Monday, 12 June 2017

वाणी प्रकाशन समाचार ( वर्ष :11, अंक : 121, जून 2017 )

प्रिय पाठकों,

प्रस्तुत है वाणी प्रकाशन समाचार 

 वर्ष :11, अंक : 121, जून  2017  









'Pravasi putra' by Dr. Padmesh Gupta




 डॉ.पद्मेश गुप्त 

का नया कविता संग्रह 
प्रवासी पुत्र 

395/- /- | 978-93-5229-530-2| कविता संग्रह  

​ पुस्तक के सन्दर्भ में

हिन्दी भारत की भाषा है लेकिन केवल भारत की नहीं पिछले कुछ समय से वह दुनिया के अलग-अलग क्षेत्रों में फैलती गयी है और यह विस्तार आज भी जारी है। लन्दन में हिन्दीवासी बड़ी संख्या में हैं और हिन्दी बोलते भी हैं। यद्यपि अंग्रेज़ी का वर्चस्व थोड़ा बढ़ा है पर पिछले अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूँ कि कुछ क्षेत्रों में खासतौर से यू.के. हिन्दी समिति व वातायन के प्रयास से हिन्दी न सिर्फ बढ़ी है बल्कि अभिव्यक्ति का माध्यम भी बनी है। गोष्ठियाँ होती हैंपत्रिकाएँ निकलती हैं और ये सब कुछ जिस एक व्यक्ति का प्रयास है उसे मैं सीधे-सीधे उसके नाम से याद करूँगा श्री पद्मेश गुप्त। वे मूलतः लखनवी हैं। उनके वयोवृद्ध पिता दाऊजी मेरे आज भी अच्छे मित्र हैं।

यह जानकर मुझे विशेष प्रसन्नता हुई कि पद्मेश का नया कविता संग्रह आ रहा है। संग्रह के साथ की भूमिका से संग्रह की सभी कविताओं और पद्मेश के कविता कहने की कला की जानकारी तो मिल ही जायेगी पर अपनी ओर से यह कहूँगा कि यह कृति एक अभिनव प्रयास है और पद्मेश की अन्य रचनाओं से आगे बढ़ी हुई है।

इससे पहले उनके दो संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं पर यह तीसरा संग्रह थोड़ा अलग ही दिखाई पड़ता है और पहले से कुछ और भी महत्त्वपूर्ण। मैं पूरा संग्रह तो नहीं देख सका हूँ लेकिन एक कविता पर मेरी दृष्टि पड़ीजो बेटे को निवेदित है। जो आज की भाषा में है और जिसका सन्देश भी ठेठ आज का है। 

पद्चिह्न-पुत्र प्रंकित को

चलते चलते बाज़ार में 
किसी ने मेरी अँगुलियाँ थामीं
मैं खिलौनों की दुकान की ओर बढ़ गया
क्षण भर में भ्रम टूटा,
और मैंने पाया...
मेरी हथेली को स्पर्श करने वाला...
सिर्फ एक हवा का झोंका था।
फिर कैसे?
मुझे अपने पदचिन्हों के साथ...
कुछ नन्हे पाँव के निशान भी दिखायी दिये
और सूर्यास्त सी मुस्कान के साथ
मैं स्वयं...
खिलौनों का बाज़ार हो गया।

कविताएँ दूसरी भी महत्त्वपूर्ण हैं पर इस अच्छी कविता के साथ मैं अपनी बात साधुवाद के साथ समाप्त करता हूँ और प्रियवर पद्मेश को हार्दिक बधाई देता हूँ।

-केदारनाथ सिंह

डॉ. पद्मेश गुप्त


पद्मेश अब तक ब्रिटेन में विश्व एवं अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर हुए चार सम्मेलनोंलन्दन में 20 अन्तरराष्ट्रीय कवि सम्मेलनों, 1999 में यू.के. मेें हुए छठे विश्व हिन्दी सम्मेलन के संयोजकसैकड़ों साहित्यिक गोष्ठियों,अध्यापकों के अधिवेशन एवं शिविर तथा हिन्दी ज्ञान प्रतियोगिता के संयोजन का दायित्व निभा चुके हैं।

आपने यू.के. में हिन्दी की एकमात्र साहित्यिक पत्रिका पुरवाई’ का 18 वर्षों तक सम्पादन एवं प्रकाशन किया तथा प्रवासी टुडे’ पत्रिका का वर्षों तक सम्पादन किया।

2017 में पद्मेश गुप्त ने भारत के राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी के कर-कमलों द्वारा केन्द्रीय हिन्दी संस्थान,मानव संसाधन विकास मन्त्रालयभारत सरकार द्वारा पद्मभूषण डॉ. मोटूरि सत्यनारायण पुरस्कार ग्रहण किया।  


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मीडिया कवरेज 



भारतीय संविधान राष्ट्र की आधारशिला : ग्रेनविल ऑस्टिन, अनुवाद : नरेश गोस्वामी



भारतीय संविधान राष्ट्र की आधारशिला

ग्रेनविल ऑस्टिन

अनुवाद : नरेश गोस्वामी


प्रस्तुति कृति से पहले भारतीय संविधान से सम्बन्धित अधिकांश लेखन संविधान के नीरस प्रावधानों में उलझ कर रह जाता था। यह तात्कालिकता और वर्णनात्मकता से आक्रान्त एक ऐसा लेखन था जिसमें एक दस्तावेज़ के रूप में संविधान की ऐतिहासिक पूर्व-पीठिकासंविधान सभा की उग्र बहसों के आग्रह-दुराग्रह और चिन्ताएँ अनुपस्थित थीं। इस तरह ग्रेनविल ऑस्टिन की इस रचना ने भारत में संवैधानिक अध्ययन की धारा को एक नया परिप्रेक्ष्य प्रदान किया।

भारतीय संविधान की निर्माण-प्रक्रियाउसके अवधारणात्मक आधार तथा उसकी लोकतान्त्रिाक परिणति से लेकर केन्द्र सरकार के स्वरूपनागरिक अधिकारोंसंघ और राज्य के आपसी सम्बन्धोंन्यायपालिका की भूमिका तथा भाषा के असाध्य विवाद जैसे विभिन्न मुद्दों पर विमर्शी दृष्टि डालती यहकृकृति सिर्फ औपनिवेशिक सत्ता का भाष्य न लिख कर यह दिखाती है कि इन मसलों के सम्बन्ध में भारतीय पक्ष के विभिन्न धड़े क्या सोच रहे थे।

अपने समय के प्रकाशित-अप्रकाशित दस्तावेज़ो के अलावा संविधान सभा के सदस्यों के विस्तृत साक्षात्कारों तथा लेखक द्वारा जुटाये गये अन्य प्राथमिक स्रोतों पर आधारित यह रचना आज एक क्लासिक की हैसियत रखती है।  

                    अनुक्रम 

1. संविधान सभा : बीज से वृक्ष की ओर - 29• सभा : उत्पत्ति और गठन
• 
भारत : एक सूक्ष्म चित्र
• 
सभाकांग्रेस और देश
• 
नेतृत्व तथा निर्णय-प्रक्रिया
2. सामाजिक क्रान्ति : मार्ग का चुनाव – 63• मौज़ूदा विकल्प
• 
चुना गया मार्ग
• 
विकल्प चुनने के कारण
1. कांग्रेस कभी गाँधीवादी थी ही नहीं
2. 
समाजवादी प्रतिबद्घता
3. 
तात्कालिक कारण
4. 
वयस्क मताधिकार की ज़रूरत
3. संविधान की अन्तरात्मा मौलिक अधिकार तथा राज्य के नीति-निर्देशक सिद्घान्त 1 - 98निरन्तरता के साठ वर्ष 
• 1947 का माहौल 
• 
सभा द्वारा मौलिक अधिकारों की रचना
• 
अधिकारों की सीमाएँ
• 
सभा और नीति-निर्देशक सिद्धांत
4. मौलिक अधिकार-2 सामाजिक सुधारराज्य सुरक्षा बनाम 'उचित प्रक्रिया’ - 130 1. उपयुक्त विधि और सम्पत्ति
2. 
सम्पत्ति के अनुच्छेद की संशोधन-प्रक्रिया 
3. 
उपयुक्त विधि और वैयक्तिक स्वतन्त्रता
4. 
निवारक नज़रबन्दी : 1950 से
मौलिक अधिकार तथा नीति-निर्देशक सिद्घान्त : एक सिंहावलोकन
5. कार्यपालिका : लोकतन्त्र की शक्ति
• कार्यपालिका : स्वरूप का प्रश्न 
• 
कार्यपालिका तथा अल्पसंख्यकों के हित
• 
कार्यपालिका : शक्ति की सीमाएँ
1. राष्ट्रपतिमन्त्रिपरिषद् तथा निरीक्षण समितियाँ
2. 
लिखित प्रावधान बनाम पारम्परिक परिपाटियाँ 
कार्यपालिका : सन् 1950 के बाद
6. विधायिका : निर्वाचित सरकार की समन्वयकारी भूमिका 217• मतभेदों के विरुद्घ संघष
• 
द्वितीय सदनों की समस्या
7. न्यायपालिका और सामाजिक क्रान्ति 245• सर्वोच्च न्यायालय
• 
न्यायपालिका की स्वतन्त्रता
• 
एकजुटता का स्थायी विषय
8. संघवाद-1 : एक सौहार्द्रपूर्ण संघ 277शक्तियों का वितरण
1. विधायी सूचियों में शक्ति-विभाजन
2. 
संघीय कार्यपालिका का प्राधिकार तथा शक्तियों का वितरण
संघ का अन्यतम हथियार : आपातकालीन प्रावधान
9. संघवाद-2 : राजस्व का वितरण 321
1. भारत के संघीय वित्त की पृष्ठ भूमि
2. 
वित्तीय प्रावधानों की रचना
10. संघवाद-3 : राष्ट्रीय नियोजन 346• भाषाई प्रान्तों का मुद्दा और संविधान 
• 
संविधान का रियासतों में प्रसार
11. संशोधन : संघ का लचीलापन 373
12. भाषा और संविधान : एक आधा-अधूरा समझौता388
• गाँधी के आगमन से संविधान सभा तक
• 
सभा में शुरुआती झड़प
1. संविधान के मसौदे की रचना
2. 1948 
की घटनाएँ 
3. 
राष्ट्रीय भाषा
4. 
जनवरी-अगस्त, 1949 की घटनाएँ
• सर्वसम्मति पर आधारित निर्णय-प्रक्रिया
• 
सामंजस्य का सिद्घान्त
• 
चयन और समायोजन का हुनर
• 
युद्ध का शंखनाद
• 
उपसंहार
13. निष्कर्ष : एक सफ ल संविधान की अन्तर्कथा450• भारत का मौलिक योगदान
1. सर्वसम्मति पर आधारित निर्णय-प्रक्रिया
2. 
सामंजस्य का सिद्घान्त
• चयन और समायोजन का हुनर
• 
संविधान का आलोचना-पक्ष
• 
इसकी सफलता का श्रेय भारत की जनता को जाता है
परिशिष्ट 1 483परिशिष्ट 2 486परिशिष्ट 3 492ग्रन्थ-सूची 513

 


नरेश गोस्वामी ने मेरठ और दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी शिक्षा पूरी की है। उन्होंने हिन्दी समाज विज्ञान कोश’ (सं. अभय कुमार दुबे) में लगभग पैंसठ लेखों का योगदान दिया है और ग्रेनविल ऑस्टिन,स्टुअर्ट हॉलजोशुआ फिशमैनबृजबिहारी कचरु आदि पर परिचयात्मक लेखन भी किया है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में उनके कुछ प्रमुख शोध-लेख और समीक्षाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। धर्म और राजनीति के अन्तःसम्बन्धों का अध्ययन उनके शोध का मुख्य विषय है। सम्प्रति वे विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएसदिल्ली) द्वारा प्रकाशित शोध-जर्नल प्रतिमान’ में सहायक सम्पादक हैं।

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