Wednesday, 7 March 2018

अपने-अपने अज्ञेय


अपने-अपने अज्ञेय

'छायारूप' - ओम थानवी


ज्ञेय को अज्ञेयनाम पसन्द नहीं था। जीवन के अन्तिम वर्षों तक वे कहते रहे कि यह उनका ओढ़ा हुआनाम है। उनके हाथ से जो पाण्डुलिपि तैयार होती, हरेक पर अज्ञेयलिखा रहता था। मुझे उनकी कुछ किताबें उन्हीं के हाथों भेंटस्वरूप पाने का सौभाग्य मिला है। उन सब पर अज्ञेयही लिखा है। उद्धरण- चिन्ह में। उन्हें फोन पर पूछा जाता कि अज्ञेय जी हैं, तो जवाब होताः नहीं, मैं वात्स्यायन बोल रहा हूँ! यह उनकी चुहल होती थी। वे अपने रचनाकार रूप का नाम अज्ञेयस्वीकार कर चुके थे, लेकिन व्यक्ति के नाते सच्चिदानन्द वात्स्यायन थे। इतना ही नहीं, कविता-कथा यानी रची हुई कृति तो अज्ञेयनाम से छपवाते थे; पत्र-पत्रिकाओं के लिए लिखे लेख, विचार-मन्थन या आलोचना आदि सब असल नाम से।

लेकिन यह भी सच है कि उपनाम ने उनके जीते-जी हिन्दी समाज में असल नाम की प्रतिष्ठा पा ली थी। उनके उद्धरण-चिन्ह देखते-न-देखते निरर्थक हो गये।

अब यह बात जगजाहिर है कि किस तरह विकट परिस्थिति में यह नाम उनके पल्ले अनचाहे आ पड़ा। दिल्ली जेल (1930-1933) में लिखी साढ़े सात कहानियाँवात्स्यायन जी ने वहीं से जैनेन्द्र कुमार को भिजवाईं, आगे जागरण और विशाल भारत के सम्पादक प्रेमचन्द और बनारसीदास चतुर्वेदी को पहुँचाने के लिए। लेखक की इच्छानुसार जैनेन्द्र जी ने कहानियाँ भिजवा दीं। प्रेमचन्द को दो राजनीतिक कहानियाँ पसन्द आयीं। उन पर कोई नाम नहीं था। पहले उन्हें संशय हुआ कि अनाम कहानियाँ जैनेन्द्र जी की ही न हों। उन्होंने पूछा तो जैनेन्द्र जी ने लेखक के नाम की जगह एक विशेषण अज्ञेयका प्रयोग किया। यानी लेखक ऐसी परिस्थिति में नहीं है कि उसका नाम उजागर किया जा सके। बाद में प्रेमचन्द ने निर्णय किया कि क्यों न लेखक के नाम की जगह अज्ञेयही लिख दिया जाए। और अमरवल्लरीकहानी उन्होंने जागरण में इस नामसे प्रकाशित कर दी।

लेकिन कोई तीन दशक पहले, 1981 में, दिल्ली में मुझे अपने घर के जंगलकी सैर कराते हुए अज्ञेय जी ने जब बड़े सहज भाव से कहा कि ऐसा बेहूदानाम वे खुद कभी न रखते, बल्कि किसी तरह का उपनाम ही न रखते -  तो मैं चौंक गया था।

वह उनका कैवेंटर्स ईस्ट वाला घर था। छह साल बाद वहीं उनका प्रयाण हुआ। कभी इला डालमिया के पिता रामकृष्ण डालमिया का उद्यम रही कैवेंटर डेयरी के आमने-सामने बने दो बँगलों में यह पूर्वी ठिकाना उजड़ी जायदाद की दास्तान आप कहता था। मगर वात्स्यायन जी ने इसमें एक तरतीब ढूँढ़ ली थी। बागवानी में वे सिद्धहस्त थे। यह लगाव उन्हें विरासत में पिता से मिला था। उस घर में आगे की तरफ उन्होंने एक खूबसूरत बगीचा विकसित किया। पर पीछे का हिस्सा निपट उजाड़ रहने दिया।

उस तरफ जाने की इजाजत हर किसी को नहीं होती“, कुछ चंचल मुद्रा में मुझ नाकुछ को जैसे विशिष्टता का अनुभव कराते हुए उन्होंने कहा। इशारा उठने का था।

उनकी पसन्दीदा दार्जीलिंग चाय की महक तब तक मेरे रसबोधका हिस्सा नहीं बनी थी। उसे उसी साँस में सुड़ककर मैं उठ खड़ा हुआ। उनकी नजर पैनी थी। उठते हुए प्याली को निहारकर बोले, आप चाय पीते हैं या दूध? मुझे सवाल तत्काल समझ में नहीं आया। या, कहना चाहिए, उनके मजाकिया स्वभाव का अभ्यस्त नहीं हुआ था। बाद में समझा कि अच्छी चाय का दूध और चीनी से दुश्मनी का नाता होता है। बहरहाल, हम बगीचे से निकले और घर के बाएँ खड़ी दो कारों -  एक फिएट, दूसरी एम्बेसडर - की बगल से होते हुए पिछवाड़े के जंगल में प्रवेश कर गये।

वह सचमुच छोटा-मोटा जंगल ही था। दिल्ली के बीचोबीच किसी घर की चारदीवारी में ऐसा नजारा मेरे लिए तब भी अजूबा था, आज भी है। अलसाए पेड़, बेतरतीब झाड़-झंखाड़। घर के सामने तराशे हुए बगीचे में तो अजीब-सी चुप्पी थी, पर इस जंगल का सन्नाटा मोहक था और सुनाई पड़ता था। जैसे अज्ञेय के व्यक्तित्व के दो रूपों की छाया हो। दो चेहरों की तरह घर का आगा-पीछा उन्होंने दो नितान्त भिन्न ध्रुवों पर रच रखा था। जिस तरह अपने रूपों को वे चाव से जी लेते थे, वनस्पतियों की यह दूरी भी चाव से पाटे रखते थे। पर उनका मन शायद पीछे के एकान्त में ज्यादा रमता था।
उस सन्नाटे को अचानक पक्षियों की चहचहाहट वेधती और फिर जैसे उसी सन्नाटे में विलीन हो जाती। प्रकृति पर अज्ञेय की हजार कविताएँ होंगी, पर उनके घर में प्रकृति-प्रेम का वह जीता-जागता रूपाकार मेरे दिलोदिमाग पर आज भी ज्यों-का-त्यों छाया है।

उसी वनप्रान्तर में उन्होंने अपने नाम को हलके अन्दाज में बेहूदा कहा और मैं चौंका। दरअसल, उनका नाम - यानी उपनाम - जेहन में इस तरह जम चुका था कि उस पर सोचने की कभी जरूरत महसूस नहीं हुई थी। नामों-उपनामों के साथ अक्सर ऐसा ही होता है। उनमें अर्थ कौन ढूँढ़ता है? लेकिन जब उन्होंने अज्ञेय नामकरण की दास्तान - जो मुझे तब ज्ञात न थी - सुनाई तो उनका तंज भी समझ में आया।

अज्ञेयः जिसे कभी जाना न जा सके। पर अभिव्यक्ति में रत जो लेखक हमेशा सम्प्रेषणीयता की वकालत करता आया हो, अपने आप को अज्ञेय कैसे कह सकता है! भले उनके विरोधी उन्हें अहंवादी करार देते रहे हों, अज्ञेय अत्यन्त विनम्र और सहज थे। एकान्त और निजता की चाह रखने वाला हमेशा अहंकारी नहीं होता। अपने साहित्य में वे अहं के विलयकी बात करते थे। और तो और, वे आत्मकथा-लेखन को भी अहंकारी उद्यममानते थे। अपने जीवन को कोई इतना अहम क्यों माने कि उसकी दास्तान दूसरों को सुनाने लगे। फिर - वे कहते थे - आत्मकथाएँ सच को बयान करने के लिए कम, छुपाने के लिए ज्यादा लिखी जाती हैं।

जाहिर है, ऐसे व्यक्ति के लिए अपने आप को अज्ञेय कहना ज्यादा अहंवादी ही अनुभव होता, जो कि वे नहीं थे। फिर प्रयोगशीलता की मानसिकता में अनपुजी परती तोड़ने वालाघोर आधुनिक रचनाकार पीछे छूट गयी शैली में अपना उपनाम धरता ही क्यों! जो हो, अज्ञेय नाम वात्स्यायन जी को जँचा नहीं। पर हिन्दी और हिन्दीतर समाज के लिए वह उनके नाम का अभिन्न हिस्सा बनता चला गया। और खुद लेखक के लिए सदा उद्धरण-चिन्ह में दुबका एक उपनाम!

लेकिन वात्स्यायन जी के यहाँ उनके नाम-उपनाम या जैनेन्द्र-प्रेमचन्द वाला प्रसंग छिड़ा कैसे?

उस शाम वत्सल निधि का एक खास आयोजन था। त्रिवेणी सभागार में अज्ञेय के पिता हीरानन्द शास्त्री की स्मृति में स्थापित व्याख्यानमाला का पहला कार्यक्रम। गोविन्दचन्द्र पाण्डे  भारतीय संस्कृति के मूल स्वरपर बोलने वाले थे। जैनेन्द्र कुमार को अध्यक्षता करनी थी। मैं इसी कार्यक्रम के लिए जयपुर से आया था। कैवेंटर्स ईस्ट में उमंग का माहौल था। इला जी खुद मंच की सजावट का सामान जुटाने-सँवारने में लगी थीं।

वात्स्यायन जी ने मेरा जिम्मा जैनेन्द्र जी को उनके दरियागंज के घर से मण्डी हाउस लिवाने में लगाया। विनोदी अन्दाज में यह कहते हुए कि टैक्सी का खर्च याद से हमें देना होगा, ”इस मामले में जैनेन्द्र जी शुरू से अल्पव्ययी हैं!और इसी के आगे-पीछे जैनेन्द्र जी से उनके आधी सदी से ऊपर के सम्बन्ध की बात निकली। कैसे सम्भव था कि जैनेन्द्र के हाथों अज्ञेयबन जाने की हुड़क उनकी जबान पर न चढ़ आती?

दरियागंज की एक गली में जैनेन्द्र जी रहते थे। उसी घर में कभी अज्ञेय और प्रेमचन्द की पहली मुलाकात हुई थी। सामने ही कहीं कुछ समय के लिए वात्स्यायन जी ने भी यहीं पर घर लिया था। जैनेन्द्र जी को लेकर गद्गद भाव से हम त्रिवेणी की ओर रवाना हुए तो पाया कि वे चुप के लिए मशहूर अज्ञेय से कहीं ज्यादा चुप्पे हैं। उनकी मुख-मुद्रा बेहद गम्भीर थी, पर चेहरे पर उम्र की सलवटों के बीच अपनापे की रेखाएँ नुमायाँ थीं। एक और सज्जन साथ थे, जिनका नाम याद नहीं आ रहा। उन्हीं से बातचीत होती रही। पर मन में सुबह की बात घुमड़ रही थी। किसी मोड़ पर जैनेन्द्र जी ने आयोजन के बारे में कुछ पूछा।

मौका देखकर मैंने कहा- अज्ञेय नाम तो आपका ही दिया हुआ है न? उन्होंने सहज भाव से कहा-  हाँ, मैंने ये और वेमें इस प्रसंग का उल्लेख किया है। वे फिर चुप लगा गये। उनकी चुप्पी को मैंने यों समझा कि बाकी वहाँ पढ़ो!

कहना मुश्किल है, जैनेन्द्र जी को यह मालूम था या नहीं कि अपूर्व लोकप्रियता के बावजूद अज्ञेय जी की अज्ञेयके बारे में कमोबेश वही राय है, जो पचास साल पहले उन्होंने जैनेन्द्र जी को बड़ी वितृष्णाके साथ व्यक्त की थी!

अज्ञेय को पहले-पहल मैंने सितम्बर 1972 में बीकानेर प्रौढ़ शिक्षण समिति की एक संगोष्ठी में देखा। नामवर सिंह और महावीर दाधीच से अविचलित उलझते हुए। समिति ने समकालीन हिन्दी कविता पर एक परिसंवाद आयोजित किया था। उसकी रूपरेखा नन्दकिशोर आचार्य ने बनाई थी। आचार्य जी ने लड़कपन के दिनों में अज्ञेय की काव्य-तितीर्षा पुस्तक लिखी। आलोचना के नीरस और अक्सर दुराग्रही पाठ के बरक्स वह कवि-मन से कविता को समझने की ईमानदार कोशिश साबित हुई। उस एक कृति ने हमेशा के लिए अज्ञेय को राजस्थान से एक आत्मीय रिश्ते में जोड़ दिया।

यों अज्ञेय पहली बार 1965 में बीकानेर आये। सम्भवतः राजस्थान में किसी साहित्यिक आयोजन में उनकी वह पहली यात्रा रही हो। राजस्थान साहित्य अकादमी का कोई सम्मेलन था। उनके साथ विद्यानिवास मिश्र, रघुवीर सहाय और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना भी थे। पहली ही यात्रा में देसी ठाठ के शिक्षाविद् डॉ. छगन मोहता से उनकी गहरी दोस्ती हो गयी। डॉ. मोहता के आग्रह पर उन्होंने असाध्य वीणाका पाठ भी किया। 1971 में वे फिर बीकानेर आये। नागरी भण्डार संस्थान में उन्होंने आधुनिक भारतीय कविता पर व्याख्यान दिया। अगले साल दो यात्राएँ और। वह उस साल की दूसरी यात्रा थी, जिसमें मैंने उन्हें देखा और सुना।

फरवरी 1978 में वात्स्यायन जी नवांकुर लेखक सम्मेलन के उद्घाटन के लिए फिर बीकानेर आये। इस बार निर्मल वर्मा साथ थे। तब तक मैं छिटपुट लिखने लगा था और सम्मेलन के नवांकुरलेखकों में शरीक था। कुछ अतिरिक्त उत्साह में जैसी-तैसी कविताएँ भी वहाँ सुना डालीं। जब चाय का वक्त हुआ तो धर्मशाला के हॉल के बाहर चौकी पर अज्ञेय बोले, आपको लिखते रहना चाहिए। उन्हें हैरानी हुई जब पता चला कि मैं वाणिज्य का विद्यार्थी हूँ। हालाँकि हैरानी की खास गुंजाइश नहीं थी, क्योंकि कॉलेज के भीतर और बाहर मैं पाठ्य सामग्री को छोड़कर सब चीजें पढ़ता था। वाणिज्य न ठीक से पढ़ा, न सीखा। हिन्दी पढ़ाने वाले संजीदा शिक्षक डॉ. आदर्श सक्सेना के कहने पर कॉलेज की पत्रिका का सम्पादन जरूर किया। अज्ञेय की कविताएँ मुझे कण्ठस्थ थीं। एक छोटी कविता स्कूल के जमाने से बहुत पसन्द थी, जिसे उस रोज खुद उनको मैंने अपने स्वर में सुनायाः चुप-चाप, चुप-चाप/झरने का स्वर/हममें भर जाय...!तब नहीं सोचा था कि यह कवि के साथ कभी न खत्म होने वाले एक रिश्ते की शुरुआत है।

इसके बाद उनसे दिल्ली में मिला। नन्दकिशोर जी के बाबा - पिता के बड़े भाई, जिन्हें राजस्थान में बड़े पिता कहते हैं - बहुत बीमार थे। एक दवा दुर्लभ थी। आचार्य जी के कहने पर दिल्ली की गाड़ी पकड़ी। वे अपेक्षया खुशनुमा दिन थे। आपातकाल उठ चुका था। अज्ञेय नवभारत टाइम्स का सम्पादन कर रहे थे, पूरी आजादी के साथ और अपने अन्दाज में (हजारीप्रसाद द्विवेदी का निधन हुआ तो अखबार के पहले पेज पर और कोई दूसरी खबर न थी!)।

मैं उनके दफ्तर पहुँचा। पहचानने में उन्हें देर नहीं लगी। कुछ लिख रहे हैं न, उन्होंने पूछा। फिर अपने निजी चिकित्सक को फोन मिलाया। उनकी गाड़ी से मैं चिकित्सक के घर पहुँचा। उन्होंने एक दुकान पर जाने को कहा। दुकानदार ने दवा की जगह वितरक का पता दिया। वितरक ने सहानुभूति से मेरी बात सुनी और एक छोटे दुकानदार को फोन कर कहा कि संकट का मामला है। जो माल भेजा है उसमें से एक डिब्बा इन्हें दे दो, कल भरपाई कर देंगे। उस दुकानदार से आखिरकार दवा मिल गयी।
मुझे जैसे संजीवनी हासिल हुई। गाड़ी वापस करने अज्ञेय जी के दफ्तर पहुँचा। चश्मा उतारकर उन्होंने उस दवा के डिब्बे की इबारत पढ़ी। कोई दिक्कत तो नहीं हुई, मुझसे पूछा। उनकी कार दिन भर मेरे पास थी, इस अपराध-बोध को थोड़ा हल्का करने की गरज से मैंने एक साँस में सारी रामकहानी सुना डाली। वे थोड़ा-सा मुस्कुराए और कहा-  चक्कर न कटवाए तो दिल्ली क्या हुई! चलिए, काम तो हो गया। उनके चेहरे पर राहत का भाव था। जैसे दवा की जरूरत स्वयं उन्हें रही हो! मैंने धन्यवाद कहा, तो बोलेः खुद का धन्यवाद नहीं करते! चला, तो कमरे के बाहर तक छोड़ने आये। हाथ जोड़ते हुए विदा दी। उनके इस मानवीय पहलू ने मुझे उनका और मुरीद बना दिया।

पढ़ाई पूरी कर आठवाँ दशक लगते-न-लगते मैं पत्रिका समूह के साप्ताहिक इतवारी पत्रिका में काम करने जयपुर आ गया। छह महीने के भीतर समूह के संस्थापक कर्पूरचन्द कुलिश ने मुझे साप्ताहिक के सम्पादन का जिम्मा सौंप दिया। हालाँकि सम्पादक के रूप में नाम नहीं छपता था, पर काम की मुझे पूरी छूट थी। मैं तब तेईस वर्ष का था। इतवारी के राजनीतिक स्वरूप में थोड़ा घालमेल करते हुए संस्कृति यानी साहित्य, कला, रंगमंच, संगीत-नृत्य, दर्शन, शिक्षा आदि की सामग्री मैंने बढ़ा दी। साप्ताहिक की बीस-बाईस हजार प्रतियाँ बिकती थीं। ज्यादातर राजस्थान में ही। लेकिन लिखने वालों में अनेक बाहर के थे। जैसे राजकिशोर, रमेशचन्द्र शाह, बनवारी, पंकज आदि। रघुवीर सहाय, प्रयाग शुक्ल और वागीश कुमार सिंह स्तम्भ लिखते थे, जो लम्बे अरसे तक चले। कला-परख पर प्रयाग जी की अनूठी किताब देखना उस वक्त छपे लेखों का ही संकलन है।

जयपुर ने मेरे लिए दिल्ली की दूरी घटा दी। अब अज्ञेय जी से उनके घर में मिलना शुरू हुआ। सरदार पटेल मार्ग पर कैवेंटर लेन में पूरब का बँगला - कैवेंटर्स ईस्ट!


अज्ञेय के साथ ओम थानवी (जयपुर,1981)

दिल्ली में इतवारी पत्रिका के बहुत-से पाठक थे। पर मुझे यह जानकर ज्यादा खुशी हुई कि अज्ञेय इतवारी बराबर पढ़ते हैं। इला डालमिया भी पढ़ती थीं। इला जी ने बाद में स्त्री-समाज की समस्याओं पर हमारे लिए एक पाक्षिक स्तम्भ लिखा। पता नहीं क्यों, ‘गीर्वाणी दासनाम से। वात्स्यायन जी ने उस स्तम्भ को नाम दिया -समान्तर संसार। मैं समानान्तरशब्द से ज्यादा परिचित था, सो वही सुना। उन्होंने फौरन साफ किया कि जब समान्तर कहने से काम चल सकता है तो एक अक्षर फिजूल क्यों खर्च करें! लेखन में शब्दों-अक्षरों की और कला में रंग-रेखाओं की फिजूलखर्ची उन्हें गवारा न थी।

उसी वक्त यह भी समझ आया कि महिला और स्त्री, नारी या औरत शब्द एक अर्थ के नहीं हैं। सम्भ्रान्त स्त्री को महिला कहा जा सकता है, लेकिन पत्थर तोड़ने वाली मेहनतकश औरत को तो नहीं। सब महिलाएँ स्त्रियाँ होंगी, लेकिन सब स्त्रियों को महिला करार देना उनके साथ अन्याय होगा। शब्दों की परतों में इस तरह की आमदरफ्त वात्स्यायन जी का खब्त था। यह राग मेरे पिताजी में भी था - अब भी है - जो तबियतऔर तबीयतके बीच तब तक उलझे रहते, जब तक पुख्ता प्रमाण न जुटा लाते कि तबीयतही सही है (हिन्दी में; अरबी/उर्दू में तबीअतरहता है)।

शब्दों को लेकर अपनी मगजपच्ची का एक दिलचस्प वाकया अज्ञेय ने खुद बयान किया है। अस्पताल में भरती थे। मार्फिया का इंजेक्शन लगा था। नीम-बेहोशी में डॉक्टर की आवाज कान में पड़ी कि दर्द कैसा है? जवाब दिया- बहुत है। डॉक्टर ने फिर पूछा इंटालरेबल (असह्य) है? अज्ञेयः सीवियर (तीखा) है। डॉक्टरः क्या सहन नहीं होता? अज्ञेयः ‘‘कहा तो, डॉक्टर, कि सीवियर है। इंटालरेबल का मतलब है कि या तो चीखूँ-चिल्लाऊँ, या फिर बेहोश हो जाऊँ। आप देख रहे हैं कि होश में हूँ, और सह रहा हूँ।’’ डॉक्टर को कोफ्त हुई। बाहर जाकर बोले कि अजीब मरीज है, दिल के दौरे में और मार्फिया के नशे में भी लफ्जों पर बहस करता है। किस्सा बयान कर अज्ञेय की टीपः ‘‘क्यों न करूँ ? इंटालरेबल, यानी जो सहा न जाय। सह तो रहा हूँ - भाषा के साथ आपका अन्याय भी तो सह ही रहा हूँ!’’

ऐसा ही एक प्रसंग आचार्य जी बताते हैं। नवभारत टाइम्स के दिनों में, जब अज्ञेय गॉल्फ लिंक्स में रहते थे, शहर में कहीं रेतीला चक्रवात आया। एक जगह तो मोटरसाइकिल उड़कर पेड़ पर जा टँगी। हक्का-बक्का हर शख्स कहता, साहब क्या तूफान था। अज्ञेय का सुधारः तूफान नहीं, घूर्णावात (वर्लविंड) रहा होगा। (राजस्थानी में इस किस्म के बवण्डर के लिए भूतोलियाशब्द है।)
शब्दों पर उनका सोच-विचार चलता रहता था। कोई शाम नमस्कार कर विदा हुआ तो पूछते, आपको पता है प्राचीन भारत में सुबह-शाम के अभिवादन क्या थे? फिर बताते- ‘प्रातः स्वस्तिऔर सायं स्वस्ति’! शब्दों के रूढ़ प्रयोगों में भी वे संशोधन खोजते थे, मसलन मितव्ययिता की जगह सीधे मितव्यय, पूर्वाग्रह के बदले पूर्वग्रह, अपेक्षाकृत की जगह अपेक्षया। कभी-कभार जानबूझकर प्रयोगों में बाँकपन ले आते; जैसे प्रत्यक्ष या रू-ब-रू की जगह कहते- अपरोक्ष!

हिन्दी में अनेक शब्दों को अज्ञेय चलन में लाये। मसलन यायावर, जिजीविषा, पूर्वग्रह, लोकार्पण। लोकार्पण के लिए विमोचन कहना उन्हें निरर्थक लगता था। एक दिन बोले, पुस्तक के विमोचन (मुक्ति) की क्रिया तो छापेखाने में ही सम्पन्न हो जाती है! शायद विमोचनके विकल्प की खोज शुरू हो चुकी थी। कुछ रोज वे संतरणपर अटके। फिर शब्द दिया लोकार्पण। आज हिन्दी में हर पुस्तक का लोकार्पणहोता है। भोपाल में भारत भवन के एक आयोजन समवाय-एक में अशोक वाजपेयी द्वारा सम्पादित पूर्वग्रह के विशेषांक का लोकार्पण नामवर सिंह ने किया था। अंक की प्रति पहले-पहल अज्ञेय को सौंपते हुए नामवर जी ने कहा था- यह अंक उनके हाथों में देता हूँ, जिन्होंने हमें पूर्वग्रहऔर लोकार्पणदोनों शब्द दिए हैं।

ऐसे अज्ञेय के करीब पहुँचकर लगा कि ज्ञान की एक नयी खिड़की खुल गयी है। बीकानेर में पिताजी से, डॉ. छगन मोहता और आचार्य जी से बहुत सीखने को मिला। जयपुर में विद्वान बहुत थे, पर किसी से इतनी घनिष्ठता कायम नहीं हुई। फिर उमंगों भरी उम्र में सम्पादक बन जाने से लगी गाँठ हरेक के आगे कहाँ खुलती है। यों वात्स्यायन जी खुद हरेक से नहीं खुलते थे। लेकिन जिससे खुल गये, सब दीवार-खाइयाँ ढहा देते थे। उनकी और मेरी उम्र में लगभग आधी सदी का फासला था। वे सम्पादकी में भी अछूती ऊँचाइयाँ कायम कर चुके थे। लेकिन इस दूरी का अहसास उन्होंने मुझे कभी नहीं होने दिया।

हमारे साप्ताहिक के लिए उन्होंने कई सुझाव दिए। उसमें सुधार हुआ सो हुआ, मैंने बहुत सीखा भी। उनके कई सुझाव याद आते हैं। जैसे यह कि एक ही विचार के लोग आपके यहाँ क्यों लिखते हैं, अखबार कोई मुखपत्र तो नहीं होता। यह गलती रघुवीर सहाय ने की। इससे सीखिए। अन्तरराष्ट्रीय मामलों पर आपके यहाँ कुछ नहीं होता। अपने पाठकों को कुछ दुनिया की खबर भी दीजिए। कविताओं की आपको समझ है (उन्हें खुशफहमी रही होगी!), सो कविताओं के चुनाव का जिम्मा सिर्फ अपने पास रखिए, वरना कविताओं की जगह लंगड़ा गद्य छपने लगेगा। अब तो छपाई के साधन बेहतर हैं, तस्वीरें बढ़ा सकते हैं। इत्यादि।

उनके इस लगाव और सरोकार से अभिभूत मैं तरह-तरह की सलाह माँगकर लेने लगा। जैसे एक दफा मैंने समस्या बताई कि हमारा चिट्ठियों का स्तम्भ बेजान है। सामान्य अभिव्यक्ति के पत्र ही आते हैं कि अमुक लेख अच्छा या बुरा लगा। अज्ञेय ने सुझाया, कुछ समय के लिए मॉडल’ (फर्जी) पत्र अपने सहयोगियों से लिखवाइए। छद्म नामों से छापिए। उन्हें पढ़कर बाद में पाठक वैसे पत्र भेजने लगेंगे। उन्होंने बताया, यह प्रयोग उन्होंने दिनमान में मत और सम्मतके लिए किया था। लम्बे और बेहतर पत्र आने लगे।

लेखकों के चुनाव को लेकर उनकी दृष्टि बड़ी उदार थी। वे मानते थे कि हर लेखक छापा जाना चाहिए, ‘जो छपने लायक हो। विचारधारा या मत विशेष के आधार पर सम्पादक की पसन्द-नापसन्द को वे जातिवादीपूर्वग्रह की संज्ञा देते थे। पत्रकारिता ही नहीं, साहित्य में भी नाम देखकर यानी पहले लेखक की विचारधारा जाँच कर उसे अच्छा या बुरा लेखक मान लेने की वृत्ति को भी वे एक किस्म का जातिवाद ही मानते थे। कलकत्ता में जब विशाल भारत के सम्पादक हुए तो कार्यभार सौंपते हुए बनारसीदास चतुर्वेदी ने लेखकों की दो सफे की लम्बी सूची उन्हें थमा दी थी, यह कहते हुए कि इन्हें कभी मत छापना क्योंकि उनके साथ हमारे सम्बन्ध अच्छे नहीं हैं। वात्स्यायन जी ने उसी वक्त चतुर्वेदी जी को कहा कि सम्पादक के नाते आपका अनुभव विशद है और मैं उसका अनुसरण करूँगा, लेकिन आपकी यह बात मुझे नहीं जमती। रचना को पढ़े बगैर और उस पर विचार किए बगैर उसे प्रकाशित न करने का निर्णय सम्पादक करे यह उचित नहीं लगता, चाहे लेखक से सम्बन्ध खराब ही क्यों न हों।

वक्त कभी-कभी बहुत धीमी गति से चलता है। विशाल भारत का जमाना गुजरे अस्सी बरस हो रहे हैं। पर नाम देखकर टीका लगाने या मिटाने की मनोवृत्ति अब भी देखने में आ जाती है। कुछ ही समय पहले दिल्ली के एक प्रतिष्ठान में समूह सम्पादक ने लिखित आदेश जारी किया कि समूह के पत्र या पत्रिकाओं में सोलह लेखकों का लिखा कुछ भी नहीं छपेगा। लेखकों की सूची में विष्णु खरे, अरुंधति राय, कात्यायनी, प्रभाष जोशी, राजकिशोर, रामशरण जोशी जैसे जाने-माने नाम भी थे। यह मामला जनसत्ता में उठा जिसकी बुद्धिजीवी वर्ग से लेकर संसद तक में व्यापक प्रतिक्रिया हुई। अन्ततः समूह सम्पादक को ही पद से हटना पड़ा।

वात्स्यायन जी के कद और रुतबे को भूलकर एक दफा मैंने कहा, आप इतवारी के लिए क्यों नहीं लिखते? वे बोले, शब्दों की सीमा बताइए। मैंने कहा, आपके लिए क्या सीमा! जितना लिख देंगे, हम पर अनुग्रह होगा। और उन्होंने सचमुच लिखा। कभी चिन्तनपरक, कभी ललित।

एक अप्रकाशित उपन्यास का अंश हमें दिया। उसका शीर्षक था - हेम और केतकी। निधन के बाद वह (अधूरा) उपन्यास बीनू भगत के नाम से छपा। नोबेल पुरस्कार पाने वाले स्वीडी कथाकार पेर लागरक्विस्त की उपन्यास-त्रायी के नायाब अनुवाद (अब महायात्रा नाम से एक साथ उपलब्ध) के अंश भी उन्होंने दिए, जो हमने चार किस्तों में प्रकाशित किए। जब साम्यवादी युगोस्लाविया में गोल्डन रीथसम्मान लेने गये तो उस यात्रा का लम्बा संस्मरण इतवारी के लिए खास तौर पर लिखा। एक दफा मैंने उनसे जिक्र किया कि स्त्री-समाज की समस्याओं पर अच्छी सामग्री नहीं मिल पाती। मेरा खयाल है, इसी हवाले से शायद उन्होंने बाद में इला डालमिया को हमारे लिए नियमित स्तम्भ लिखने को प्रेरित किया होगा।

ऐसे लेखक भी थे जिन्हें मैं पत्र पर पत्र लिखता, पर उनसे जवाब तक नहीं मिलता था। अनेक लेखकों से बहुत सहयोग मिला भी। पर अज्ञेय का स्नेह अपूर्व और अपरिमेय था।

आप सोचते हों कि अज्ञेय जैसा दिग्गज साहित्यकार और सिद्ध सम्पादक एक कमइल्म युवक से इतना कैसे खुल सकता है। असल में अज्ञेय के व्यक्तित्व की यह खूबी वे लोग अच्छी तरह जानते हैं, जिन्होंने उन्हें करीब से देखा। वे ऐसे ही थे। सारिका में कमलेश्वर के सम्पादन में छपी शृंखला लेखकः अपनी निगाह में के तहत उन्होंने खुद लिखा कि एक सीमा है जिसके आगे वे अस्पृश्य रहना पसन्द करते हैं; जैसे कि एक सीमा के आगे वह दूसरों के जीवन में भी प्रवेश या हस्तक्षेप नहीं करते। “इस तरह का अधिकार (अज्ञेय) बहुत थोड़े लोगों से चाहता है और बहुत थोड़े लोगों को देता है। जिन्हें देता है उन्हें अबाध रूप से देता है, जिनसे चाहता है उनसे निर्बाध भाव से चाहता है।”

उनके व्यक्तित्व के जैसे दो रूप थे, वैसे ही दो सिरे भी थे। वे घोर आधुनिक थे और  पुराणों की बात करते हुए जय-जानकी या भागवत-भूमि यात्रा पर भी निकल पड़ते थे। वे अपने में सिमटे लगते थे, पर बहुत खुल भी जाते थे। चुप रहते थे और अपनों में होते तो खूब बतिया लेते थे। मितव्ययी थे, और फिजूलखर्च भी। हँसते नहीं थे। और हँसते तो इतना हँसाते हुए कि हँसोड़ भी रश्क करें।

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अज्ञेय की हस्तलिपि में गद्य का एक अंश 

अज्ञेय ने कमोबेश हर विधा में लिखा और ऐसा कि अलग-अलग कोण से हमेशा चर्चा में बने रहे। कवि, कथाकार, यात्रा-लेखक, नाटककार, डायरी-लेखक, आलोचक, निबन्धकार, व्यंग्यकार, स्तम्भकार, सम्पादक, अनुवादक! फिर देश-विदेश में प्रोफेसरी की। इसके अलावा जब उन्होंने अपनी रुचियों में चित्रकारी, मूर्तिकारी, छायाकारी के साथ चर्म-कर्म, बढ़ईगीरी, सिलाई और बागवानी आदि बहुत-सी दस्तकारियों में थोड़ी-बहुत कुशलताका जिक्र भी कर डाला तो, बकौल मनोहर श्याम जोशी, हिन्दी में एक फिकरा मुकम्मल हो गया कि एक कुरुक्षेत्र चूक गये, वरना अज्ञेय किस क्षेत्र में नहीं कूदे।

मगर एक क्षेत्र शायद छूट रहा था। आयोजन का। थोड़ा-बहुत आयोजन तो काव्य-सप्तकों, दिनमान आदि के सम्पादन और छिटपुट गतिविधियों में भी रहा होगा। लेकिन जीवन के आखिरी दशक में उन्होंने बाकायदा एक संस्था बनाई - वत्सल निधि। हालाँकि संस्था में कोई स्टाफ नहीं था, न जरूरत के दूसरे साधन। दो पहियों पर निधि की गाड़ी खड़ी हुईः एक अज्ञेय खुद थे, दूसरी संगिनी इला डालमिया, जो अज्ञेय को घर में वत्सल कहकर पुकारती थीं।

आपको खयाल होगा, ज्ञानपीठ पुरस्कार में मिली बड़ी धनराशि को अज्ञेय ने अनुपार्जितधन मानते हुए एक संकल्प के साथ स्वीकार किया था कि उतनी ही राशि अपनी जेब से मिलाएँगे और लेखकीय आयोजनों के लिए एक न्यास बना देंगे। हालाँकि उनकी जेब उतनी भारी न थी, जितनी कार-बँगले या दूर देशों की यात्राओं को देखकर लोग कयास लगाते थे।

वत्सल निधि की स्थापना 1980 में हुई। शुरू में तीन मोटे कार्यक्रम तय किए गयेः लेखक शिविरों, व्याख्यानमालाओं और यात्राओं का आयोजन। वत्सल निधि के लेखक शिविरों का स्वरूप यह होता था कि नामवर लेखकों और नवतर लेखकों को एक साथ रहने, खाने, बोलने, घूमने का मौका दिया जाए। ऐसा पहला शिविर मार्च 1981 में लखनऊ में आयोजित हुआ, साक्षरता निकेतन में। शिविर के निदेशक अज्ञेय खुद थे। छह रोज मुझे भी लखनऊ में अनेक बड़े लेखकों की छाया में रहने का मौका मिला।

सचाई तो यह है कि उस तादाद में किसी शिविर में नये लेखकों के साथ पाए के लोग मैंने न पहले देखे, न बाद में। कुछ नाम बरबस याद आते हैं अमृतलाल नागर, डॉ. देवराज, श्रीनारायण चतुर्वेदी, कुँवर नारायण, निर्मल वर्मा, रघुवीर सहाय, श्रीलाल शुक्ल, विजयदेव नारायण साही, विद्यानिवास मिश्र, विपिन कुमार अग्रवाल, शिवानी, रमेशचन्द्र शाह, गिरिराज किशोर, नन्दकिशोर आचार्य, लीलाधर जगूड़ी, शीन काफ निजाम, भूदेव मिश्र...।

आयोजन कर्म भी अपने आप में मामूली कौशल नहीं है। उसमें समय और उद्यम का पूरा अनुशासन चाहिए। और भी, जब पीछे शासन या किसी प्रतिष्ठान का जोर न हो। आयोजनों के निमन्त्रण वात्स्यायन जी और इला डालमिया मिलकर तैयार करते थे। लिफाफों पर पते इला जी हाथ से लिखती थीं। एक कॉपी में आयोजन के खर्च का हिसाब अज्ञेय दर्ज करते। लखनऊ के बाद हुए एक शिविर में स्टेशन रवानगी से पहले मैं कैवेंटर्स ईस्ट में था। मैंने देखा कि अज्ञेय नौकर के साथ बैठकर रुपहली पन्नी के छोटे-छोटे चौकोर खाँचों में अल्पाहार की चीजें खुद सजा रहे हैं - चीजें जो रेल में लेखकों को प्रस्तुत की जानी थीं। आजकल ऐसे पैकेट चलती रेल में ही मिल जाते हैं।

लखनऊ शिविर के लिए सब लेखक गोमती एक्सप्रेस से रवाना हुए। निर्मल जी और रघुवीर सहाय आदि से लेकर नयों में (स्मृतिशेष) संजीव मिश्र और मुझ नाचीज जैसे पचास से ऊपर सम्भागी। लन्दन से आये ओंकारनाथ श्रीवास्तव भी, जिन्होंने बीबीसी के लिए अज्ञेय से रेल-पटरियों की खटरखट के बीच गुफ्तगू रेकार्ड की। विद्यानिवास मिश्र रास्ते में कानपुर स्टेशन से सवार हुए।

खादी का कुरता-पाजामा और बण्डी तब तक अज्ञेय की पसन्दीदा वेश-भूषा बन चुके थे। टाई-सूट में कम से कम मैंने उन्हें नहीं देखा। लेकिन उस रोज गोमती एक्सप्रेस के कुर्सीयान में वे कादरे की जीन्स-मार्का पतलून पर फौजी जैकेट पहने थे। सिर पर एक तरफ झुकी हुई गोल टोपी थी। यानी पूरी तरह सफरी पोशाक और खुली रंगत। जब थोड़े सफर, थोड़े नाश्ते और कुछ गम्भीर बातों से लोग सुस्त-से दीखने लगे, वात्स्यायन जी ने ताली बजाकर सबका ध्यान खींचा। फिर सबसे आगे पहुँच गये।

मुड़े तो एक बाजीगर की-सी चंचलता और फुर्ती उनके चेहरे पर चढ़ चुकी थी। बोले, हमारे दौर के अनेक कवियों को सुनने का मौका आपको शायद न मिला होगा। हम उनकी कुछ झलक दिखलाए देते हैं। और वे दरवाजे के साथ दीवार से निकले मेज-नुमा फट्टे पर चढ़कर बैठ गये। ये खुलाऊ मेजें कुर्सीयान में सबसे आगे की पंक्ति के मुसाफिरों की सुविधा के लिए बनी होती हैं। वहीं पालथी मार उन्होंने एक-एक कर कुछ प्रसिद्ध कवियों के पाठ की सस्वरनकल उतारी।

सबसे मजेदार, बल्कि हँसा-हँसा कर लोटपोट कर देने वाली नकल भगवतीचरण वर्मा के गीत की थी। उसे पेश करने से पहले उन्होंने अपने दाँत दिखाए, फिर ऊपर-नीचे के होंठ जाने किस मशक्कत से मसूढ़ों की तरफ उमेठे। शायद कवि की गोल मुख-मुद्रा का रूप धारण करते हुए। फिर ये पंक्तियाँ चेहरे की लचक और शरीर की मटक के साथ कुछ ऊँचे स्वर में गुनगुनाने लगेः

हम दीवानों की क्या हस्ती
हैं आज यहाँकल वहाँ चले
मस्ती का आलम साथ चला
हम धूल उड़ाते जिधर चले...

गुरु गम्भीर से लेकर घुन्ने-मनहूस जैसे दर्जनों दुर्विशेषणों से शोभितअज्ञेय की हस्ती को इतनी सहज, प्रांजल और ललित मुद्रा में देखना मेरे लिए एक जीवन-भर का अनुभव साबित हुआ। उसके बाद उनके साथ और यात्राएँ भी कीं। लेकिन वह मस्ती हू-ब-हू दुबारा देखने को नहीं मिली। हमेशा वैसा माहौल, दोनों तरफ से, एक साथ कायम नहीं होता। पर उनकी इस प्रतिभा की झलक जब-तब जरूर मिल जाती थी।

रेल के उस सफर में लेखक बतियाते, सोते-जागते रहे। आचार्य जी ने गाड़ी के मामूली हिचकोलों की परवाह न कर इतवारी के लिए अपना उस हफ्ते का जायते-जायतेस्तम्भ लिख डाला। मैं वात्स्यायन जी की गतिविधियों, भंगिमाओं पर गौर करता था। या खिड़की के बाहर सुन्दर-असुन्दर दृश्यावली निहारने लगता। ऐसी ही किसी घड़ी पास की सीट पर वात्स्यायन जी आकर बैठ गये। मुझे इसका भान तब हुआ जब कान में उनकी धीमी, लय-बद्ध आवाज पड़ी- ‘अपने से छूटते हुए से दृश्यों को देखने का अपना ही सुख है!

इतनी सन्निकट उपस्थिति कि मुझसे उनके कथन का मर्म ही फिसल गया। मेरा असमंजस ताड़ उन्होंने साफ किया कि आम तौर पर कुर्सीयान की सारी कुर्सियाँ इंजिन की दिशा में, यानी सीधी, होती हैं। यही डिब्बा उलटा लगा है। सीधा होता तो हम आते दृश्यों को पकड़ रहे होते। उलटी दिशा में दृश्य हमसे छूटकर दूर भागते हैं। उनका कोई रूप बने उससे पहले वे रपटकर दूर हो जाते हैं! पर उन्हें इस तरह आते और जाते देखने का अपना अनुभव है। नहीं?
क्यों नहीं। आप समझ सकते हैं, अज्ञेय ने कुर्सीयान की दोनों दशाओं की गति में भी लुत्फ का सबब ढूँढ़ लिया था!

बाद में कभी जैनेन्द्र कुमार का एक संस्मरण प्रेमचन्द के बारे में पढ़ा। 1929 का, जब लखनऊ में जैनेन्द्र प्रेमचन्द से पहली बार मिले। घर से दफ्तर के लिए प्रेमचन्द ताँगे की जगह इक्का ही किराए करते थे। वजह जैनेन्द्र जी को उन्होंने यों बतायी थी- ताँगे में सीट उलटी होती है। यानी हम आने वाली दुनिया और खुद ताँगे वाले की तरफ पीठ करके बैठते हैं। जबकि इक्के में दुनिया मंजर दर मंजर सामने रहती है!

लखनऊ शिविर के दौरान ही वात्स्यायन जी ने सत्तर वर्ष पूरे किए। सबने बधाई दी। उन्हीं दिनों छपी अपरोक्ष उन्होंने हस्ताक्षर कर मुझे स्नेहस्वरूप दी। पुस्तक डॉ. छगन मोहता को समर्पित थी। उसी शाम अपने काव्य-नाटक उत्तर प्रियदर्शी का पूरा पाठ स्वर में किया। पाठ के दौरान मैंने लक्ष्य किया कि उनकी सदा तनी रहने वाली गर्दन थकान के बाद कुछ छोटी हो जाती है, यानी झुक जाती है। गर्दन और हाथ पर नसों का उभार भी शायद बढ़ने लगा था। नाटक का लम्बा पाठ पूरा होने के बाद - पहले नहीं - उन्हें कुछ लेखकों ने सलाह दी कि दिन भर के काम के बाद अब कुछ आराम के बारे में सोचना चाहिए। बहरहाल, उत्तर प्रियदर्शी के सर्जक का अपना वाचन मैंने उस दिन रेकॉर्ड कर लिया था।

जिन्होंने नदी के द्धीप पढ़ा है, उन्हें खूब याद होगा कि लखनऊ के कॉफी हाउस की उपस्थिति उपन्यास में एक पात्र की सी ही है। सो शिविर में शरीक सहृदय पाठक-लेखकों की फरमाइश पर सदय अज्ञेय लेखक-समूह को कॉफी पिलाने हजरतगंज ले गये। कॉफी हाउस का नक्शा उस जमाने में भी वही रहा होगा - ऊँची छत, बड़े दरवाजे, कुछ कोटर। लेकिन बाहर की चिल्ल-पों नयी सभ्यता के साथ दाखिल हुई होगी। प्रवेशद्वार के दायीं तरफ एक अखबार विक्रेता की दुकान थी। वात्स्यायन जी बोले - यह तब से है, बाकी ज्यादातर कारोबार तो बदल ही गया है!

कॉफी हाउस में एक दिलचस्प बात हुई। उम्रदराज बेयरे से वात्स्यायन जी ने कुशलक्षेम पूछा। अदब से जवाब देकर वह जाने लगा तो आचार्य जी ने उसे पूछ लिया, आप भी पहचानते हैं ये (अज्ञेय) कौन हैं! बेयरे ने विनय से कहा, अच्छी तरह हुजूर। पहले डॉक्टर साहब (राममनोहर लोहिया) के साथ इसी टेबल पर तो बैठा करते थे। बाद में अज्ञेय बोले, इसको ठीक याद है। आपने तो परीक्षा ले ली।
लखनऊ प्रवास का एक वाकया और। शिविर के किसी सत्र में एक पहाड़ी युवा कवि आये। तब उत्तर प्रदेश का विभाजन नहीं हुआ था और वे वहीं एक अहम महकमे में नियुक्त थे। गोस्वामी तुलसीदास पर चल रही चर्चा के दौरान उन्होंने दखल करते कहा- लेकिन तुलसीदास के मन में जो बात थी, उसे लेकर आप...। वात्स्यायन जी ने झिड़कते हुए सिर्फ एक वाक्य कहा और युवा कवि ने बात वहीं समेट दी। अज्ञेय ने कहा था- मैं आपको बधाई देना चाहता हूँ कि आपको मालूम है तुलसीदास के मन में क्या था! मन मेंशब्द वे जोर देकर बोले थे।

इस तरह के नियोजित-अनियोजित हस्तक्षेप उनके कार्यक्रमों में होते रहते थे। दरअसल अज्ञेय और उनके समानधर्मा लेखकों का हिन्दी समाज में असर व्यापक था। तत्कालीन सोवियत राजनीति की प्रेरणा और साधनों से गोलबन्द हुए लेखक संगठनों के एजेंडे में मानो एक अहम लक्ष्य अज्ञेय की छवि को ध्वस्त करना भी जुड़ गया था। इतनी अफवाहें और आक्षेप अन्य किसी लेखक को शायद ही झेलने पड़े हों, जितने अज्ञेय को।

उन ओछे आरोपों की सूची बनाई जाए तो उसके आधार पर छोटा-मोटा शोध-प्रबन्ध तैयार किया जा सकता हैः अभिजात और व्यक्तिवादी थे, पूँजीवादी और दक्षिणपन्थी थे, प्रतिगामी और प्रतिक्रियावादी थे, सीआईए के एजेंट थे, फोर्ड फाउंडेशन और कांग्रेस फॉर कल्चरल फ्रीडम से अमेरिकी धन ऐंठते थे, अंग्रेजों के पिट्ठू थे, दूसरों की चीजें अपने नाम से छपवाते थे, प्रगतिहीन और समाज-विरोधी साहित्य के प्रणेता थे...आदि-इत्यादि। कुछ परस्पर विरोधी आक्षेप भीः जैसे कभी नपुंसक ठहराये गये, कभी एक नाजायज सन्तान के पिता! इस तरह के नियोजित दुष्प्रचार से अज्ञेय का कितना नुकसान हुआ, कहना मुश्किल है। व्यथा को वे झेल गये और इतना कुछ सार्थक काम कर गये कि चरित्र-हनन की पहुँच से ऊपर उठ गये। लेकिन उस अभियान से उन पाठकों का नुकसान जरूर हुआ होगा जो प्रचारकों के बहकावे में आ गये। एक पीढ़ी जैसे अँधेरे में धकेल दी गयी। कइयों ने अज्ञेय का साहित्य पढ़ा तक नहीं और दूसरों की राय ओढ़ ली, कुछ ने पढ़ा तो अपने पूर्वग्रहों का चश्मा चढ़ाकर।
1977 की बात है। कलकत्ता में वे अपनी लेखन प्रक्रिया पर बोल रहे थे। कल्याणमल लोढ़ा सभा के अध्यक्ष थे। एक युवा लेखक ने उनके वक्तव्य के बीच शोर मचाना शुरू कर दिया- आपकी तरह रईसी में जीने वाला लेखक रचनाधर्मी कैसे हो सकता है? वात्स्यायन जी ने कहा कि अपनी पूरी बात कह लूँ, उसके बाद सवाल रखें तो अच्छा होगा। बात पूरी होने से पहले ही युवा लेखक फिर शुरू हो गये, इस बार कुछ ज्यादा उग्र होकर। बोले, सुविधाजीवी लेखकों ने हिन्दी का बहुत नुकसान किया है। आपने सबसे ज्यादा। आपके हाथों में मुक्तिबोध का खून लगा है। आप चाहते तो मुक्तिबोध की असमय मृत्यु न होती!...

अज्ञेय ने जीवन में तरह-तरह के आरोप सुने और झेले होंगे, पर मुक्तिबोध के नाम पर वह बेहद घिनौना आरोप था। आम तौर पर इस तरह की बातें वे चुप रह कर दरगुजर कर दिया करते थे, लेकिन उस रोज उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया जाहिर की। भले ही दो पंक्तियों में। उन्होंने कहा कि यह विचार ही अपने में क्रूर और बेमानी है। मुक्तिबोध का मैं सम्मान करता था और उनके लिए जो कर सकता था किया, उसका ब्योरा देने की जरूरत नहीं है। लेकिन उस शोर-शराबे में वह कार्यक्रम चौपट हो गया। शोर मचाने वाले युवक को और क्या चाहिए था!

कहना न होगा, ऐसे पूर्वग्रह ज्यादातर वामपन्थी लेखकों में देखे गये। लेकिन इससे यह निष्कर्ष निकालना भूल होगी कि सभी वामपन्थी खयालतन अज्ञेय-विरोधी रहे हैं। मुझे अज्ञेय और कुछ वामपन्थी रचनाकारों का पत्रचार देखने का मौका मिला है। उनमें शमशेर और मुक्तिबोध के पत्र भी शामिल हैं। अज्ञेय के प्रति दोनों कवियों का आदर और भरोसा कई लेखकों को हैरान करेगा। तीसरा उदाहरण त्रिलोचन का है। उस घटना का मैं गवाह हूँ। आठ के दशक में जयपुर के रवीन्द्र मंच पर प्रगतिशील लेखक संघ का अधिवेशन चल रहा था। युवा लेखकों पर बेबात अज्ञेय-निन्दा का जुनून सवार था। त्रिलोचन आयोजन के मुख्य अतिथि थे। उनसे रहा नहीं गया। अपने सम्बोधन में बेहद दुखी स्वर में बोले भाई (अज्ञेय) के बारे में ऐसे शब्द सुनकर मन व्यथित हो गया है। या तो आप लोगों ने उन्हें पढ़ा नहीं है, या आप उन्हें जानते नहीं। मेरे मन में उनके प्रति बहुत आदर है और मैं उनके बारे में हल्की बात सुन नहीं सकता। उम्मीद करता हूँ कि (सम्मेलन में) आगे ऐसी बात नहीं होगी।

दूसरे कई लेखकों-आलोचकों के उदाहरण दिए जा सकते हैं जिनके विचार अज्ञेय से नहीं मिलते थे, पर उनके साहित्य की वे बड़ी कद्र करते आये हैं। केदारनाथ सिंह इनमें अव्वल हैं। वे मानते हैं अज्ञेय के योगदान का सही मूल्यांकन अब तक हुआ नहीं है; उनके साहित्य में व्यक्तिवाद या प्रतिक्रियावाद ढूँढ़ना निराधार है। राजेन्द्र यादव और विजयमोहन सिंह दोनों का कहना है कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर के बाद भारतीय साहित्य में अज्ञेय से बड़ा व्यक्तित्व नहीं हुआ। समाचार-पत्रों में सम्पादकीय नाम से नहीं छपते, पर यह जगजाहिर है कि अज्ञेय के निधन पर  नवभारत टाइम्स में सम्पादकीय विष्णु खरे ने लिखा और उसे आज भी याद किया जाता है। राजेश जोशी की हाल में प्रकाशित कृति समकालीनता और साहित्य की भूमिका कविता पर अज्ञेय के एक उद्धरण से शुरू होती है। एक वरिष्ठ वामपन्थी आलोचक के कथन से क्षुब्ध होकर - कि हिन्दी में भारत-पाक विभाजन पर गद्य तो लिखा गया, काव्य नहीं - जोशी ने पूर्वग्रह में अज्ञेय की शरणार्थी काव्य-श्रृंखला पर लेख भी लिखा। उन्होंने कहा, ये कविताएँ अज्ञेय के सेक्युलर दृष्टिकोण का साक्ष्य हैं।बाद में दिल्ली में अज्ञेय जन्मशती संगोष्ठी में मैनेजर पाण्डेय ने शरणार्थी श्रृंखला के हवाले से अज्ञेय की तारीफ की और कहा कि इस बात (शरणार्थी श्रृंखला) की ओर सबसे पहले ध्यान उन्हीं ने दिलाया था।

अज्ञेय के काव्य की धुरन्धर आलोचना करने वाले नामवर सिंह ने कुछ ही समय पहले अकार में अज्ञेय की खूब तारीफ की और शेखरः एक जीवनी को हिन्दी के पाँच महान उपन्यासों में एक बताया। दिल्ली में अपना एक व्याख्यान अज्ञेय की कविता नाचसे शुरू कर उन्होंने श्रोताओं को चौंकाया। फिर अज्ञेय जन्मशती के दौरान पटना में दिए एक व्याख्यान में कहा कि अज्ञेय नागार्जुन से बड़े कवि हैं। लौटकर दिल्ली के हिन्दू कॉलेज में बोले कि अज्ञेय काव्य वैभव में मुक्तिबोध से आगे हैं। यह भी कहा कि अज्ञेय प्रयोगवादी नहीं हैं; उन्हें जन-विरोधी समझ लेना अधूरी समझ होगी। जन्मशती के मौके पर उन्होंने नेशनल बुक ट्रस्ट के लिए अज्ञेयः संकलित कविताएँ का सम्पादन भी किया। उसकी भूमिका में अज्ञेय को अमृत पुत्राबताते हुए उन्होंने लिखा कि अज्ञेय की ‘‘अप्रतिहत सृजन-यात्रा प्रयोग के पड़ाव से आगे... और सभी वादों से ऊपर है, और टिकाऊ भी’’। साहित्य अकादेमी में हुई अज्ञेय जन्मशती संगोष्ठी में उदय प्रकाश ने अपने वक्तव्य में यह रेखांकित करने की कोशिश की अज्ञेय वामपन्थी थे, दक्षिणपन्थी नहीं। इस बात पर कट्टर वामपन्थी बहुत बिदके।  
हाल के कई कार्यक्रमों में मैंने लक्ष्य किया कि नयी पीढ़ी अज्ञेय को बासी आग्रह-दुराग्रहों से हटकर पढ़ने-समझने को उद्यत दिखाई देती है। क्या हिन्दी समाज में अज्ञेय के सहृदय पाठ की यह कोई नयी आहट है?

एक बार रघुवीर सहाय ने अज्ञेय से पूछा था कि जीवन में आप क्रान्तिकारी रहे, आपका सारा कृतित्व मूलतः क्रान्ति या परिवर्तन लाने वाला है। लेकिन आज जो लोग अपने को क्रान्तिकारी मानते हैं, उनके लिए आप लगभग असह्य क्यों हो गये हैं? वात्स्यायन जी ने स्पष्ट जवाब दिया थाः अब आप मुझे केवल व्यवस्था-विरोधी या नॉन-कन्फर्मिस्ट कह सकते हैं। आज के क्रान्तिकारी के पास तो दूसरी व्यवस्था का बँधा-बँधाया ढाँचा होता है। सफल हो गये तो दूसरे ढाँचे में पहुँच या लोगों को पहुँचाकर फिर यथार्थवादी हो जाते हैं।

जाहिर है, ऐसी क्रान्तिसे उनका विश्वास उठ चुका था। वे साफ कहते थे कि देश में जो दल अपने को क्रान्तिकारी या प्रगतिवादी मानते हैं, वे अपने ढाँचे के अलावा किसी दूसरी प्रगति को प्रगति मानने को भी तैयार नहीं होते, “जो कि सामाजिक अत्याचार का एक रास्ता है।”

विचारधारा की लीक पर चलने-लिखने वाले अज्ञेय से छड़क खाते थे। लेकिन अज्ञेय की अपनी विचारधारा क्या थी?

दरअसल, अज्ञेय किसी एक विचारधारा के पिछलग्गू होने के खिलाफ थे। व्यावहारिक राजनीति को लेकर उनके विचारों में बदलाव आता रहा, लेकिन स्वतन्त्रता और समता में उनकी मूल्यगत आस्था हमेशा कायम रही। एक दफा उन्होंने कुछ ऐसा कहा था कि विचार में मैं अगर अपना ही खण्डन करता हूँ तो समझिए जड़ होकर एक जगह रुका नहीं हूँ, विकासमान हूँ; मेरे बाद के कहे (या किए!) को प्रमाण मानिए।

बहरहाल, अज्ञेय के विचार या विश्वास की गति देखिए। दस-ग्यारह वर्ष के थे तब नारा लगाया-‘‘गाँधी जी का बोलबाला, दुश्मन का मुहँ हो काला’’। विदेशी कपड़ों की घर में होली जला दी। फिर सशस्त्र क्रान्ति की ओर उन्मुख हुए। अन्त में फिर गाँधी जी के अहिंसा के विचार पर आ गये।
भगत सिंह और चन्द्रशेखर आजाद वाले क्रान्तिकारी दस्ते के वे सदस्य थे। लाहौर में आजाद के कहने पर भगत सिंह और अन्य साथियों को जेल से भगा लाने के लिए तीन रोज में ट्रक चलाना सीखा। बाद में वह योजना स्थगित हो गयी और धीरे-धीरे उनका संगठन भी बिखर गया। दूसरा विश्वयुद्ध छिड़ने पर जब देश पर संकट मँडराया और पूर्वी सीमा पर जापानी सेना की घुसपैठ का खतरा महसूस किया गया तो फौज में भरती हो मोर्चे पर चले गये। असम, बंगाल और बर्मा की सीमा पर हमले का प्रतिरोध करने वाले नागरिकों का भूमिगत संगठन तैयार करने का जिम्मा लेकर। एक क्रान्तिकारी देशभक्त कैसे ब्रितानी - या युद्ध की भाषा में मित्रा राष्ट्रों की - फौज में शामिल हो गया, यह बात कई लोगों को आज भी हैरान करती है। हालाँकि इस बारे में सवाल चालीस के दशक में उठा दिए गये थे, जिनका जवाब अज्ञेय ने दिया।

उनका कहना यह था कि युद्ध समर्थक न था, न हूँ; लेकिन यह तर्क मुझे ग्राह्य नहीं लगता था कि भारत क्योंकि पराधीन है, इसलिए शत्रु (जापानी सेना)  से देश की रक्षा का काम हमारा नहीं है। दरअसल, युद्ध की राजनीति को सामान्य स्थितियों से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। अज्ञेय तब दिल्ली में भी फासिस्ट-विरोधी आन्दोलन में शरीक होते थे, प्रगतिशील लेखक संघ को समर्थन देते थे। नहीं भूलना चाहिए कि दूसरे विश्वयुद्ध में जर्मनी, जापान और इटली के फासिस्ट गुट के आक्रमण के खिलाफ लोकतान्त्रिक देश तो एक थे ही, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी भी ब्रितानी सेना का समर्थन कर रही थी।

फिर अज्ञेय मानवेन्द्रनाथ राय के नव-मानववाद से प्रभावित हुए। राय उनके दोस्त भी थे। कुछ समय अज्ञेय जवाहरलाल नेहरू के करीब रहे। कविता की उनकी एक किताब (प्रिजन डेज एंड अदर पोएम्ज) की भूमिका नेहरू ने लिखी। बाद में वे नेहरू अभिनन्दन ग्रन्थ के सम्पादक मण्डल में भी शरीक हुए। लेकिन, दरअसल, एम.एन. राय के बाद नेहरू के बजाय वे राममनोहर लोहिया से ही प्रभावित दिखाई देते हैं। वे नेहरू के आजादी से पहले के संघर्ष और खतरनाक जीवनके खयाल से जरूर प्रभावित थे। लेकिन आजादी के बाद नेहरू के आर्थिक विचारों, खासकर विशाल पैमाने के उत्पादन और केन्द्रीकरण के विरोधी हो गये।

लोहिया के हवाले वे अक्सर देते थे। 1980 में जोधपुर में मैंने उनसे इतवारी पत्रिका के लिए भाषा पर बातचीत की। उन्होंने जोर देकर लोहिया के इस नजरिए को समुचित बताया कि चाहे पवित्र जीवन हो चाहे छिनाली, भाषा ऐसी हो जो सबके काम पूरी तरह आये।

1983 में जबलपुर के पास बरगीनगर में हुए वत्सल निधि शिविर के उदघाटन के वक़्त उन्होंने नेहरू के विचारों की कटु आलोचना की। बरगी में नर्मदा पर बाँध का निर्माण जोर-शोर से चल रहा था। परियोजना के कर्मचारी ही हमारे मेजबान थे। अज्ञेय आधुनिकता की नेमतों पर बोलते हुए नेहरू के बाँध सम्बन्धी विचारों पर आ गये। बोले, इन बाँधों को आधुनिक भारत के मन्दिरबताया गया है। यह आने वाला वक़्त बताएगा कि ये सचमुच मन्दिरसाबित होते हैं या शैतान का घर। ठीक यही शब्द थे। उनका कहना था कि आधुनिक विकास की अवधारणा यान्त्रिक विकास की अवधारणा है, जो बुनियादी तौर पर लोक का हित नहीं अहित साधती है।

बरगी परियोजना पूरी हुई, तब तक अज्ञेय चल बसे। लेकिन तारीख गवाह है कि बरगी बाँध पूरा खड़े होते ही बयासी गाँवों का जीवन लील गया; एक सौ साठ गाँव बाँध की डूब से आहत हुए।

जयप्रकाश नारायण से उनकी बड़ी निकटता रही। सम्पूर्ण क्रान्ति आन्दोलन के दौर में, आपातकाल से पहले, गाँधी शान्ति प्रतिष्ठान से निकलने वाले जयप्रकाश जी के पत्र एवरीमेन्स वीकली का उन्होंने सम्पादन किया। जेपी के विचारों में वे एम.एन. राय की छाया देखते थे। राय को भले उन्होंने कोई पुस्तक समर्पित नहीं की, लेकिन उनकी छोटी मगर महत्त्वपूर्ण किताब स्त्रोत और सेतु जेपी के नाम है... ‘‘निरन्तर सेतु बनाते रहकर जो स्त्रोत को कभी नहीं भूले, उन लोकनायक जयप्रकाश को सादर निवेदित’’। उनके इस वक़्तव्य में भी उनकी लोकतांत्रिक विचारधारा का अक्स साफ दिखाई देता हैः ‘‘सैद्धान्तिक रूप से मैं लोकतन्त्र को कम्युनिज्म से अच्छा समझता हूँ। और लोकतन्त्र को बुनियादी (रेडिकल) अथवा प्राथमिक (प्राइमरी) रूप दिया जा सके, ऐसी चेष्टा का अनुमोदन करता हूँ। एम.एन. राय के विचारों की यही दशा थी, विनोबा के विचारों की भी यही है, जयप्रकाश नारायण की भी।’’

अज्ञेय इन्दिरा गाँधी की नीतियों के ज्यादा मुखर आलोचक होकर सामने आये, खासकर आपातकाल में। उन्होंने उस दौर में आतंकऔर बौद्धिक बुलाए गयेजैसी अनेक कविताएँ लिखीं, जबकि बहुत सारे बौद्धिक, साहित्यकार-पत्रकार तब मौन थे या दमन के आगे घुटने टेक चुके थे।

आपातकाल के दौरान ही, नवम्बर 1976 में, अज्ञेय बीकानेर आये। रामपुरिया कॉलेज में सभ्यता का संकटविषय पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि स्वतन्त्रता परम मूल्य है और दमघोंटू माहौल में उसकी महत्ता सबसे ज्यादा अनुभव होती है। उन्होंने यह भी कहा, देश आतंक के साये में जी रहा है और बौद्धिक समुदाय मौन है। सल में अनेक बौद्धिक उस वक़्त मौन ही नहीं थे, वे आपातकाल के हक में दस्तखत कर और करवा रहे थे।

प्रो. आनन्द कृष्ण ने भी एक लेख में लिखा है कि आपातकाल में अज्ञेय बहुत क्षुब्ध थे और अपने स्वभाव के अनुसार आक्रोश व्यक्त करते थे। एक बार आनन्द जी को वात्स्यायन जी ने (सम्भवतः हल्के अन्दाज में) कहा कि वे पशुपालन पर एक शास्त्रीय पुस्तक लिखना चाहते हैं, जिसमें आपातकाल पर टीका होगी कि किस तरह मनुष्य पशुवत् बना दिया जा सकता है! आनन्द कृष्ण के अनुसार, ''अक्सर वे अपने यहाँ आने-जाने वालों को (भी) इस तरह का साहित्य लिखने के लिए उत्साहित करते रहते थे।''

मेरे पास बरगीनगर शिविर के वक़्त की एक रेकॉर्डिंग है। एक दोपहर अज्ञेय हमें सैर पर भेड़ाघाट ले गये। सम्भागियों के आग्रह पर संगमरमरी चट्टानों पर बैठे-बैठे धुआँधार प्रपात के नाद के बीच उन्होंने अपनी चुनिन्दा कविताओं का पाठ किया। एक कविता सम्भावनाएँसुनाने से पहले उन्होंने कहा, ''यह कविता इमरजेंसी में लिखी थी, हालाँकि इस उल्लेख की कोई उपयोगिता नहीं है, या शायद हो भी...!' 
कविता यों हैः

अब आप ही सोचिए
कितनी सम्भावनाएँ हैं।
कि मैं आप पर हँसूँ।
और आप मुझे पागल करार दे दें;
या कि आप मुझ पर हँसें
और आप ही मुझे पागल करार दे दें;
या आप को कोई बताए कि मुझे पागल करार दिया गया
और आप केवल हँस दें...
या कि
हँसी की बात जाने दीजिए
मैं गाली दूँ और आप -
लेकिन बात दोहराने से लाभ?
आप समझ तो गये न कि मैं कहना क्या चाहता हूँ?
क्योंकि पागल
न तो आप हैं
न मैं;
बात केवल करार दिए जाने की है -
याहाँकभी गिरफ्तार किए जाने की है।

तो क्या किया जाए?
हाँ, हँसा तो जाए-
हँसना कब-कब नसीब होता है?
पर कौन पहले हँसे?
किबलाआप!
किबलाआप!

अज्ञेय कविता का पाठ बहुत जानदार करते थे। पर गाते बेसुरा थे। पर गा लेते थे, यह अहम बात है। जैसा कि किसी ने कहा है, जो गा सकता है वह निर्मल है। काव्य-पाठ के वक़्त कभी अपने रचे गीत का पन्ना खुलता तो उनका स्वर भी खुल जाता था। पाठ के लिए एक कॉपी में उन्होंने अपनी सुघड़- साथ में उतनी ही स्वच्छन्द- हस्तलिपि में चुनिन्दा कविताओं के बीच कुछ गीत करीने से लिख रखे थे। आचार्य जी के आग्रह पर उन्होंने जब अपनी कुछ कविताएँ रेकॉर्ड करवायीं, तब अरे ऋतुराज आ गयागीत भी गाया। जम्मू गये तो वहाँ खड़ी कविताओं के बीच पूर्णिमा की चाँदनी सोने नहीं देतीगा आये। वात्स्यायन जी को मैंने दो-तीन बार मन्द स्वरों में अकेले गुनगुनाते भी देखा। जैसे कुछ खुद को सुना रहे हों।

बहरहाल, लोहिया-जयप्रकाश के असर और तानाशाही के दौर के बाद अज्ञेय अपने को गाँधी-विचार के ज्यादा करीब पाते थे। ऐसा मैंने पहले-पहल उनके घर एक चहलकदमी के दौरान अनुभव किया। मैंने उनसे पूछा था कि क्या आप कभी गाँधी जी से मिले? उन्होंने मेरी तरफ देखे बगैर हँसते हुए कहा, अरे! हमारे जैसे कार्यकलाप थे, तब हम गाँधी जी के सामने होते तो हमें देखते ही मारने को दौड़ते! बाद में उन्होंने साफ कहा कि तब हमें अपना (हिंसा का) रास्ता सही लगता था। अब लगता है गाँधी जी का रास्ता ही सही था। वे गाँधी जी के नैतिक बलको ज्यादा बड़ा समझते थे और इस दृष्टि से उनके व्यक्तित्व को महानमानते थे।

उस रोज मुझे लगा कि एक नायाब जानकारी हाथ लग गयी है। जबकि - बाद में पढ़ा - 1977 में दिल्ली में राजेन्द्र प्रसाद स्मारक व्याख्यान देते हुए वे कह चुके थेः ''गाँधी जी लगातार राजनीति को एक बृहत्तर सन्दर्भ देने का प्रयत्न करते रहे और उसमें सफल भी हुएः सफल हुए अपनी निष्ठा, प्रतिभा और त्रिकालदर्शिता के कारण...आजादी हमें मिली; लेकिन यह हमारा दुर्भाग्य था कि आजादी पाने के साथ-साथ हमने गाँधी जी को खो दिया।''

उसी व्याख्यान में उन्होंने अफसोस की मुद्रा में कहा कि गाँधी जी का कोई उत्तराधिकारी नहीं हुआ।फिर गाँधीवादियों और जनसंघियों दोनों पर टीकाः ''कुछ थे जिन्होंने सर्व-सेवाऔर सर्वोदय के नाम पर अध्यात्म की भूमि पर बल दिया; लेकिन उनका अध्यात्म भी इतना थोथा और संकीर्ण था कि उससे किसी दूसरे को प्रेरणा मिलना तो दूर, गाँधी जी की संचित आत्मबल की पूँजी धीरे-धीरे चुका कर वे स्वयं बौने हो गये।... कुछ दूसरे थे जिन्होंने संस्कृति की बात की; लेकिन उनकी राष्ट्र की कल्पना भी वैसी ही संकीर्ण और थोथी थी। बल्कि उनकी धर्म की और संस्कृति की नैतिक आधार-भित्ति की अवधारणा भी संकीर्ण और थोथी रही।''
1984 में आकाशवाणी अभिलेख के लिए हुई बातचीत में भी वात्स्यायन जी ने स्वीकार किया कि वे गाँधी जी के जीते-जी तो विरोधी थे, लेकिन अब गाँधी जी के विचारों के समर्थकहैं।

अब फिर कुछ आपबीती।

यह जिक्र पीछे कर आया कि अज्ञेय के व्यक्तित्व में जिस बात ने मुझे अपनी ओर ज्यादा खींचा, वह थी मानवीय सम्बन्धों में उनकी उत्कट आस्था। यह एक निराला अनुभव था जो उनके चुप्पे-घुन्ने-एकान्तिक होने की प्रचलित धारणाओं के सर्वथा विपरीत था।

लखनऊ लेखक शिविर के बाद दिल्ली लौटे तो अपने घर ले गये। यहाँ तक ठीक था। मुझे जयपुर की राह पकड़नी थी। दिल्ली जरूरी पड़ाव था। नहा-सँवरकर झोला उठाकर मैंने इजाजत माँगी तो बोले- ड्राइवर आपको बीकानेर हाउस के बस अड्डे छोड़ आएगा। आइन्दा आप जब दिल्ली आएँ, यहीं ठहरिए। अगर मालूम हुआ कि कहीं और ठहरे हैं तो मुझे अच्छा नहीं लगेगा। मैंने कहा, जी जरूर। हमेशा की तरह, बाद में अहसास हुआ कि उन्होंने क्या कहा। आज तक सोचता हूँ। दिल्ली में रहते ऐसे लोगों से दिल्लगी हुई कि उनके घर का हुलिया देखने को तरसता हूँ! और एक कालजयी साहित्यकार दिल से किसी कस्बाई युवक को मेहमानी का स्थायी न्योता देता था!

धीरे-धीरे मैं उनसे खुल गया। झिझक जाती रही। वे हँसी-मजाक भी करने लगे। मेरी भाषा की अशुद्धियों पर भी इशारे से ध्यान दिलाते। मसलन, राजस्थानी के असर में मैं पता चला को पत्ता पड़ाबोलता था। वे मौका देखकर अशुद्ध उच्चारण ठीक मेरे अन्दाज में दुहराते और मुझे, देर-सबेर, भूल समझ आ जाती।

दिल्ली में मेरी वजह से उन्हें परेशानी भी जरूर हुई होगी। रेस्तरां में खाना खाने जा रहे हैं। मैं मेहमान बन कर पहुँच गया हूँ। हम कहीं जा रहे हैं, देर से लौटेंगे, आप यहीं रहिएजैसा शहरी छल वे नहीं कर सकते थे। वे मुझे साथ ले जाते। एक शाम वे किसी के घर खाने पर जाने वाले थे कि मैं बगैर इत्तला दिल्ली आ पहुँचा। उन्होंने चाय पिलाई और अपनी मेजबान- इतिहासकार डॉ. देवहूति - को फोन किया कि हमारे एक मेहमान भी साथ आएँगे। मुझमें ना कहने की सलाहियत नहीं थी। सो साथ हो लिया। चाणक्यपुरी के शान्ति पथ पर फिएट को वात्स्यायन जी ने फर्राटे की गति दी। इला जी तो चुपचाप सड़क की ओर देखती रहीं, पर मैं चकित और पूरी तरह रोमांचित होकर कभी रास्ते को देखता था, कभी अज्ञेय की ओर।

खाने से पहले डॉ. देवहूति ने हमें घर पर टंगी कलाकृतियों से परिचित कराया। एक कृति में कोई चेहरा भी था। मैंने औचक पूछ लिया- कैरिकेचर (विद्रूप) है? इला जी प्रगट तौर पर सन्न रह गयीं और थोड़ा मुझे घूरा, शायद इसलिए कि और नादानी न कर बैठूँ। वात्स्यायन जी सहज थे, सहज भाव में ही बोले- नहीं, फिगरेटिव (रूपाकार) है...।

उनसे सम्पर्क बढ़ता गया। राजस्थान पत्रिका में मेरे एक सहयोगी महेश शर्मा ने कैलास-मानसरोवर की यात्रा की। उनके संस्मरण प्रौढ़ शिक्षण समिति ने पुस्तक रूप में प्रकाशित किए। यात्रा संस्मरण के लोकार्पण के लिए यायावर अज्ञेय से ऊँचा नाम नहीं सूझा। सुधेन्दु पटेल के साथ- जो तब समिति से जुड़े थे - दिल्ली आकर हमने वात्स्यायन जी से गुजारिश की। उन्होंने हमें कालाजाम खिलाए और मान गये।

कार्यक्रम से एक रोज पहले फोन कर मैंने उनसे पूछा कि आप किस उड़ान से जयपुर पहुँचेंगे? वे बोले- प्रौढ़ शिक्षा का काम करने वाली संस्था पर विमान का बोझ क्यों? बस का भाड़ा मैं वहन कर सकता हूँ और कल सुबह राजस्थान रोडवेज की दस बजे की बस से आऊँगा। ठहरने का बन्दोबस्त करने की जरूरत भी नहीं है, (राजस्थान) विश्वविद्यालय के गेस्ट हाउस में दयाकृष्ण जी ने कमरा करा दिया है। यानी हमारे जिम्मे कोई काम नहीं छूटा था, सिवाय आयोजन के कार्ड बाँटने के। कार्यक्रम हुआ। इतना सफल कि किसी लोकार्पण में इतनी भीड़ मैंने उसके पहले या बाद में जयपुर में नहीं देखी।

जयपुर वे कई बार आये। जैसे बीकानेर, उदयपुर, जोधपुर और जैसलमेर भी। एक दफा इला जी साथ थीं। वे रघुवीर सहाय के बेटे वसन्त को भी साथ लाये। इला जी ने कहा, ये आपके साथ जयपुर घूमेंगे। मेरे पास तब मोटरसाइकिल होती थी। हम उसी पर घूम आये।

लेकिन अगली दफा मुश्किल पेश आयी। वात्स्यायन जी ने कहा, सुबह बड़े तड़के की उड़ान है। आप छोड़ आएँगे? तपाक से बोला, क्यों नहीं! बाद में सोचता रहा, निकट के किसी मित्रा के पास कार नहीं है! वात्स्यायन जी के पास सामान भी है! हिम्मत कर दफ्तर में बात की। गाड़ी का बन्दोबस्त हो गया। सुबह चार बजे देखता हूँ, अखबारों के बण्डलों से भरी एक जीप-नुमा ट्रेकरगाड़ी सामने खड़ी है। उसमें सिर्फ ड्राइवर के बगल वाली सीट खाली थी। कोई चारा न देख वात्स्यायन जी को आगे बिठाया, पीछे अखबारों और सामान के बीच खुद लदकर किसी तरह हवाई अड्डे पहुँचा कर आया!
मेरे परिवार के साथ उनकी आत्मीयता जयपुर में ही पनपी। बच्चों के साथ खेलते, उनके हाथ से मिठाई खाते, धूप सेंकते दर्जनों तस्वीरें- जो मित्र रमेश मेहता की मेहरबानी से अब इंटरनेट पर चली गयी हैं- जयपुर की ही हैं।

जयपुर एक बार वे रायकृष्ण दास व्याख्यानमाला के आयोजन के लिए भी आये। जुलाई 1985 में। व्याख्यान नरेश मेहता, आनन्द कृष्ण और भूमित्रा देव ने दिए। उन सत्रों की अध्यक्षता प्रदेश के विद्वानों- दार्शनिक डॉ. दयाकृष्ण, चित्रकार कृपालसिंह शेखावत और कवि नन्द चतुर्वेदी- ने की। जयपुर के प्रसिद्ध चित्राकार रामगोपाल विजयवर्गीय से उन्होंने आयोजन के उद्घाटन का आग्रह किया। विजयवर्गीय जी से उनका पुराना परिचय था। फिर भी चाहते थे उनको निमन्त्राण घर जाकर दें। मैं उनके साथ गया।

दोनों जाने कितने बरसों बाद मिले होंगे। वात्स्यायन जी ने मिलते ही कहा- आपने पहचाना? विजयवर्गीय जी ने बड़े छायावादी अन्दाज में जवाब दिया- कोई सूरज की रोशनी न देख सके तो उसी का दोष होगा। सारी दुनिया आपको जानती है। मैं जानते हुए न पहचानूँ, क्या यह सम्भव है? फिर वहाँ आधुनिक कविता पर बात चल पड़ी। एक मोड़ पर अज्ञेय ने कहा, आज की कविता में कविता कम है, वह प्रकारान्तर से लँगड़ा गद्यही है!

व्याख्यानों से पहले राजस्थान के साहित्य-प्रेम की अज्ञेय ने बड़ी तारीफ की। उन्होंने कहा, जिस समाज में हम रह रहे हैं उसमें यह लग सकता है कि साहित्य का कोई प्रयोजन नहीं रहा। मेरा मानना है, ऐसा है नहीं। मेरी इस मान्यता को जब मैं राजस्थान के जनजीवन को देखता हूँ तो और भी बल मिलता है। अगर कहूँ कि यहाँ के जनजीवन से मुझे लगता है कि साहित्य का सचमुच प्रयोजन है तो गलत न होगा।
1987 में वात्स्यायन जी की मृत्यु हुई तब इतवारी का एक विशेष अंक मैंने उनकी स्मृति को समखपत किया। रघुवीर सहाय, गिरिराज किशोर, बनवारी, पंकज आदि कई लेखकों के साथ रामगोपाल विजयवर्गीय ने भी उसमें एक माखमक संस्मरण लिखा। बाद में एक प्रसंग उन्होंने अज्ञेय के प्रसिद्ध मौनपर व्यक्तिशः सुनाया। कहीं कोई कला प्रदर्शनी साथ-साथ देखते हुए अज्ञेय और राय कृष्णदास में घण्टों कोई बात नहीं हुई। बेचैन होकर विजयवर्गीय जी ने इसका सबब पूछ लिया था। अज्ञेय तब भी चुप रहे, पर राय कृष्णदास जी ने जवाब दिया- हमारी बातचीत तो लगातार होती रही थी, आप ही नहीं सुन पाए होंगे! यानी, आपसी समझ रखने वालों को शब्दों की फिजूलखर्ची की जरूरत नहीं पड़ती!

अज्ञेय के साथ मैंने जो यात्राएँ कीं, उनमें माउंट आबू और उदयपुर-नाथद्वारा की याद ताजा है। फरवरी 1982 की बात है। माउंट आबू में वत्सल निधि का शिविर प्रौढ़ शिक्षण समिति के सन्दर्भ केन्द्र के जरिए आयोजित हुआ था। दुर्गा भागवत से लेकर विजयदेव नारायण साही, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, रामस्वरूप चतुर्वेदी, विपिन कुमार अग्रवाल आदि अनेक लेखक-आलोचक वात्स्यायन जी के बुलावे पर राजस्थान आये। गोष्ठियों की कार्यवाही तो सब जगह एक-सी चलती है। जो अलग से याद है, वह उनका बोलना नहीं, दत्तचित्त होकर सुनना!

अज्ञेय ढलान पर बनी कुटिया में ठहरे। आलोचक मोहनकृष्ण बोहरा ने उनसे दिल्ली में मिलने का समय माँगा था। वात्स्यायन जी को राजस्थान का भूगोल बेहतर मालूम था। उन्होंने पत्र लिखा कि मैं माउंट आबू आ रहा हूँ, जो आपके सिरोही जिले में ही पड़ता है। आप वहाँ आ जाएँ तो यात्रा का कष्ट बचेगा। बोहरा जी आये और एक शाम एलियट पर अपनी किताब का वह हिस्सा वात्स्यायन जी को सुनाने लगे। शब्द-दर-शब्द।

शालीन और विद्वान बोहरा जी से तब मेरा परिचय नहीं था। वात्स्यायन जी होंठों पर दोनों हाथ की तर्जनी रखे गौर से सुन रहे थे। न घड़ी की तरफ देखा, न मेरी तरफ। इला जी उस वक़्त कहीं हवाई चप्पल खरीदने गयी थीं। वहाँ होतीं तो शायद कुछ बोलतीं। दशा देखकर मुझे कोफ्त हुई। पूरा अध्याय सुनाकर बोहरा जी ने वात्स्यायन जी की ओर देखा। अज्ञेय पर एलियट के प्रभाव और 
सम-भाव की उन्होंने लम्बी और बारीक व्याख्या की थी। अध्याय पूरा हुआ तो वात्स्यायन जी ने मुस्कुरा कर गर्दन एक तरफ लचकाते हुए सिर्फ इतना कहा- ‘देयर इज नथिंग अनफेयर इन इट!और आदर के साथ उन्हें विदा दी। बोहरा जी के जाने के बाद मैंने छेड़ की, आपकी हालत तो उन्होंने पस्त कर दी! पर अज्ञेय सहज थे- ''(उनका) बरसों का परिश्रम है। सुनाना चाहते थे; सो सुना!''
इस दर्जे का धैर्यवान और सहृदय श्रोता मैंने दूसरा नहीं देखा।

माउंट आबू की एक और याद। सखकट हाउस में कवि प्रकाश आतुर ठहरे हुए थे। उनकी कविता का तो पता नहीं, पर आदमी उम्दा थे। कांग्रेसी झुकाव के चलते राजस्थान साहित्य अकादमी के अध्यक्ष थे। मुझसे प्रेम रखते थे। उस रोज उनका जन्मदिन था। बोले, अज्ञेय जी यहाँ हैं। तुम उनसे आग्रह करो तो शाम को यहीं आ जाएँगे। तुम्हारी बात टाल नहीं सकते।

मैं बहकावे में आ गया। हवाई गुरूर का बोध था। मैंने कहा, जरूर आएँगे। और जाकर वात्स्यायन जी को बुलावा सुपुर्द किया। वे कुछ सोचने लगे। तब तक मैं भी जमीन पर आ चुका था। अपराध-बोध से ग्रस्त-सा-बोला- चलेंगे? उन्होंने कहा- आपने आतुर जी को क्या यह कहा कि मैं आऊँगा? मैंने कहा- जी! बोले- इनकार कर दूँ तो इसमें आपकी हेठी होगी। शाम को साढ़े सात बजे आइए, चलेंगे। मुझे थोड़ी राहत तो मिली, पर मन खिन्न रहा।

अज्ञेय, दरअसल, साहित्य के क्षेत्र में सरकारी संरक्षण के खिलाफ थे। मानते थे कि कुछ कलाओं में सरकारी संरक्षण की जरूरत हो सकती है, पर साहित्य का उससे अहित होता है क्योंकि वह लेखक को परमुखापेक्षी बनाता है। सरकारी सहायता के साथ राजनीतिक दलों का हस्तक्षेप चला आता है। राजस्थान साहित्य के मामले में यह बात सौ फीसदी सही थी; भाजपा सरकार आयी तो प्रकाश आतुर की जगह दक्षिणमार्गी दयाकृष्ण विजय ने ले ली! आगे उसी दिशा में लेखकों के जुड़ाव-सम्मान का सिलसिला चल पड़ता था।

फिर वात्स्यायन जी को लेखक समाज की शाम की बैठकों की हकीकत भी मालूम रही होगी। बहरहाल, शाम को जब हम पहुँचे तो आतुर जी के कमरे में डॉ. मनोहर प्रभाकर और सावित्राी परमार भी आमन्त्रिात थे। बीच में टेबल पर शराब की बोतल रखी थी। मेरे होश उड़ गये। मांस-मदिरा को छूना मैं बुरा समझता था। गद्गद आतुर जी ने मदिरा पैमाने में ढाल दी। मैंने वात्स्यायन जी की सेवा में पानी उँडे़लने का उद्यम किया। वात्स्यायन जी ने बहुत आहिस्ता हथेली हिलाते कहा- कुछ इसका जायका भी रहने दीजिए! वे बोले तो मेरी जान में जान आयी। चाय से दूध की तरह शराब से पानी की दूरी भी समझ आई।

उनसे बड़ा रसिक भी मैंने नहीं देखा।

पीने के तो खास नहीं, पर अच्छे खाने के वात्स्यायन जी बहुत शौकीन थे। जयपुर आते तो मिर्जा इस्माइल रोड वाले नीरोजरेस्तराँ जरूर जाते। वहाँ का कीमा उन्हें पसन्द था, उन्हें पता था कि मांस-मछली मैं नहीं छूता, तो मुझे कभी पूछते नहीं थे। रेस्तराँ में रोटी की तश्तरी बायीं तरफ रखने को वे मिथ्याचार का नमूना मानते थे। एक दफा बोले कि दरअसल पश्चिम में लोग छुरी दाएँ हाथ में रखते हैं और खाना बाएँ हाथ के काँटे से खाते हैं। पर हम भारतीय तो सीधे हाथ से खाना खाते हैं। तब उलटे हाथ की तरफ रोटी रखकर उसे सीधे हाथ से उठाने में क्या तुक है! सीधे उठाना है तो तश्तरी भी सीधे हाथ को रखो!

अज्ञेय व्यवस्थित यायावर थे। मगर कभी-कभी तयशुदा यात्रा के साथ कुछ फौरी भटकन भी यात्रा में आ जुड़ती थी। जैसलमेर की यात्रा में सम-लुद्रवा या बीकानेर में देशनोक-गजनेर जा पहुँचना तो सहज है। लेकिन जून 1985 में राजस्थान साहित्य अकादमी सम्मेलन के उद्घाटन के लिए माउंट आबू आये तो एक दोपहर अचानक बोले, नाथद्वारा चलेंगे? और हम उदयपुर की ओर रवाना हो गये। वहाँ रजिया तहसीन के घर स्थानीय लेखकों के साथ एक अनौपचारिक बैठक हुई। फिर अगले रोज नाथद्वारा। खाने-पकाने के शौकीन अरुण कुमार (अब पानीबाबा) तब राजस्थान पत्रिका के उदयपुर संस्करण के सम्पादक थे। वे भी हमारे साथ हुए। नाथद्वारा मन्दिर में पहले दर्शन किए। घड़ी भर के लिए खुलने वाले मन्दिर के पट के सामने वात्स्यायन जी निश्चल खड़े रहे- न आस्तिक की तरह, न नास्तिक की बेरुखी में। उसके बाद हमने विराट रसोईघर के आँगन में पालथी मारकर प्रसादयानी भोग वाली पत्तल को ग्रहण किया।

नाथद्वारा परिसर में शुद्ध घी के कुएँहैं। ठाकुर जीके लिए छप्पन भोग बनाने में इतना घी लगता है कि उसे कुओं में ही जमा किया जा सकता है। पानी की तरह घी बाल्टी से उलीचा जाता है। मैं मन्दिरमार्गी तो नहीं, पर नाथद्वारा के उन व्यंजनों का स्वाद यकीनन दिव्य होता है। तीनों ने पत्तल के सारे व्यंजन चट कर डाले। हमने मुँह साफ भी कर लिया, पर अरुण कुमार जी खाली पत्तल में अभी भी कुछ खोज रहे थे। देखा, वे सूखे पत्तों में फँसी एक-एक सींक निकालकर उसमें सने खाद्य का सेवन कर रहे हैं। इससे पहले कि मैं अपनी हैरानी प्रकट करूँ, वात्स्यायन जी ने शायद मेरे कान में कहा- वैष्णव सम्प्रदाय के आस्थावान लोग प्रसाद को गहरी भावना से लेते हैं, इसलिए सींक का प्रसाद जाया नहीं होने देते। मुझे अपने अल्पज्ञान पर खीझ अनुभव हुई।

जैसे अज्ञेय से निखालिस पेय का सलीका पाया, दक्षिण भारत- जहाँ वे किशोरावस्था में रहे - के व्यंजनों की समझ भी अखजत की। अपनी एम्बेसडर कार तेजी से हाँकते हुए खान मार्केट के पास स्थित एम्बेसडर होटल पहुँचते और भीतर चलने वाले दक्षिणी भोजन के रेस्तराँ दासप्रकाश’ (अब बन्द) में ले जाते। शायद मेरे शाकाहार की कद्र में! डोसा-वड़ा को छोड़कर वहाँ कुछ भी आजमाने की सूझ देते। वहाँ हम तीन बार गये। इला जी- वे भी शाकाहारी थीं - हर बार साथ थीं। दक्षिणी रसोई कितनी विविध है, मैंने तभी जाना। या बाद में कभी दक्षिण जाने पर। एक बार मोटापे की चिन्ता में मैंने खाने में कमी की। पर वजन घटता न था। यों वात्स्यायन जी भी अच्छी-खासी कद-काठी के थे। वजन घटाने के मेरे प्रयासों में उन्होंने एक उपाय का इजाफा किया। उन्होंने सुझाया, खाने से पहले खूब मट्ठा पीया करें तो उसके बाद खाने की मात्रा आप कम होगी!

अभिजात कहे जाने का खतरा है, फिर भी बता दूँ कि ब्राउन-ब्रेड नामक रोटी के दर्शन सबसे पहले वात्स्यायन जी के घर खाने की मेज पर किए। बीकानेर में तो मैदे की सफेद डबलरोटी भी खास चलन में न थी, आटे (या आटों) की भूरी-मटमैली ब्राउन-ब्रेड कहाँ से आती। वात्स्यायन जी मशीन में उस ब्रेड का कतला खुद सरकाते। सेंक कर, अदा से उस पर मक्खन फैलाकर मेहमानों को पेश करते। वे श्रेष्ठ ब्राउन-ब्रेड का ठिकाना बताना भी नहीं भूलते थे कि वह (तब) अशोका बेकरी में मिलेगी। अब इन चीजों की थोड़ी जानकारी मुझे हो गयी है।

कहना यह कि चिन्तन और सृजन में ही नहीं, खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने, चलने-फिरने, सुनने-बोलने और यहाँ तक कि न बोलने में भी मैंने अज्ञेय में एक अनूठी सुरुचि के दर्शन किए।
ऐसी सुरुचि का धनी व्यक्ति कभी रूखा या बेजौक नहीं हो सकता। कहने वाले भले कहें।

उनमें छायाकारी की भी खूब गति थी। यात्राओं में तो कैमरा साथ रहता ही था, घर के अहाते में भी किसी पंछी की मोहक अदा देख भीतर से कैमरा तुरन्त उठा लाते थे। जैसे शिकारी की बन्दूक हर वक़्त तैयार रहती है, उनके कैमरों पर लम्बे लेंस तने रहते थे। सुनहले शैवाल में कविताओं के बीच उनके खींचे कई चित्र हैं। बेवजह दुष्प्रचार का शिकार हुई मित्र लेखकों की सांस्कृतिक यायावरी - जय जानकी-जीवन यात्रा और भागवत-भूमि यात्रा - के दौरान उन्होंने सैकड़ों तस्वीरें खींचीं। इनमें कुछेक सामूहिक वृत्तान्त्त के साथ प्रकाशित हुई हैं।

एक बार उन्होंने मुझे अपनी खींची बहुत-सी तस्वीरें देखने का मौका दिया जिनकी उनके पास एकाधिक प्रतियाँ थीं। मुझे उनकी एक प्रति इतवारी के लिए ले लेने की छूट थी। मैंने उन तस्वीरों को बार-बार देखा। कुछ मेरे दिलोदिमाग पर आज तक अंकित हैं। जैसे मृत्यु-शैया पर अशक्त लेटे प्रेमचन्द, शून्य निगाहों से कैमरे की ओर तकते हुए। युवावस्था में हजारीप्रसाद द्विवेदी, काली दाढ़ी और गाँधी-चश्मे में। या, कार की खिड़की के पार होंठो में पाइप दबाए विजयदेव नारायण साही। कोई एक तस्वीर साधारण चप्पलों में दो भारी-भरकम पाँवों की थी। ये साही जी के ही चरण हैं’, वात्स्यायन जी ने बताया था।

मैथिलीशरण गुप्त, प्रेमचन्द, निराला, सियारामशरण गुप्त, पन्त, महादेवी, जैनेन्द्र, फणीश्वरनाथ रेणु, राहुल सांकृत्यायन, अमृतलाल नागर, राय कृष्णदास सब अलग-अलग मुद्राओं में उनके कैमरे में कैद थे। एक बड़े डिब्बे में वात्स्यायन जी के अपने पोर्ट्रेटथे। उनके ये चित्रा मशहूर छायाकार ओ.पी. शर्मा ने एक विशेष बैठक आयोजित कर खींचे थे। बाद में शर्मा लम्बी यात्रा में अज्ञेय के साथ भी गये और बहुत सुन्दर तस्वीरें उतारीं। इनमें कई चित्रा वात्स्यायन जी के निधन के बाद पत्रा-पत्रिकाओं और किताबों पर छपते रहे। शायद इला जी से मिले हों। लेकिन ओ.पी. शर्मा को उनके सृजन का श्रेय शायद ही दिया गया। जन्मशती समारोह के वक़्त किसी तरह मैंने ओ.पी. शर्मा जी का ठिकाना ढूँढ़ा। अशोक (वाजपेयी) जी के साथ उनसे त्रिवेणी के तहखाने में भेंट की, जहाँ शर्मा जी एक प्रशिक्षण केन्द्र चलाते हैं। वक़्त बेहद कम था, पर हमारे आग्रह पर उन्होंने अज्ञेय की चुनिंदा तस्वीरों के बडे़ प्रिंट बनवा कर दे दिए। हमने उन चित्रों की एक प्रदर्शनी साहित्य अकादेमी परिसर में लगवायी। इस प्रदर्शनी का खर्च रजा फाउंडेशन ने वहन किया और नब्बे की वय में पहुँच चुके सैयद हैदर रजा आयोजन में खुद मौजूद रहे।

अज्ञेय पढ़ते खूब थे। अक्सर लेटे-लेटे; आराम और इत्मीनान की मुद्रा में। यों यह सिलसिला उनकी हर मेज पर देखा जा सकता था। एक बार उनकी बैठक की गोल मेज पर रखी किताबों को मैं उलट-पलट कर देख रहा था। एक किताब सूसन के. लेंगर की फीलिंग एंड फार्मः ए थियरी ऑफ आर्ट थी, दूसरी चेखव की प्रेमिका लिडिया एविलोवा के संस्मरणों का अनुवाद चेखव इन माइ लाइफ। बाद में अज्ञेय जी से पता चला कि दोनों किताबें माँगी हुई हैं, जबकि घर में अपनी किताबें रखने को ठौर न थी! पहली किताब निर्मल वर्मा के यहाँ से आयी थी, दूसरी पर राजेन्द्र यादव नाम लिखा था। अज्ञेय बोले- हिन्दी में ये दोनों सबसे वेल-रेडलेखक हैं!

बरसों बाद राजेन्द्र जी से मैंने इस प्रसंग का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि अज्ञेय जी से वे ज्यादा मिले तो नहीं, लेकिन वह किताब उनसे शायद रघुवीर सहाय या सर्वेश्वर दयाल ले गये थे।
एक किताब वात्स्यायन जी को देने का सौभाग्य मुझे भी प्राप्त हुआ। वह थी उनकी अपनी पहली काव्यकृति भग्नदूत। हनुमान चालीसा की तरह गुटके के आकार में लाहौर से छपी किताब मुझे बीकानेर के लेखक-अनुवादक रामनरेश सोनी ने दी थी। मैंने वात्स्यायन जी से अपने उस कीमती स्वामित्व का जिक्र किया। एक दिन इला जी ने कहा- ओम, वह किताब तुम वत्सल (अज्ञेय) को दे दो! उनके पास नहीं है। मैंने एक रोज ले जाकर खुशी-खुशी दे दी। उन्हीं की तो थी!

वात्स्यायन जी नये लेखकों को बहुत पढ़ते थे। तभी अधिकार से कह सकते थे कि आज की कविता बहुत बोलती है, जबकि कविता का काम बोलना है ही नहीं।युवा लेखकों की चिट्ठियाँ भी उन्हें बहुत आती थीं। कुछ युवकों से सिलसिलेवार पत्रचार चलता था। पता नहीं कैसे, पर कमोबेश हर चिट्ठी के जवाब के लिए वक़्त निकाल लेते थे। रोज नहीं। फुरसत का कोई एक रोज। जवाब देकर मूल पत्र पर दर्ज करते उत्तरितऔर साथ में तारीख! उनके घर से निजी कागजात-पाण्डुलिपियों आदि के जो बीसेक बक्से मिले हैं, उनमें ज्यादातर पत्र-व्यवहार है। एक पत्राचार छप्पन साल पुराना देखिएः विजयमोहन सिंह (अब प्रतिष्ठित आलोचक) ने इलाहाबाद के इरविंग क्रिश्चियन कॉलेज के छात्रावास से उन्हें लिखाः

शेखर पढ़कर मैं आपको अपने काफी निकट महसूस कर रहा हूँ...मेरे प्रिय लेखक शरतचन्द्र रहे हैं, पर मेरी सबसे प्रिय पुस्तक शेखर है... शेखर की आलोचनाओं को भी पढ़ता रहा हूँ। मुझे दुख होता है कि आपने इनका मुँहतोड़ उत्तर क्यों नहीं दिया। यदि आप आज्ञा दें तो मैं अपनी अल्पमति से इनका उत्तर देने की चेष्टा करूँगा। यदि आप मेरी इसमें सहायता करें... विजयमोहन ¯सह (10.11.54)
उस जमाने में साधारण डाक भी आज की कूरियर व्यवस्था से पहले पहुँचती होगी। दस नवम्बर के पत्र का जवाब अज्ञेय ने तेरह नवम्बर को उत्तरितकर दियाः ''रचना किसी को प्रिय लगे, इससे हर लेखक प्रसन्न होता है...आलोचना की हिन्दी में बहुत गिरी हुई अवस्था है। प्रशंसा और निन्दा दोनों ही निराधार या बहुत कम आधार लेकर होती है...लेकिन साहित्य का मूल्यांकन अन्ततोगत्वा पेशेवर आलोचक नहीं, विवेकशील पाठक करते हैं।...कृतिकार का श्रेष्ठ साधन (और कह लीजिए अस्त्र) उसकी कृति ही हैः अगर वह कोई काम नहीं कर सकती तो उसकी पैरवी से वह काम कैसे होगा?"

वात्स्यायन जी को कलाओं की गहरी समझ थी। कला की दुनिया में बहुत उठना-बैठना रहा। लेखक की जगह उन्होंने पहले चित्राकार और बाद में मूर्तिकार बनने के सपने देखे थे। बचपन में संगीत सीखने भी गये पर उसमें दाल गली नहीं। हालाँकि संगीत में रुचि जीवन भर बनी रही। घर पर चलने वाली शौकिया कारीगरी में एक फर्नीचर के आधुनिक रूपाकार तैयार करने का काम भी था। अपनी बनायी एक मेज उन्होंने चित्राकार रामकुमार को भेंट की थी।

सतीश गुजराल की पहली चित्र प्रदर्शनी के लिए दिल्ली में जब कोई दीर्घा नहीं मिल रही थी, उनके बडे़ भाई इन्द्रकुमार गुजराल ने अज्ञेय के घर पहुँचकर मदद की गुजारिश की। वात्स्यायन जी ने युवक सतीश की कलाकृतियाँ मँगवाईं और बाद में जनपथ पर प्रदर्शनी की व्यवस्था कराई। इस प्रसंग का जिक्र सतीश गुजराल ने अपनी जीवनी में और इन्द्रकुमार गुजराल ने अज्ञेय की मृत्यु पर लिखे एक लेख में किया है, जो नवभारत टाइम्स में छपा था।

वात्स्यायन जी का घर अनेकानेक कलाकृतियों से सुसज्जित था। बैठक में ठीक सामने की दीवार पर एक कृति चित्राकार-कथाकार रामकुमार की थी। उसके बारे में एक बार उन्होंने बताया कि अपने जन्मदिन पर वे कहीं बाहर थे। इला जी भी घर पर नहीं थीं। पीछे रामकुमार अचानक आये और यह कलाकृति रखकर लौट गये! रामकुमार ने वात्स्यायन जी के कहने पर उनकी कविताओं के अंग्रेजी अनुवाद संग्रह नीलाम्बरी के लिए अनेक रेखांकन भी बनाये थे। मरुथल शृंखला की एक हस्तलिखित पुस्तिका में भी रामकुमार के रेखांकन हैं।

कलाकार मकबूल फिदा हुसेन से भी उनका याराना था। नृत्य-संगीत की दुनिया के अनेक दिग्गज कलाकारों से भी। ज्ञानपीठ पुरस्कार अपनी शर्तों पर नृत्यांगना रुक्मिणी देवी अरुंडेल के हाथों स्वीकार किया। मंडी हाउस में उनकी आमदरफ्त बहुत रहती थी, खासकर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के प्रदर्शनों में। उनकी पचहत्तरवीं वर्षगाँठ पर देशभर के लेखक इंडिया इन्टरनेशनल सेंटर में जमा हुए। उन्होंने वहाँ अज्ञेय के साहित्य पर परचेबाजी नहीं की, बल्कि गुरु केलुचरण महापात्रा और माधवी मुद्गल का कुचिपुडी नृत्य आयोजन देखा।

पचहत्तर वर्ष पूरे होने पर कुमार गन्धर्व ने स्वेच्छा से कैवेंटर्स ईस्ट की बगिया में गाने की इच्छा जाहिर की। घरेलू महफिल जमना तय हो गया। अभी इला जी बैठने के बन्दोबस्त को सलीका दे रही थीं कि कुमार जी संगीतकारों के साथ शाम ढलने से पहले आ पहुँचे। व्यवस्था के निरीक्षण में उन्होंने खुद हाथ बँटाया और फिर अनवरत तीन घण्टे निर्गुण संगीत की धूनी रमाई।

अन्त में फिर थोड़ी घर की बात। पिछले दिनों बेटे का जयपुर में विवाह हुआ। वहीं पर चिकित्सक है। विवाह की घड़ी में तीन दिवंगतों की याद ने मुझे बहुत सताया। अपनी दादी की, जो पोते को गोद खिलाने की आस लगाये उसके जन्म से कुछ पहले चल बसी थीं। प्रभाष जोशी जी की, जो उसे एम.बी.बी.एस. पूरा करते ही सम्भावनाओं और ठिकानों की राह सुझाते थे। और वात्स्यायन जी की, जिन्होंने बेटे का नाम रखा था- ‘मिहिर’!

अपनी मृत्यु से कुछ रोज पहले इला जी ने हम सबको घर बुलाया था। पत्नी को उन्होंने एक आभूषण- नेपाली मंगलसूत्र- दिया। बेटी को धन। बेटे के सिर पर हाथ फेरा और फिर उसे एक नीले रंग का जैकेट देते हुए बोलीं यह वत्सल का है। बडे़ हो गये हो, तुम्हें अब यह पूरा आएगा।
वह वस्त्र हम सबको पूरा आया है। हमारे लिए घर में अज्ञेय की वह शाश्वत मौजूदगी है। उसकी गरमाई घर में हमें हरदम महसूस होती रहेगी।