Thursday, 9 March 2017

प्रकृति और कविता के 'संवेत' स्वर : कत्थक प्रस्तुति - रचना यादव




प्रकृति और कविता के 'संवेत' स्वर : कत्थक प्रस्तुति - रचना यादव

रचना यादव 


वाणी फाउंडेशन और इन्द्रप्रस्थ कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय के सह-संयोजन में 3-4 मार्च 2017 को इन्द्रप्रस्थ महाविद्यालय के प्रांगण में मनाये गये दो दिवसीय ‘हिन्दी महोत्सव’ का शुभारम्भ सुप्रसिद्ध कत्थक नृत्यांगना रचना यादव की प्रस्तुति ‘संवेत’ से हुआ| रचना यादव एक ऐसी पारिवारिक पृष्ठभूमि से आती हैं जहाँ भारतीय संस्कृति के मूल्यों को हमेशा बढ़ावा दिया गया है| उनकी माता मन्नू भंडारी एवं पिता राजेन्द्र यादव हिन्दी साहित्य और लेखन के जाने-माने नाम हैं| रचना यादव भारतीय जनसंचार संस्थान, नयी दिल्ली से जनसंचार में स्नाकोत्तर है और संस्थान का ‘सिल्वर साल्वर आवर्ड’ भी प्राप्त कर चुकी हैं। 

कार्यक्रम का आरम्भ करते हुए रचना यादव ने प्रकृति और कविता के संवेत स्वर की प्रस्तुति की।
संवेत का अर्थ प्रकृति के पाँच तत्वों— 
पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश 
का समागम होना है।

ये तत्व एकमेक होकर बनाते हैं एक सम्पूर्ण जीवन, और उस जीवन की शान्ति, सन्तुष्टि और सौम्यता का पोषण भी इन्हीं तत्वों पर निर्भर है। 

रचना यादव ने भाषा को नृत्य में रूपान्तरित करके, ताल की सजीवता के साथ भाषा की हर शैली से दर्शकों का परिचय कराया। उनके नृत्य में निहित प्रत्येक पदचाप, प्रत्येक भाव-भंगिमा ने दर्शकों को आह्लादित किया। उन्होंने वेदों से लेकर आधुनिक कविता तक भाषा और कविता की यात्रा का वर्णन बड़ी बखूबी से अपने नृत्य में प्रकट किया। पंचतत्व की इस झाँकी में रचना ने सर्वप्रथम पृथ्वी की विशालता, अपनी धुरी पर उसके घुमाव, दिन-रात होने के संकेत, जीवनदायिनी पृथ्वी के माँ स्वरूप की अति-मनोरम प्रस्तुति दी। 

प्रस्तुति के पहले प्रज्वलित किया गया दीप 

इसके अगले ही पल मंच पर रचना जल बन गयी थीं। ताल के साथ हाथों के घुमाव में जल-धारा बहती-सी प्रतीत होती थी। जल-धारा ज्यों ही बह निकली कि ताल बदल गयी और बगिया वायु से मनुहार करने लगी कि “मेरा श्रृंगार पूर्ण हो चुका है, प्रियतम चले आओ !”

यह एक तत्व से दूसरे तत्व में उतर जाना रचना यादव की प्रस्तुति को बहुत खूबसूरत बना रहा था।फिर कुछ देर, बिना संगीत के, फ़ैज़अहमद फ़ैज़ की ग़ज़ल की नज़्म “तापस उदास है यारों सबा से कुछ तो कहो” की पंक्तियों पर रचना ने केवल पदचाप प्रस्तुत की। 

अग्नि तत्व की प्रस्तुति देतीं रचना यादव 

चौथे तत्व अग्नि की प्रस्तुति में तबला और ढोलक का स्वर प्रखर हो चला था। मंच पर बिखरा तेज़ प्रकाश प्रबल अग्नि की लपटों की छटा बिखेर रहे था। पदचाप द्वारा अग्नि को स्वयं में समाहित करने की क्रिया प्रस्तुति के आखिर में अन्तहीन कल्पनाओं से भी विराट, पवित्र आकाश की असीम विराटता को रचना ने अपनी पदचाप से प्रदर्शित किया। आकाश एक आधुनिक कविता है जिसे मूलतः आशुतोष दीक्षित ने अंग्रेजी में लिखा है। इस कविता का हिन्दी अनुवाद रचना यादव के पिता राजेन्द्र यादव ने किया है। 

संवेत की परिकल्पना रचना यादव ने खुद की और नृत्य संरचना उनकी गुरु अदिति मंगलदास ने की है। संगीत संरचना में उनका साथ दिया-समीउल्लाह खान, प्रकाश सज्जा—गोविन्द सिंह यादव, वेशभूषा स्वयं रचना यादव, तबले पर योगेश गंगानी, पखावज पर महावीर गंगानी, गायन-जनाब समीउल्लाह खान और सांरगी परजनाब कमाल अहमद ने उनका साथ दिया।  


पिंकी
हिन्दी  (विशेष), तृतीय वर्ष,
इन्द्रप्रस्थ कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय
 अधिकृत ब्लॉगर, हिन्दी महोत्सव’17

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