Wednesday, 12 April 2017

पढ़िए शैलेन्द्र सिंह के नवीन उपन्यास ‘हाशिया’ का एक अंश:-



पढ़िए शैलेन्द्र सिंह के नवीन उपन्यास हाशिया का एक अंश:-



मदन ने उठकर एक अंगड़ाई ली और रुककर एक लंबी सांस ली | रसोई में से बाहर निकल कर दीवार पर से मछलियों की पोटली उठाईबायें हाथ से पकड़ कर सुबह की अपनी दूसरी यात्रा शुरू की|


मछलियाँ बेचने के लिए लगभग दो किलोमीटर दूर नगर में जाने के लिए गाँव की गलियों से गुज़र कर कच्चे रास्ते पर हमेशा की तरह अकेला चलने लगा | इसी रास्ते पर मदन के गाँव के बच्चे स्कूल की वर्दी में स्कूल जा रहे थे, कुछ बच्चे मदन से आगे जा रहे थे, कुछ मदन के पीछे थेअक्सर स्कूल के बच्चे मदन से आगे या पीछे ही चलते थेशायद मदन के कपड़ों में मछलियों की बदबू से बचने के लिए | मदन के कपड़ों में बदबू तो आती थी पर शायद वह इस बदबू का आदी हो गया था और उसको खुद महसूस नहीं होती थी |

मदन को स्कूल को स्कूल जाने वाले बच्चों को देख कर बहुत अच्छा लगता थामदन अक्सर सोचता था की उसके बच्चे भी एक दिन बड़े होकर नगर में पढ़ने जायेंगे और फिर उससे भी आगे शहर मेंने जाकर पढ़ाई करेंगेमदन अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए कुछ भी करने के लिए तैयारी था |

पिछले साल एक दिन मदन इसी तरह सुबह मछलियाँ बेचने के लिए नगर जा रहा था | उसके रिश्ते में भाई तरसेम भी सुबह ही उसके साथ नगर जा रहा था | दोनों आपस में बातें कर रहे थे तो इसी बीच मदन ने अपना दाहिना हाथ जेब में डालकर बीड़ी का बंडल निकाला | एक बीड़ी निकाल कर मुँह में डालकर जेब से निकाली हुई माचिस से सुलग दी|

इस पर तरसेम ने उससे पूछाआप दिन में कितनी बीड़िया पीते हो?”

बस एक ही बंडल मदन ने जवाब दिया
इस पर तरसेम ने एक बार फिर पूछा थाएक बंडल कितने रूपये का आता है?”

मदन ने अपने मन मे सोचा था की यह कोई पूछने की बात हैसब जानते है की गणेश बंडल बीड़ीकितने का है और साधारण तरीके से तरसेम को जवाब दियातीन रूपये का आता है|”और फिर बीड़ी को दोनों होटों के बीच दबाकर लंबी सांस लेकर बीड़ी का धुआ अंदर खीचने लगा |


तरसेम ने की क्षण रुक कर मदन की तरफ़ देखा और कहने लगाइसका मतलब आप एक दिन का बीड़ी का तीन रूपये ख़र्चा करते है एक महीने का 90 रूपये और एक साल का में एक हज़ार रूपये से भी ज्यादा|


यह सुनकर मदन हैरान हो गया था एक साल में हज़ार रूपये से भी ज्यादा वह बीड़ियों पर खर्च कर देते हैउसने तो कभी एक दो दिन से ज्यादा हिसाब ही नहीं किया थाउसकी बीड़ी हाथ में ही रह गयी और चेहरे पर साफ़ नज़र आने लगा जैसे किसी को कोई गलती करते पकड़ लेता है|

उधर तरसेम के चेहरे पर संतुष्टि के भाव आ गये क्योंकि वह यही तो मदन को एहसास दिलाना चाहता थातरसेम ने अपने बात आगे बढ़ाई-अगर आप चाहो तो यही एक हज़ार रुपया बचा सकते हो और अपने बच्चों की पढ़ाई पर लगा लगा सकते हो | और सेहत भी ख़राब नहीं होगी|”

मदन के चेहरे पर गलती के भाव उभर कर ज़िंदगी की ख्वाहिशों के भाव में परिवर्तन होने लगेक्योंकि तरसेम ने उसे एक नया रास्ता दिखा दिया था |

मदन के मन में विचार आयायही फ़ायदा है पढ़ाई करने कामुझे तो कभी दिमाग में यह आया ही नहीं था| 
उस दिन के बाद उसने कभी भी अपने पैसों से बीड़ी नहीं खरीदी पर कभी इधर-उधर से मिल जाये तो ली लेता थातो उसने बीड़ी पीना ही बिल्कुल बंद कर दिया था|

मदन यह भी सोच रहा था की और भी कितने लोग है जो पढ़े-लिखे है पर इतने हमदर्दी से और इतने स्पष्ट तरीके से कभी किसी ने उसको नहीं समझाया था|
यक़ीन भी क्यों नहीं आता क्योंकि तरसेम का पिता शैलेराम भी तो गरीब ही थाशैलेराम ने गरीबी मे ही तरसेम को पढ़ाया था|

 तरसेम तीन-चार साल पहले ही 10+2 स्कूल में लेक्चरर लगा थामदन के मन में बहुत बड़ी अभिलाषा थी की उसके बच्चे भी बड़े होकर पढ़-लिख कर तरसेम की तरह नौकरी करेबड़े अफ़सर बनेइसीलिए मदन ने तुरंत बीड़ी पर ख़र्चा बंद कर दिया था|

स्कूल जाने वाले बच्चों को देखते-देखते और हर दिन की तरह अपने मन में विचारों के महल बनाते-बनाते नगर में पहुच गयाआधा बाज़ार पार करने के बाद चौक में ढाबे में पहुँच गया|
नगर में दो ही ढाबे है दूसरा ढाबा भी पास ही हैथोडू का ढाबा ज्यादा मशहूर हैइस नगर में आने वाली और यहाँ से गुजरने वाली सभी गाडियाँ लगभग इन्हीं दोनों ढाबों के सामने रुकती हैबसों के ड्राइवर तथा कंडक्टर अधिकतर थोडू के ढाबे पर ही खाना खाते है|

थोडू अपने ढाबे में झाड़ू लगाता-लगाता दाबे का कूड़ा बाहर निकाल रहा था | मदन ढाबे से बाहर निकलते हुए सूरज की किरणे पड़ती एक बेंच पर बैठ गया | थोडू राम ने झाड़ू से नीचे गिर हुई चावल-दाल और हड्डियों से भरा हुआ कूड़ा दुकान से बाहर निकाल कर सड़क के मध्य में ढेरी बना दी और एक हाथ में झाड़ू लेकर फिर ढाबे के अंदर पीछे चला गया और झाड़ू रख कर वापस आ गया | पुराने अख़बार को दो-चार तेह लगाकर एक पंखा जैसे बनाकर अंगीठियों में पहले से नीचे कागज़ और फल की पेटियों की पट्टियाँ और उस पर पत्थरी कोला कर आग लगाई हुई थीअंगीठियों से सफ़ेद धुआ निकल कर दुकान में भर चुका थाधुएँ से ढाबे की छत और दीवारे पहले ही काली हो चुकी थीथोडू पुरानी अख़बार के बनाये पंखे से अंगीठी से होते हुए उपर उभरता और सफ़ेद कार्बन मोनोओक्साड से भरा हुआ धुआँ और थोड़ी-सी आग की लपट को भी साथ ले आता|


थोडू और उसका नौकर पंजू दोनों एक एक अंगीठी को हवा दिये जा रहे थेहवा के झोके से अगर यह धुआँ थोडू या पंजे की तरफ आता तो बीच में अख़बार के पंखे को रोककर खाँस लेता|
थोडू काले रंग तथा दरम्यान क़द का था | मोटी नाकमोटे काले होंटघुंगराले बाल और पेट निकला हुआमुह से रात की पी हुई शराब की मंद-सी बू अभी भी आ रही थीआँखें धुआँ लगने से और लाल हो गयी थीं|
कुछ देर बाद दोनों अंगीठियाँ बराबर जल उठी थी और धुआँ निकलना बंद हो गया थाथोडू उठ कर अंदर ग्राहकों के बैठने वाले वाले बेंच पर आ कर बैठ गया|

मदन भी थोडू के पास आ कर बैठ गया और साथ ही बेंच पर रख कर मछलियों की पोटली खोलने लगाथोडू ने दायाँ हाथ आगे बढ़ा कर सबसे बड़ी मछली को पकड़ापरखाहाथ से ही तोला और फिर एक खाली पतीले में फेंक दियाइसी तरह एक एक करके सारी मछलियों को उसी पतीले में फेंक दियाअपने कुर्ते से मछली वाले हाथ साफ़ किये और दायें हाथ से अपने कुर्ते के दायीं तरफ वाली जेब से नोटों की गड्डी निकाली और दो पचास-पचास के नोट निकाल कर मदन के हाथ में दे दिये|

पंजू यह मचलियाँ साफ़ कर लो|” थोडू ने नौकर की तरफ देखते हुए कहा|

मदन लगभग 15-20 मिनटों तक थोडू से बातचीत करता रहा और उसके बाद लगभग पूरा बाज़ार पार करने के बाद देसू महाजन की करियाना की दुकान पर पहुँच गया| लोग आमतौर पर इसे देसू शाह कह कर ही बुलाते थे| मदन ने देसू शाह की करियाना की दुकान की दो छोटी-छोटी सीढियां चढ़ीं और दुकान पर आ गया| दुकान के अन्दर आते ही बायीं तरफ एक तख़्तपोश पर देसू शाह बैठा हुआ था जिसके बायीं ओर पर रुपयों का गल्ला रखा हुआ था और दायीं तरफ़ लसल जिल्द वाले बड़े-बड़े पांच-छह उधार लिखने वाले रजिस्टर रखे हुए थे| देसू शाह साठ-पैंसठ साल का पतली कद-काठी का था| मुँह से दांत गिरने के कारण गाल अन्दर की ओर चले गये थे| दाढ़ी काट कर नहा कर गोरा मुँह और लम्बे कंघी किये हुए बालों पर तेल चमक रहा था| माथे पर सिन्दूरी लम्बा टीका| देसू शाह के लगभग सिर के ऊपर दीवार पर धन का आशीर्वाद देने वाली लक्ष्मी माता और श्री गणेश की तसवीरें लगी हुईं थीं| दोनों तस्वीरों पर ताज़ा गुट्टे के फूलों के हार लटक रहे थे और दोनों तस्वीरों के नीचे अगरबत्ती अपना सफ़ेद धुआँ छोड़ रही थी| तस्वीरों के नीचे देसू शाह सफ़ेद कुरता-पाजामा पहने पालथी लगा कर बैठा हुआ था|
मदन ने देसू शाह को सिर को नीचे झटका देते हुए नमस्ते की और उसके सामने लगे दायीं ओर बेंच पर बैठ गया|

देसू शाह आदत से तेज़-तेज़ बोलता था और इसलिए तेज़ी से मदन को जवाब दिया और फिर से मदन के साथ बेंच पर पहले से बैठे ग्राहक के साथ बातें ज़ारी रखते हुए उसकी तरफ देखने लगा|

सुना है कल मन्त्री जी आ रहे हैं और बहुत बड़ी सभा को सम्बोधित करेंगे|” वहाँ पहले से बैठे हुए एक ग्राहक ने देसू शाह से पूछा|

हाँदेसू शाह ने जवाब दिया|

और सब गरीब परिवारों को जिनके घर नहीं हैं उनको घर बनाने के लिए मन्त्री जी खुद अपने हाथों से रुपयों के चेक बाँटेंगे|”देसू शाह ने कहा| मन्त्री जी स्वयं अपने हाथ से चेक बाँटेंगे ग्राहक ने आश्चर्य से पूछा|

देसू शाह ने इस बात को अपने चेहरे के भाव से ही गलत बताते हुए कहा— अब चुनाव कुछ ही महीने दूर हैं और सत्ता में बैठे मन्त्री और पार्टी के लोगों के वोट अपनी तरफ खींचने के लिए यह सब कर रहे हैं|”

इस पर देसू शाह के सामने बैठे ग्राहक ने भी गर्दन हिला कर हाँ में हाँ मिलायी|

पिछले चार सालों से भी ज्यादा समय में तो कुछ किया नहीं और अब चुनाव सिर पर हैं और अब सरकार को सारे काम याद आ रहे हैं|” शाह ने फिर अपनी बात को दोहराया|

देसू शाह की राजनीतिक विचारधारा सत्ता में पार्टी के विपरीत है और जो ग्राहक देसू शाह के साथ बात कर रहा था उसकी भी|


मदन बेंच पर बैठे-बैठे इस वार्तालाप को चुपचाप सुन रहा था| उसका पूरा ध्यान इस वार्तालाप से जुड़ा हुआ था|

अति गरीब परिवार जिनके अपने घर भी नहीं हैं उनके घर बनाने के लिए रुपयों के चेक बांटने की बात सुनने के बाद तो मदन की रूचि और भी बढ़ गयी थी| मदन इस इंतज़ार में था कि इस विषय पर वह और भी कुछ बोले पर देसू शाह ने तो बात को ही गलत क़रार देते हुए ख़त्म कर दिया था|

इस पर मदन के मन में सोच की प्रतिक्रिया होने लगी थी|

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