Saturday, 3 March 2018




दिलीप कुमार साहब 

की आत्मकथा

दिलीप कुमार : वजूद और परछाईं

 
950 
/- 
 978-93-5072-943-4 • हार्ड कवर  
 
495
/- 
 978-93-86799-68-5  पेपर बैक 
आत्मकथा   पृष्ठ संख्या -
​ 436



पुस्तक-अंश

दिलीप कुमार (युसूफ ख़ान)जिन्होंने हिन्दी सिनेमा में 1940 के दशक में एक नौसिखिया के रूप में शुरुआत कीने बहुत ही कम समय में स्टारडम (नायकत्व) के शिखर को छुआ। अपने 60 वर्ष के लम्बेफ़िल्मी कैरियर में उन्होंने अपनी रचनात्मक योग्यतादृढ़ निश्चयमेहनत और अनोखे अन्दा से एक के बाद एक हिट फ़िल्मों में मन्त्रमुग्ध कर देने वाला प्रदर्शन किया। इनकी नकल करने वाले असंख्य हैं,लेकिन वास्तविक तो केवल एक ही है जिसने अपने समय का भरपूर आनन्द लिया है।

इस अनूठी पुस्तक में दिलीप कुमार की जन्म से लेकर अब तक की जीवन-यात्रा का वर्णन किया गया है। इस प्रक्रिया में उन्होंने स्पष्ट रूप से अपनी बातचीत और सम्बन्धों-जो व्यापक स्तर पर विविध लोगों से रहे हैं और इनमें केवल पारिवारिक ही नहींअपितु फ़िल्मी दुनिया से जुडे़ लोगों के साथ-साथ राजनीतिज्ञ भी शामिल हैं- का स्पष्ट रूप से विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। वह अनुभव करते हैं कि उनके बारे में जो बहुत कुछ लिखा जा चुका हैवह मिथ्या और भ्रामक है। वह स्पष्ट रूप से बताते हैं कि उन्होंने कैसे सायरा बानो से शादी कीजो कि एक परीकथा की तरह है।

दिलीप कुमार उस घटना के बारे में बताते हैंजिससे उनकी ज़िन्दगी बदल गयी : बॉम्बे टॉकी की देविका रानी से उनकी मुलाक़ात होना और उनके द्वारा उन्हें फ़िल्म में अभिनय का आमन्त्रण दिया जाना। उनकी फ़िल्म ज्वार भाटा’ (1944) थी। वह विस्तारपूर्वक बताते हैं कि उन्हें किस प्रकार सीखना पड़ा और कैसे उन्होंने अपना अभिनय-सम्बन्धी अन्दा बनाया जिसने उन्हें अपने समकालीनों से बिल्कुल अलग कर दिया। इसके बाद उनकी फ़िल्मोंजैसे- जुगनू’, ‘शहीद’, ‘मेला’, ‘अन्दा’, ‘दीदार’, ‘दाग़’ और देवदास’ के साथ-साथ उनका क़द भी बढ़ता गया। इन फ़िल्मों में उन्होंने बड़ी तेज़ी से ट्रेजेडियन’ के रूप में भूमिका निभाईजिससे उनकी मानसिकता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। उन्होंने एक ब्रिटिश (अंग्रे) मनोचिकित्सक से परामर्श कियाजिसने उन्हें हास्य-व्यंग्य की भूमिका निभाने की सलाह दी। फ़िल्म आज़ा’ औरकोहिनूर’ के अलावा नया दौर’ में किया गया उनका हास्य से भरपूर अभिनय प्रभावशाली रहा। तब उन्होंने अनेक फ़िल्मोंजैसे-  ‘गंगा-जमना’, ‘लीडर’, ‘दिल दिया दर्द लिया’, ‘राम और श्याम’, ‘आदमी’, ‘संघर्ष’, ‘गोपी’, ‘सगीना’ और बैराग’ आदि में गम्भीर और दिल गुदगुदाने वाले किरदार निभाए।

आगे चलकर उन्होंने फ़िल्मों से पाँच वर्ष का विराम लिया और फिर अपनी दूसरी पारी क्रान्ति’ (1981) से शुरू कीजिसके बाद वे अनेक हिट फ़िल्मों में दिखाई दियेजैसे- विधाता’, ‘शक्ति’, ‘मशाल’, ‘कर्मा’, ‘सौदागरऔर क़िला

दिलीप कुमार को अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से भी पुरस्कृत किया गया है जिसमें आठ बार फ़िल्मफेयरबेस्ट एक्टर अवार्ड’ हैजो कि अपने आप में एक रिकॉर्ड है। उन्हें पद्मभूषण’ और दादासाहेब फालके अवार्ड’ जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों के साथ-साथ निशान-ए-इम्तिया’ (पाकिस्तान का उच्च नागरिक पुरस्कार) से भी नवाज़ा गया है। उन्होंने बड़ी शिष्टता से अनेक सामाजिक कार्यों में बखूबी भूमिका निभाई है।

लम्बे समय से प्रतीक्षारत यह आत्मकथा’ दिलीप कुमार से जुड़े वास्तविक तथ्यों को अपने में सम्पूर्ण रूप से समेटे हुए हैजो न केवल एक श्रेष्ठ अभिनेता रहे हैं बल्कि कला पारखीउर्दूफ़ारसी और अंग्रेजी साहित्य के आदर्श पाठकओजस्वी वक्ता एवं उच्चकोटि के नकलची और श्रेष्ठ नर्तक रहे हैं।


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