Tuesday, 14 March 2017

'केदारनाथ सिंह - चकिया से दिल्ली' की समीक्षा



Satyagrah.scroll.in  में 'केदारनाथ सिंह–चकिया से दिल्ली' की समीक्षा

समीक्षक : गायत्री आर्य
दिनांक : 29 जनवरी 2017  



किसी भव्य इमारत को देखने के साथ ही उसके बनने की प्रक्रिया देखना भी बेहद दिलचस्प होता है. कुछ इसी तरह किसी बड़े लेखक या कवि को पढ़ने के साथ-साथ उसके बड़ा बनने की प्रक्रिया जानना भी बहुत ही शानदार अनुभव होता है. केदारनाथ सिंह : चकिया से दिल्लीएक ऐसी ही किताब है, जो विभिन्न व्यक्तियों के लेखन के माध्यम से मूर्धन्य कवि केदारनाथ सिंह के बनने की कथा कहती है.
पूरी किताब में एक बात बार-बार उभर कर आती है कि केदार जी अपने गांवदेश और मिट्टी से इतने ज्यादा जुड़े हैं कि उनके लिए दुनिया के सबसे खूबसूरत देश और जगह के कोई मायने नहीं हैं 
किताब में 26 लोगों ने केदारनाथ सिंह से जुड़े अपने अनुभवों, यादों, लेखों, टिप्पणियों और संस्मरणों को कलमबद्ध किया है. साथ ही केदारनाथ सिंह पर लिखी गई छह कवियों की कविताएं भी हैं. ये केदारनाथ सिंह के व्यक्तित्व के विविध पहलुओं पर प्रकाश डालती हैं. केदार जी के आठ कविता संग्रह आ चुके हैं, लेकिन फिर भी उनकी चुप्पी ज्यादा बोलती है. उनकी चुप्पी के बारे में अभिज्ञात लिखते हैं, ‘कई बार उनकी चुप्पी बोलते लोगों पर भी भारी पड़ती है. कहां चुप रहना है और यह भी कि कहां चुप रहना ही बोलना है. साठोत्तरी कविता के दौर में उनकी चुप्पी की पर्याप्त चर्चा साहित्य-जगत में हुई है और एक कृति से दूसरी कृति के बीच बीस साल का अन्तराल उनकी चुप्पी में शामिल है.
अक्सर कविताओं की किसी किताब से गुजरते हुए, कविताएं न समझ में आने के कारण पाठक पृष्ठ छोड़-छोड़कर किताब पढ़ना शुरू कर देते हैं. लेकिन इस किताब में हमें उल्टा अुनभव होता है. यहां केदार जी की कविताओं के अंश पढ़कर उनकी सारी कविताएं पढ़ने की भूख पैदा होती है. इस किताब में दर्ज उनके कुछ कवितांश मेरे शहर के लोगो / यह कितना भयानक है / कि शहर की सारी सीढ़ियां मिलकर / जिस महान ऊंचाई तक जाती हैं / वहां कोई नहीं रहताया फिर, ‘क्या कभी सोचा है आपने / वह जो आपकी कमीज़ है / किसी खेत में खिला / एक कपास का फूल है / जिसे पहन रखा है आपने’.
पूरी किताब में एक बात बार-बार उभर कर आती है कि केदार जी अपने गांव, देश और मिट्टी से इतने ज्यादा जुड़े हैं कि उनके लिए दुनिया के सबसे खूबसूरत देश और जगह के कोई मायने नहीं हैं. रामजी तिवारी लिखते हैं,‘रसूल हमजातोव के पिता ने बड़े शहर मॉस्को के मुकाबले अपने जन्म-गांवत्सादाको तरजीह दी थी. वे अपने त्सादाको प्यार करते थे और उसके मुकाबले दुनिया की सभी राजधानियों को ठुकरा सकते थे. यह दृष्टान्त सिर्फ त्सादाके हमजातके लिए ही नहीं है, वरन दुनिया के सभी बड़े और महान लेखकों के बारे में दिया जा सकता है... आप दुनिया के किसी भी महान लेखक को देखिए, वह अपनी जड़ों में गहरा धंसा नजर आएगा....केदार जीकी जिन कविताओं पर दुनिया मुग्ध रहती है, वे कविताएं उनके गांव और ज़मीन से जुड़कर ही आकार लेती हैं.
केदार जी अपनी मातृभाषा भोजपुरी और साहित्यिक भाषा हिन्दी दोनों के प्रति बेहद ईमानदार थे. वे कहते थे, ‘हिन्दी मेरा देश है / भोजपुरी मेरा घर’  
जड़ें जितनी गहरी और मजबूत होती हैं, पेड़ भी उतना ही विराट होता है; केदार जी इसका बहुत सटीक उदाहरण हैं. फिर भी महज गांव-देहात से जुड़कर या देशज शब्दों का इस्तेमाल करके कोई केदार जी की ऊंचाई नहीं छू सकता. कविता के आठ-दस संग्रहों के होने से कोई केदारनाथ सिंह नहीं बन सकता. न ही कुछ गंवईशब्दों के सहारे वह जादुई देशज बिम्ब-विधानपाया जा सकता है. उसके पीछे एक लम्बी जीवन यात्रा और संघर्ष की कहानी होती है, जो सिर्फ जी कर, भोग कर और सहन कर ही सीखी जा सकती है. यहां कविता और जीवन में उतनी ही कम फांक है, जितनी एक आदमी के तौर पर होनी चाहिए; उतनी अधिक नहीं, जितनी इस समय आमतौर पर पायी जाती है.
इस किताब के लिखे जाने की सफलता इसी बात में है कि केदार जी के बारे में लिखे गए संस्मरण, लेख या यादें पढ़कर उनसे मिलने की तीव्र इच्छा पैदा होती है. केदार जी अपनी मातृभाषा भोजपुरी और साहित्यिक भाषा हिन्दी दोनों के प्रति बेहद ईमानदार थे. वे कहते थे, ‘हिन्दी मेरा देश है / भोजपुरी मेरा घर.
अपने घर, गांव, समाज, परिवेश और मातृभाषा से बेहद प्यार के बावजूद वे शुद्ध साहित्यिक हिंदी भाषा के प्रयोग को लेकर बेहद सजग थे. प्रमोद कुमार तिवारी अपने एक अनुभव को साझा करते हुए लिखते हैं, ‘सर! मैंने ये-ये पुस्तकें पढ़ लिये हैं.छूटते ही सुनने को मिला, ‘ऐसी भाषा के साथ काम करना है, तो मेरे साथ काम नहीं कर सकते. अपनी भाषा सुधारोऔर फोन कट... वे भाषा पर कितनी मेहनत करते हैं और भाषा उनके लिए केवल माध्यम नहीं, लक्ष्य भी है... मसलन ये शब्द थोड़ा हल्का हो गया, इसकी जगह कोई और शब्द सोचो...नहीं-नहीं, ये ज्यादा भारी हो गया. हां, ये शब्द ठीक है, परन्तु थोड़ा नुकीला है.केदारनाथ जी भाषा को लेकर इतने सजग थे कि अपनी कविताओं में उन्होंने अपने भाषा ज्ञान को नहीं उड़ेला. यह उनकी कविताओं की एक बड़ी ताकत थी.
केदारनाथ सिंह की कविता और उनका व्यक्तित्व बिल्कुल अभिन्न हैं. यह दुर्लभ अभिन्नता उनकी सहज विशेषता है. किताब के ज्यादातर लेख इस बात की गवाही देते हैं कि उनके व्यक्त्वि की सादगी ही उनकी कविताओं की सादगी का मूल मंत्र है. यह किताब एक बहुत बड़े कवि की सादगी और संवेदना से पाठकों को रू-ब-रू कराने में सफल होती है. केदारनाथ सिंह के चकिया से दिल्ली पहुंचने के लंबे सफर की झलक देती हुई यह किताब उनके जीवन के विविध पक्षों से हमें परिचित कराती है.
यह किताब किसे पढ़नी चाहिए : 
1. वे जो केदारनाथ सिंह के बारे में जानना चाहते हैं.
2. उन्हें, जो जानना चाहते हैं कि कोई कवि बड़ा कैसे बनता है.


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