Thursday, 24 May 2018

नये शेखर की जीवनी | अविनाश मिश्र

नये 
शेखर 
की जीवनी 
                                                                                  
                                                                                    अविनाश 
                                                                                        मिश्र


 वाणी प्रकाशन से शीघ्र प्रकाशित होने जा रहा है 
युवा लेखक अविनाश मिश्र का नया उपन्यास 

नये 
शेखर 
की 
जीवनी

आइये पढ़ते हैं किताब का एक अंश 

सत्ताएँ कैसे भेदती हैं एक व्यक्ति के अन्तरतम को...

शेखर मूलतः कवि है और कभी-कभी उसे लगता है कि वह इस पृथ्वी पर आख़िर कवि है। यह स्थिति उसे एक व्यापक अर्थ में उस समूह का एक अंश बनाती है, जहाँ सब कुछ एक लगातार में ‘अन्तिम’ हो रहा है। वह इस यथार्थ में बहुत कुछ बार-बार नहीं, अन्तिम बार कह देना चाहता है। वह अन्तिम रूप से चाहता है कि सब अन्त एक सम्भावना में बदल जाएँ और सब अन्तिम कवि पूर्ववर्तियों में।

वह एक कवि के रूप में अकेला रह गया है, गलत नहीं है तो एक मनुष्य के रूप में अकेला रह गया है एक साथ नया और प्राचीन। वह जानता है कि वह जो कहना चाहता है वह कह नहीं पा रहा है और वह यह भी जानता है कि वह जो कहना चाहता है उसे दूसरे कह नहीं पाएँगे

शेखर मूलतः कवि है और वर्षों से एक वक्तव्य देना चाहता रहा है। वह एक वक़्त से इस वक्तव्य को कविता-पंक्तियों की तरह अपने भीतर बुनता आया है। उसने कई वक्तव्यों को पढ़ा और सुना है और वह उन सब खामियों से वाकि है जो उसने उन्हें पढ़ते और सुनते हुए अनुभव की हैं।

शेखर अपने एकान्त को इस वक्तव्य के रिया से भरा करता है। वह राह चलते-चलते कुछ बोलने लगता है। उसका आस-पास उस पर हँसता है।

शेखर मूलतः कवि है और वह चाहता है कि लोग उस पर ध्यान दें।

शेखर इस वक्तव्य में उस जीवन के विरुद्ध जाना चाहता है जिसमें आत्मा अनुपस्थित है।

शेखर एक आत्मवंचित खालीपन से बाहर आना चाहता है।

लेकिन शेखर की उम्र या कहें उसकी अयोग्यता ने अब तक उसे उन अवसरों से अलग बनाये रखा है जिनमें ख़ुद को एक वक्तव्य देने के लिए मुस्तैद करना पड़ता है।

शेखर मूलतः कवि है और यह जानता है कि उसकी भावनाएँ उसके खिला इस्तेमाल की जा सकती हैं

मानसून-दर-मानसून बरसते चले जा रहे हैं और शेखर अपनी उम्र, अपनी अयोग्यता और अपनी कविता-पंक्तियों के साथ ख़ुद में कहीं गुम होता जा रहा है।

उदासी एक बासी ची है शेखर के समय में, जो बरों की तरह उसे दी गयी है। लेकिन यह बरों से भी ज़्यादा बासी है। सब कुछ रंगीन और रौशन है, लेकिन शेखर उदास है। वह बाक़ी खबरें जानना चाहता है, लेकिन वे प्रत्येक अन्तराल में उत्पादों में बदल जाती हैं। बाक़ी ख़बरें कहीं नहीं हैं।

शेखर अबारों पर सो रहा है एक बन्द कमरे में पानी पी-पीकर आईनों से झगड़ता हुआ। वह घुट रहा है, इसलिए खिड़कियाँ खोल देना चाहता है, यह जानते हुए भी कि अब कुछ भी सुरक्षित नहीं समग्र मानचित्र में।

शेखर मूलतः कवि है और पुरस्कार नहीं यात्राएँ स्वीकार करना चाहता है। यात्राएँ ही बचा सकती हैं उसे। वह बहुत दूर तक गुम होना चाहता है। सर्वत्र प्रताड़ितों के भोज्य में से एक कौर उठाते हुए वह जानना चाहता है कि सत्ताएँ कैसे भेदती हैं एक व्यक्ति के अन्तरतम को। वह यह भी जानना चाहता है कि क्या जल से भी ज़्यादा अर्थपूर्ण है कुछ जीवन में और वृक्षों से भी जो सर्वत्र उसके साथ रहेंगे और धूल से भी जो वह कहीं भी चला जाए, भूल से भी कभी उसे उसके साथियों से जुदा नहीं होने देगी।


अविनाश मिश्र
5 जनवरी 1986 को गाज़ियाबाद में जन्म। शुरुआती शिक्षा और जीवन उत्तर प्रदेश के कानपुर में। आगे की पढ़ाईलिखाईसंघर्ष और आजीविका के लिए साल 2004 से दिल्ली के आस-पास रहनवारी और बीच-बीच में दिल्ली से दूर प्रवास। कविताआलोचना और पत्रकारिता के इलाके में सक्रिय। कुछ प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में सेवाएँ दीं और लगभग सभी प्रतिष्ठित प्रकाशन माध्यमों पर रचनाएँ और साहित्यिक पत्रकारिता से सम्बन्धित काम प्रकाशित।अज्ञातवास की कविताएँ’ शीर्षक से कविताओं की पहली किताब साहित्य अकादेमी से साल 2017 में आयी। इन दिनों आलोचना की एक किताब पर काम और विश्व कविता और अन्य कलाओं की पत्रिका सदानीरा’ का सम्पादन कर रहे हैं।  
यह उपन्यास विश्व के सबसे बड़े साहित्योत्सव जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के प्रकाशन प्लेटफार्म जयपुर बुकमार्क द्वारा संचालित 'फर्स्ट बुक क्लब २०१७' में प्रकाशन के लिए चुना गया है। 

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