Thursday, 2 March 2017

हिंदी महोत्सव'17 के वक्तागण





हिंदी महोत्सव'17 के वक्तागण 


रक्षंदा जलील ने दिल्ली पब्लिक स्कूल से पढ़ाई करने के बाद मिरांडा हाउस (दिल्ली विश्वविद्यालय) से अग्रेज़ी साहित्य में स्नातक किया है। उन्होंने जामिया मिल्लिया इस्लामिया के थर्ड वर्ल्ड स्टडीज से ‘प्रोग्रेसिव राइटर्स मूवमेंट एज रिफ्लेक्टेड इन उर्दू लिटरेचर’ विषय पर डॉक्टोरेट की उपाधि प्राप्त की है। एक ख्याति प्राप्त आलोचक और साहित्य-इतिहासकार के रूप में रक्षंदा जलील के अब तक दो सम्पादित कहानी-संकलन, दिल्ली के अल्पज्ञात स्मारकों पर एक निबन्ध पुस्तक, एक स्त्रीवादी रचनाकार की जीवनी और अनुवाद पर आठ से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। वे हिन्दी-उर्दू साहित्य और संस्कृति को लोकप्रिय बनाने के लिए ‘हिन्दुस्तानी आवाज़’ नाम की संस्था और दो ब्लॉगों का भी संचालन करती हैं।

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रविन्दर सिंह भारत के एक बेस्टसेलर लेखक हैं। इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस, हैदराबाद के पूर्व-छात्र रहे रविन्दर माइक्रोसॉफ्ट में सीनियर प्रोग्राम मैनेजर के रूप में अपने 8 साल लम्बे आई टी करियर को छोड़कर एक पूर्णकालिक लेखक बन गए हैं। ‘आई हैड टू ए लव स्टोरी’ उनकी बेस्टसेलर किताब है जो उनकी ज़िन्दगी की सच्ची घटनाओं पर आधारित है। यह किताब कन्नड़ में भी प्रकाशित हो चुकी है। ‘कैन लव हैपेन ट्वाइस,’ ‘लव स्टोरीज दैट टच माय हार्ट,’ ‘लाइक इट हैपेंड यस्टरडे,’ ‘योर ड्रीम्स आर माइन नाउ,’ ‘टेल मी ए स्टोरी’ और ‘दिस लव दैट फील्स राईट’ उनकी अन्य कृतियाँ हैं। उन्होंने ब्लैक इंक नाम से एक प्रकाशन गृह भी शुरू किया है जिसके तहत वे नए लेखकों की पहली कृतियाँ प्रकाशित करते हैं

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ऋचा अनिरुद्ध हमारे समय की एक बेहद प्रतिभाशाली पत्रकार हैं। वे ख़ास तौर पर IBN7 की प्राइम टाइम प्रस्तुति के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने IBN7 पर ‘ज़िन्दगी लाइव’ कार्यक्रम का भी संचालन किया है। पत्रकारिता के अलावा उनकी अकादमिक पृष्ठभूमि भी काफी ठोस रही है। उन्होंने दूरदर्शन से अपना व्यावसायिक करियर शुरू किया और बाद में IBN7 से प्राइम टाइम कार्यक्रम की प्रस्तोता के रूप में जुड़ गईं।

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सैफ़ महमूद दिल्ली में रहते हैं और पेशे से वकील हैं। वे एक साहित्य मर्मज्ञ, उद्घोषक और अनुवादक तो ही हैं, मानवाधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले एक सक्रिय कार्यकर्ता भी हैं। वे साउथ एशियन अलाइंस फॉर लिटरेचर, आर्ट एंड कल्चर (SAALARC) के संस्थापक हैं। उर्दू में उपलब्ध उनके विपुल लेखन के अंग्रेज़ी अनुवाद हो चुके हैं जिन्हें विभिन्न प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित भी किया गया है। पूर्व में उन्होंने अपने पिता ताहिर महमूद के उर्दू तहरीर ‘दिल की हिकायतें’ नामक एक संकलन का सम्पादन किया है।
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प्रतिरोध का सिनेमाके राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी की पढ़ाई इलाहाबाद विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और जामिया मिल्लिया इस्लामिया से हुई। पिछले बारह वर्षों से वे हिन्दुस्तानी दस्तावेज़ी सिनेमा और महत्त्वपूर्ण नए सिने प्रयासों को आम दर्शकों के बीच लोकप्रिय बनाने की मुहिम में अपने साथियों के साथ जुटे हैं। गोरखपुर, इलाहाबाद, लखनऊ, भिलाई, पटना, नैनीताल, आजमगढ़, बलिया, देवरिया, उदयपुर, कोलकाता, हैदराबाद, रामनगर आदि शहरों में प्रतिरोध का सिनेमाअभियान व फ़िल्म सोसायटी आंदोलन की शुरुआत कराने में उनकी प्रमुख भूमिका रही है। संजय जोशी ने अमरकान्त,’ ‘टके सेर भाजी टके सेर खाजा,’ ‘सवाल की जरूरत,’ ‘कॉमरेड जिया उल हक़ जैसी डॉक्यूमेंट्री फ़िल्मों व पहाड़पुर के बच्चेनामक टेलीविजन धारावाहिक कथा का निर्देशन भी किया है। संजय जोशी प्रतिरोध के सिनेमाऔर जन संस्कृति मंचके पूर्णकालिक कार्यकर्त्ता हैं और नवारुण प्रकाशन का भी संचालन करते हैं।

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सरला महेश्वरी का जन्म दिल्ली में एक गुजराती परिवार में हुआ। इन्होंने हिन्दी से एम. ए. और पीएच. डी. की उपाधियाँ प्राप्त की हैं। 1979 से 1984 तक वे दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कॉलेज में प्राध्यापिका रही हैं। 1975 में वे दूरदर्शन में बच्चों से सम्बन्धित एक कार्यक्रम की प्रस्तुति से टीवी से जुडीं, पहले बच्चों के लिए स्क्रिप्ट लेखन और बाद में अनेक प्रस्तुतियाँ दीं। पाँच साल तक दूरदर्शन में अनाउंसर रहने के बाद जनवरी 1982 से दूरदर्शन पर समाचार वाचन शुरू किया। विवाहोपरान्त इंग्लैंड गईं और वहाँ बीबीसी से जुड़ीं। बीबीसी एक्सटर्नल सर्विसेस (लन्दन) और बीबीसी टीवी (बर्मिंघम) में अपनी सेवाएँ दीं। 1986 में भारत वापस लौटीं और दूरदर्शन पर दुबारा समाचार वाचन शुरू किया। उन्होंने डॉक्यूमेंट्री फ़िल्मों के लिए विकलांग, अनाथ और झोंपड़ी में रहने वाले बच्चों के अनेक इंटरव्यू लिए हैं और कई विशिष्ट अवसरों पर राष्ट्रपति भवन, विज्ञान भवन, लाल किला, राजपथ, नेशनल स्टेडिम और लन्दन के एल्बर्ट हाल में मंच संचालन भी किया है।  

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सविता सिंह इग्नू के स्कूल ऑफ जेंडर एंड डेवलपमेंट स्टडीज में प्रोफेसर हैं। उन्होंने 2009 से इस स्कूल में सेवाएँ आरम्भ कीं और इसकी पहली निदेशक बनीं। वे यहाँ जेंडर स्टडीज में एम.फिल. और पीएच.डी. पाठ्यक्रमों का समन्वयन करती हैं। एक संस्थापक निदेशक के तौर पर उन्होंने जेंडर और विकास अध्ययन के क्षेत्र में नयी दृष्टियों का विकास किया है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से एम.ए और एम.फिल की उपाधि प्राप्त की और मैकगिल विश्वविद्यालय, मोंट्रेल से उच्च शिक्षा प्राप्त की जहाँ उन्होंने प्रो. चार्ल्स टेलर, जेम्स टुली और सैम नौमोफ के शोध सहयोगी के रूप में तीन वर्ष तक राजनीतिक सिद्धान्त का अध्यापन किया। बाद में दिल्ली विश्वविद्यालय से ‘डिस्कोर्स ऑफ़ मॉडर्निटी इन इंडिया : ए हरमेन्युटिकल स्टडी’ पर पीएच. डी. की उपाधि प्राप्त की। सविता सिंह राजनीतिक चिन्तन के अलावा कविता की विधा में भी निरन्तर लेखन करती हैं। ‘अपने जैसा जीवन’ और ‘स्वप्न समय’ उनके चर्चित कविता संग्रह हैं।

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इलेक्ट्रानिकी एवं संचारिकी में बी. टेक. शैलेश भरतवासी अपने आप को हिंदी काएकमात्र पूर्णकालिक ब्लॉगर कहना पसन्द करते हैं। 2007 में जब उन्होंने ब्लॉगिंग कीदुनिया में कदम रखा तो उस वक्त ऐसी कोई धारणा नहीं थी कि हिंदी ब्लॉगिंग को वे पूर्णकालिक प्रोफ़ेशन का रूप दे सकेंगे। शैलेश भरतवासी ने अपने ब्लॉगिंग प्रकल्प हिंद-युग्म’ के जरिए हिंदी ब्लॉगिंग को एक तरह से री-डिफ़ाइन किया है और ऐसी तमाम संभावनाएँ न केवल तलाशी हैं, बल्कि उसके कमर्शियल वायेबिलिटी की ओर भी पुख्ता कदम रखे हैं। ‘हिन्द युग्म’ के बैनर तले तमाम नायाब और बड़े काम हुए हैं और आगे बहुत सी नई योजनाएँ पाइपलाइन में हैं। हिंदी ब्लॉगिंग के उज्जवल भविष्य के प्रति शैलेश भरतवासी पूरी तरह आश्वस्त हैं और बताते हैं कि आने वाले समय में और भी बहुत से पूर्णकालिक ब्लॉगर आएँगे जो हिन्दी ब्लॉगिंग के जरिए अपनी आजीविका का साधनउपलब्ध कर सकेंगे।



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श्यौराज सिंह बेचैन हिन्दी के शीर्षस्थ दलित लेखक और चिन्तक हैं। इन्होंने हिन्दी साहित्य से एम.ए., पीएच.डी और डी.लिट्. की उपाधियाँ प्राप्त की हैं। अबतक इनकी लगभग बीस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें ‘मेरा बचपन मेरे कन्धों पर’ (आत्मकथा) सर्वाधिक चर्चित है। ‘तहलका’ पत्रिका में 35 किश्तों में इस कृति का अंग्रेज़ी अनुवाद प्रकाशित हो चुका है। इसके अलावा पंजाबी, जर्मन, मराठी, उर्दू, मलयालम और कन्नड़ में भी इसके अनुवाद जारी हैं। लेखक के तीन कविता-संग्रह, एक शोध-प्रबन्ध तथा दलित और स्त्री-विमर्श पर कुल 15 (लिखित और सम्पादित) पुस्तकें प्रकाशित हैं। इन्होंने फ्रांस, दक्षिण अफ्रीका, सूरीनाम, कनाडा, हॉलैंड और ग्रेट ब्रिटेन की साहित्यिक-सांस्कृतिक यात्राएँ की हैं। साहित्य में उल्लेखनीय योगदान के लिए इन्हें सुब्रह्मण्यम भारती सम्मान, साहित्य भूषण सम्मान तथा स्वामी अछूतानन्द अति विशिष्ट सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। ये भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (शिमला) के पूर्व अध्येता रहे हैं और वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं।

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स्मिता परिख आकाशवाणी में उद्धघोषिका, अभिनेत्री, और मइप्र्र एंटरटेनमेंट की मुख्य प्रबन्धक स्मिता परिख ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा मध्य प्रदेश के इन्दौर शहर में की, कॉमर्स में स्नातकोत्तर की डिग्री राजस्थान के उदयपुर शहर में हासिल की। बचपन से ही कविताएँ और कहानियाँ लिखने की शौकीन स्मिता को कक्षा 11 वीं में मात्रा 15 वर्ष की उम्र में राजस्थान साहित्य अकादेमी से कहानी लेखन के लिए युवा साहित्यकार पुरस्कार प्राप्त हुआ, उसी साल महाराणा मेवाड़ फाउंडेशन से कविता लेखन के लिए, पुरस्कार प्रदान किया गया। आकाशवाणी उदयपुर और फिर आकाशवाणी मुम्बई से जुड़ाव रहा और स्मिता ने एफएम चैनल पर कई सफल कार्यक्रमों का संचालन किया, ‘अपने मेरे अपनेऔर जाएँ कहाँजैसे प्रसिद्ध टेलीविज़न कार्यक्रमों में मुख्य भूमिकाएँ निभायीं। दूरदर्शन के नैशनल चैनल पर कई सफल कार्यक्रमों जैसे -बायस्कोप’, ‘सिने सतरंगी’, ‘डीडी टॉप 10’ का संचालन किया। संगीत जगत के सभी दिग्गजों के साथ विश्व भर में भ्रमण किया और संचालन किया। मुम्बई में इनकी मइप्र्र एंटरटेनमेंट के नाम से एक कम्पनी है जो देश-विदेश में इवेंट्स करती है। मुम्बई का प्रसिद्ध साहित्यिक सम्मेलन -लिट्-ओ- फेस्ट मुम्बई का सम्पूर्ण निर्देशन स्मिता करती हैं। ये इस महोत्सव की प्रबन्धक हैं। देश भर से इस सम्मेलन में नामी साहित्यकार हिस्सा लेते हैं। हिन्दी भाषा को अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर लाने का ये एक अभियान है। मैं पन्थ निहारूँ...स्मिता का पहला कविता संग्रह है जो 2014 में प्रकाशित हुआ। नज़्मे इन्तजशर कीं...उन चुनी हुई नज़्मों का संकलन है... जिनमें प्रेम, क्षृंगार इन्त्ज़ार की सम्मिलित भावनाएँ देखी जा सकती हैं। स्मिता परिख ने हमेशा प्रेम की विभिन्न भावनाओं पर लिखा है, ये नज़्मों की किताब उसका एक अनूठा उदाहरण है

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हिंदी महोत्सव'17 के वक्तागण



हिंदी महोत्सव'17 के वक्तागण 



निष्ठा गौतम दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में अंग्रेज़ी साहित्य पढ़ाती हैं और एशिया की विख्यात विचार मंडली ‘आब्जर्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन’ से सम्बद्ध हैं। संस्कृति, जेंडर और सैन्य विषयों से सम्बन्धित उनके लेख ‘वाल स्ट्रीट जर्नल,’ ‘डेली मेल,’ ‘द कैरवान,’ ‘इंडिया टुडे,’ ‘हिन्दुस्तान टाइम्स,’ ‘द पायनियर’ और ‘डीएनए’ जैसी प्रतिष्ठित राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होते रहते हैं। टेलीविजन और रेडियो के प्रमुख कार्यक्रमों में भी वे एक विशेषज्ञ के रूप में लगातार हिस्सा लेती रहती हैं।

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निज़ामी बंधु उस्ताद चन्द निज़ामी, शादाब फरीदी निज़ामी और शोराब फरीदी निज़ामी का एक विख्यात कव्वाली समूह है। निज़ामी बंधुओं के पास इस हुनर की सात शताब्दी लम्बी और समृद्ध विरासत है। प्रतिष्ठित सिकंदर घराना से सम्बन्धित निज़ामी बंधु हज़रत निजामुद्दीन औलिया के दरगाह पर अमीर ख़ुसरो की लिखी कव्वाली की प्रस्तुति करते हैं। उन्होंने अनेक प्रतिष्ठित मंचों और महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक कार्यक्रमों में शिरकत की है। 2003 में नई दिल्ली में ‘जहाँ-ए-ख़ुसरो’ में उनकी प्रस्तुति यादगार रही। इसके अलावा उन्होंने क़ुतुब फेस्टिवल (नई दिल्ली), विरासत फेस्टिवल (देहरादून), उद्यान म्यूजिक फेस्टिवल (मुम्बई), आई टी सी संगीत रिसर्च एकेडमी (कोलकाता), स्पिक मैके (भारत के विभिन्न जगहों में) और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मेला (नई दिल्ली) में बेहतरीन और यादगार प्रस्तुतियाँ की हैं। उन्होंने अमेरिका, फ्रांस, कनाडा, जर्मनी, इंग्लैंड, ईरान, वेस्ट इंडीज, तंजानिया और मोरक्को आदि देशों में भी खूब नाम कमाया है। 2011 की सुपरहिट फ़िल्म ‘रॉकस्टार’ में इनकी कव्वाली प्रस्तुति को फ़िल्म के एक अभिन्न हिस्से के रूप में दिखाया गया। निजामी बंधु अपनी प्रस्तुतियों से न केवल कला के इस माध्यम की खूबियों को जाहिर करते हैं, बल्कि ख़ुदा के पाक संदेश को भी पूरी दुनिया में फैलाते हैं।

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ओम थानवी साहित्य, कला, सिनेमा, रंगमंच, पुरातत्त्व और पर्यावरण में गहरी रुचि रखते हैं। देश-विदेश में भ्रमण कर चुके हैं। बहुचर्चित यात्रा-वृत्तान्त मुअनजोदाड़ो के लेखक हैं। अपने अपने अज्ञेय पुस्तक का मूलत: उद्देश्य सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' को श्रद्धांजलि अर्पित करना है। अज्ञेय के साथ ओम थानवी के पारिवारिक सम्बन्ध भी रहे हैं, थानवी जी अज्ञेय से मिलते रहते थे। एक लगाव से वह अज्ञेय को कितना समझ पाए और अज्ञेय के बारे में कितना संकलन कर पाए। इन्होंने इसका सही रूप 'अपने अपने अज्ञेय' पुस्तक के माध्यम से प्रस्तुत किया है!

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बिहार के मुंगेर जिले में जन्मे और पले-बढ़े प्रचण्ड प्रवीर ने 2005 में भारतीय प्रौद्यौगिकी संस्थान, दिल्ली से रासायनिक अभियान्त्रिकी में स्नातक की उपाधि प्राप्त की है। 2010 में हार्पर हिन्दी से प्रकाशित इनके पहले उपन्यास ‘अल्पाहारी गृहत्यागी : आई आई टी से पहले’ ने कई युवा हिन्दी लेखकों को प्रेरित किया। 2016 में प्रकाशित इनकी दूसरी पुस्तक ‘अभिनव सिनेमा : रस सिद्धान्त के आलोक में विश्व सिनेमा का परिचय’ हिन्दी के वरिष्ठ आलोचकों द्वारा काफी सराही गई। प्रचण्ड प्रवीर वर्तमान में गुड़गाँव (हरियाणा) में एक रिस्क मैनेजमेंट फर्म में काम कर रहे हैं।

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प्रतीक्षा पांडे का परिचय ख़ास उन्हीं के अंदाज़ में कुछ यों है : “सिमिट्री डिसऑर्डर हैचिप्स का पैकेट गलत तरीके से फाड़ दो तो बुरे गाने सुनाकर ‘डिवाइन रिवेंज’ लेती हैकॉन्वेंट से पढ़ी है और कनपुरिया हैजन्नेटर जैसी हँसीटीम की इंगलिस पिचर है जब भी बड़ी होगी तो कवियत्री बनेगी सुअर की आवाज निकालती है क्यूट फेस बनाकरएक हाथ पर कौआ और दूजे पर मछली बनवा रखी है थोड़ी सिलबिल्ली हैं और पूरी ठस लड़कियों को लेकर कोई हलकी बात कहे तो मौके पर ही पेल देती हैंस्कार्फ और सर्फिंगदोनों से प्यार है।” 
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प्रतिष्ठा सिंह ने कुछ समय तक लोकसभा सचिवालय में इन्टर्नशिप की है और इटैलियन भाषा में अध्ययन और शोध कार्य किया है। वे दिल्ली विश्वविद्यालय में यू. टी. ए. रह चुकी हैं और वहाँ इटैलियन पढ़ाती भी हैं। लेखन में और देश-दुनिया के भ्रमण में खूब रुचि है और जब कभी समय मिलता है, कविताएँ और कहानियाँ लिखती हैं। वाणी प्रकाशन से हाल ही में आई उनकी पुस्तक ‘वोटर माता की जय!’ इन दिनों बहुत तेजी से चर्चित हो रही है। यह पुस्तक बिहार के चुनाव में महिलाओं की भागीदारी का प्रामाणिक दस्तावेज़ प्रस्तुत करती है।
 
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प्रियदर्शन की गिनती उन दुर्लभ मीडियाकर्मियों में होती है जिन्होंने मीडिया को केवल यश कमाने का जरिया न बनाकर उसे व्यावहारिक स्तर पर सोचने-समझने का एक लोकतान्त्रिक स्पेस दिया है। किसी ख़ास पेशे में रहते हुए भी अपने व्यापक सरोकारों के चलते वे निरन्तर एक संस्कृतिकर्मी की सक्रिय भूमिका में आते रहे हैं। प्रियदर्शन जी का साहित्य से भी बहुत गहरा लगाव है और वे लम्बे अरसे से साहित्य, समाज, सिनेमा तथा मीडिया पर लगातार लिख रहे हैं। वाणी प्रकाशन से प्रकाशित ‘ग्लोबल समय में गद्य,’ ‘ग्लोबल समय में कविता’ और ‘नये दौर का नया सिनेमा’ जैसी पुस्तकों में उनके अध्ययन के बहुआयामी पहलुओं को देखा जा सकता है। अब तक उनके दो कविता संग्रह और दो कहानी संग्रहों के अलावा आलोचना की चार पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्होंने कई विश्वप्रसिद्ध कालजयी कृतियों का अनुवाद भी किया है। ‘उसके हिस्से का जादू’ कहानी संग्रह के लिए उन्हें वर्ष 2009 का स्पंदन सम्मान मिल चुका है और वाणी प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक ‘नये दौर का नया सिनेमा’ को नवम्बर 2016 में मुम्बई के मामी फिल्म समारोह में हिन्दी के लिए ‘राइटिंग इन एक्सिलेंस स्पेशल मेंशन’ में शामिल किया गया है।

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पुष्पेश पन्त ने अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध, भारतीय विदेश नीति, संस्कृति, धर्म, यात्रा और भारतीय व्यंजनों पर लगभग 50 पुस्तकों का लेखन किया है। उनकी पुस्तक ‘इंडिया : कुक बुक’ को न्यूयॉर्क टाइम्स की ओर से वर्ष 2010 का बेस्टसेलर घोषित किया गया है। पुष्पेश पन्त अंग्रेज़ी और हिन्दी अखबारों में नियमित स्तम्भ लिखते हैं और रेडियो और टेलीविजन पर लगातार चर्चा-परिचर्चा में भाग लेते रहे हैं। उन्होंने डिस्कवरी और बीबीसी जैसे चैनल के कार्यक्रमों में शिरकत की है एवं मध्य प्रदेश और उत्तर-पूर्वी राज्यों के जनजातीय जीवन पर डॉक्यूमेंट्री का निर्माण भी किया है।
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रचना यादव एक ऐसी पारिवारिक पृष्ठभूमि से आती हैं जहाँ भारतीय संस्कृति के मूल्यों को हमेशा बढ़ावा दिया जाता रहा है। वे भारतीय जन संचार संस्थान, नई दिल्ली से जन संचार में स्नातकोत्तर हैं और संस्थान का ‘सिल्वर साल्वर अवार्ड’ भी प्राप्त कर चुकी हैं। इसके अलावा उन्होंने प्रयाग संगीत समिति, इलाहाबाद से कत्थक में ‘प्रभाकर’ का प्रशिक्षण प्राप्त किया है। रवि जैन के निर्देशन में उन्होंने नृत्याभ्यास शुरू किया और बाद में दृष्टिकोण डांस फाउंडेशन, अदिति मंगलदास डांस कंपनी से जुड़कर अपना प्रशिक्षण जारी रखा। आगे चलकर पं. जयकिशन महाराज के निर्देशन में नृत्य में उच्चतर प्रशिक्षण जारी रखा। रचना यादव ने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई सांस्कृतिक समारोहों में शिरकत की है और भारत के कई शहरों में एकल नृत्य प्रस्तुति भी दी है। वे अपनी संस्था ‘रचना यादव कत्थक स्टूडियो’ के माध्यम से 60 छात्रों को प्रशिक्षण देती हैं और ‘हम कदम’ नाम से एक वार्षिक आयोजन भी करती हैं जिसमें नयी प्रतिभाओं को एक मंच प्रदान किया जाता है।

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राहुल देव CNEB न्यूज चैनल के प्रधान सम्पादक और सी ई ओ हैं। उन्हें जनसत्ता, आजतक, जी न्यूज, दूरदर्शन तथा जनमत न्यूज जैसे प्रतिष्ठित समाचार माध्यमों में वरिष्ठ पदों पर काम करने का लगभग चार दशकों का लम्बा अनुभव प्राप्त है। वे मंगलायत विश्वविद्यालय के पत्रकारिता और जन संचार विभाग से एक फैकल्टी के रूप में भी जुड़े हैं। अकादमिक जगत के अपने अन्य सहयोगियों के साथ राहुल देव का भी यह विश्वास है कि वे अपने सुदीर्घ अनुभवों के आधार पर अकादमिक क्षेत्र में व्याप्त व्यवहारिक समस्याओं को दूर कर इस क्षेत्र को और भी समृद्ध बना सकते हैं।

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हिंदी महोत्सव'17 के वक्तागण




हिंदी महोत्सव'17 के वक्तागण 


1959 में दिल्ली में जन्मी गगन गिल मूलतः पत्रकार रही हैं हालाँकि आगे चलकर वे पत्रकारिता की जगह कविता में अधिक सक्रिय हो गयीं। ‘एक दिन लौटेगी लड़की,’ ‘अँधेरे में बुद्ध,’ ‘यह आकांक्षा समय नहीं’ और ‘थपक थपक दिल थपक थपक’ उनके प्रमुख कविता संग्रह हैं। उनकी अधिकांश कृतियों में बुद्ध की करुणा और उनके सत्यों को बिम्ब-प्रतिबिम्ब के रूप में रचा गया है। गगन गिल एक सफल अनुवादक भी हैं और अबतक उन्होंने 10 पुस्तकों का अनुवाद किया है। स्वयं उनकी कृतियों के भी अनेक भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित हो चुके हैं। कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर आधारित बेजोड़ गद्य कृति ‘अवाक्’ ने पाठकों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें अब तक द्विजदेव सम्मान, भारत भूषण अग्रवाल सम्मान, संस्कृति पुरस्कार और केदार सम्मान प्राप्त हो चुके हैं।

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गीताश्री का जन्म मुजफ्फरपुर ( बिहार ) में हुआ । सर्वश्रेष्ठ हिन्दी पत्रकार ( वर्ष 2008-2009) के लिए रामनाथ गोयनका पुरस्कार से सम्मानित वरिष्ठ पत्रकार गीताश्री पत्रकारिता के साथ-साथ साहित्य की दुनिया में सक्रिय हैं । सम्प्रति : आउटलुक (हिन्दी ) दिल्ली में सहायक संपादक!


इरा पांडे एक ख्याति प्राप्त सम्पादक हैं जो ‘सेमिनार,’ ‘बिब्लियो,’ ‘डॉर्लिंग किन्डर्सले’ और ‘रोली बुक्स’ से जुड़ी रही हैं इस समय वे आई. आई. सी. के सभी प्रकाशनों की प्रधान सम्पादक हैंउन्होंने ‘दीदी : माई मदर्स व्याइस’ पुस्तक का लेखन किया है और हाल में ही प्रसिद्ध साहित्यकार शिवानी की कृति ‘अपराधिनी’ का अनुवाद भी किया है

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लीलाधर मंडलोई जन्म: जन्माष्टमी। सही तिथि व साल अज्ञात। शिक्षा: बी.ए. बीएड. (अँग्रेज़ी) पत्रकारिता में स्नातक। एम.ए. (हिन्दी)। प्रसारण में उच्च-शिक्षा सी.आर.टी., लन्दन से। पदभार: दूरदर्शन, आकाशवाणी के महानिदेशक सहित कई राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय समितियों के साथ ही प्रसार भारती बोर्ड के सदस्य। कृतियाँ: घर-घर घूमा, रात बिरात, मगर एक आवाज़, काल बांका तिरछा, क्षमायाचना, लिखे में दुक्ख, एक बहुत कोमल तान, महज शरीर नहीं पहन रखा था उसने, उपस्थित है समुद्र (हिन्दी व रूसी में) (कविता-संग्रह); देखा-अदेखा, कवि ने कहा, हत्यारे उतर चुके हैं क्षीर सागर में, प्रतिनिधि कविताएँ, 21वीं सदी के लिए पचास कविताएँ (कविता चयन); कविता का तिर्यक (आलोचना); अर्थजल, दिल का किस्सा (निबन्ध); दाना-पानी, दिनन दिनन के फेर (डायरी); काला पानी (यात्रा-वृत्तान्त); बुन्देली लोकगीतों की किताब, अन्दमान निकोबार की लोककथाओं की दो किताबें; पेड़ भी चलते हैं, चाँद का धब्बा (बाल साहित्य)। सम्पादन: केदारनाथ सिंह संचयन, कविता के सौ बरस, स्त्री मुक्ति का स्वप्न, कवि एकादश, रचना समय, समय की कविता आदि। अनुवाद: पानियों पे नाम (शकेब जलाली की गज़्लो का लिप्यन्तरण मंजूर एहतेशाम के साथ)। माँ की मीठी आवाज़ (अनातोली पारपरा की रूसी कविताएँ, अनिल जनविजय के साथ)। फिल्म: कई रचनाकारों पर डाक्यूमेंट्री निर्माण, निर्देशन तथा पटकथा लेखन। कुछ धारावाहिकों में कार्यकारी निर्माता तथा संगीत व साहित्य के ऑडियो-वीडियो सीडी, वीसीडी के निर्माण में सक्रिय भूमिका। सम्प्रति: निदेशक, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली और साहित्यिक पत्रिका नया ज्ञानोदयके सम्पादक।
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जन्म : 30 नवम्बर, 1944, अलीगढ़ जि़ले के सिकुर्रा गाँव में। आरम्भिक जीवन : जि़ला झाँसी के खिल्ली गाँव में। शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी साहित्य), बुंदेलखंड कॉलेज, झाँसी। कृतियाँ : चिन्हार, गोमा हँसती है, ललमुनिया तथा अन्य कहानियाँ, पियरी का सपना, प्रतिनिधि कहानियाँ, समग्र कहानियाँ (कहानी-संग्रह); बेतवा बहती रही, इदन्नमम, चाक, झूला नट, अल्मा कबूतरी, अगनपाखी, विजन, कही ईसुरी फाग, त्रिया हठ, गुनाह-बेगुनाह, फ़रिश्ते निकले (उपन्यास); कस्तूरी कुंडल बसै, गुड़िया भीतर गुड़िया (आत्मकथा); खुली खिड़कियाँ, सुनो मालिक सुनो, चर्चा हमारा, आवाज़, तब्दील निगाहें (स्त्री विमर्श); फाइटर की डायरी (रिपोर्ताज)। फैसला कहानी पर टेलीफिल्म वसुमती की चिट्ठी। प्रमुख सम्मान : सार्क लिट्रेरी अवार्ड, 'द हंगर प्रोजेक्ट’ (पंचायती राज) का सरोजिनी नायडू पुरस्कार, मंगला प्रसाद पारितोषिक, प्रेमचन्द सम्मान, हिन्दी अकादमी का साहित्यकार सम्मान, मध्यप्रदेश साहित्य परिषद का वीरसिंह जूदेव पुरस्कार, कथाक्रम सम्मान, शाश्वती सम्मान एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का महात्मा गांधी सम्मान। सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन और सामाजिक मुद्दों पर सक्रिय हस्तक्षेप।

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मंगलेश डबराल विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लम्बे समय तक काम करने के बाद वे तीन वर्ष तक नेशनल बुक ट्रस्ट के सलाहकार रहे। अब तक उनके पाँच कविता संग्रह, तीन गद्य संग्रह और साक्षात्कारों की एक पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है। उन्होंने अनेक शीर्ष विदेशी कवियों की कविताओं का अंग्रेज़ी से अनुवाद किया है तथा अनेक विशिष्ट साहित्यकारों पर केन्द्रित वृत्तचित्रों के लिए पटकथा लेखन भी किया है। वे निरन्तर समाज, संगीत, सिनेमा और कला पर समीक्षात्मक लेखन करते रहे हैं। लगभग सभी भारतीय भाषाओं के अलावा 12 विदेशी भाषाओं की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताओं के अनुवाद प्रकाशित हो चुके हैं। उनके कविता संग्रह ‘आवाज़ भी एक जगह है’ का इतालवी अनुवाद और ‘दिस नंबर डज नॉट एग्ज़िस्ट’ नाम से अंग्रेज़ी में अनुवादित एक पुस्तक प्रकाशित हो चुका है। उन्हें ओमप्रकाश स्मृति सम्मान, शमशेर सम्मान, पहल सम्मान, साहित्य अकादेमी सम्मान, हिंदी अकादेमी (दिल्ली) का साहित्यकार सम्मान और कुमार विकल स्मृति सम्मान जैसे महत्त्वपूर्ण सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। जन संस्कृति मंच से जुड़े मंगलेश डबराल आजीविका हेतु पत्रकारिता से सम्बद्ध हैं।
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मनीषा तनेजा दिल्ली विश्वविद्यालय में स्पेनिश की अध्यापिका हैं। इन्होंने एम.ए. और एम. फिल. की शिक्षा प्राप्त की है और अनुवाद अध्ययन में शोध किया है। प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों में उनके अनेक शोध लेख प्रकाशित हो चुके हैं। उन्होंने पाब्लो नेरूदा की कृति का हिन्दी अनुवाद ‘हाँ मैंने ज़िन्दगी जी है’ नाम से और अन्ना लोंगिनी की कृति का अंग्रेज़ी अनुवाद ‘द सिलहौटे : ऑन द बॉर्डर बिटवीन आर्ट एंड पॉलिटिक्स’ नाम से किया है। दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रो. विभा मौर्या के साथ उन्होंने ‘अ व्यू ऑफ द 1857 रिवोल्ट इन स्पेनिश प्रेस’ विषय पर शोध आलेख की प्रस्तुति भी की है।

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मीरा जौहरी हिन्दी की प्रकाशन संस्था राजपाल एंड संस की मुख्य साझीदार हैं। उन्होंने फैकल्टी ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज (दिल्ली विश्वविद्यालय) से एम.बी.ए. करने के बाद प्रमुख कम्पनियों में मार्केटिंग कंसल्टेंट के रूप में अपने करियर की शुरुआत की। पिछले 20 वर्षों से राजपाल एंड संस से जुड़ी रहकर उन्होंने बहुभाषीय शब्दकोशों की एक पूरी शृंखला तैयार करवाई है जिनमें आज देश भर में सबसे अधिक बिकने वाले शब्दकोश शामिल हैं। उन्होंने हिन्दी प्रकाशन के सीमित दायरे को बढ़ाते हुए अंग्रेज़ी में भी उल्लेखनीय प्रकाशन किया और एक ऐसी व्यवस्था विकसित की जिसके तहत भारत के क्षेत्रीय प्रकाशकों के साथ-साथ विदेशों में भी पुस्तकों के भाषा अधिकार बेचे जा सकें। देश और दुनिया के ख्याति प्राप्त लेखकों की कृतियों को सुलभ बनाने के लिए उन्होंने एक बेहद सक्रिय अनुवाद प्रकाशन कार्यक्रम की नींव रखी है।
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नीलिमा पेशे से शिक्षिका हैं और फ़िलवक़्त दिल्ली विश्वविद्यालय के ज़ाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज (सान्ध्य) में एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं। वे एक माँ, बेटी, पत्नी, दोस्त और लेखिका जैसी बेहद व्यवस्थित भूमिकाओं में भी हैं। गुत्थी ये है कि वे बोहेमियन, हिप्पी, बाइक गैंग की सरगना, स्लट-नेत्री क्यों नहीं हैं। दरअसल वे ख़ुद को अन्तर्मन की खोजी ज़्यादा मानती हैं। शब्द और चुप्पी की स्त्री-भाषा में जो कुछ अनकहा रह जाता है उसे ताड़ना और कह देना अपना असली काम समझती हैं। बाग़ी प्रेम-विवाहों के आख्यानों के सम्पादित संकलन के बाद वाणी प्रकाशन से प्रकाशित उनकी किताब पतनशील पत्नियों के नोट्सइन दिनों काफी चर्चित हो रही है।

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नीता गुप्ता जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल से सम्बद्ध जयपुर बुकमार्क की सह-निदेशक हैं जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अनुवाद के स्वत्वाधिकार के लिए काम करता है। वे यात्रा बुक्स की प्रकाशक हैं और भारतीय भाषाओं के बीच अनुवाद को बढ़ावा देने वाली गैर-लाभकारी संस्था भारतीय अनुवाद परिषद् में सम्पादक और संयुक्त सचिव हैं। 1996 से वे भारतीय भाषाओं के अनुवाद के विविध पक्षों पर काम कर रही हैं और पुस्तक प्रकाशन, ई-बुक और साहित्यिक पत्रिका के सम्पादन से जुड़ी रही हैं। हाल ही में उन्होंने ‘ट्रांसलेटिंग भारत, रीडिंग इंडिया’ नाम से निबन्धों का एक संकलन सम्पादित किया है।

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