। घर क याद? हमेस आवत रह ला। ई फागुन महिन्ना में बिसेस। होली क याद, तीज-त्यौहार क याद, सगी-दोस्तन क याद, बाग-बगिया क याद, झुन्नू के महतारी क याद। अब का बताईं केकर-केकर याद आवत हय! रोजिन्ना क काजकरम? घंटा-दुइ घंटा घरे-दुआरे बइठना, फिर खेती-बारी क काम देखना, संझा बेर फिर अपने दुआरे पर बइठना। दम-वम? हुश, नाहीं। पढ़ाई? पहिली किताब पढ़े रहेन- दर्जा अलिफ। गाँव में प्राइमरी स्कूल रहल। बम्बई आये 4 साल होइ गवा। आय रहेन पइसा कमाये, बियाह करै बदे। पइसा क ज़रूरत? बियाह करै ख़ातिर पइसा क बहुत रूरत पड़त हय। पइसा रहल होत त कतौं सौ, दुइ सौ देइ के बियाह कइ लिहे होइत। बम्बई पहुँचे त अपने गाँव के तिवारीजी के इहाँ गये। कुछ दिन ओनही के इहाँ रहेन। कुछ पइसा क जोग कइके हम आपन धन्धा शुरू कइ दिहेन। कपड़ा क फेरी करै लागेन। गमछा, लुंगी, चदरा। व्यापार? व्यापार अच्छा चलत हय। आमदनी इहै 5-7 रुपिया रोज़ क। खर्चा डेढ़-दुइ रुपिया रोहोइ जाला। 90 पैसा होटल वाले के देई थ। खाई थ एकै जून, यह से ख़ूब डटि के भोजन करित हय। होटलवाला भी याद करत होई कि केहू मिलल बा। जमा? कुछ पइसा जमा ज़रूर कइ लिहेन। शादी ख़ातिर खोली? पहिले बियाह होइ जाय, तब खोली क कतौं इन्तिजाम करी कि पहिले खोलिए पर आपन कुल पइसा खरचि देईं। कोसिस? कोसिस काहे नाहीं करित। अपने जान-पहिचान क जेही मिल जात हय ओही से कहित हय कि रुपिया-पइसा जवन लगि जाय, हम देवै बदे तैयार हई। बियाहे ख़ातिर सबेरे-संझा रोनजर दौड़ावत रही ला। बाकी त जब कवनों मिलै तब न। अबहीं तक त कवनों नाहीं टकराइल। औरत क सूरत त बहुत देखे, मगर अपने अरथे कोई नाहीं आवा। एक ठे मराठिन क बिटिया एक दिन मिलल। ऊ हंसि के हमसे कहलेसि कि भइयाजी, ब्लाउज क कपड़ा लेइके आवा। वहका देखि के हमरो मन ललका। दुसरे दिन हम नीक-नीक छींट क कपड़ा लेइके गयेन ओकरे खोली पर। सोचली कपड़ा बेचै के बहाने कुछ बात बनि जाई। बाकी त ऊ उधार माँगत रहल अउर हम दिहे नाहीं। यहसे मामला कुछ बढ़ल नाहीं आगे। बम्बई में अच्छा लगे क जिन पूछा। इहाँ क हर चिजियै बहुत अच्छा हउवै। अच्छी-अच्छी बस्ती, बिल्डिंग। धन्धा-व्यापार ख़ूब होला इहाँ। बम्बई के अन्दर लच्छिमीजी क निवास हय। नीक-नीक मरद, मेहरारू अउर लड़िकी देखइ के मिलत हय। गाँव से त बम्बई बहुत अच्छी हय। इहाँ भले कबहूँ चांस नाहीं लागत, बाकी पइसा त मिलत हय। उत्तर प्रदेश क भी बहुत हइन इहाँ, बाकी त जोग नाहीं घटत हय। अरे हमरे साथे जे बियाह करी, ओकर हम जिनिगी सुधारि देब- कमाई के रस्ते से, सुख-सिंगार से, सब तरह ओका छकाछक रक्खब। कवनो किसिम क तकलीफ ओके न होये पाई। एक हमार दोस्त पूछिस कि कमर में ताकत भी हउवै कि बियाहै करल चाहत है। हमरे रिसि लागि गै, हम कहेन जौ नौ महिन्न में लड़िका न खेलवाय दिहिन त आपन मोंछ गदहा के पेसाब से बनवाय डारीं। बियाह कइके कुछ दिन बम्बई में रहब। फिर कुछ दिन देस में। इहाँ क धन्धा भी सँभारब अउर घरे क खेती भी। उमिर? इहै 39-40 साल। अरे जोशीजी, नेकी अउर पूछि-पूछि। शादी करवाइ द त जना धरमशाला बनवाइ दिहय। लड़की अच्छी होय चाहे कवनो जाति होय। चिजिया त एकै रही। उमिर न बहुत ज्यास्तिये होय, न ढेर कमै। आस दियाइ के निरास मत कइ दिह्या। अब आपय क भरोस बाय। बहुत पुन्न होई आपके।
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