Friday, 3 August 2018

भारतीय शास्त्रीय संगीत के महान गायक पद्मविभूषण पंडित जसराज के जीवन पर आधारित पहली जीवनी 'रसराज : पंडित जसराज'



वरिष्ठ लेखिका व संगीत अध्येता 


की

भारतीय शास्त्रीय संगीत के महान गायक पद्मविभूषण 

पंडित जसराज

के जीवन पर आधारित पहली जीवनी



950 /-  978-93-87889-58-3  हार्ड कवर 
895/-  978-93-8788-61- पेपर बैक 
जीवनगाथा    पृष्ठ संख्या -534 


सराज के जन्मते ही पिता पंडित मोतीराम ने उन्हें शहद चटाया था। उनके घर में इसे घुट्टी पिलाना कहा जाता है। माँ कृष्णा बाई का कहना था कि सभी बच्चों में से मोतीराम जी ने केवल जसराज को ही शहद चटाया था। बच्चों को माँ की सेवा करने का अच्छा अवसर मिलाक्योंकि वह 1957 तक जीवित रहीं। पिता तो अपने गाने के सिलसिले में आते-जाते रहते थे।

गाँव पीली मन्दौरी जहाँ जसराज का जन्म हुआ हिसार (हरियाणा) से लगभग  70 किलोमीटर दूर है। उस समय वह पंजाब में था। गाँव से स्टेशन लगभग 12 किलोमीटर था। एक दिन पंडित मोतीराम कहीं से कार्यक्रम करके गाँव लौटे। चूँकि स्टेशन और गाँव के बीच दूरी बहुत थीतो ऊँट पर सवार होकर आये थे। साफ़-सुथरे सफ़ेद कपड़े पहने हुए थे। मैदान में छोटे-छोटे बहुत सारे बच्चे खेल रहे थे। एक बच्चे की तरफ़ इशारा करके पंडित मोतीराम ने किसी से पूछा कि भैया ये किसका बच्चा हैतो उन्हें उत्तर मिला कि ये आप ही का बच्चा है। फौरन ऊँट से उतर पड़े और धूल में नहाये जसराज को गोदी में उठा लिया। न अपने सफ़ेद कपड़ों की परवाह की और न ही दो-ढाई वर्ष के जसराज की धूल में सनी पोशाक की ओर देखा। गोदी में उन्हें उठाकर पैदल-पैदल घर आ गये। उसके बाद क्या हुआ,

इसकी स्मृति किसी को नहीं है। पंडित जसराज अपने माता-पिता की नौवीं सन्तान हैं।

दरस देत क्यूँ नी
राग जयजयवन्तीताल तीन ताल
पंडित जसराज के आध्यात्मिक गुरु महाराज जयवन्त सिंह जी वाघेलाजिन्हें सब बापू साहब कह कर पुकारते थेको राग जयजयवन्ती बहुत पसन्द था। वे अक्सर पंडित जसराज से पूछते तुम जयजयवन्ती राग को क्यों कभी नहीं सुनातेमैंने यह बन्दिश विशेष रूप से तुम्हारे लिए लिखी है।

बापू साहब रचित बन्दिश एक विलम्बित रचना थीजिसमें बन्दिश के चारों तत्त्वकृस्थायी अन्तरा,  अभोग और संचारी को बहुत ख़ूबसूरती से सँजोया गया था। बापू साहब के देहान्त के पश्चात् पंडित जसराज को इस बात का विशेष कष्ट रहा कि वे अपने आध्यात्मिक गुरु की इच्छा को पूरा नहीं कर पाये। और उन्होंने माताजी (काली माँ) की स्तुति में राग जयजयवन्ती में एक अन्य बन्दिश की रचना की जिसे वे अनेकशः अपने गायन में सम्मिलित करते हैं।

स्थायी
दरस देत क्यूँ नी माँ मोरी।
मनमन्दिर में तू ही बिराजत।
परख लेत क्यूँ नी (माँ मोरी)

अन्तरा
बिपदा है मोपे अति भारी।
हरत लेत क्यूँ नी माँ मोरी।
कहनी थी सों कहली माता।
समझ लेत क्यूँ नी (माँ मोरी)


सुबह उठकर बिना कुछ लिखे हुए सुनीता बुद्धिराजा के दिन की शुरुआत नहीं होती और रात को बिना कुछ पढ़े हुए नींद नहीं आती। किताबों से घिरे हुए कमरे में उठना-बैठना सुनीता को अच्छा लगता है। ज़िन्दगी की किताब का हर पन्ना उन्हें बहुत कुछ सिखाता है लेकिन सीख कर भी सभी कुछ पर भरोसा करनाविश्वास करनासुनीता की आदत है। जीवन के हर आन्दोलन को महसूस करना भी उनकी आदत है। उनका सारा लेखन इसी भरोसेविश्वास और महसूसने की नींव पर टिका हुआ है। दिल्ली में जन्मी सुनीता बुद्धिराजा की कविताएँलेखसंगीत-चर्चा सभी कुछ इसी आदत का परिणाम हैं।

आधी धूप’, ‘अनुत्तर’ और ‘प्रश्न-पांचाली’, सभी ने पाठकों के मन को छुआ है। ‘प्रश्न-पांचाली’ महाभारतीय पात्र द्रौपदी को केन्द्र में रखकर उसी विश्वास की पतली-डोर को पकड़कर लिखा गया कविता-खंड है जिसने नाटककार दिनेश ठाकुर को मंच पर उतारने के लिए बाध्य कर दिया।

टीस का सफ़र’ जानी-मानी महिलाओं की निजता के अकेलेपन से उभरी टीस का परिणाम है तो ‘सात सुरों के बीच’ उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँपं. किशन महाराजपं. जसराजमंगलमपल्ली बालमुरली कृष्णपं. शिवकुमार शर्मापं. बिरजू महाराज तथा पं. हरिप्रसाद चौरसिया के साथ वर्षों की गयी चर्चाओं पर आधारित सुरीली रचना है।

पेशे से जनसम्पर्क से जुड़ी सुनीता बुद्धिराजा ‘किंडलवुड कम्युनिकेशंस’ चला रही हैं।

प्रस्तुत है उनकी नयी पुस्तक रसराज: पंडित जसराज जो संगीत मार्तंड पंडित जसराज की जीवनगाथा पर आधारित है।



 कार्यक्रम की कुछ झलकियाँ  





- मीडिया कवरेज -

19 जुलाई 2018 



3 अगस्त 2018 








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आप इस पुस्तक को ई-बुक के रूप में भी पढ़ सकते हैं