Monday, 6 March 2017

ज़बानी ज़ायका : हिन्दुस्तानी की कहानी






ज़बानी ज़ायका : हिन्दुस्तानी की कहानी


(बाएँ से) सुकृता पॉल कुमार, रक्षन्दा जलील, निष्ठा गौतम एवं सैफ़ महमूद


कैसा होता है अलग-अलग ज़बानों का स्वाद, क्या यह एक ही होता है या इसमें कोई भिन्नता भी पाई जाती है? भाषा क्या है और क्या होनी चाहिए? हम अक्सर इन सवालों के जवाब ढूंढते हैं। बहुत ही दिलचस्प होती है यह गुफ़्तगू जो ज़बानों के दरमियान ज़बान के लिए होती है। किसी की भाषा में अगर हिन्दी के शब्दों की अधिकता है तो क्या उसे हिन्दी का हिस्सा मान लेना चाहिए? या किसी बोली में उर्दू का असर हो तो उसे उर्दू का हिस्सा मान लिया जाये?

'' क्या रंगों के साथ-साथ, भाषाओं के भी मजहब होते हैं?''

ऐसे कई सवालों से सजा था हिन्दी महोत्सव का पहला सत्र- ज़बानी ज़ायका। 

सुकृता पॉल कुमार को अनेकानेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। मैन, वुमन एंड एंड्रोग्यनी, कन्वेर्सेशंस ऑन मॉडर्निज्म़ आदि उनकी प्रमुख कृतियाँ है। सुकृता पॉल कुमार नेस्त्री विमर्श पर बात करते हुए 'इनरकोर्टयार्ड’ या घर की चारदिवारी में इस्तेमाल होने वाली भाषा का जिक्र किया। इस्मत चुग़ताई के जीवन और उनकी रचना के उदाहरण लेते हुए उन्होंने कहा कि इस्मत चुग़ताई की रचनाओं का महत्व आज भी है। उनकी भाषा बेबाक और लच्छेदार है। इस्मत चुग़ताई ने बेग़मात की ज़बान को अपने लेखन में प्रस्तुत किया। इसके साथ-साथ उन्होंने कृष्णा सोबती के आदमीनामा का ज़िक्र भी किया। सुकृता का मानना था कि कृष्णा सोबती और इस्मत आपा जैसे लेखकों ने भाषाओँ की दूरियों को मिटाया है|

निष्ठा गौतम के संस्कृति, जेंडर और सैन्य विषयों से सम्बन्धित लेख राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। टेलीविजन और रेडियो के प्रमुख कार्यक्रमों में भी एक विशेषज्ञ के रूप में लगातार हिस्सा लेती रहती हैं। इस्मत आपा और कृष्णा सोबती की रचनाओं पर निष्ठा गौतम का सवाल था, “इस्मत चुग़ताई और कृष्णा सोबती के तर्जुमें में और मूल रचना में क्या कोई अन्तर होता है?

सुकृता पॉल कुमार

सुकृता पॉल कुमार ने बहुत ही खूबसूरती से जवाब देते हुए कहा, 

 हर किताब एक नई 
  हिन्दी लेकर आती है। 
   तर्जुमें और ऑरिजनल में 
   अन्तर होना स्वभाविक है|

इसके साथ ही उन्होंने कृष्णा सोबती की रचना ‘मित्रोमरजानी’का उदाहरण दिया जो अपने आप में स्त्री विमर्श और स्त्री आकांक्षाओं को व्यक्त करती है।

“हिन्दुस्तानी ज़बान को कायम रखने और उसके विकास में प्रगतिशील लेखक की क्या भूमिका हैं?”
प्रश्न पूछे जाने पर रक्षन्दा जलील नेप्रेमचन्द केप्रगतिशील लेखक संघ में 10 अप्रैल 1936 को दिए गये संबोधन को केन्द्र में लाते हुए कहा, “हमें साहित्य के उद्देश्य बदलने होंगे, सौन्दर्य की परिभाषा को बदलना होगा|जो प्रेमचन्द ने सन् 1936 में कहा,वही प्रगतिशील लेखकों का उद्देश्य था। भाषा के रूप में हिन्दुस्तानी भाषा का प्रयोग ही उनका मकसद था। ”

रक्षन्दा जलील ने जामिया मिलिया इस्लामिया में “प्रोग्रेसिव राइटर्स मूवमेंट एज रिफ्लेक्टेड इन उर्दू लिटरेचर” विषय पर डॉक्टोरेट की उपाधि प्राप्त की है। हिन्दी-उर्दू साहित्य और संस्कृति को लोकप्रिय बनाने के लिए उनका अप्रतिम योगदान है|

प्रगतिशील लेखक संघमें हिन्दी और उर्दू के बड़े-बड़े लेखकों ने मिलकर हिन्दी और उर्दू भाषा की दूरियों को कम करने का काम किया। जिसकी नींव सन् 1900 में ही पड़ गयी थी| रक्षन्दा जलील ने शिष्ट साहित्य और लोक साहित्य का पर भी बात की।

सैफ़ महमूद 

सैफ़ महमूद एक वकील हैं। उसके साथ-साथ उद्घोषक, अनुवादक और मानवाधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले एक सक्रिय कार्यकर्ता भी हैं। उन्होंने ‘दिल की हिकायतें’ नामक एक संकलन का सम्पादन भी किया है। उन्होंने अपनी बात कुछ यूँ शुरू की,

नफरतों की जंग में
 क्या-क्या हो गया
   सब्जियाँ हिन्दू हो गयीं, 
   बकरा मुस्लमाँ हो गया।

सैफ़ का मानना था कि हिन्दुस्तान में बड़ा होने वाला हर शख्स, खासकर उत्तर भारत में, हिन्दी और उर्दू दोनों से एक जैसा परिचित होता है| पर ज़बानों की सियासत में भाषाओँ के साहित्य का भी वर्गीकरण हो गया। 

सैफ़ का कहना था, “अक्सर यह फरमाया जाता है कि उर्दू इश्क़ और मोहब्बत की भाषा है पर ये नहीं भूलना चाहिए कि उर्दू में शायरी के साथ साथ नज़म भी है जो ज़िन्दगी की हक़ीक़तों से रू-ब-रू कराती है,जिनमें अनेक शायर आते हैं- फैज़, साहिर लुधयानवी, ग़ालिब, आदि।”

सैफ़ का मानना था कि हम जो भाषा बोलते हैं ना वो शुद्ध हिन्दी है ना उर्दू। आज भी अदालतों में उन्हीं शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है जो गंगा-जमुनी संस्कृति की देन है। जैसे—हुजूर, जनाब, मौका-ए-वारदात।

अन्त में सैफ़ ने अपनी बात समाप्त करते हुए कहा कि जिस ‘हिन्दोस्तानी’ जुबां का सदका भारतीय संविधान तक करता है, उसे यूँ उर्दू और हिन्दी में बाँट देना चंद सियासतदारों के हाथ में नहीं है।”


मुशर्रत प्रवीन
हिन्दी (विशेष), तृतीय वर्ष
इन्द्रप्रस्थ कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय
अधिकृत ब्लॉगर, हिन्दी महोत्सव 2017


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