Saturday, 15 April 2017

Fresh Arrival : 'Ishq Kee Dukan Band Hai' by Narendra Saini



 इश्क़ की दुकान : टूटते हुए सपनों की दास्तान 

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नरेन्द्र सैनी 


मूल्य 225/- | 978-93-5229-638-5 | कहानी संग्रह


 पुस्तक अंश 

बचपन में देखे गये सलोने सपनों की दुनिया से निकलकर एक बच्चा कब तितलियों और फूलों की दुनिया को सहसा झटककर उस दोराहे पर आ जाता हैजहाँ से कुछ ,ऐसे सम्बन्धों और ख़्वाहिशों को पंख लगते हैंजिसे भली समझी जाने वाली दुनिया के दरवाज़े के भीतर ले जाने की सनातन मनाही चली आ रही है--- ,ऐसे मेंएक समय वो भी आता हैजब दोस्तीभरोसाईमानदारी और इश्क़’ जैसी बातें बेमानी लागने लगती हैं--- काला जादू जानने वाले किसी जादूगर के बक्से से निकलकर उड़ने को आतुर चिड़िया बेसब्री की डाल कुतरती हैजिसे सेक्स’ के अर्थों में समझना सबसे प्यारा खेल बन जाता है---

इन कहानियों की फंतासी में पड़े हुए अनगिनत पलों में इश्क़’ के सबसे सलोने सुरखाबी पंख नुचते जाते हैंजो उसे प्रेम कमकारोबार की शक्ल में बदलने को आतुर दिखते हैं। इसी कारण सेक्स की परिणतिपर पहुँचे हुए किरदारों का सपना टूटता है और इश्क़’ की दुकान बन्द मिलती है---


 नरेन्द्र सैनी 


नरेन्द्र सैनी इंडिया टुडे पत्रिका में हैं तो सीनियर असिस्टेंट एडिटर हैलेकिन उनकी पूरी शख़्सियत एक क़िस्सा-गो की है। दिल्ली में पले-बढ़े नरेन्द्र ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से पोस्ट ग्रेजुएशन किया। पेशे से पत्रकार होने के बावजूद अनुवाद से लेकर कहानी लेखन की हर विधा में पिछले एक दशक से उनका सशक्त हस्तक्षेप है। लेखन के इस विशाल संसार में नरेन्द्र की सबसे बड़ी पूँजी यह है कि पूरा जीवन दिल्ली जैसे महानगर में बिताने के बावजूद उनके संवाद कस्बाई भारत की कसमसाहट लिए रहते हैं। उनके पात्र दिल्ली की भव्य इमारतों की परछाईं में छिपी अनाम बस्तियों से निकलकर चमकदार सड़कों पर चहलकदमी करने लगते हैं । जब वे अपने नौजवान किरदारों की जुबान बोलते हैं तो यही लगता है कि जैसे वे आज भी नॉर्थ कैंपस के किसी हॉस्टल में डटे हों। 

अलग से उनकी नौकरी और लेखकी का मिला-जुला आलम यह है कि सिनेमा के परदे के किरदार महानायक अमिताभ बच्चन हों या युवा प्रतिभा नवाजुद्दीन सिद्दीकी, भाषा और अर्थशास्त्र की बिरादरी के प्रो. कृष्ण कुमार हों या गुरचरण दाससबके साथ रहगुजर बनाते नरेन्द्र ने कुछ लिखते-पढ़तेअनूदित और सम्पादित करते हुए पुस्तकों की शक्ल में बहुत कुछ सार्थक सँजोने का काम भी किया है।

ऑक्सफोर्ड बुक स्टोर में 'इश्क़ की दुकान बंद है' पर आयोजित लोकार्पण व परिचर्चा की कुछ तस्वीरें:


 'इश्क़ की दुकान बंद हैपुस्तक लोकार्पित करते हुए बायें से दायें अदिति माहेश्वरी-गोयल
 लेखक नरेन्द्र सैनी व वाणी प्रकाशन के प्रबन्ध निदेशक अरुण माहेश्वरी। 

 लेखक को गुलदस्ता  देते  हुए  अरुण माहेश्वरी 

पुस्तक अंश  पढ़ते  हुए लेखक  नरेन्द्र  सैनी 


कार्यक्रम में उपस्थित श्रोतागण


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  पुस्तक समीक्षा : ओम निश्चल  


बाले तेरे बाल-जाल में कैसे उलझा दूँ लोचन ?
ऐसी महाकवि वाली झिझक नरेन्द्र सैनी और उनकी कहानियों में नहीं है।
कभी महाकवि पन्त की इस कविता की आलोचना करते हुए 'पंत और पल्‍लवमें निराला ने कहा थाकि यह कविता प्रकृतसम्‍मत नहीं हैक्‍योंकि कवि की यही तो उम्र है बाल-जाल में उलझने की जबकि वह इससे विमुख लग रहा है। ''इश्‍क की दुकान बंद है''नाम से वाणी प्रकाशन दिल्‍ली से आई नरेन्‍द्र सैनी की कहानियाँ ऐन्द्रिय अनुभव की युवा प्रतीतियों की दास्‍तान हैं। नरेन्‍द्र युवा हैं और पढ़ने लिखने के नाम पर उनके इस शौक को व्‍याधि का दर्जा भी दिया जा सकता है सो किस्‍सागोई की परंपराओं और लीक से परिचित न होंऐसा नही हो सकता। किन्‍तु एक दिन बातचीत के दौरान उनके निजी अहसासात के साथ रिश्‍ता जुड़ा तो वहां कुछ उदासियों के कोलाज भी नजर आये। इस युवा उम्र में नरेन्‍द्र विवेकानन्द सी गम्भीरता क्‍यों लिए हैं। पूछने पर उनके हालात पता चले। पत्रकारिता में आने की दास्‍तान भी। शौक भी दिलचस्‍पियाँ भी। मैंने कहा तुम कहानियाँ क्‍यों नही लिखते। उसने तब तक कुछ कहानियाँ लिखी थीं पर कहीं छपने छपाने को लेकर वे गंभीर न थे । मैंने कहानी पढने के लिए माँगी और नयी कहानियाँ लिखते रहने को कहा। नरेन्‍द्र ने पहली कहानी जो मुझे पढ़ने को भेजी वह थी 'एक लड़की अनजानी-सी।उसके बाद 'श्रुति। फिर एक एक कर कई कहानियाँ पढ़ने को भेजीं। मेल पर वे कहानियाँ आज भी हैं।
ऋषिएक लड़की अनजानी सी,
अफसाने उस दीवानी के, श्रुति,
उर्वशी : एक फैंटेसी, ही इज इन लव और आयशा

---ये कहानियाँ अन्‍य कुछ और कहानियों के साथ बेशक इस संग्रह में भी होंगी। पहली ही कहानी 'एक लड़की अनजानी सी' मैंने पढ़ी तो वह
आज की कहानियों से अलग लगी। देखा कि उनमें सेक्‍स को लेकर झिझक नहीं है। वे टैबूज को तोड़ती हैं। उनमे एक खास तरह के सेक्‍सुअल एक्‍सपीरियेंसेज के वृत्तान्त हैं। आज के दौर के युवा दिलों की कहानियाँ । दिलचस्‍प । पर मानवीय मूल्‍यों के नियामक सम्पादकों के लिए ऐसे अनुभव निजी बेडरूम के दायरे में तो आ सकते हैं पर उन्‍हें मर्यादित पत्रिकाओं में छपने में जरा कठिनाई होती है । तथापि जोखिम लेकर उसकी इसमें से कुछ कहानियाँ मित्रों ने छापीं। 'प्रयाग पथ' के हितेश सिंह ने बास्टर्ड” छापी. तो विजय राय ने 'लमही' के लिए भेजी तो उन्होंने डैडलाइन” सिलेक्ट कर ली, बया में इक लड़की अनजानी सी” को जगह मिली। कुछ भेजने व तकादे के बावजूद नहीं छप सकीं शायद
उनके ब्‍यौरे इतने ऐंद्रिक व सेक्‍सुअल साइके के होंगे कि उन्‍हें छापने में सम्पादकों को कठिनाई महसूस हुई होगी।
नरेन्द्र का खुद का जीवन भी एक कहानी है। बेतरतीब। औपन्‍यासिक। मामला गतानुगतिक चलता तो वे आज किसी कालेज या युनिवर्सिटी में पढ़ा रहे होते। नरेंद्र ने हंसराज कालेज दिल्‍ली से एमए तक की पढ़ाई की पर शुरुआती तौर पर वे पाठ्यक्रम की विषयवस्‍तु तक ही सीमित रहे। पर जब 'चीड़ों पर चाँदनीका कुछ हिस्‍सा पाठ्यक्रम में पढ़ा तो निर्मल वर्मा को पढ़ने का जुनून पैदा हुआ। चीड़ों पर चाँदनी के एक एक कर दृश्‍य उनके भीतर उतरते गये और उन्‍होंने धीरे-धीरे निर्मल वर्मा की जलती झाड़ीवे दिनपरिंदेधुंध से उठती धुन और लगभग सभी किताबें पढ़ डालीं। पुस्‍तकालयों के आशिक बने तो चंद्रधर शर्मा गुलेरी और चन्द्रकान्ता से लेकर मोहन राकेशकमलेश्वरइस्मत चुग़ताईकृष्ण चंदरफणीश्वरनाथ रेणुजैनेंद्रअज्ञेयश्रीलाल शुक्ल को पढ़ डाला। पढने की ललक तो थी पर हालात ने प्रूफ रीडर बना दिया। इसका नतीजा यह निकला कि तमाम बड़े लेखकों की किताबें उन्‍हें पांडुलिपि स्‍तर पर ही पढ़ने को मिल गयीं। फिर जीविका के चलते अनुवाद की ओर मुड़े तो विश्‍व के तमाम लेखकों को भी पढ़ने का रास्‍ता सहज ही प्रशस्‍त होता गया। हिन्दी गद्य की समझ भी तभी विकसित होनी शुरू हुई। जिसे निर्मल वर्मा की कृतियों और भीष्‍म साहनी और अज्ञेय के उपन्‍यासों ने भीतर तक मथा होराजेन्द्र यादवकृष्ण बलदेव वैदहजारी प्रसाद द्विवेदीवृन्दावन लाल वर्मानागार्जुनराजकमल चौधरी व कृष्‍णा सोबती को पढ़ने का आस्‍वाद मिला होउसके लिए अपनी कहानी के साथ साहित्‍य जगत में उतरने का अपना अर्थ है। सवाल यह है कि सैनी कहानी की परंपरा को अपनी कहानियों में कहाँ तक अग्रसर कर पाते हैं। कथाजगत के तमाम महारथियों को पढ़ने के बाद जब किसी की सलाह पर मिलान कुंदेरा को उन्‍होंने पढ़ा तो वे उनकी किस्‍सागोई की कला के मुरीद हो गये। फिर नरेन्द्र ने अपने अनुभव और कल्‍पना की देखी दुनिया को अपनी कहानियों में रचने लगे। हर कहानी में ऐसे किरदार जो सामान्‍य प्रकृति के होकर भी कुछ अलग सा दिखते हों जो अपने फैसलों में इतने विश्‍वासी होंजिनकी दुनिया में सेक्‍सुअल एक्‍सपीरियेंसेज और नैतिकता एक-दूसरे को आँख न चिढ़ाते हों। जहाँ सम्बन्ध इतने बाजारू और बेमतलब से लगते हों स्‍त्री पुरुष की बुनियादी वासना जहाँ  पर प्रश्‍नातीत होऐसे अनेक हालात और कुछ अनूठे से लगते चरित्रों के साथ कहानी की अपनी दुनिया बसाना नरेन्द्र की कल्‍पनातिशयता का हिस्‍सा है।
उनकी कहानियाँ पढ कर रोमांच होता है खास कर तब जब उनके पात्र वर्जनाओं की फेंस को लाँघते हुए कुछ ऐसा बर्ताव करते हों जैसे उन्‍हें इस दुनिया में अलग से पहचाना जाए। उनका विहैबिरियल पैटर्न अलग दिखता है। 'आयशाकहानी में आयशा राघव से प्‍यार करती है पर चरम पर पहुँचने से पहले राघव को उसका मुस्‍लिम होना नागवार लगता है और वह अलग हो जाता है। 'एक लड़की अनजानी सीकी काम्‍या के तीन दोस्‍त होते हैं। तीनों को वह एक जगह एक समय पर बुलाती है। तीनों आपस में अनुमान लगाते हैं कि कोई खास बात है और हर दोस्‍त भ्रम में है कि शायद वह उन्‍हें प्रपोज करे। पर वह तीनों से मिलने आती है और बताती है कि वह दरअसल किसी और को चाहती है।पर आप लोग ऐसे ही जीवन में बने रहिएगा। तीनों में उत्‍सुकता बढ़ती है कि वह कौन है आखिर और अंत में वह रोशनी की ओर इंगित करती है कि यही है वह तो लगभग यह एक अचरज भरा अन्त होता है। 'श्रुतिकहानी में उसके मां पिता के सम्बन्ध इतने कसैले हो चुके हैं कि वह आगे चल कर अपने प्रेमी राजीव के साथ सामान्‍य व्‍यवहार नहीं कर पाती।
'एक था शेरूया 'ही इज इन लवकहानी एक कुत्ते और कुतिया की कहानी है। शेरू स्‍वीटी के प्‍यार में है। जहाँ जहाँ स्‍वीटी वहाँ वहाँ शेरू। पर इसी बीच एक अल्‍शेसियन कुत्ता उनके बीच प्रवेश करता है । शेरू का प्‍यार गौड़ हो जाता है। पर स्‍वाभिमानी शेरू को जिस दिन पता चलता है कि अल्‍शेसियन कुत्ते के साथ मिल कर स्‍वीटी ने उसे चोट पहुँचाई है तो उस दिन के बाद से वह मुहल्‍ले में दिखाई नहीं पड़ता। इस कहानी में पसरे कुत्‍तेपन में मनुष्‍यों के स्‍वार्थी प्रेम यानी 'निर्धन का दामन तोड़ दियावाले भाव की गंध आती है। 'अफसाने उस दीवानी केभी एक अलग सी कहानी है जहाँ प्‍यार में दीवानी एक अध्‍यापिका लड़की वैवाहिक सम्बन्धों के बिना माँ बनती है और अपने प्रेमी पर उसे भरोसा होता है पर बाद में जब पता चलता है कि उसने किसी आईएएस लड़की से शादी कर ली है तो बहुत झटका लगता है। वह उसके साथ किस निस्‍संगता से पेश आती हैकहानी का अन्त देखने लायक है।
नरेन्द्र समाज से ज्‍यादा व्‍यक्‍ति के भीतर की ख्‍वाहिशोंप्रवृत्तियोंजीवनशैलियों को खँगालने में यकीन रखते हैं। अपने चित्रण में वे बेशक कहीं-कहीं बड़े खुलेपन और बेबाकी से पेश आये हैं पर शायद आज के जीवन में जहाँ सारी चीजें मुखर और अमर्यादित हो चुकी हैंकहानीकार भले ही छुपा लेजमाना वाकई बहुत बेशरम हो चुका है। वह बहुत कैलकुलेटिव हो चुका है। सम्बन्धों का बुलबुलापन देर तक कहाँ टिकता है। नरेन्द्र की कहानियों में नये जमाने के लड़के लड़कियॉं हैं जिनके लिए वर्जनाएँ  मायने नहीं रखतीं। और लड़के! वे तो यह पूछने में तनिक नहीं झिझकते कि ''आर यू आन पिल्‍स ?'' 

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