Saturday, 10 March 2018

'लेडी चंगेज़ ख़ाँ' - कुर्रतुलएन हैदर

वाणी के स्त्री-विमर्श


पहली कड़ी



 'लेडी चंगेज़ ख़ाँ' 

कुर्रतुलएन हैदर


24 अक्टूबर की शाम पद्मा सचदेव ने रुँधी हुई आवाज़ में टेलीफ़ोन पर इत्तेला दी, ‘‘इस्मत आपा गुज़र ग़यीं।’’

गुर जाना या पास्ड अवे बहुत ही ग़म्भीर शब्द हैं। कसरते-इस्तेमाल की वज़ह से इनकी मानवियत खो ग़यी है। यानी इनसान दुनिया से महज़ गुज़र जाता है।

इस्मत चुग़ताई भी एक वक़्त दुनिया में आयीं। समाजी और अदबी इन्क़लाब के एक हंगामी दौर में अपना हंगामाख़ेज़ रोल अदा किया और ‘‘गुज़र ग़यीं।’’

एक क्लीशे ऐसे लेखों में लामोहाला इस्तेमाल किया जाता है कि ‘‘गुज़रना हम सबको है।’’
सवाल यह है कि कौन किस तरह गुज़रता है।


पद्मा सचदेव का दर्द इस हक़ीक़त का बयान था कि जो लोग़ मरहूमा से ज़ाती तौर पर वाक़िफ थे, वह उनको कितना चाहते थे। मर उसी शाम आधे घंटे के बाद ब दूरदर्शन की हिन्दी और अंग्रेज़ी ख़बरों में उनकी वफ़ात की ख़बर के साथ ग़लत तस्वीर दिखाई यी जो इस्मत चुग़ताई के बजाय उनकी माँ की तस्वीर थी। इसके साथ ही एक और हक़ीक़त ज़ाहिर हुई कि अर वह कोई अहम सियासी लीडर बड़ी इंडस्ट्रियलिस्ट या ग्लैमरस फ़िल्मी शख़्सियत होतीं तो क्या दूरदर्शन ऐसी बेपरवाही बरत सकता था?

दूसरी सुबह अख़बारों में जो ख़बर छपी, उसमें उनकी कहानी लिहाका ही ज़िक्र था और यह बिल्कुल नहीं कहा ग़या था कि वह तरक़्क़ीपसन्द तहरीक और नयी कहानी की मेमार थीं।

उनकी ग़हरी इनसान दोस्ती की मिसालें उनके लावाब असाने नन्ही की नानी’, ‘चौथी का जोड़ा’, ‘बिच्छो फूफ़ीऔर भेड़ेंहैं। बक़ौल डॉ. सोग़रा मेहदी ‘‘इस्मत आपा को आख़िर-आख़िर में इस बात का बेहद दुख था कि लोग़ उनको महज़ लिहाकी वज़ह से याद रखते हैं, और बूढ़ी, बेकस औरतों और समा के मज़लूम तबक़े की कहानियों को भुला दिया जाता है। गोया जिन्सी विषय और इस्मत चुग़ताई एक-दूसरे के पूरक होकर रह ये हैं।’’

यह सही है कि तरक़्क़ीपसन्द तहरी की शुरुआत में ज़ब ये नये अदीब एक ठहरे हुए और बेहिस समाज़ को झिंझोड़ने की कोशिश में जुटे हुए थे, मण्टो और इस्मत आपा ने ऐसे असाने लिखे जिन पर हाशी के मुदमें चलाये ये लेकिन ये दोनों अदीब जो बाग़ियाना ज़हन रखते थे, बहुत हद तक अपने मिशन में कामियाब रहे। यानी उन्होंने दोहरे मेयार रखने वाले समा में हलचल मचा दी।


कुर्रतुलएन हैदर

1869 ई. में पटना की रशीदतुन्निसा बेग़म ने इस्लाहे निस्वाँनाम से एक नॉवेल लिखा था इसके बाद उर्दू की स्त्री उपन्यासकारों की एक पूरी नस्ल ने सुधारवादी लेकिन शरीफ़ाना उपन्यास लिखे जिनके ज़रिये उन्होंने समा के हर तबक़े में औरतों पर होने वाले अत्याचार की सच्ची तस्वीर पेश की। लेकिन वह स्त्री उपन्यासकार समाजी सुधारवाद के दरमियानी दौर की नुमाइन्दा थीं। इन्क़लाबी रवैये और अन्दाज़े-तहरीर का आरम्भ 1932 में अंगारेके प्रकाशन से हुआ, जिसके कहानीकारों में डॉ. रशीद ज़हाँ भी शामिल थीं। उनकी कहानियों के कई संग्रह प्रकाशित हुए। एक दिलचस्प बात यह है कि आम तौर पर अलीग़ढ़ को रूढ़िवादी मिडिल क्लास या मुस्लिम स्टेब्लिशमेंट का नुमाइन्दा समझा जाता है लेकिन इस हक़ीक़त को नज़रअन्दाज़ किया ग़या है कि यह कई इन्क़लाबी तहरीकों का सरचश्मा संस्था भी थी।

मिसाल के तौर पर सैयद अहमद खाँ को औरतों की अंग्रेज़ी तालीम का मुख़ालि समझा जाता है। दरअसल ऐसा नहीं था। वह औरतों की तालीम को समय से पूर्व समझते थे। अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िला अंडरग्राउंड तहरीक अलीढ़ में 1903 ई. के लगभग शुरू हुई। डॉ. अब्दुल रहमान बिनौरी और सज्जाद हैदर यल्दरम जिसमें शामिल थे। इस तहरीक का कहीं ज़िक्र ही नहीं किया जाता। अदब के मुख़्तलि नये रुहानात अलीढ़ ही की पैदावार हैं। इन्क़लाबी शायरों की फ़ेहरिस्त भी परिचय की मोहता नहीं।


इस्मत चुग़ताई अलीग़ढ़ में शायद 1938 ई. में मेरी चचेरी बहनों के साथ पढ़ती थीं। उन्हीं दिनों मुस्लिम यूनिवर्सिटी में सहशिक्षा इस तरह शुरू हुई थी कि क्लास में एक स्क्रीन लगा दी जाती थी। उसके पीछे बैठकर लड़कियाँ लेक्चर सुनती थीं। उस ज़माने के बारे में इस्मत आपा की कहानी परदे के पीछे प्रकाशित हुई। यह बहुत ही सादा किस्म का ख़ाका था जिसमें उन्होंने परदे के पीछे लड़कियों की हँसी-मज़ाक और जुमलेबाज़ी का नक़्शा खींचा था लेकिन बहुत ल्दी कहानी परदे के पीछेइस्मत आपा के अदब का प्रतीक बन ग़यी क्योंकि उन्होंने हिन्दोस्तानी समा के रेब का परदाफ़ाश करने की हिम्मत की। वह एक बाग़ी औरत कहलायीं, और अपनी हैसियत से बेहद ख़ुश हुईं। उन्हें लोगों को चौंकाने और पारम्परिक मूल्यों की मुख़ालत का हुनर आता था।


भोपाल, सन 1949 के एक कार्यक्रम में इस्मत चुग़ताई और अन्य 

अलीढ़ की ही रशीद ज़हाँ ने कम्युनिस्ट पार्टी में शिरकत की और उनकी छोटी बहन ख़ुरशीद ज़हाँ बॉम्बे टॉकी में 1937 में शामिल हुई और रेनुका देवी के नाम से शोहरत हासिल की। उनकी भाव शाहिदा अब्दुल्लाह ने फ़िल्मी नाम नैना रखा। आ ये बातें अहम नहीं मालूम होतीं लेकिन आज से पचास-पचपन साल पहले यह एक बहुत बड़ी समाजी जुर्रत थी। इस्मत चुग़ताई भी इसी पीढ़ी से तअल्लु रखती थीं। उस समय ज़ब उर्दू में औरतें सुधारवादी कहानियाँ लिख रही थीं या ज़ेबुन्निसा वग़ैरा औरतों की पत्रिकाओं में उनकी रूमानी क़िस्म की कहानियाँ छपती थीं, (जिनमें कुछ बहुत अच्छी होती थीं। हिजाब इम्तियाज़ अली उर्दू फ़िक्शन की एक अलाहिदा पहचान हैं जिनके ज़िक्र की इस वक़्तगुंज़ाइश नहीं है) उस वक़्त इस्मत चुग़ताई बम के गोले की तरह अदब के मैदान पर आ गिरीं बकौल शख़्से:

रेस्ट इज़ हिस्ट्री


उनका पहला संग्रह चोटेंथा या कलियाँमुझे याद नहीं, शायद 1941 में छपा था। इस्मत आपा ने ज़िन्दगी के बहुत उतार-चढ़ाव देखे। मैं उनसे पहली बार 1956 में बम्बई में मिली ज़ब वह और शाहिद लती अपने फ़िल्मी कैरियर की बुलन्दी पर थे। वह स्क्रिप्ट लिखती थीं और शाहिद लती डायरेक्ट करते थे, और वह सारी फ़िल्में हिट होती थीं। दो नाम मुझे याद हैं, ‘ज़िद्दीऔर बुज़दिलऔर एक फ़िल्म जिसमें उन्होंने शायद नर्गिस की ज़िन्दगी को विषय बनाया था।

उस समय भी उन्होंने चन्द अच्छी कहानियाँ लिखीं, लेकिन मेरा ख़याल यह है कि उसी ज़माने से स्क्रिप्ट लिखने के कारण अनजाने में उनके यहाँ कहानी के न की गिरफ़्त कमज़ोर पड़ ग़यी और कुछ घास काटने वाला अन्दाज़ आ या। अजीब-आदमीऔर मासूमामें कहीं-कहीं फ़िल्मगॉसिप का-सा अन्दाज़ झलकने लगा।


इस्मत चुग़ताई 

लेकिन इस्मत आपा ने उर्दू फ़िक्शन को जो बहुमूल्य कहानियाँ दी हैं, वह हमेशा याद रखी जायेंगी। अच्छी कहानी का एक मेयार मैं यह समझती हूँ कि आप उसे बार-बार पढ़िये और फिर पढ़ने को जी चाहे। मण्टो और इस्मत की कुछ कहानियाँ इसी मेयार की हैं।


कभी-कभी मैं उनको लेडी चंगेज़ खाँ पुकारती थी क्योंकि वह उर्दू फ़िक्शन की एक ऐसी चुग़ताई सवार और तीरन्दाज़ थीं जिनका निशाना कभी नहीं चूकता था।

उनकी कहानियों में जो बेसाख़्तापन और भाषा का चटख़ारा मिलता है, वह उनकी और उनके ख़ानदान की दूसरी औरतों की भाषा थी। इस्मत आपा एक मुहब्बत करने वाली, मुँहफट, साफ गो की ढीठ किस्म की ख़ुशमिज़ाज औरत थीं।

एक बार का जिक्र है कि एक औरत की नयी-नयी शादी हुई थी। उस ज़माने में मुग़ल-ए-आजमफ़िल्महिट जा रही थी। वह औरत एक दावत में मुग़लों का जोड़ा पहन कर शामिल हुई और खाने के बाद सोफ़े पर मधुबाला के पोज़ में दुपट्टा तान कर लेट यी। जो मेहमान हाथ धोने के लिए सोफ़े के पास से गुज़र रहे थे वह लामोहाला ठिठक कर उनको देखते। इतने में इस्मत आपा नमूदार हुईं और ब-आवाज़े बुलन्द ड्रामाई अन्दाज़ में पुकारीं, ‘‘अनारकली! मैं आ ग़या।’’

जाँ निसार अख़्तर के इन्तकाल के वक़्त एक कोहराम मचा हुआ था। एक औरत जो उनकी मुँहबोली बहन थी, पछाड़ें खा रही थी। एक और चिल्लाए जा रही थी। अरे बेवा को बुलाओ, बेवा की चूड़ियाँ तोड़ो। इस्मत आपा ख़ामोशी से कुछ देर यह मंजर देखती रहीं, फिर आग-बबूला होकर उठीं। पहले तो उन मुँहबोली बहन को अच्छी तरह झाड़ा, उसके बाद जो औरत, बेचारी-बेहाल ख़दीजा की चूड़ियाँ तोड़ने पर तैयार थी, इस्मत आपा ने उनकी तबीयत साफ़ की। पहले तो कड़कीं, औरत ही को क्यों कहा जाता है कि फलाँ की बेवा है, मर्द के लिए क्यों नहीं कहते कि फलाँ का रंडुवा है और फ़ौरन ज़ब वह रंडुवा हो तो खींच कर उसकी ऐनक और घड़ी तोड़ डालो।

उन्होंने अपनी आर्थिक परेशानी के समय में भी किसी से अपनी परेशानियों का रोना नहीं रोया, न दोस्तों की बेमुरव्वती की शिकायत की। वह ख़ुद्दारी के साथ अपने करीबी दोस्तों की महफिल में बैठी ताश खेला करतीं।

इस्मत आपा बुनियादी तौर पर उस तबक़े से तअल्लुक रखती थीं जिसे एक समय में फ्री थिंकर कहा जाता था। उनकी बड़ी बेटी ने बैंग्लोर में सिविल मैरिज़ कर ली और ख़बर दी कि उसके सास-ससुर मज़हबी रस्म भी अदा करना चाहते हैं, आप भी आ जाइये। बैंग्लोर से वापस आकर इस्मत आपा ने अपने ख़ास अन्दाज़में बहुत ख़ुश होते हुए सुनाया कि, ‘‘सुबह-सुबह मैं उठ ग़यी। सारा घर सो रहा था। उनका पंडित आ ग़या। अब वह बेचारा एक कमरे में परेशान बैठा था। कहने लगा मुहूरत निकली जा रही है और यहाँ कोई है ही नहीं। मैं कैसे पूजा शुरू करूँ। मैंने कहा, ऐ पंडितजी! आप क्यों फिक्र करते हैं, मैं पूजा शुरू करवाये देती हूँ। बस मैं बैठ ग़यी और मैंने पूजा करवा दी।’’

मैंने हैरान होकर पूछा, ‘‘भला आपने पूजा किस तरह करवायी?’’ कहने लगीं, ‘‘, इसमें क्या था। पंडितजी ने कहा, मैं मन्त्रा पढ़ता हूँ, आग़ में थोड़े-थोड़े चावल फेंकती जाओ, मैं चावल फेंकती गयीं। इतने में घर के लोग़ भी आ ग़ये, बस!’’

एक अमरीकन स्कॉलर शायद कार्लो कपोला बम्बई आया हुआ था। एक दिन उसने बताया कि आजकल इस्मत आपा इमाम हुसैन के बारे में बहुत फ़िक्रमन्द हैं। अब मैंने देखा कि मुहर्रम की एक मज़लिस में इस्मत आपा काला ब्लाउज़, काली साड़ी पहने एक इमाम बाड़े में बैठी निहायत ग़ैर से मसायब का बयान सुन रही हैं। कहने लगीं, ‘‘भाई कमाल है। इमाम हुसैन कितने कमाल के इनसान थे। देखो तो उन्होंने क्या किया।’’ जाने उन्हें इमाम हुसैन में दिलचस्पी किस तरह पैदा हुई लेकिन अब मज़लिसों में काले कपड़े पहने इसमत चुग़ताई नज़र आने लगीं। और बम्बई के शियों में बहुत प्रसिद्ध हो गयीं। सब इमाम हुसैन और उनके घरवालों से उनकी मुहब्बत से बहुत प्रभावित थे। कहने लगीं, ‘‘दरअसल मैं मीर अनीस के मर्सियो को ग़द्यमें ढाल रही हूँ।’’ इसके बाद उनकी किताब एक क़तरएँ-खूँप्रकाशित हुई।

बहुत दिनों तक मुझे उनसे मिलने का मौक़ा नहीं मिला, लेकिन पिछले चन्द बरसों, ख़ासकर उनकी ज़िन्दगी के आख़िरी दिनों के बारे में जिस अन्दाज़ से लोगों ने उनका नक्शा खींचा था, उससे इनसानी मनोविज्ञान का एक अजीबोग़रीब पहलू सामने आया। बच्चों के लिए लम्बी उम्र की कामना की जाती है। जीते रहो, जीती रहो, सबसे बड़ी दुआ समझी जाती है। हर शख़्स चाहता है कि उसे लम्बी उम्र मिले। लेकिन ज़ब कोई दूसरा व्यक्ति उस मंजिल पर पहुँच जाये, ज़ब याददाश्त कमज़ोर पड़ जाती है तो वह फ़ौरन सेनाइल मशहूर कर दिया जाता है। इस्मत आपा की याददाश्त कमज़ोर पड़ गयीं थी लेकिन उनके लिए लोग़ इस तरह मज़े लेकर बात करते थेअरे साहब, वह तो अब चार बरस की बच्ची बन ग़यी हैं। गुड़ियाँ खेलने लगी हैं, वग़ैरा वग़ैरा । हालाँकि यह हक़ीक़त नहीं थी।

जब हम दूसरों के बुढ़ापे और उससे मुतअल्लिक़ बीमारियों का मजाक उड़ाते हैं, उस वक़्त यह भूल जाते हैं कि अग़र बुज़ुर्गों की दुआयें क़ुबूल हो गयीं तो हम खुद भी स्टेज़ तक पहुँच सकते हैं, ज़ब हमारा मजाक उड़ाया जाये या कम-से-कम हमारे ज़िक्र से लोग़ लुफ़्त लें। यह तो अक्सर सुनने में आता है कि फलाँ, फलाँअच्छा वह अब तक ज़िन्दा हैं? कमाल है, हीं हीं हींवह तो अब अलग़नी पर लटकाने के लायक होंगे/होंगी। इस्मत आपा अकसर कहती थीं, भई मुझे तो क़ब्र से बहुत डर लग़ता है। मिट्टी में तोप देते हैं। दम घुट जायेगा। एक बार मैंने कहा कि दम होता ही कहाँ है, जो घुटेगा, कहने लगीं, ‘‘नहीं भई, क्या पता किस वक़्त वापस आ जाये। भई मैं तो अपने आप को ज़लवाऊँगी।’’ इस्मत आपा का कमाल यह था कि जो कहती थीं, कर भी दिखाती थीं। लिहाज़ा सुना है कि ज़ब मज़रूह सुल्तानपुरी वेगैरा उनके इन्तकाल की ख़बर सुनकर सीधे चन्दनवाड़ी क़ब्रिस्तान पहुँचे तो मालूम हुआ कि उनको, उनकी वसीयत के मुताबिक़ जलाया जा चुका था। उन्होंने कह रखा था कि ज़ब मैं मरूँ तो किसी को ख़बर न करना और मुझे फ़ौरन क्रीमीटोरियम में पहुँचा देना। क्या अजीबोग़रीब ख़ातून थीं।

बाग़ो-बहार और दर्दमन्द इस्मत चुग़ताई बोर लोगों को झेलने की बेपनाह सलाहियत रखती थीं। उनकी पूरी शख़्सियत की तस्वीरकशी इस एक मज़मून में नहीं की जा सकती। उन जैसी सबसे अलग इनसान और सबसे अलग लेखिका अब कहाँ से आयेगी। आले-चुग़ताई की उर्दू-ए-मुअल्ला कब की ख़त्म हुई। उर्दू ज़बान की काट और तुर्कताज़ी इस्मत चुग़ताई के साथ चली ग़यी।

जाँ निसार अख़्तर के इन्तकाल के वक़्त एक कोहराम मचा हुआ था। एक औरत जो उनकी मुँहबोली बहन थी, पछाड़ें खा रही थी। एक और चिल्लाए जा रही थी। अरे बेवा को बुलाओ, बेवा की चूड़ियाँ तोड़ो। इस्मत आपा ख़ामोशी से कुछ देर यह मंजर देखती रहीं, फिर आग-बबूला होकर उठीं। पहले तो उन मुँहबोली बहन को अच्छी तरह झाड़ा, उसके बाद जो औरत, बेचारी-बेहाल ख़दीजा की चूड़ियाँ तोड़ने पर तैयार थी, इस्मत आपा ने उनकी तबीयत साफ़ की। पहले तो कड़कीं, औरत ही को क्यों कहा जाता है कि फलाँ की बेवा है, मर्द के लिए क्यों नहीं कहते कि फलाँ का रंडुवा है और फ़ौरन ज़ब वह रंडुवा हो तो खींच कर उसकी ऐनक और घड़ी तोड़ डालो।

उन्होंने अपनी आर्थिक परेशानी के समय में भी किसी से अपनी परेशानियों का रोना नहीं रोया, न दोस्तों की बेमुरव्वती की शिकायत की। वह ख़ुद्दारी के साथ अपने करीबी दोस्तों की महफ़िल में बैठी ताश खेला करतीं।

इस्मत आपा बुनियादी तौर पर उस तबक़े से तअल्लुक़ रखती थीं जिसे एक समय में फ्री थिंकर कहा जाता था। उनकी बड़ी बेटी ने बैंग्लोर में सिविल मैरिज़ कर ली और ख़बर दी कि उसके सास-ससुर मज़हबी रस्म भी अदा करना चाहते हैं, आप भी आ जाइये। बैंग्लोर से वापस आकर इस्मत आपा ने अपने ख़ास अन्दाज़ में बहुत ख़ुश होते हुए सुनाया कि, ‘‘सुबह-सुबह मैं उठ ग़यी। सारा घर सो रहा था। उनका पंडित आ ग़या। अब वह बेचारा एक कमरे में परेशान बैठा था। कहने लगा मुहूरत निकली जा रही है और यहाँ कोई है ही नहीं। मैं कैसे पूजा शुरू करूँ। मैंने कहा, ऐ पंडितजी! आप क्यों फ़िक्र करते हैं, मैं पूजा शुरू करवाये देती हूँ। बस मैं बैठ ग़यी और मैंने पूजा करवा दी।’’
मैंने हैरान होकर पूछा, ‘‘भला आपने पूजा किस तरह करवायी?’’ कहने लगीं, ‘‘, इसमें क्या था। पंडितजी ने कहा, मैं मन्त्र पढ़ता हूँ, आग़ में थोड़े-थोड़े चावल फेंकती जाओ, मैं चावल फेंकती गयीं। इतने में घर के लोग़ भी आ ग़ये, बस!’’

एक अमरीकन स्कॉलर शायद कार्लो कपोला बम्बई आया हुआ था। एक दिन उसने बताया कि आजकल इस्मत आपा इमाम हुसैन के बारे में बहुत फ़िक्रमन्द हैं। अब मैंने देखा कि मुहर्रम की एक मज़लिस में इस्मत आपा काला ब्लाउज़, काली साड़ी पहने एक इमाम बाड़े में बैठी निहायत ग़ैर से मसायब का बयान सुन रही हैं। कहने लगीं, ‘‘भाई कमाल है। इमाम हुसैन कितने कमाल के इनसान थे। देखो तो उन्होंने क्या किया।’’ जाने उन्हें इमाम हुसैन में दिलचस्पी किस तरह पैदा हुई लेकिन अब मज़लिसों में काले कपड़े पहने इसमत चुग़ताई नज़र आने लगीं। और बम्बई के शियों में बहुत प्रसिद्ध हो गयीं। सब इमाम हुसैन और उनके घरवालों से उनकी मुहब्बत से बहुत प्रभावित थे। कहने लगीं, ‘‘दरअसल मैं मीर अनीस के मर्सियो को ग़द्यमें ढाल रही हूँ।’’ इसके बाद उनकी किताब एक क़तरएँ-खूँप्रकाशित हुई।

बहुत दिनों तक मुझे उनसे मिलने का मौक़ा नहीं मिला, लेकिन पिछले चन्द बरसों, ख़ासकर उनकी ज़िन्दगी के आख़िरी दिनों के बारे में जिस अन्दाज़ से लोगों ने उनका नक्शा खींचा था, उससे इनसानी मनोविज्ञान का एक अजीबोग़रीब पहलू सामने आया। बच्चों के लिए लम्बी उम्र की कामना की जाती है। जीते रहो, जीती रहो, सबसे बड़ी दुआ समझी जाती है। हर शख़्स चाहता है कि उसे लम्बी उम्र मिले। लेकिन ज़ब कोई दूसरा व्यक्ति उस मंजिल पर पहुँच जाये, ज़ब याददाश्त कमज़ोर पड़ जाती है तो वह फ़ौरन सेनाइल मशहूर कर दिया जाता है। इस्मत आपा की याददाश्त कमज़ोर पड़ गयीं थी लेकिन उनके लिए लोग़ इस तरह मज़े लेकर बात करते थेअरे साहब, वह तो अब चार बरस की बच्ची बन ग़यी हैं। गुड़ियाँ खेलने लगी हैं, वग़ैरा वग़ैरा। हालाँकि यह हक़ीकत नहीं थी।

ज़ब हम दूसरों के बुढ़ापे और उससे मुतअल्लिक़ बीमारियों का मजाक उड़ाते हैं, उस वक़्त यह भूल जाते हैं कि अग़र बुज़ुर्गों की दुआयें क़ुबूल हो गयीं तो हम खुद भी स्टेज़ तक पहुँच सकते हैं, ज़ब हमारा मजाक़ उड़ाया जाये या कम-से-कम हमारे ज़िक्र से लोग़ लुफ़्त लें। यह तो अक्सर सुनने में आता है कि फलाँ, फलाँअच्छा वह अब तक ज़िन्दा हैं? कमाल है, हीं हीं हींवह तो अब अलग़नी पर लटकाने के लायक होंगे/होंगी। इस्मत आपा अकसर कहती थीं, भई मुझे तो क़ब्र से बहुत डर लग़ता है। मिट्टी में तोप देते हैं। दम घुट जायेगा। एक बार मैंने कहा कि दम होता ही कहाँ है, जो घुटेगा, कहने लगीं, ‘‘नहीं भई, क्या पता किस वक़्त वापस आ जाये। भई मैं तो अपने आप को ज़लवाऊँगी।’’ इस्मत आपा का कमाल यह था कि जो कहती थीं, कर भी दिखाती थीं। लिहाज़ा सुना है कि ज़ब मज़रूह सुल्तानपुरी वेगैरा उनके इन्तकाल की ख़बर सुनकर सीधे चन्दनवाड़ी क़ब्रिस्तान पहुँचे तो मालूम हुआ कि उनको, उनकी वसीयत के मुताबिक़ ज़लाया जा चुका था। उन्होंने कह रखा था कि ज़ब मैं मरूँ तो किसी को ख़बर न करना और मुझे फ़ौरन क्रीमीटोरियम में पहुँचा देना। क्या अजीबोग़रीब ख़ातून थीं।

बाग़ो-बहार और दर्दमन्द इस्मत चुग़ताई बोर लोगों को झेलने की बेपनाह सलाहियत रखती थीं। उनकी पूरी शख़्सियत की तस्वीरकशी इस एक मज़मून में नहीं की जा सकती। उन जैसी सबसे अलग इनसान और सबसे अलग लेखिका अब कहाँ से आयेगी। आले-चुग़ताई की उर्दू-ए-मुअल्ला कब की ख़त्म हुई। उर्दू ज़बान की काट और तुर्कताज़ी इस्मत चुग़ताई के साथ चली ग़यी।



इस्मत चुग़ताई  और आशीष के ख़ुशनुमा पल... 


इस्मत चुग़ताई ख़त लिखते हुये 

सम्पादक 
सुकृता पॉल कुमार 
अमितेश कुमार 
चित्र (c) आशीष साहनी 

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चित्र (c) आशीष साहनी