Saturday, 28 July 2018

कालजयी कथाकार महाश्वेता देवी की पुण्यतिथि पर पढ़िये विशेष कहानी | ‘तारों तले अँधेरा’



(1926-2016)


कालजयी कथाकार महाश्वेता देवी की पुण्यतिथि पर पढ़िये विशेष कहानी...

तारों तले अँधेरा


तारों तले अँधेराउपन्यास बांग्लादेश के मामूली परिवार की कहानी को अपने में समेटे हुए है। इस कहानी का मुख्य पात्र है विजय, जिससे माता-पिता को ढेरों आशाएँ हैं। पिता को लगता है जो वह अपने जीवन में नहीं कर पाये, उसे उनका बेटा विजय पूरा करेगा। बस, यहीं से शुरू होता है आशा-निराशाओं का दौर। माता-पिता की आशाओं, पारिवारिक कलह और स्वयं विजय की उम्मीदों के भार को लेकर चलती है यह कहानी-तारों तले अँधेरा!                


आधी रात को दरवाज़े पर खटखटाहट हुई।

नींद में पहले तो मुझे ऐसा लगा कि भ्रम हुआ है। उसके बाद, मैंने साफ-साफ सुना कि कोई दरवाज़ें पर थाप दे रहा है और जाने कौन तो मेरा नाम ले-लेकर पुकार रहा है।
मुझे आश्चर्य हुआ। यहाँ मुझे इस ढंग से कौन पहचानता है?

मध्यप्रदेश की पंचवर्षीय योजना के तहत एक शिल्पकेन्द्र के इस सीमान्त अंचल में, मैं किसी सरकारी काम से आया था। पहले तो मुझे लगा था कि बांग्लादेश से छह सौ मील दूर, यह निर्वासन मुझसे बर्दाश्त नहीं होगा। जन्मों से परिचित कलकत्ता के लिए मेरा मन हमेशा खिचता रहेगा।

लेकिन जाने कैसे तो मैं इस जगह से प्यार कर बैठा। बेहद खूबसूरत, बेहद निर्जन जगह है यह। इसकी एकमात्र सम्पदा है, शाल पेड़ों का रिज़र्व फॉरेस्ट!

मैं कलकत्ता निवासी हूँ। नयी सेक्रेटरिएट बिल्डिंग से ऊँची कोई इमारत मैंने जीवन में नहीं देखी। यहाँ आकर, इन शाल पेड़ों की उन्नत-उदार महिमा ने मुझे पल भर में मुग्ध कर लिया। इन पेड़ों ने मुझे जीत लिया। ईषत् झूमते-लहराते, माटी की छाती से आसमान की ओर सिर उठाये देखते रहते हैं ये पेड़, यह देख-देखकर अक्सर मेरा मन किसी प्रसन्न उदारता से भर उठता है। वनस्पतियों के इस दल ने मुझे अपने ढेर-ढेर दुःख और आघात भूलने में मेरी मदद की है।

जाने कैसे तो यह जगह टूरिस्ट दफ्तर के भारत भ्रमण करेंपोस्टर की नज़र से छूट गया। अगर रेलवे की तरफ से इन सुन्दर-समुन्नत पेड़ों का पोस्टर बनता और कोयलाघाट स्ट्रीट कार्यालय पर लगता तथा दोपहर एक बजे लंच करने के लिए निकली हुई जनता उस पर जी भरकर पान की पीक फेंक-फेंककर उस पोस्टर को गन्दा कर देती, तो मुझे दुःख होता। ये तमाम पेड़ मानो महत् और बृहत्तर किसी उदार प्राणशक्ति के प्रतीक हों। उनकी अवमानना से मैं भी अपने को अपराधी महसूस करता।

उससे तो यही बेहतर हुआ। मन ही मन मैंने ही इस जगह को आविष्कार किया है, यह सोच-सोचकर मैं बेहद खुश हूँ। यह जगह भी यहीं थी, मैं भी था। जिस दिन हम दोनों मिले, उस दिन यहाँ की प्रकृति और अरण्य-सब कुछ का अथाह सौन्दर्य, एक परिपूर्ण अखण्ड रूप में मेरी नज़रों में भर उठा। यह भी एक किस्म का आविष्कार है, इस जगह को कोई नहीं जानता। यह जो मैं काम करते-करते आँखें उठाकर देखता हूँ, इन पेड़ों का उन्नत, महिमामय रूप देख पाता हूँ, बार-बार मेरा मन भी किसी अजानी उदारता से भर-भर उठता है, मानो यही अच्छा है, मानो यही ठीक है।

धीरे-धीरे यहाँ के लोगों से भी मेरी जान-पहचान हुई। जब मैं अख़बार लेने के लिए स्टेशन गया, स्टेशन-मास्टर ने खुद ही आगे बढ़कर मुझसे परिचय किया। एक दिन मुझे चाय पर भी बुलाया। उनसे परिचित होकर मुझे भी बेहद अच्छा लगा। शहर में किसी इनसान से दिल का रिश्ता जोड़ने में समय लगता है। यहाँ इस सुदीर्घ फुर्सत के समय और कुछ करने को नहीं होता। इसलिए यहाँ ये सब परिचय, ये सब मित्राता भी मूल्यवान लगती है।
स्टेशन मास्टर मेरा नाम जानते हैं।

लेकिन यह सिर्फ उन्हीं की आवाज़ नहीं है। कोई और भी परेशान लहजे में मुझे आवाज़ दे रहा है, "बादलदा! दरवाज़ा खोलो! बादलदा, दरवज़ा खोलो।"

दरवाज़ा खोलते ही, जो अन्दर दाखिल हुआ, उसे देखने के लिए मैं बिल्कुल तैयार नहीं था। वह कुमुद था! हमारे विजय का छोटा भाई, कुमुद!

कुमुद से आखिरी बार मैं आज से दो वर्ष पहले मिला था। दफ्तर से बदली का आदेश लेकर मैं बाहर निकल रहा था। कुमुद से भेंट होते ही मैंने शायद उससे कहा था- नयी जगह जा रहा हूँ। "और जैसा कि मैंने बहुत से लोगों से कहा, शायद कुमुद से भी कहा होगा-" फुर्सत मिलते ही चले आना। नयी जगह है, सैर के लिए आ जाना।खैर, अब मुझे याद नहीं।

क्या वही बात याद करके वह चला आया? लेकिन, ऐसा तो नहीं लगता। मेरे कुछ पूछने से पहले ही कुमुद भाँय-भाँय रो पड़ा।

उसने कहा, "जल्दी स्टेशन चलो, बादलदा, भइया ने खुदकुशी कर ली।"
"क्या कहा?"
"भइया ने खुदकुशी कर ली। तुम जल्दी स्टेशन चलो, बादलदा।"
"कौन विजय? विजय दास ने खुदकुशी कर ली?

कुमुद की ओर देखते हुए, यह असम्भव बात, मैंने दिमाग़ के सहारे समझने की कोशिश की। विजय दास! जिसे हम प्रॉमिथ्यूअस अनड्रोंड कहा करते थे। जो शख़्स दुःसाहसी प्रॉमिथ्यूअस की तरह ही आसमान से आग चुराकर समस्त जीवन को आलोकित करने के सपने देखता था, हम सबको भी दिखाता था, उसी विजय ने खुदकुशी कर ली? विजय का उन्नत माथा, सूखे स्वर्णाभ बालों का गुच्छा और बेचैन प्राणवन्त आँखें, मेरे मन में तस्वीर की तरह तैर रही थीं। आज वह तस्वीर एक बार फिर जीवन्त हो उठी। विजय ने क्या वाकई खुदकुशी कर ली?

मुझे विमूढ़ देखकर कुमुद ने मेरे पैरों को धकियाकर कहा, "चलो, बादलदा! देर मत करो। तुम्हारे पाँव पड़ता हूँ।"

जल्दी-जल्दी बदन पर कुर्ता डालकर मैं बाहर निकल पड़ा। कुमुद पूरे रास्ते रोता-रोता गया।

उसने कहा, "हम अच्छे-खासे आ रहे थे, भाई ने कोई गोलमाल नहीं किया। लेकिन अचानक जैसे ही बम्बई मेल गुज़री..."

छोटा-सा स्टेशन! स्टेशन की घड़ी में दो बजने में तीन मिनट बाकी था। इस समय बम्बई मेल पास करती है और फोर्टीन-अप अपनी चाल धीमी कर देती है। दोनों ट्रेनें जब पास करती हैं, तो गुम्-गुम् का ऐसा शोर गूँजता है कि कितनी ही रातें मेरी नींद टूट गयी है। ट्रेन की आवाज़ काफी दूर चले जाने के बाद भी रात की निःशब्दता उसके बाद भी, कितनी देर-देर तक काँपती हुई स्थिर हो आती थी और मुझे लगा कि इस ट्रेन के साथ, इस विलीयमान् शब्दों के साथ मेरा भी संगी होना तय था।

स्टेशन पर तेज़-तेज़ रोशनी जलती हुई!

स्टेशन मास्टर और कई एक कुली एक जगह को घेरे खड़े थे। मुझे देखकर स्टेशन मास्टर आगे बढ़ आये।

उन्होंने कहा, "देखिये, क्या काण्ड हो गया। आपका नाम लेते ही, ये भलेमानस आपको पहचान गये।"

कोई बात सुने बिना ही, मैं आगे बढ़ गया। विजय प्लेटफॉर्म पर लेटा हुआ था। उसकी वह स्वस्थ-सुन्दर देह! जिसे लेकर वह गर्व से सिर ऊँचा किये शान से घूमता-फिरता था, आज वही शरीर असहाय भंगिमा में प्लेटफॉर्म पर धूल-धूसरित पड़ी है, यह देखकर मुझे जबर्दस्त धक्का लगा। विजय इस मुद्रा में पड़ा रहेगा और मैं खड़ा-खड़ा देखता रहूँगा? ऐसा तो मैंने कभी नहीं सोचा था।

स्टेशन-मास्टर विवेचक व्यक्ति थे। उन्होंने विजय का समूचा शरीर कम्बल से ढँक दिया था। कच्चे-पक्के बालों से भरा सिर, एक बीभत्स कोण बनाता हुआ, एक ओर ढलका हुआ था। एक हाथ आँखों पर पड़ा हुआ! चारों तरफ थक्के-थक्के खून! खून इतना लाल होता है और कम्बल के रंग से इस ढंग से मिल जाता है, यह मैं नहीं जानता था।

विजय के उस हाथ की उँगलियों में, मैंने ऐसा कुछ देखा, मानो कोई असहाय गुहार, कोई पराजय या और भी कुछ दुर्बोध...मैं बता नहीं सकता! वे उँगलियाँ विजय के अनेक दिनों की, अनेक आशा-भंग की प्रतीक हों!

वह मंजर देखकर मेरे पाँव काँपते रहे। मुझे लगा, यह सबकुछ असम्भव है। किसी रात का दुःस्वप्न! मुझे इस रात के अँधेरे में आवाज़ देकर, मुझे बहला-फुसलाकर बुलाकर, यह दुःस्वप्न दिखा रहा है। विजय दास इस भंगिमा में पड़ा है, यह भला कैसे सम्भव है? मेरा मन हुआ, उसे आवाज़ दूँ और पूछूँ- "क्या-क्या चाहा था? बताओ, विजय, कौन-कौन-सी चाहत थी? इन हाथ की मुट्ठियों में क्या पकड़ना चाहते थे? जो चाहा था, वह नहीं मिला,इसीलिए यूँ हाथ फैला रखा है? या इस परिणति को रोकना चाहा था? इस परिणति का आह्नान करके, बाद में डर गये थे? क्या तुमने यह सोचा था कि आँखें ढँक लेने से, कुछ देखना नहीं पड़ेगा?

ऐसी रात किसी के भी जीवन में न आये। कहाँ थाना, कहाँ पुलिस-खबर देते-देते रात गुज़र गयी और सुबह हो गयी। डॉक्टर ने पहले तो सर्टिफिकेट देने से इनकार कर दिया। कुमुद ने जब विजय की मानसिक अस्वस्थता के बारे में कागजात दिखाये, तब जाकर वह राज़ी हुआ। सारे हंगामे निपटाकर, एक छोटे-से झरने के किनारे विजय का दाह-संस्कार करने में दोपहर ढल गयी।

कुमुद को साथ लेकर मैं एक काली चट्टान पर आ बैठा। आस-पास का परिवेश देखकर यह ख़्याल आया कि विजय दास की आखिरी शय्या लेने के लिए वाकई यह उपयुक्त माहौल है। जीवन की जो विस्तृति, जो सीमाहीन व्याप्ति सिर्फ सपना बनकर विजय को इशारा करती रही, मौत के बाद यह परिवेश मानो उसका थोड़ा-सा क्षतिपूरण कर गयी। चारों तरफ शाल वन, ऊपर अनन्त आकाश और आस-पास ऊबड़खाबड़ माटी के दिगन्तव्यापी प्रान्तर की उदारता और प्रशान्ति क्या विजय को ज़रा भी स्पर्श नहीं करेगी? उसे बूँद भर भी शान्ति नहीं देगी?

कुमुद को शान्त करने की जिम्मेदारी मेरी पत्नी ने ले ली। तीन दिन बाद उसे कलकत्ते की ट्रैन में सवार करा आया। ऐसा लगा, इस शोक में भी उसे थोड़ी-बहुत सान्त्वना मिली है।
ट्रेन छूटने से पहले कुमुद ने उदास मुस्कान बिखेरते हुए कहा, "पता है, बादल’ दा, अन्त में भाई भी कहीं से जी गया। ऐसा जीवन लेकर जीये जाना उसके लिए भी अभिशाप बन गया था। हम सब कुछ भी नहीं कर पाये...भाई को इस तरह देखते रहना भी...जो हुआ, अच्छा ही हुआ! बस, माँ के लिए ही फिक्र होती है। उन्हें तो यह सब समझाया नहीं जा सकता।"

विजय की माँ! उस शान्त, दुःखिनी महिला की याद हो आयी, जितनी तकलीफ होगी, उस माँ के दिल को ही होगी। उनकी छाती सूनी हो जाएगी।

उसके करीब छह महीने बाद, मैं छुट्टी लेकर कलकत्ता आया। विजय का ज़िक्र छेड़ते ही और एक जबर्दस्त धक्का लगा। कोई इनसान क्या इसी तरह ख़त्म हो जाता है? कोई इनसान जब गैर-जरूरी हो जाता है, तो उसे इसी तरह निर्मम मज़ाक़ करना पड़ता है?
जिसने जो हमदर्दी जतायी वह सिर्फ मुँहज़ुबानी थी।

दिलीप ने कहा, "बड़े ही दुःख की बात है! लेकिन, विजय बहुत दिनों पहले ही खारिज हो चुका था। बहुत दिनों से तो वह सभा-समितियों में भी नज़र नहीं आता था। आजकल वह क्या कर रहा था, इसकी भी जानकारी नहीं मिलती थी। सच्ची, सोचने बैठो, तो कैसा तो अजीब लगता है। है कि नहीं?"

बूला राय और पिकपिक सोम वगैरह की खबर दिलीप ही लाया था।

उसने कहा, "वह क्या न्यूरोसिस का शिकार हो गया था? कितना ट्रैजिक हुआ। मिसेस सोम तो पहले पहचान ही नहीं पायीं। थोड़ा ठहरकर उन्होंने कहा-

फ्रस्ट्रेशन...कुण्ठा इनसान को क्या बना देती है, देखो!"

माधवी के पास मैं नहीं गया! उसके लिए तो विजय बहुत दिनों पहले ही खत्म हो गया था। ख़बर पाकर वह भी मुँहज़ुबानी हमदर्दी जताएगी और उसके बाद अपने बाल-बच्चों या पति की कोई सुविधा-असुविधा में व्यस्त होकर, विजय को भूल जाएगी- यह देखने का मेरा बिल्कुल मन नहीं था।

ख़बर पाकर दिल्ली से अरुण ने बेला को विजय की माँ के पास भेज दिया था। विजय के घर में बैठकर भी यही लगा कि इसी बीच रिक्तता भरने लगी थी। बेला और अरुण के बेटे को पाकर विजय की माँ को थोड़ी तसल्ली मिली थी। बातचीत से यह भी लगा कि अब वे सुजय की शादी के बारे में सोच रही हैं। वहाँ से उठकर आते ही मैंने देखा कि दीवार पर विजय के पिता की तस्वीर कि बगल में विजय की भी तस्वीर झूल रही थी।

यानी विजय भी तस्वीर बन गया। उसके अन्दर की आग, वह मन-प्राण की प्यास, ज़िन्दगी को मुट्ठी में पकड़े रहने का आग्रहसबकुछ क्या इतना ही कमज़ोर था?  इसीलिए सब झूठ पड़ गया?

सिलेक्ट की मीटिंग में अब कोई दूसरा व्यक्ति! किसी नयी प्रतिभा को लेकर सिलेक्ट के औरत-मर्दों में गहमागहमी! वहाँ मेरे लिए प्रमाण-पत्र किसी दिन भी नहीं था। इसके बावजूद एक दिन मैं कॉफी हाउस चला गया। मैंने देखा, वहाँ का परिवेश वैसा का वैसा ही था। मेज़ पर घिरे बैठे लड़के-लड़कियाँ आज भी बहसबाजी में मुखर थे। मेरा यह जानने का मन हो आया कि ये लोग अब किन बातों पर चर्चा-परिचर्चा-बहसबाज़ी करते हैं।

कॉफी की प्याली पर मलाई की झीनी पर्त जमी हुई। हवा में सिगरेट के धुएँ के जाल उड़ते हुए। मैंने देखा किसी तरुण लड़के को घेरे हुए, कुछेक लड़के-लड़कियाँ बातचीत में मुखर थे। वह लड़का कभी ईषत् हँस पड़ता था, कभी अपने बालों में उँगलियाँ फेरते हुए, बातचीत के बीच-बीच में दो-एक मन्तव्य उछाल देता था। मैंने यह भी देखा कि कोई एक लड़की विस्मय-विमुग्ध निगाहों से उस लड़के को निहारे जा रही है। वह लड़का, वह लड़की, वह परिवेशसबकुछ मेरे जाने-पहचाने थे। वह मंज़र देखते-देखते अन्दर ही अन्दर मैंने कहीं दर्द महसूस किया।

वह सब देखते-देखते मुझे विजय की याद हो आयी। यहाँ विजय को क्या, किसी ने याद रखा है? इस कॉफी हाउस ने इतने सालों में जाने कितने ही विजय दास को देखा है। यहाँ, इन सब लड़के-लड़कियों के बीच कितने ही विजय दास, कितनी प्रतिभा नयी-नयी चर्चा का विषय बनीं और फिर खारिज हो गयीं। सन् उन्नीस सौ अड़तालीस का विजय दास क्या उन लोगों को याद है? जब यहाँ की बत्तियाँ गुल हो जाती हैं, जब थके हुए जमादार फ़र्श और मेज़ पर झाड़ू लगाकर जली हुई सिगरेटें इकट्ठी करते हैं, जब बैरे टोकरी-टोकरी भरकर कप-डिश धो-धोकर रखते सजाते हैं, तब क्या इस हॉल-कमरे को कभी किसी विजय दास की याद आती है? या किसी कवि की वह बात, सिर्फ कविता भर है?

I feel like one, who treads alone
Some banquet hall deserted,
Whose lights are fled,
Whose garlands dead,
And all but he deserted—

इन सब यादगारों में भी क्या उन लोगों को विजय की याद नहीं आती?

मैं वापस लौट आया। लेकिन विजय को भूल नहीं पाया। किसी दिन विजय जानता था, इसलिए हमने भी जाना था कि इस समूची पृथ्वी की सृष्टि हुई है, विजय की अनुभूति में, विजय की उपलब्धि में स्वीकृति पाने के लिए। अपने अलावा, विजय को चाँद-सूरज तक नज़र नहीं आता था।

वही विजय कैसे तो धीरे-धीरे खारिज हो गया। दुनिया छोड़कर जाने के बहुत पहले ही, दुनिया ने उसे छोड़ दिया था। दुनिया की नज़रों में बहुत पहले ही विजय मर चुका था। इसीलिए उसकी देह की मृत्यु, सभी लोग इतने निर्विकार ढंग से ले पाये।

जब मैं अपने कर्मस्थल में लौट रहा था, तक ट्रेन के पहिये-पहिये में ढेर-ढेर बातें, ढेर-ढेर शब्द मुखर होकर, टुकड़े-टुकड़े ढंग से बिखरती रही। उस वक्त विजय के बारे में सोचते-सोचते मैंने चकित होकर देखा, कि मेरी नज़रें कॉफी हाउस में देखे हुए उस जवान लड़के की तरफ टिकी हुई हैं। मैं किसके बारे में सोच रहा हूँ? मैंने अपने मन को समझने की कोशिश की। मुझे लगा यह लड़का भी उस परिवेश और भक्त-मित्रों की स्तुति-प्रशंसा में अपने को नये सिरे से जान रहा है। वह अपने को उपलब्ध कर रहा है! उसके भी मन में उच्चाशा और स्वप्न-कामनाओं का रंग खिल रहा हैधीरे-धीरे! अनजाने में! वह भी सबको पीछे छोड़कर, सबकुछ को लाँघकर, अपने को देखना चाहेगा।

यह सब सोचते हुए मन में फिर कहीं दर्द जाग उठा! उसके प्रति ममता हो आयी! विजय दास जैसे लोग कभी, किसी दिन काम नहीं आते, लेकिन जब भी उनकी याद आएगी, उनके लिए अफसोस नहीं होगा? उसे प्यार नहीं करूँगा?

उन जैसों को प्यार किये बिना रहा कैसे जा सकता है? जब भी विजय को याद करूँगा, जैसे अभी कर रहा हूँ, उसे याद करते हुए उसके प्रति ममता और प्यार के साथ प्रगाढ़ दर्द नहीं उमड़ेगा?

विजय की ज़ुबानी बहुत बार सुनी हुई उस कविता के माध्यम से उसे याद करूँगा।

To remember, with love
To remember, with tears.

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