Wednesday, 8 August 2018

प्रख्यात साहित्यकार व बहुमुखी प्रतिभा भीष्म साहनी के जन्मदिवस पर पढ़िये | भीष्म साहनी

(1915-2003)

प्रख्यात साहित्यकार व बहुमुखी प्रतिभा के भीष्म साहनी के जन्मदिवस पर पढ़िये...

उन पर बेजोड़ किताब लिखने वाले 
नयी आलोचना के विद्वान आलोचक श्याम कश्यप की बेहरीन किताब 

'भीष्म साहनी'

भीष्म साहनी: व्यक्ति और संगठनकर्ता
दरअसल, हमारे भीष्म जी थे ही इतने शालीन और सौम्य: अतिशय सादगी और अत्यन्त विनम्रता की विलक्षण प्रतिमूर्ति! हर किसी पर मिलते ही उनका सबसे पहला इम्प्रेशनयही पड़ता था; और निस्सन्देह, यह छवि ता-उम्र ऐसी बरकरार भी रही आती थी! दूसरी मुलाकात भी बन्ने भाई के सौजन्य से ही हुई थी। कई साल बाद, 1973 में, मेरे जनयुगका सहायक सम्पादक बनकर स्थायी रूप से दिल्ली आ जाने के बाद। बन्ने भाई भारतीय प्रतिनिधि मंडल के नेता केरूप में फ़्रो एशियन राइटर्स ऑर्गेनाइजेशनकेसम्मेलन में भाग लेने अल्मा अता (सोवितय संघ) जा रहे थे। मैं दैनिक जनयुगके फ़ोटोग्राफर केसाथ बन्ने भाई को विदा करने हवाई अड्डे पर गया था। यह भी, बस देखा-देखी ही थी। भीष्म जी को पिछली मुलाकात याद ही नहीं थी। हाथ मिलाते हुए शरारतन मैं इतना झुका था कि इतने वर्षों बाद भी जापानी हैंकी याद आने से बन्ने भाई मुँह फिराकर हँसी रोकने की कड़ी मशक्कत करते दिखे! मैं अपनी आदत से मजबूर था। गम्भीर और जिम्मेदार बनकर रहने की और हरेक से टकराने से, भरसक बचने की बड़े मामा  (श्री हरिशंकर परसाई, जिन्हें मैं अपने अभिन्न मित्रा राजकुमार दुबे की तरह बड़े मामाही कहता था) की सारी नसीहतें जबलपुर में ही, चलने से पहले, खूँटी पर टाँगकर दिल्ली आया था।

यहाँ भी बुजुर्गों की दाढ़ी खींचने (जो क्लीनशेव थे, उनकी टाँग खींचने) और छेड़छाड़ से मैं बाज़ नहीं आता था! बाद में खुद दाढ़ी रखने और अच्छा भला गम्भीर दिखते रहने के बावजूद! इसीलिए, भीष्मजी से मेरे सम्बन्ध अनजाने में ऐसे ही लगभग कामदीय’ (कॉमेडी वाले-हँसी मज़ाक के) बन गये थे; और सारी उमर ऐसे ही बने भी रहे। लेकिन अब इस विडम्बना को आप क्या कहेंगे कि उनसे दोस्ती की शुरुआत बड़े ही दुखद और त्रासदीय (ट्रैजिक) माहौल में हुई थी। दूसरी देखा-देखी के, बस चन्द ही रोज़ बाद। मेरा अनुमान है कि इस दोस्ती की नींव जाते हुए बन्ने भाई और सुभाष दा (मशहूर बाँग्ला कवि सुभाष मुखोपाध्याय जिनसे मैं पहले से परिचित था और कलकत्ता में कई बार मिल चुका था) ने रखी होगी- भीष्मजी को इस शरारती बच्चेकेबारे में खूब अच्छी-अच्छी बातें बताकर। कोई आश्चर्य नहीं कि बन्ने भाई ने अपने साथियों केसाथ जापानी हैंवाला लतीफ़ा भी शायद साँझा किया हो।

भीष्मजी आल्मा अता से फ़ौज़ और एक सोवियत लेखक (मुझे ठीक से याद नहीं, शायद कवि सुलेमानोव) के साथ बन्ने भाई का पार्थिव शरीर लेकर लौटे थे। हीं सम्मेलन केदौरान दो दिन पूर्व, 13 सितम्बर को बन्ने भाई को दिल का दौरा पड़ने से, अचानक उनका निधन हो गया था। हम लोगों को पता दूसरे दिन लगा था। एक और विडम्बना देखिए कि 13 सितम्बर को ही दैनिक जनयुगके पहले अंक का अजय भवन में, एक भव्य समारोह में लोकार्पण किया गया था; जिसकी पिछले तकरीबन एक माह से हम डमीनिकालकर, पिछले 13 दिन से प्रचारित करते हुए, देश-भर में भेजकर फ्रीवितरित करवा रहे थे। डमीके ही पिछले एक रविवारीय संस्करण में अल्मा-अता सम्मेलनके बारे में बन्ने भाई का लेख तथा एक नये फेडरलरूप वाले संगठन केरूप में प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) के पुनर्गठन की ज़रूरत पर भीष्मजी का और मेरा, दो लेख छपे थे। बन्ने भाई (जो कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद केसदस्य और पार्टी केकलचरल फ्रंटके इंचार्जथे) के नेतृत्व में ही पिछले लम्बे अर्से से प्रलेस के पुनर्गठन की तैयारियाँ चल रही थीं, और जो इधर 2-3 माह से अन्तिम सोपान पर थीं। मेरा अनुमान है कि इस पुनर्गठित भावी संगठन केमहासचिव (जनरल सेक्रेटरी) केरूप में भीष्म साहनी का नाम पार्टी की सीईसीकी कल्चरल सब-कमेटीद्वारा तय हो चुका था और इस अत्यन्त महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी केएहसास ने (जिसकी सम्भवतः बन्ने भाई की देख-रेख में ट्रेनिंग चल रही थी) हमारे जापानीको और भी ज़्यादा विनम्र बना दिया था।
बहरहाल, बन्ने भाई का पार्थिव शरीर लाने के बाद, या शायद उन्हें सुपुर्दे-ख़ाक करने के बाद (मुझे ठीक याद नहीं) लौटते हुए, रास्ते में मुझे पीपीएच (जहाँ जनयुग का दफ़्तर था और जहाँ मैं ऊपर गेस्ट रूममें तब रहता था) छोड़ने तक, पंजाबी में ढेर सारी गुटरगूँ बातें करते-करते मैं और भीष्म जी पक्के दोस्त बन चुके थे।

हालाँकि वे लगभग मेरे पिता (जन्म 1912) की उम्र के थे (दिखते तो थे देवानन्द की तरह युवा और फ़िल्मी हीरो की तरह ही! बाद में तो मैं उन्हें और राजीव सक्सेना को प्रलेस के देवानन्द और अशोक कुमार कहने लगा था; पर भला हो नामवर जी का जो राजीव भाई को ययातिकहते थे) और वे मुझसे यार-यारकर के बातें कर रहे थे। भीष्मजी की यह भी एक बड़ी खूबी थी कि वे एकदम हमउम्र यारबाश दोस्तों की तरह घुलमिल जाते थे। बशर्ते कि आपसे खुल जाएँ और आप उनके एकदम अन्तरंग बन जाएँ! अन्यथा, भीष्मजी अत्यन्त विनम्र और सौम्य ही नहीं, बड़े संकोची, मितभाषी और बेहद शर्मीले इनसान थे। हरेक के आगे जनाब मैं किस काबिलतथा मैं तो ख़ाकसार, बन्दापरवर, आप महान तथा दानिशमन्द वाला उनका व्यवहार कभी-कभी तो बड़ी कोफ़्त और हददर्ज़ा खीझ भी पैदा करता था। बाज़ मौकों पर (और ऐसे मौके कई बार आते भी थे) जब कोई सामने वाला अक्ल का मारा इन बातों को सच मानकर नाजायज फ़ायदा उठाने लगता और फूल कर कुप्पा हो रहा होता तो उस गुब्बारे में पिन चुभोने तथा फिर भी ज़रूरत पड़े तो ऐसे दानिशवरों की सर्जरीकरने का नेक काम मुझे ही अंजाम देना पड़ता था!

भीष्मजी को नये संगठन का जनरल सेक्रेटरी बनाने केबारे में पार्टी का फैसला बिल्कुल सही था, क्योंकि वही अकेले ऐसे व्यक्ति थे जो पुराने प्रगतिवादीदौर के प्रलेस केटकरावों और व्यक्तियों की पुरानी आपसी रंजिश बचाते हुए, अपने शालीन, विनम्र और सुलह-सफ़ाई वाले स्वभाव से हर तरह के मतभेदों के बीच से रास्ता निकाल सकते थे। उन्होंने ऐसा किया भी। हम मज़ाक में कहा करते थे कि लेखकों को किसी संगठन में एकजुट करना तराजू में मेंढ़क तौलने जैसा ही है। लेकिन भीष्मजी ने यह करिश्मा भी कर दिखाया! एच.के. व्यास ने पार्टी की काम-काज की और सांस्कृतिक भाषाअंग्रेज़ी में ड्राफ्ट मेनिफ़ेस्टो’ (घोषणापत्र का मसौदा) बनाया जिसे पहले शायद बन्ने भाई और भीष्मजी ने मिलकर बनाना था। एच के व्यास साहित्यकार नहीं थे, पर दुर्भाग्य से साहित्यानुरागी भी नहीं थे; जैसे कि पुराने नेताओं में डांगे, नम्बूदिरिपाद, पी. सी. जोशी थे; या मौजूदा नेतृत्व में मोहित सेन और योगीजी थे। राजबहादुर गौड़ तो खुद भी उर्दू केअच्छे लेखक थे। अच्छा होता कि इस सांस्कृतिक मोर्चेकी ज़िम्मेदारी पार्टी सीईसी के ही एक अन्य सदस्य मोहित सेन को दी जाती और ड्राफ्ट मेनिफ़ेस्टोमोहित, भीष्म और का. राज बनाते! बहरहाल, पार्टियों और उनकेनेतृत्व की अपनी समझ होती है! कम्युनिस्ट पार्टियाँ भी अपवाद नहीं हैं।

भीष्मजी और मैं जब इस मेनिफ़ेस्टोका हिन्दी में अनुवाद करने बैठे तो मेरा तो दिमाग ही भन्ना गया! मैं कुछ कहता कि भीष्मजी ने मुस्कुराकर धीरे से कहा, श्यामजी, मेनिफ़ेस्टोतो व्यासजी ने बड़ा अच्छा बनाया है, पर यह कुछ ज़्यादा ही पॉलिटिकल नहीं हो गया! लेखकों, कलाकारों केसंगठनों...!मैंने बीच ही में बात काटकर कहा, ‘बहुत खराब बना है। बहुत बड़ा भी है। एडिट करके इसे चौथाई किया जा सकता है। इसकी भाषा भी बड़ी ठस है। हमें इस बारे में व्यासजी से बात करनी चाहिए। मेनिफ़ेस्टो का ड्राफ्ट आप बनाइए। ज़रूरी समझें तो चाहे व्यास जी के इस ड्राफ़्ट में से राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थिति के दो या तीन पैरे संक्षिप्त करके ले लीजिए। इस तरह उनका योगदान भी शामिल रहेगा।लेकिन भीष्म जी ने कानों को छूकर मना कर दिया। वे बोले कि वे ठीक नहीं समझेंगे। उन्हें बुरा लग सकता है।वे इस पर भी आना-कानी करने लगे कि कम-से-कम हम अपनी राय तो व्यासजी को बता ही सकते हैं। जब मैंने  ज़ोर दिया तो मेरी राय से पूरी तरह से सहमति जताते हुए भी, कहने लगे कि मैं कह नहीं सकूँगा, चाहें तो आप कहएि।भन्नाकर मैंने असहयोग कर दिया और अनुवाद अकेले बुजुर्गवार बेचारे हमारे भीष्मजी ने किया। मुझे नहीं मालूम कि उर्दू अनुवाद ताबाँ साहिब ने किया था या अजमल ने? क्या पता कि शायद वह भी भीष्मजी ने ही किया हो! जब कमेटी में उस पर विचार किया गया तो लगभग सभी ने ड्राफ्टकी आलोचना की। भीष्मजी को इसे नये सिरे से तैयार करने को कहा गया तो वे आना-कानी करने लगे कि उनकी समझ व्यासजी से बेहतर नहीं हो सकती। बहरहाल, कॉमरेड राजबहादुर गौड़, व्यासजी, ताबाँ साहिब, राजीव सक्सेना और भीष्मजी की एक ड्राफ्ट सब-कमेटी बनाकर यह समस्या भी हल कर ली गयी। मैंने डॉ. नामवर सिंह का नाम सुझाया जो राजीव भाई और व्यासजी ने फटाक् से दरकिनार कर दिया!

नया संक्षिप्त ड्राफ्ट मेनिफ़ेस्टोमंजूर होने के बाद, उसे पहले 51 फिर 21, अन्ततः भारी बहस-मुबाहिसों के बाद, 31 लेखकों केनाम प्रस्तावकोंके रूप में अन्तिम रूप से तय हो जाने के बाद, हिन्दी उर्दू और अंग्रेज़ी में तत्काल जारी करने का फैसला किया गया। इन 31 लेखकों केड्राफ्ट मेनिफ़ेस्टोपर हस्ताक्षर कराने की ज़िम्मेदारी के निर्वाह के लिए इन पंक्तियों के लेखक को भी शामिल किया गया। डॉ. रामविलास शर्मा और अमृत राय ने इनकार कर दिया। एच.के. (व्यास) को लिखे उनके पत्रों में कई आपत्तियाँ उर्ठा गयी थीं। अमृत राय ने भीष्मजी को अलग से भी ख़ासा लंबा पत्र लिखा था जिसमें पुराने मतभेदों, आरोपों और झगड़ों के ढेरों सन्दर्भ थे।

बहरहाल कमेटी के फैसले के अनुसार दोनों को मनाकर हस्ताक्षर लेने के लिए मैं और भीष्मजी पहले आगरा, फिर इलाहाबाद गये; पर दोनों मिशन इम्पॉसिबल नाकाम ही रहे! लेकिन इन दोनों यात्राओं में भीष्मजी से निकटता और अन्तरंगता तो बढ़ी ही, उनका एक भिन्न रूप भी देखने को मिला, एक बेहद ज़िन्दादिल और हँसी ज़ाक करने वाले इन्सान, विलक्षण व्यंग्यकार और अत्यन्त विटी’! उन्हें ऐसे-ऐसे लतीफ़े याद थे कि दोनों सफ़र हँसते-हँसते कटे।

आगरा तो हम सुबह चलकर रात वापस आ गये, पर इलाहाबाद अमृत राय के  पास एक दिन रुककर दूसरे दिन लौटे। रामविलासजी से मैं कुछ अरसा पहले भी गीताजी और प्रमोद-दम्पति केसाथ मिल चुका था। उन्होंने बड़े प्यार से समझाया कि अपने अध्ययन और योजनाबद्ध लेखन-कार्य केकारण वे कहीं नहीं आते-जाते और किसी भी संस्था या संगठन से नहीं जुड़ सकते। उन्होंने अपनी पत्नी की गम्भीर बीमारी का भी हवाला दिया। मैं तो ज़्यादतर चुप ही रहा, पर भीष्मजी जैसी विनम्रता, आदर और हर तरह के तर्कों से उन्हें मनाने की कोशिशें करते रहे, यह अपने-आपमें बड़ा ही दिलचस्प और अद्भुत था। यहाँ तक कि रामविलासजी भी उनके ऐसे विनम्र, शालीन और अतिशय सौम्य व्यवहार से बड़े प्रभावित दिखे। हम लोगों को विदा करते हुए उन्होंने मेरी ओर मुड़कर कहा, ‘अगर तुम लोग भीष्मजी को जेनरल सेक्रेटरी बनाओगे तो तुम्हारा संगठन पहले की तरह सभी भाषाओं के साहित्यकारों को जोड़ सकेगा और सम्पूर्ण भारतीय साहित्य का नेतृत्व करेगा।लगभग ऐसा ही कुछ, सम्भव है जोड़ सकेगाकी जगह संगठित कर सकेगाजैसा कुछ कहा हो! जो भी हो, रामविलासजी की भविष्यवाणी शत-प्रतिशत सही साबित हुई! अमृत राय को पहली बार देखा था। भीष्मजी की तो पुरानी पहचान थी। मुझे लगा जैसे प्रेमचन्द को देख रहा हूँ! छपे-हुए चित्रों में देखे प्रेमचन्द के जैसा ही चेहरा-मोहरा और पतली सी आवाज़ जो बीच-बीच में उत्तेज़नावश और भी तीखी और पतली हो जाती थी। गुस्से में भी बड़ी प्यारी और सुरीली। गुलाबीपन लिए हुए झक्क सफ़े, गोरा चेहरा! ऐसा कि उँगली से गाल छू लूँगा तो खून की बूँदें टपकने लगेंगी! वे तमाम शिकायतें करते रहे, पर अन्त में यह कह कर विदा किया कि संगठन की गतिविधियाँ देख-परख कर, भविष्य में सहयोग की सोच सकते हैं। और सहयोग किया भी; परसाईजी और भीष्मजी केअनुरोध पर 1980 में जबलपुर महासम्मेलन में आये भी; और एक सत्र के अध्यक्ष मंडल में भी रहे। हँसी-मज़ाक में शमशेर को डाँटते भी रहे और केदारनाथ अग्रवाल-नागार्जुन से छेड़छाड़ भी करते रहे।

दरअसल, दिल्ली में बुजुर्ग साहित्यकारों में मेरी सर्वाधिक निकटता और गहन अन्तरंगता शमशेरजी और भीष्मजी से ही पनपी। लगभग हमउम्र या ख़ास दोस्तों की तरह। मजे़ की बात यह कि दोनों ही निहायत संकोची, अत्यन्त शालीन और बेहद विनम्र! मैं प्रायः दोनों से शरारतन छेड़छाड़ करता रहता था। शमशेरजी से कुछ ज़्यादा (भई, दोनों कवि हुए न!) बख्शता भीष्मजी को भी नहीं था। वे भरपूर मजा लेते; और कभी-कभी अपने विटसे खुद भी छक्काउड़ाकर बाउंड्री पार करा देते! उनमें हास्य-व्यंग्य की विलक्षण प्रतिभा थी। बड़ी मासूमियत के साथ कभी वे ऐसा महीन व्यंग्य करते कि सामने वाले को लाजवाब कर देते और खुद चेहरा गम्भीर और भोलाभाला बनाए रखते कि साहिबो, मैंने तो कुछ किया ही नहीं, कुछ कहा ही नहीं! उनके साथ प्रलेस के सम्मेलनों-सेमिनारों के सन्दर्भ में दूर-दूर की बड़ी यात्राएँ कीं। वे अपने लिए कुछ भी नहीं करने देते थे, जबकि साथ जाने वाले की हर छोटी-बड़ी सुविधा का ख्याल रखते थे। आप कुछ करना भी चाहें, तो तनकर खड़े हो जाते और सामने की लटें हाथ से पीछे फेंकते हुए कहते यार, मुझे बूढ़ा समझते हो!फिर एकदम बड़ी अदा से तिरछे झुककर हफी जालंधरी की पंक्ति दोहरा देते अभी तो मैं जवान हूँ, अभी तो मैं जवान हूँ...

गया सम्मेलन के लिए जाते समय हम दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर केहिन्दी, उर्दू, पंजाबी और कश्मीरी भाषाओं के सभी तकरीबन 30-32 लेखक, स्लीपर क्लास में एक ही डिब्बे में, एक-साथ चल रहे थे। हमें बाहर के लेखकों ने किराए केपैसे पहले ही भिजवा दिए थे, जो सभी तब हमारे निरन्तर सम्पर्क में थे। राजस्थान से भी छह-सात लेखक जानेवाले थे, पर किसी के भी पैसे निर्धारित तिथि तक नहीं पहुँचे थे। इनमें तीन मेरे प्रिय मित्र  मोहन श्रोत्री, स्वयं प्रकाश (दोनों सम्पादक क्यों’) और कवि विजेन्द्र भी थे। वे हर हालत में जाने के  दिन तक पहुँचने का वायदा कर चुकेथे। अतः मैंने जनयुग से एडवाँसलेकर उनके भी अपने साथ ही टिकट रिजर्व करवा लिए थे। राजीव भाई ने मुझे बाकी तीन, विजयदान देथा (बिज्जी), डॉ. विशम्भर नाथ उपाध्याय और वेदव्यास के भी टिकट कराने को कहा कि इनकेलिए मैं पैसे दे दूँगा। उन्होंने समय पर न पैसे दिए, मैंने इनकेटिकट कराए। दुर्भाग्य से ट्रेन छूटने तक भी न विजेन्द्र पहुँचे, न मोहन श्रोत्रीय और न ही कथाकार स्वयं प्रकाश! तीनों केटिकट भी वापिस नहीं हो पाए और ट्रेन चल पड़ी! गया से लौटने पर जब मुझे एक जून को मई की तनखा मिली।

तो लिफ़ाफ़े में चन्द रुपये ओर कुछ चेंज मात्रा देखकर मैं भड़क गया। कैशियर जैन साहेब ने निहायत प्यार से समझाया कि कामरेड! आपने गया के तीन टिकटों के  लिए जो एडवांस लिया था, वह काटकर इतने ही बचते हैं!लगभग पूरा वेतन ही कट गया था! मैं लिफ़ाफ़ा वहीं पटककर चला आया। बाद में व्यासजी की कृपा से पूरा वेतन मिला और अगले माह से पाँच बराबर किश्तों में कटौती करने का एकाऊँट्स डिपाट्मेंटको आदेश। तीनों मित्रों से एक धेला भी नहीं! जब गये ही नहीं, टिकट इस्तेमाल ही नहीं किया, तो पैसे काहे के ! इस तरह यह साहित्य और प्रगतिशील लेखक संघ केलिए मेरी पहली कुर्बानीथी। तब मुझे बिल्कुल अन्दाजा नहीं था कि आगे-आगे और क्या-क्या होने वाला है? यह किस्सा इसलिए कि जब भीष्मजी को पता चला तो उन्होंने अकेले में अपनी जेब से मुझे पैसे देने की पेशकश की। सख़्ती से मना करने पर भी जबरदस्ती नोट मेरी जेब में ठूँसने की विफल कोशिशें करते रहे। बाद में भी मिलते ही, कई दिनों तक अफसोस जताते रहे। ऐसे ही थे हमारे भीष्मजी!

यह अविस्मरणीय और ऐतिहासिक यात्रा थी। रास्ते भर जगह-जगह से लेखक इस ट्रेन में सवार होते गये थे। जिनके रिजर्वेशन कन्फर्मनहीं हो पाए थे, उन्हें भी हमने अपने डिब्बे में चढ़ाकर ऐडजस्टकिया। पहली छह बर्थों में नीचे भीष्मजी और ताबाँ साहिब थे और मिडिल में कमर रईस और अजमल तथा सर्वोच्च शिखर पर मैं और योगेश कुमार। सामने साइड लोअर और अपर पर दीनानाथ नादिम (कश्मीर) और प्रो. जगन्नाथ आज़ाद (जम्मू) थे। इलाहाबाद में अजमल अजमली के भाई-भतीजे कई टोकरों में भरकर रूमाली रोटियाँ और स्वादिष्ट कबाब की टिक्कियाँ, शीरमाल और जाने क्या-क्या खाने-पीने की ढेरों चीज़ें लाए। दोपहर को और रात को सभी के जी-भरकर लंचऔर डिनरलेने केबाद भी, रूमाली रोटी और कबाब बच रहे। इलाहाबाद से ही कामतानाथ (कानपुर), अजित पुष्कल और सतीश जमाली आदि 8-10 और लेखकों को भी यहीं ऐडजस्ट किया गया जिनकी सीटें नहीं थीं। गया तक प्रायः यही आलम रहा। शाम गहरी होते ही ताबाँ साहिब की सदारत में रसरंग के साथ जो कविताओं और शेरो-शायरी का समाँ बँधा कि लगभग पूरी रात मुशायराचलता रहा- भोर में, गया पहुँचने तक; जहाँ सुरेन्द्र चौधरी, खगेन्द्र ठाकुर और नईम साहिब के नेतृत्व में बिहार के लेखकों और दर्जनों कार्यकर्ताओं का भारी हुजूम फूल-मालाओं, बैनरों और नारों तथा इप्टाके क्रांतिकारी जनगीतोंके साथ स्वागत-सत्कार केलिए मौजूद था। प्रगतिशील लेखक संघ के पुनर्गठन के इस ऐतिहासिक मौकेपर, गया स्टेशन पर, शायद ही कोई होगा जिसकी आँखों की कोर न भींगी हों! ऐसा ही भावभीना और भावुकतापूर्ण माहौल रात को उद्घाटन के समय भी था। मैं, मास्टर साहब (मोहन श्रीवास्तव) और धड़कनजी (सुरेश शर्मा) तीनों घूम-घूमकर ज़ारा ले रहे थे। कई बड़े-बूढ़े और बुजुर्ग लेखकों की आँखों से भावावेश में आँसुओं की धार बह रही थी। विश्वनाथ त्रिपाठी की अश्रुपूरित आँखें देखकर, आदतवश उन्हें छेड़ने बढ़ा तो मुँह से बोल नहीं फूटा और दृष्टि धुँधली होती देख एहसास हुआ कि अरे! यह तो मैं भी रो रहा हूँ! तभी भरी-आँखें लिए कामतानाथ आ गये और हाथ मिलाने लगे तो देर तक हाथ झुलाते रहे और रोते रहे! भरी-आखों से सतीश कालसेकर और दीपेन-दा (परिचय-सम्पादक) आये तो देर तक गले मिले। मंच पर भीष्मजी और ताबाँ साहिब की आँखें देख नहीं पा रहा था, पर बोलते हुए भावावेग से रुँधे कंठ यही चुगली खा रहे थे कि आँखें उनकी भी सूखी नहीं होंगी! यह ऐसा ही महान और ऐतिहासिक अवसर था। पचास के  दशक में तत्कालीन महासचिव डॉ. रामविलास शर्मा के हटने पर, सन’ 53 के बाद से बिखराव केउपरान्त बाईस साल बाद, एक बार फिर यह वेगवती लहर उठी थी! इस क्षण की आप कल्पना नहीं कर सकते! इसे वही समझ और महसूस कर सकते हैं जो उस ऐतिहासिक मौके पर वहाँ साक्षात् मौजूद थे।

दूसरे दिन की विचार गोष्ठी और रात (व्यासजी की अध्यक्षता में) पार्टी लेखकों को मीटिंगदो बातों केलिए याद की जाती रहेंगी: पहली यह कि व्यासजी अध्यक्ष मंडल में हिन्दी से शिवमंगल सिंह सुमनके नाम पर अड़ गये। और हम लोग, ख़ासकर राजीव सक्सेना, विश्वनाथ त्रिपाठी, मास्टर साहब (मोहन श्रीवास्तव), कामतानाथ और मैं, कवि केदारनाथ अग्रवाल केनाम पर! बहस इतनी उग्र हो गयी कि भीष्मजी की अपीलों के बावजूद मैं उठकर गुस्से में लगातार बोलता रहा, जब तक कि त्रिपाठी जी और दीपेन-दा ने दोनों हाथ खींचकर मुझे नीचे नहीं बिठा दिया। अन्ततः भीष्मजी की तज़बीज पर मतदानहुआ और हमने व्यास ऐंड कं. को बुरी तरह से हरा दिया। जब व्यासजी ने दोनों के नाम जुड़वा दिये, तो कमर रईस और अजमल ने आज़ादी से पहले की मुस्लिम लीगकी तरह बैलेंस करने के नाम पर उर्दू से भी अध्यक्ष मंडल में दो नाम रखने की अपील करते हुए ताबाँ साहिब का नाम जुड़वा दिया। अन्य भाषाओं में कोई विवाद नहीं हुआ। भीष्मजी तो महासचिव-पद पर सभी की सर्वसम्मत और एकमात्र पसन्द थे ही! राष्ट्रीय समिति के लिए भी नामों की फ़ेहरिस्त, देश-भर से, सभी भाषाओं के लगभग सभी पीढ़ियों के प्रमुख लेखकों के नामों केसाथ तय की गयी।

दूसरे दिन, विचार गोष्ठी में सभी भाषाओं में साहित्यिक परिदृश्य पर पर्चे पढ़े गये। प्रायः सभी भाषाओं में सम्पूर्ण परिदृश्य पर एक-एक और बाँग्ला में (कविता तथा कथा-साहित्य और आलोचना) दो, क्रमशः शायद सौरी घटक और दीपेन-दा, जिन्होंने आलोचना पर पर्चा न होने के कारण अन्तिम क्षणों में कथा साहित्य के  साथ आलोचना जोड़ी थी। यह भी सम्भव है कि विषय उलटरहे हों। हिन्दी-उर्दू में तीन-तीन पर्चे पढ़ेगये। उर्दू में कमर रईस, अजमल अजमली और जगन्नाथ ज़ाने तथा हिन्दी में सुरेन्द्र चौधरी (कथा-साहित्य), मोहन श्रीवास्तव (कविता) और राजीव सक्सेना (आलोचना) ने पर्चे पढ़े। एक ख़ास बात यह थी कि लिखित पर्चा मात्र एक ही था, जो सचमुच पढ़ा गया, हमारे राजीव भाई का! बाकी सब पढ़े गयेकेनाम पर नोट्सया मौखिक व्याख्यानकी परम्परा का निर्वाह किया गया था। संगठन सत्र में भीष्मजी केलिखित (शायद) तवील-लेख के अलावा। राजीव भाई केपर्चे पर जबर्दस्त हंगामा हो गया। ओपनर बैट्समैन की जोड़ी रही नन्दकिशोर नवल और श्याम कश्यप! राजीव भाई ने हर ऐसे ऐरे-गैरे नत्थूखैरे के  नामों की लम्बी-चौड़ी आलोचकों की फ़ेहरिस्त गिना डाली थी; यहाँ तक कि जिनके मुँह से अभी दूध की गँध भी नहीं मिटी थी, (‘मुख दधि लेप किए’) और जो अभी कलम पकड़ना ही सीख रहे थे, उन सभी के नाम थे, पर नहीं नाम था कहीं भी तो डॉ. रामविलास शर्मा का! नवलजी ने तो बड़ी शालीनता से इस चूककी ओर इशारा किया, पर माबदौलत तो अपने तीखे व्यंग्य-बाणों के साथ राजीव भाई पर पूरे फ़ौज-फाटे और लाव-लश्कर के साथ चढ़ धाए! बाद में, भीष्मजी ने कहा भी कि यार ऐसी बड़ी गलती कैसे हो गयी!राजीव भाई की सफ़ाई थी कि एक तो पर्चा संक्षिप्त है (सभी को मात्रा ढाई से तीन पेज के पर्चे का ही अनुरोध किया गया था), दूसरे, मैंने तो समकालीन आलोचना पर ही तो लिखना था, कोई इतिहास तो नहीं बखानना था!मैं फिर फट पड़ा था कि निराला की साहित्य-साधना का लेखक समकालीन नहीं है! आप खुद क्या है? इधर लिखा क्या है आपने? पिछले दस साल का ही बता दें!आदि-इत्यादि। भीष्मजी ने बीच-बचाव किया। राजीव भाई से तो पिण्ड छुड़ाकर भागते ही बना। आख़िरकार, भीष्मजी ने कहा, ‘यार, गलती तो की ही राजीव ने, बहुत बड़ी गलती, पर तुम्हें भी उसकी उमर का तो ख़्याल रखना चाहिए था। नवलजी ने देखो कितने सलीकेसे अपनी बात रखी।नवलजी से यही पहली देखा-देखीथी जो कालान्तर में घनिष्ठ मित्रता में विकसित हुई। शायद तभी से नवलजी भी भीष्मजी की निगाहों में चढ़ गये, जिनकी वे बराबर प्रशंसा करते नहीं थकते थे। दरअसल, वे ऐसे ही शिक्षक और गहरे पारखी थे! लोगों की गलतियों और कमियों को नजरअन्दाज करना, ज़रूरी लगे तो अकेले में ऐसे समझाना कि न उसे ठेस लगे और न ही उसकेअहंपर चोट पड़े! इसी तरह किसी केभी गुणों और किस काम केलिए कौनसर्वाधिक उपयुक्त है, इसकी भी उन्हें बड़ी सटीक और सूक्ष्म पहचान थी।

एक बार लोगों की ज़ोरदार फ़रमाइश पर ठीक ऐसी ही मिमिकरीकी गुस्ताख़ी मुझसे शीलाजी के सामने भी हो गयी! शायद सुदर्शन सोबतीजी केइसकस दफ़्तर में नियमित मासिक रचना-गोष्ठी खत्म होने के बाद गप्पशप और चाय-पान के दौरान। मैंने भीष्मजी के कैरीकेचरकी ऐसी प्रामाणिकप्रस्तुति पेश की कि शीलाजी ने पूरी संजीदगी से कहा: भीषम! इतनी विनम्रता भी किस काम की कि ज़ाक बन जाए!भीष्मजी बगलें झाँकने लगे। फिर तो लोग शीलाजी-भीष्मजी के संवादों की नकल करने केपीछे ही पड़ गये। मुझे क्या फर्क पड़ता, मैं तो चिकना घड़ा था; बल्कि कुछ ज़्यादाबल-खम और घुमावों वाली नक्काशीदार सुराही’, वह भी टेढ़े मुँह वाली! शनिवार की रचना गोष्ठियों के बाद हमारे इसरार पर कई बार भीष्मजी और शीलाजी मोहनसिंह प्लेस (कॉफ़ी हाउस) भी साथ चल देते थे। पर उस दिन शीलाजी का मुँह इतना गम्भीर और फूला हुआ था कि वे उन्हें सीधे कार में बिठाकर ईस्ट पटेल नगर (घर) ले गयीं! मैं इतना ढीठ हूँ कि घर पहुँचने पर घटित होने वाले संवादों और भीष्मजी की मिमियाहट की भी तीसरी प्रस्तुति पेश लग गया। हाय! योगेश होते तो इनाम में कम-से-कम तीन प्याले कॉफ़ी जरूर पिलाते! वे उस दिन आये ही नहीं थे! अगर डॉ. रामविलास शर्मा की पत्नी-भक्ति और अम्माजीका अत्यन्त ख्याल रखने को कीर्तिमान माना जा सकता है तो हमारे भीष्मजी भी उनसे इस मामले में कोई कम नहीं थे।

भीष्मजी सचमुच ऐसे ही थे! और यह तो सभी जानते हैं कि शीला जी की सार्वजनिक डाँट-फटकार से बड़ा सहमे-सहमे भी रहते थे! कई बार दूतावासों या (राजकमल प्रकाशन की मालिक) शीला संधु की पार्टियों में नया गिलास उठाने पर शीलाजी (श्रीमती साहनी) के टोकते ही (भीषम, बस्स करो हुण; तुसीं गड्डी, बी चलाणी ए) झट गिलास मुझे थमाकर डिनर की प्लेट थाम लेते! गड्डी चलाणे के प्रसंग में एक और किस्सा याद आया। एक बार बड़ा भीषण एक्सीडेंट हो गया था। ज़ाहिर है, ड्राइव तो भीष्मजी ही कर रहे थे। हुआ कुछ ऐसा कि भीष्मजी तो लगभग बच गये पर शीलाजी गम्भीर रूप से घायल हो गयीं। शायद जबड़ा टूट गया था। ठीक होकर घर आने केबाद जब मैं, राजकुमार सैनी और केवल मिजाजपुर्सी के लिए पहुँचे तो केवल ने अपनी आदत के अनुसार बैठते ही बोफोर्स का गोला दाग दिया: गड्डी कोण चला रया सी?’ दो दोस्तों में झगड़ा कराने में प्रलेस के  हमारे नारदावतारकेवल गोस्वामी को ख़ासी महारत हासिल है और पति-पत्नी को भिड़ाने में विशेषज्ञता! वह ऐसे ही सींकलगाकर बड़ी मासूमियत से शान्तचित्त हाथ सेंकता रहता है। सुनते ही शीलाजी फट पड़ीं: गड्डी कोण चला र्यासी....भीषम, हौर कोण? देखो, आप तो साबुत सही-सलामत, मेरा जबड़ा तोड़ दिया।उन्हें अभी भी बोलने तक में बड़ी तकलीफ़ हो रही थी। भीष्मजी बेचारे जैसे-तैसे सफाई देने में लगे थे: शीला, मेरी गलती नईंसी। गड्डी चलाण वाले नूँ कदी बी टोका-टोकी नीं करणी चाइदी। दायें से लो, बाएँ से लो, इधर से काटो; सुन-सुनकर ड्राइव करने वाला कन्यू हो जाता है। जिसके हाथ में स्टीयरिंग, फैसला उसी को करने देना चाहिए।हम लोग सारा मारा समझ गये। स्टीयरिंग भीष्मजी के हाथ में रहते हुए भी, आख़िरकार दिशा-निर्देश और मार्गदर्शन तो शीलाजी केही चलते थे! यारो, उन दोनों की अद्भुत और बड़ी प्यारी-सी गृहस्थी की चार-चक्का-गाड़ी में भी! यह बात दीगर है कि वक्तन-फवक़्तन शीलाजी यहाँ स्टीयरिंग भी प्रायः छीन ही लेती थीं। इस सुखद और प्यारी गृहस्थी की सफलता का यही राज था।

साहिबो! मैंने अनेक दम्पति देखे हैं। लेकिन भीष्मजी और शीलाजी-जैसा प्यार, अपनापा और आपसी दोस्ती और कहीं नहीं देखी। एक-दूसरे के प्रति ऐसा विलक्षण समर्पण भी कहीं नहीं देखा। दोनों बिना कहे एक-दूसरे की इच्छा या मन की बात फ़ौरन जान लेते थे और वैसा ही करते भी थे। दोनों एक-दूसरे का इतना और ऐसा ख़्याल रखते थे कि आज भी यह लगभग अकल्पनीय ही लगता है! उन दिनों मैं बड़े गुस्सैल स्वभाव का था (अब नहीं हूँ! कसम से!!)। भीष्मजी मुझसे कहा करते थे, यार तूँ बड़ा गरम मिजाज हाँ, वोह्टी (पत्नी) नाल बड़ा लड़दा होएँगा!फिर लतीफ़ा सुनाते: दुनिया केआधे मर्द अपनी जनानियों (पत्नियों) केजोरू के गुलामहोते हैं...बाकी आधे झूठे! मैं तो भई सच मान लेता हूँ। सुखी-दाम्पत्य का यही राज है। कुछ सीखो, यार, कुछ सीखो!हम अपने जनरल सेक्रेटरी से और बहुत सारी बातों के अलावा यह भी सीख रहे थे। डॉ. रामविलास शर्मा की तरह भीष्मजी भी अपनी पत्नी की सेवा करने और उनका बेहद ख्याल रखने के मामले में, मेरी दृष्टि में, एकदम मेरिंग रॉड’ (सर्वोच्च पैमाना) थे! इतने कि मैं उनके और शीलाजी के  सामने ही उन्हें कई बार दुनिया का सबसे बड़ा पत्निभक्तऔर पत्निव्रती’ (पतिव्रता का विलोम) तक कह दिया करता था। (ज़ाहिर है कि रामविलासजी के आगे ऐसी गुस्ताख़ी की कल्पना तक से मेरी जुबान तालू से चिपक जाती थी, वह भी फ़ेवीकोल से)। ऐसी गुस्ताख़ियों पर भीष्मजी तो धीमे-धीमे शरमाते रहते पर शीलाजी बड़ी खुश हो जातीं। मैं इस ची का बड़ा फ़ायदा भी उठाता! शुद्ध संगठन के हित में।

दरअसल, भीष्मजी ही नहीं, शीलाजी भी उनका बहुत ख़्याल रखती थीं। वे न केवल उनकी सेहत, बल्कि उनकेलेखन-कार्य का भी बेहद ख़्याल रखती थीं। उनकी हर सुख-सुविधा का। विशेष रूप से उनके लिखने के समय का कि उसमें किसी भी तरह का व्यवधान न आने पाए। भीष्मजी की शाम को लिखने की आदत थी। लेकिन गया सम्मेलन की तैयारियों के सिलसिले में उनकी शामें अक्सर सूनीजातीं। भीष्मजी ने कभी कुछ नहीं कहा। मैं देर शाम भीष्मजी के साथ लौटता; और रो उनके यहाँ, ईस्ट पटेल नगर, चाय-स्वल्पाहार के बाद ही ईएसआई कॉलोनी (रमेश नगर) जाता; जहाँ मैं गीताजी के आने के बाद किराये पर रहने लगा था। हर बार चाय भीष्मजी ही बनाते। शीलाजी कहती भी थीं, तो उन्हें उठने नहीं देते और मेरी मदद की तजबीब भी ठुकरा देते। उनकेयहाँ पाश्चात्य और पंजाबी ढंग के दोनों तरह के रेडीमेड स्वल्पाहार मौजूद रहते। कई बार की सूनी शामोंकेबाद एक बार शीलाजी ने कहा कि आप लोग तो रो ही दोपहर से देर शाम तक जनयुगमें उलझे रहते हैं। भीषम कुछ लिख ही नहीं पाते। भीषम को तो शाम को ही लिखने की आदत है, और कोई टाइम इन्हें सूट नहीं करता। भीष्मजी ने कहा: ‘‘श्यामजी इसमें क्या कर सकते हैं! ये तो सुबह से शाम तक जनयुगमें ही रहते हैं। दोपहर को मेरे कालिज से वहाँ पहुँचने केबाद व्यासजी के साथ मिलकर घोषणा पत्रपर हस्ताक्षर लेने, लोगों की जिज्ञासाओं को शान्त करने, उनके कई तरह के ऐतराज को दूर करने और उनकेसुझावों पर प्रतिक्रिया देने, फिर सम्मेलन में उन्हें ज़रूर पहुँचने की बार-बार ताकीद करने, सम्मेलन से सम्बंधित ढेरों दीगर बातों और तैयारियों के  सिलसिले में हमें हिन्दुस्तान भर के सभी भाषाओं के लेखकों से सम्पर्क रखना पड़ता है। रोज़ दर्जनों चिट्ठियाँ लिखनी पड़ती हैं, सैकड़ों चिट्ठियों केजवाब देने पड़ते हैं, टेलीफोन पर बातें करनी पड़ती हैं। सुबह मेरा कॉलिज है, श्यामजी का जनयुग का काम है, फिर व्यासजी भी दोपहर को ही पहुँचते हैं।’’

मैंने बताया कि सुबह का निकला, अब मैं घर जाऊँगा, कुछ देर बाद खाना खाकर और देर रात कुछ खाने केलिए लेकर फिर रात केदो-ढाई बजे तक के  लिए चला जाऊँगा। ठीक आठ बजे रात जनयुगकी स्टाफ़ कार लेने पहुँच जाती है। शीलाजी बहुत नाराज हुईं: हद है, भीषम, आप व्यासजी से कुछ कहते क्यों नहीं। आप या श्यामजी नहीं कह सकते तो मैं कहूँगी। ऐसे तो मुण्डा बेचारा (लड़का) बीमार पड़ जाएगा। फिर मुझसे: तेरी वोह्टी कुँज नयी कैंदी, ऐदाईं रेहा ताँ तैनूँ छड्ड के माप्पेयाँ (अपने माँ-बाप) कौल तुर जाऊ।भीष्मजी हँसने लगे: शीला, गीताजी भी कम्युनिस्ट हैं।शीलाजी को जब लाड़-प्यार आता तो वे मुझे तुसीं (आप) या श्यामजी कहने से तैंनूँ’ (तुझे) या बेचारा मुंडापर उतर आतीं। मुझे भी बड़ा सुखद और अच्छा लगता। ऐसे ही एक बार उन्होंने सेहत के लिए देसी घी की पिन्नियों का डब्बा दिया जो शायद कोई उन लोगों केलिए लाया था। शीलाजी इस बात को सहन नहीं कर पातीं थीं कि कोई भीष्मजी के अपने लिखने के टाइम में व्यवधान डाले। इस मामले में वे न किसी का लिहाज रखती थीं और न ही किसी की भी ऐसी गुस्ताख़ी को कभी क्षमा करती थीं। गया सम्मेलन के बाद, यह रोज-रोज़ की भारी गहमागहमी और थका डालने वाली मशक्कत तो बन्द हो गयी, पर फिर भी पुनर्गठित प्रलेस के नये-नये बने संगठन और उसके मुख्यालय को चलाने की ज़िम्मेदारी और उसकेढ़ेरों काम तथा व्यस्तताएँ तो थी हीं। भीष्मजी की शामें तो उन्हें लिखने केलिए (हमेशा नहीं पर प्रायः) मिलने लगी थीं। लेकिन फिर भी, धीरे-धीरे प्रलेस के विस्तार और मुख्यालय केकामों में लगातार होती बढ़ोतरीतथा संगठन के काम से अक्सर बाहर आने-जाने से भीष्मजी का शामों का नियमित लेखन तो अनियमित हो ही गया था। शीलाजी इससे क्षुब्ध रहती थीं। ऐसे कितने सौभाग्यशाली लेखक होंगे जिनकी शरीक-ए-हयातउनके लेखन-कार्य को लेकर शीलाजी की तरह अत्यन्त गम्भीर और सम्वेदनशील होंगी! भीष्म जी थे। भीष्मजी उस उम्र में भी (वे साठ पार कर चुके थे और सत्तर के करीब पहुँच रहे थे) हम नौजवानों से कहीं ज़्यादापरिश्रम करते थे। कॉलिज से रिटायर होने के बाद तो वे चौबीसों घंटे प्रलेस के लिए खटते थे। अपना लिखना-पढ़ना और खाना-पीना भूलकर, अपनी सेहत की कीमत पर भी। उन्हें देशभर के लेखकों से नियमित पत्र-व्यवहार करना पड़ता था, उनकी विभिन्न संगठनात्मक समस्याओं को सुलझाना पड़ता था। संगठन केविस्तार केसाथ-साथ देशभर में जगह-जगह राज्य सम्मेलन, सेमीनारों, समारोहों का ताँता लगा रहता। हर कोई चाहता था कि उसमें भीष्मजी अवश्य आएँ। ज़्यादतर जगह मैं उनके साथ जाता। सबसे ज़्यादा उत्तरी भारत, ख़ासकर हिन्दी-भाषी राज्यों में।

अत्यधिक परिश्रम और यात्राओं (कई बार शहडोल सम्मेलन या भोपाल और कलकत्ता-गुवाहाटी जैसी बड़ी असुविधाजनक तथा दुर्घटनापूर्ण यात्राएँ भी) के  फलस्वरूप भीष्मजी केबीमार पड़ जाने केकारण, अन्ततः शीलाजी ने यात्राओं पर अंकुश लगा दिया था। लेकिन कई ऐसे महत्वपूर्ण मौके होते थे कि भीष्मजी का जाना ज़रूरी होता था। तब मैं पूर्वोल्लिखित टैक्टिक्ससे शीलाजी को खुश करके संगठन केहित में, अपने महासचिव का हरणकर लिया करता था! मेरी इस हरण क्षमताको लेकर प्रलेस के साथियों ने, विशेषकर मास्टर साहबऔर प्रमोद पाण्डेय ने कई तरह केजोक्सभी गढ़ लिए थे। यहाँ तक कि देश के  (हिन्दी साहित्य केतो निश्चित रूप से) सबसे नाजुक और अत्यधिक कोमलकांत साहित्यकार नन्दकिशोर नवल को भी मैं भारतीय रेल केस्लीपर क्लास में हिन्दी प्रदेश में यहाँ से वहाँ तक न जाने कहाँ-कहाँ नहीं घसीट ले गया, जो शायद हिन्दी साहित्य के सर्वाधिक यात्रा-भीरू लेखक हैं। लेकिन दो भले मानुस हमेशा मेरे और भीष्मजी केअनुरोध पर सदा तत्पर’-जैसे फौजी (या स्काउट्सभी कह सकते हैं।) अनुशासन से तैयार हो जाते थे। एक त्रिलोचन शास्त्री और दूसरे हमारे प्यारे शमशेर! त्रिलोचन अपने कपड़े केमैले झोले (जिसे सेवाराम त्रिपाठी अपने दादूलैंड के ख़ास बघेली उच्चारण में मुँह सिंकोड़कर झव्वालाकहा करता था) में एक खादी का गमछानुमा तौलिया और दो बिना प्रेस किए धुले कुर्ते-पायजामे डालकर तथा शमशेरजी अपने विख्यात फटे-पुराने काले बैग में नये सिरे से टाँकेलगवाकर तैयार मिलते थे। सर्दियाँ होतीं तो दोनों बुजुर्गवार बन्द गले केकोट (शमरेजी रंग-बिरंगी, स्वेटर भी) तथा बन्दर-टोपी’ (मंकी कैप) और मफ़लरों में सजे-धजे! हमारे हिन्दी साहित्य का, ख़ासकर प्रगतिशील लेखक आंदोलन का, वह एक नया स्वर्णकाल था! ऐसी यात्राओं, उनकी हँसी-दिल्लगी और ज़िन्दादिली केदुर्लभ आनन्द की आज आप कल्पना तक नहीं कर सकते। ख़ासकर, आजकल के पाखंडपूर्ण, ईर्ष्याजनित, दम्भी और अवसरवादी मौहाल में!

लेकिन शहडोल सम्मेलन केबाद भीष्मजी, त्रिलोचन शास्त्री से और बाद में हमारे प्रिय साथी और प्यारे दोस्त खगेन्द्र ठाकुर के मामले में भी थोड़ी सावधानी और सतर्कता बरतने लगे थे। यदि त्रिलोचन साथ होते तो वे यह चालाकी ज़रूर बरतने लगे थे कि वे मेरे साथ ही कमरा शेयरकरें, उनकेसाथ नहीं, भले ही अन्य कोई भी साथी लेखक हो वह चल जाता! अब आने-जाने की ट्रेन यात्राओं में तो उनका कोई बस चल नहीं सकता था! शास्त्री भगवान के अलावा वे खगेन्द्र ठाकुर के साथ कमरा शेयरकरने केलिए किसी भी कीमत पर तैयार नहीं होते थे (बन्दापरवर, यह तो मैं भी करता हूँ। अभी भी!), अगर किसी बड़े हाल में फर्श पर सोना हो तो इस सामूहिक शयनकक्ष में उनका सदा यह सद्-प्रयास रहता कि उनका गद्दा खगेन्द्र ठाकुर के गद्दे से, उनके भरसक ज़्यादा-से-ज़्यादादूर बिछा हो! इसमें कोई रहस्य भी नहीं है। जब एक बार मैं, नवलजी, कमला पांडे (कमला प्रसाद तब पांडे भी हुआ करते थे!) और खगेन्द्र जी रात को मुरली बाबू (श्री मुरली मनोहर प्रसाद सिंह) के यहाँ रुके थे, तो इस रहस्यके पर्दाफाश से मैं भी स्तम्भित और आतंकित हो गया था (मुरली बाबू आतिथेय थे, अतः क्षम्य हैं; पर अब इसे तो नन्दकिशोर नवल की हद दर्जे की बेईमानी ही कहेंगे न कि उन्होंने जरा भी मित्राता का निर्वाह नहीं किया जो पहले से सतर्क नहीं किया!)। पर अब यह रहस्यकोई रहस्य भी नहीं रह गया है। प्रलेस केप्रायः सभी साथी जानते हैं कि खगेन्द्र ठाकुर केगड़गज्ज गर्जन में गूँजते’ (यह ग-ग-गबतर्ज भगवान, भारत वर्ष में गूँजे हमारी भारतीयानी भ-भ-भ’) ‘आर्टिलरीमार्का खर्राटों के चलते उनके आसपास दूर-दूर तक कोई नहीं सो सकता। खर्राटों की धुन के साथ ठाकुरजी के मध्यप्रदेश का तना हुआ विशाल तम्बू जिस स्वर-ताल-लय पर उठता-गिरता, इस मनोहर (मुरलीबाबू नहीं!) मनभावन मनमोहक मनोहारी दृश्य का वर्णन तो मेरे-जैसा अतुकान्त-छन्दमुक्त नया कवि नहीं, कोई हिन्दी के द्ददाया एक भारतीय आत्मा-जैसा सिद्ध कवि ही कर सकता है! फिर कोढ़ में खाज यह कि अपानवायु की नियमित फुसकारियों को तो कोई प्राणायामी सिद्ध योगी ही शायद झेल पाने में समर्थ हो तो हो, मेरे-जैसे आलस्यावतार के बस की तो यह बिल्कुल नहीं! ऐसी हालात में फँस जाने पर मेरे-जैसे कायर तो ऊपरी मंजिल से कूदकर जान ही दे देंगे; या धरती का धरातल मिला तो आसपास कुँआ तलाशने लगेंगे।

बहरहाल, भीष्मजी केइस संस्मरण में यह मधुर-मनोहर-मर्यादाहीन वर्णन मेरी विवशता है। एक तो मेरा सच्चाई का नितान्त पक्षधर होना, फिर यथार्थवादका आग्रह; भले ही इसकेलिए मुझे प्रिय दोस्त ठाकुरजी फाँसी दे दें (पर उनकेबोफोर्स’ के गोले कदापि नहीं! शान्तम् पापं!!)। इसके अतिरिक्त, यदि यह पृष्ठभूमि (कुछ विस्तार के लिए क्षमा करें) न होती तो मैं आपको उन वैज्ञानिक उपायों के बारे में कैसे समझा पाता जो एक बार भीष्मजी ने हमारी मंडली में सुझाए थे। शायद राष्ट्रीय कमेटी की भोपाल बैठक में। नींद न आने पर देर रात शाकिर भवनके  नीचे चाय की गुमटी पर कड़ चाय-धूम्रपान के दौरान। जब हँसते-हँसते हमारे पेट में दर्द होने लगा था और पास के पेड़ों पर सोए पक्षी जागकर फड़फड़ाते और चीखते डरकर उड़ने लगे थे। आपने बच्चों की गुब्बारेवाली पीपनी तो देखी ही होगी; अपने बचपन में बजा-बजाकर बुजुर्गों की नींद हराम भी की होगी। मैंने तो खूब की थी। भीष्मजी की तजवीज़ थी कि ऐसी ही पीपनी लाकर मुँह में तथा बोफोर्समें (तब बोफोर्सनाम कोई नहीं जानता था, भीष्मजी उवाच सही शब्दों से अश्लीलताका आरोप लग सकता है, क्योंकि वे असंसदीय हैं) लगा देनी चाहिए। तब यह भयानक और डरावनी आवाजें कुछ तो मधुर या संगीतमय हो सकेंगी। मेरे यह कहते ही कि चलो कल सुबह ही ठाकुरजी को महासचिव का सुझाव बताता हूँ, भीष्मजी चिल्ला पड़े: ओए यार, जूते पड़वाओगे!मैंने दिलासा दिया: ठाकुरजी चप्पल पहिनते हैं। वह भी ख़ासी घिस चुकी है। ज़्यादा तकलीफ नहीं होगी! साहिबान, भीष्मजी जितने संकोची, गम्भीर और विनम्र थे, उतने ही ज़िन्दादिल, हँसी-मज़ाक और हास्य-व्यंग्य के उस्ताद भी थे। लेखन ही नहीं, जीवन में भी।


वर्ष 2016 के विश्व पुस्तक मेला में भीष्म साहनी की सुपुत्री कल्पना साहनी जी और लेखक श्याम जी के सान्निध्य में वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'भीष्म साहनी' का लोकार्पण किया गया। इस अवसर की एक तस्वीर आपसे साझा की जा रही है।