Tuesday, 1 August 2017

कालजयी कथाकार महाश्वेता देवी के दो नये उपन्यास ​'जटायु' और 'जन्म यदि तब'


कालजयी कथाकार महाश्वेता देवी

के दो नये उपन्यास



जटायु

महाश्वेता देवी के उपन्यास का मतलब ही हैकोई भिन्नतर स्वाद! किसी भिन्न जीवन की कथा! उनकी कथा-बयानी में न कोई ऊपरी-ऊपरी घटना होती हैन कोई हल्की-फुल्की घटना या कहानी। ज़िन्दगी के बिल्कुल जड़ तक पहुँच जाने की कथा ही वे सुनाती हैं। वह कहानी मानो कोई विशाल वृक्ष है। कहानी के नीचे बिछी पर्त-दर-पर्त मिट्टी को उकेरकरबिल्कुल जड़ से महाश्वेता अपना उपन्यास शुरू करती हैं और पेड़ ​की​ सुदूरतम फुनगी तक पहुँंच जाती हैं। बीवी दीदी इस उपन्यास में मूल चुम्बक! उन्हीं से जुड़े उभरे हैंवाणीहाबुलहरिकेशसतुदा जैसे कई-कई पात्र!

दरअसल, ‘जटायु’ उपन्यास में जितनी घटनाएँ हैंउससे कहीं ​ज़्याद ​ रिश्तों की खींचतान! दो चरित्रों के आपसी रिश्ते! यह सोच-सोचकर हैरत होती है कि उसी बीवी दीदी को उनके पिताउनके विवाहित जीवन में सुखी नहीं देख पाये। उधर बीवी दीदी यानी रमला हैंवे ​ज़िन्दगी ​ में कभी भी अपनी देहअपने पति के सामने बिछा नहीं पायीं! ऐसी जटिलता आखिर क्योंवैसे इस तरह की जटिलताइनसान के अन्दर ही बसी होती है! इनसान के अवचेतन में! उन्हीं अवचेतन दिलों की कहानी और मर्द-औरत के आपसी रिश्तों के बीच खींचतान की कहानी है -जटायु


जन्म यदि तब 
वह कविता कहाँ गयीबिटिया शर्मिष्ठाअरेवह कविताजो मैंने लिखी थी और फेंक दी थीहाँबिटिया,तूने उठाकर सहेज लिया थावर्नाचल फिर से लिख लेबेटू! बँगला में न लिख सकेतो चल अंग्रेजी में ही लिख ले। तू ना लिख पायेतो अपने गौर काका को बुला! वह बिल्कुल ठीक-ठीक लिख लेगा। सुन,बिटियामेरा बड़ा मन था कि वह कविता मेरी मौत के बाद...लेकिनमाँ बुला जो रही है! मेरी माँतेरी माँ! एक बार उन दोनों के पास चला गयातो दोबारा लौटकर आना नहीं होगाबिटिया...। इसी तरह के पात्रों के इर्दगिर्द बुनी गयी हैं 'जन्म यदि तब' उपन्यास की कथा।



बांग्ला की प्रख्यात लेखिका महाश्वेता देवी का जन्म 14 जनवरी 1926 को ढाका में हुआ। वह वर्षों बिहार और बंगाल के घने कबाइली इलाकों में रहीं। उन्होंने अपनी रचनाओं में इन क्षेत्रों के अनुभव को अत्यन्त प्रामाणिकता के साथ उभारा है।

महाश्वेता देवी एक थीम से दूसरी थीम के बीच भटकती नहीं हैं। उनका विशिष्ट क्षेत्र है -दलितों और साधन-हीनों के हृदयहीन शोषण का चित्रण और इसी सन्देश को वे बार-बार सही जगह पहुँचाना चाहती हैं ताकि अनन्त काल से गरीबी-रेखा से नीचे साँस लेनेवाली विराट मानवता के बारे में लोगों को सचेत कर सकें।

गैर-व्यावसायिक पत्रों में छपने के बावजूद उनके पाठकों की संख्या बहुत बड़ी है। उन्हें साहित्य अकादेमीज्ञानपीठ पुरस्कार व मैग्सेसे पुरस्कार समेत अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है।

निधन: 28 जुलाई 2016, कोलकाता।


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