Thursday, 20 April 2017

वाणी प्रकाशन समाचार ( वर्ष :10, अंक : 119, अप्रैल 2017 )




प्रिय पाठकों,

प्रस्तुत है वाणी प्रकाशन समाचार 

 वर्ष :10, अंक : 119, अप्रैल  2017  

























'Is Paar Kabhi Us Paar' by Padmaja Ghorpare



  शब्दों की सीमा समाप्ति पर आरम्भ होती कविताएँ  

इस पार कभी उस पार

पद्मजा घोरपड़े
मूल्य 295/- | 978-93-5229-601-9 | कविता संग्रह 

पुस्तक अंश
पद्मजा घोरपड़े की कविताओं की विविध और बहुरंगी दुनिया में प्रवेश करने के लिए सबसे पहले उनकी इस प्रतिश्रुति को ध्यान में रखना चाहिए कि जहाँ शब्दों की सीमाएँ समाप्त होती हैं वहीं से कविता आरम्भ होती है।’ 
कविता को लेकर यह समझ कोई मामूली समझ नहीं है बल्कि बहुत ही मार्के की और दूरदृष्टि वाली समझ है। आज जहाँ काव्य रचना में शब्दों की स्फीति और वाग्जाल की अधिकता मिलती है वहीं पद्मजा घोरपड़े शब्दों की सीमा की बात करती हैं और इसे रचना की एक बुनियादी ज़रूरत के रूप में देखती हैं। इसे एक विरल काव्य बोध ही कहा जाएगा-अवधारणा की दृष्टि से और प्रस्थान-बिन्द की दृष्टि से भी। यदि गहराई से देखा जाय तो 'इस पार कभी उस पार' की कविताएँ इसी काव्य-बोध का निरन्तर विस्तार करती प्रतीत होती हैं। 

ईसप और पंचतन्त्र की नीति कथाओं से प्रेरणा ग्रहण करते हुएउनका एक आधुनिक संस्करण रचते हुए ‘कभी इस पार कभी उस पार’ में सूरजपहाड़नदीसागरसाहिलसावन और हवाओं पर लिखी कविताएँ भी मिलेंगी। इन कविताओं में नागफनी की झाड़ियाँ हैंसोते हुए जंगल हैंनींद ओढ़े हुए अफ़साने और ऊँघते हुए मकान भी हैं ,यहाँ बबूल उगाते खेत और सूखी आँखों वाले कुएँ हैं तो फुसफुसाती हुई हवाएँ और आँसुओं के कफ़न में लिपटी हुई खुशियाँ भी हैं और इन सबके बीच जीने की जद्दोजेहद करता हुआ एक अदना-सा अंकुर भी है जिसमें अपने चारों ओर की विषम परिस्थितियों से भी जीवन-रस को खींच लेने का माद्दा हैअपने अस्तित्व को पहचानने की कोशिश और कशिश है। और सबसे बड़ी बात यह कि इन कविताओं में समय का एक बेहद तीखा बोध भी हैउसकी नब्ज़ पकड़कर उसके पार और उससे परे जाने का एक दर्शन भी है।

संग्रह की कविताओं में मानवीय अनुभवों और उनके सूक्ष्मतम निहितार्थों के साथ-साथ मानव और प्राकृतिक दुनिया के अलग-अलग पड़ावों के मार्मिक अनुभवों-प्रसंगों को उभारने वाले बिम्ब हैं। मानवीय सरोकारों के निरन्तर फैलते हुए क्षितिज को रेखांकित करती हुई यह दुहरी बिम्ब-रचना उनकी कविताओं की एक दुर्लभ विशेषता बन गयी है। कठोर अनुभव और सच्चाइयों से लबरेज ये बिम्ब कविता में धीरे-धीरे ढलते और पिघलते हुए एक आन्तरिक संगीत की सृष्टि करते हैं। कविताओं में निहित प्रश्नाकुलतासंवादधर्मिताआश्चर्य-विस्मय और व्यंग्य की ख़ूबियाँ उन्हें बार-बार पढ़ने और सोचने पर मज़बूर करती हैं। 

पद्मजा घोरपड़े


एसोसिएट प्रोफ़ेसरहिन्दी विभागाध्यक्ष एवं भूतपूर्व प्रभारी प्राचार्यस.प. महाविद्यालयपुणे। प्रकाशित पुस्तकें: कुल 38; समीक्षाकविताकहानी, पत्रकारिताजीवनी तथा अनुवाद लेखन हेतु राष्ट्रीय स्तर के 5 पुरस्कार प्राप्त।

डॉ. पद्मजा घोरपड़े की कविता का अनुशीलन’ पर एम. फिल्. शोध प्रबन्ध (शिवाजी विद्यापीठकोल्हापुर)। राष्ट्रीय स्तर की पत्र-पत्रिकाओं में लगभग 80 शोधपरक और समीक्षात्मक लेख प्रकाशित। केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय द्वारा आयोजित नवलेखक शिविरों में मार्गदर्शक के रूप में भागीदारी(कोच्चीतिरुअनन्तपुरमपुणे आदि)। ग्योटिंगन विद्यापीठ (जर्मनी) के छात्रों के लिए हिन्दी अध्यापन (2003 से 2008 तक)।


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