Tuesday, 14 November 2017

कम्बन तथा तुलसी रामायण में मन्दोदरी तथा शूर्पणखा की तुलना ।



क्या तुलसीदास की मन्दोदरी और शूर्पणखा कम्बन से भिन्न थी ?
इन स्त्रियों के चित्रण में क्या फर्क है ? जानिये यहाँ :- 



       रावण की पत्नी मन्दोदरी राक्षस कुल में जन्म लेकर भी श्रेष्ठ मानवी के सुयोग्य सद्गुणों से सम्पन्न साध्वी नारी पात्र है। अपने पति रावण के प्रति निष्ठा, परिस्थिति की सूक्ष्म परख आदि इसकी विशेषताएँ हैं। वाल्मीकि रामायण में रावण वध के पश्चात् विलाप करते समय मन्दोदरी का प्रथम साक्षात्कार होता है। कुम्भकर्ण तथा हनुमान से स्पष्ट है कि रावण के जीवन काल में मन्दोदरी ने भी उसे आदेश दिया था। इसमें मन्दोदरी विलोप, मुख्यतः रावण का प्रताप उसकी समर वीरता, पराक्रमी पति पर मन्दोदरी का गर्व, पति की तरफ उसकी शुभ चिन्ता आदि का प्रकाशन करता है। सीता के प्रति क्षणिक विकार की भावना होने पर भी समस्त सम्पदाओं की अधिष्ठात्री उस पतिव्रता देवी सीता पर श्रद्धा प्रकट करती है।

तुलसी रामायण में जब रावण अशोक वन में सीता से मिलने जाता है तब वहाँ जाकर उसे उपदेश देने वाली शुभ चिन्तक के रूप में मन्दोदरी को उपस्थित किया गया है। इसके बाद भी वह कई बार सीता हरण के बारे में रावण को चेतावनी देती है। निन्दा भी करती है। मन्दोदरी उस समय राम की महिमा एवं शक्ति का परिचय कराके उसे चेतावनी देती है। राम की महिमा तथा विश्वरूप का भी उद्घाटन करती है।

मन्दोदरी ने बचपन में ही देव और दानवों के बीच सामाजिक अन्तरों का अनुभव किया था। अपने मन में उठे प्रश्नों के समाधान के लिए एक दिन अपने पिता से मैंने प्रश्न किया। ‘‘पिताजी! लोग दानवों तथा देवों की तुलना करते हुए देवों को श्रेष्ठ और दानवों को दोयम क्यों मानते हैं?’’ उन्होंने मुझे गले से लगाकर प्यार किया और बोलेबेटी जहाँ तक पृथ्वी पर देव और दावन की उत्पत्ति का सवाल हैतुम जान लो कि दोनों जातियों के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध है। प्राचीन युग में प्रजापति कश्यप ने दो-दो बहनों अदिति और दिति से एक साथ विवाह किया था। अदिति के गर्भ से उत्पन्न सन्तानें देव कहलायीं और दिति से उत्पन्न दैत्य। दोनों की आकृतियों और रंग में अन्तर है और नहीं भी। ये आपस में मौसेरे भाई-बहनें हैं।

मन्थरा के मानसिक कौशल को तुलसीदास ने विशेष रूप से उभारा है। शूर्पणखा में कम्बन तथा तुलसीदास ने रूप-चेतना की प्रतिष्ठा की है।

मन्दोदरी राम कथा का एक ऐसा उपेक्षित पात्र है जिसकी गणना उन पंच कन्याओं में की जाती हैजिनके स्मरण से महा पातकों का भी नाश होता है।
            
अहल्याद्रौपदीकुन्तीतारामन्दोदरी तथा पंच कन्या स्मरे नित्यं महात्मक नाशनम्।
यद्यपि ये पाँच कन्याएँ काफी लांछित हैं तथा अभिशप्त जीवन जीने के लिए उन्हें विवश होना पड़ाफिर भी वे अत्यन्त पूज्य हैं। भगवद् भक्ति के कारण उनका अन्तःकरण परम पवित्र एवं शुद्ध है। भगवान को वे अत्यन्त प्रिय हैं।

मन्दोदरी के जन्म के सम्बन्ध में कई कथाएँ प्रचलित हैं। आनन्द रामायण (1, सर्ग 9) में उसके विष्णु के शरीर के चन्दन से निर्मित होने का उल्लेख मिलता है। यहाँ कथा इस प्रकार है सीता-शोध के क्रम में हनुमानजी को सीता का भ्रम हो जाता है। इस पर पार्वती शिवजी से पूछती हैं कि राक्षसी मन्दोदरी सीता के समान कैसे हो सकती हैसंसार की समस्त स्त्रियाँमैंने सुना है कि सीता के अंश से ही उत्पन्न हैंतब फिर उनकी सीता से बराबरी कैसी?

उत्तर में शिवजी बोलेएक समय शेषनाग के उच्छवास लेने से जब रावण की माता कैकसी का पूजा करने वाला शिवलिंग पाताल में चला गया तो उसने रावण से कहा कि वह एक उत्तम आत्मलिंग शिवजी से ला दे। रावण ने अपने शरीर की वीणा पर षडज आदि स्वरों से गन्धर्व के समान गायन कर मुझे प्रसन्न किया तो दो वरदान माँगे- प्रथम माता के लिए आत्मलिंगद्वितीय पत्नी के रूप में पार्वती। शिवजी ने दोनों ही वरदान उसे दे दिये तथा कहालिंग को पृथ्वी पर रख देने से वह वहीं स्थित हो जाएगाआगे नहीं ले जा सकेगा। रावण जब लिंग लेकर प्रस्थान किया तो तुमने अत्यन्त दुखी होकर भगवान विष्णु का स्मरण किया तो तब उन्होंने अपने शरीर के चन्दन से सुन्दर मन्दोदरी स्त्री को बनाकर मय को दे दियाजो उसे साथ लेकर पाताल चला गयाफिर ब्राह्मण का रूप धारण कर मार्ग में रावण से कहा कि शिवजी ने तुम्हें ठग लिया है। जो पार्वती तुमको दी हैवह कृत्रिम है। असली पाताल में मय के भवन में छिपा दी है।

पाताल प्रस्थान करते समय उसे तीव्र लघुशंका लगी। उस समय उन्होंने आत्मलिंग को ब्राह्मण के हाथ देकर (द्विजवेशधारी) निवृत्त होने के लिए गयागणेशदत्त सारस्वत-सीतापुर उस समय ब्राह्मण, ने लिंग को सागर के पश्चिम तट पर रखकर अपने स्थान को चले गये। निवृत्त होने के बाद उसने लिंग पृथ्वी पर रखा हुआ देखा। काफी प्रयत्न करने पर भी वह उसे हिला न सका।

तब वह खिन्न होकर उसे वहीं छोड़कर (गोकर्ण) पाताल में चला गया। वहाँ उसने मन्दोदरी को देखा। मय से उसने अपने साथ ले जाने की आज्ञा माँगी। मय ने दोनों का विवाह कर दिया। वस्त्रा तथा आभूषण के साथ (परिवाह) शत्रुघातिनी अमोह शक्ति भी दे दी। उस देवी को मन्द तथा सूक्ष्म देखकर रावण ने उनका नाम मन्दोदरी रख दिया। उसे अपने साथ लेकर लंकापुरी लौट आया। इसी रामायण में रावण के शव के साथ मन्दोदरी के शती हो जाने का भी उल्लेख है।

अंगद का यज्ञ विध्वंस हो चुका था। इसलिए वे समस्त वानरों सहित वहाँ से चले गये। मन्दोदरी को अत्यन्त विह्वल देखकर रावण ने कहा, ये सुख-दुःख दैवाधीन हैं। इसलिए हे विशालाक्षी इस निश्चित ज्ञान को आत्मसात कर शोक छोड़ दो क्योंकि शोक ज्ञान को नष्ट कर देता है।

वह युद्धभूमि में जाने के अपने निश्चय को व्यक्त करता हुआ आगे कहता है। मैं लक्ष्मण सहित राम को मारकर लौट आऊँगा अथवा श्रीराम ही अपने बाणों से मुझे छिन्न-भिन्न कर देंगे और तब मैं उनके पद को प्राप्त हो जाऊँगा। इसी क्रम में वह मन्दोदरी को एक आज्ञा भी देता है और कहता हैयदि मैं परमधाम को प्राप्त हो जाऊँ तो सीता को मारकर मेरे शव के साथ अग्नि प्रवेश कर जाना।

रावण के ये वचन सुनकर मन्दोदरी अत्यन्त दुखी होकर बोली कि हे नाथमैं जो कुछ भी कह रही हूँउसे सुनें तथा सत्य मानकर उस पर आचरण करें। उसका यह सत्य कथन दस श्लोकों में वर्णित है।
इसमें पहले आठ श्लोक राम के ब्रह्मत्व के व्यंजक रहे हैं। नवें में सीता हरण के लिए रावण की भर्त्सना है तथा अन्तिम में जानकी को वापस कर देने की तथा विभीषण को राज्य देकर स्वयं वानप्रस्थी हो जाने की प्रार्थना है। ये दोनों श्लोक मन्दोदरी के ज्ञानभक्ति तथा वैराग्य के प्रकृत प्रमाण हैं।

आनन्द रामायण में मन्दोदरी का उल्लेख युद्ध कांड के 111 सर्ग में हुआ है। रावण वध हो चुका है। उसके शव को गोद में रखकर मन्दोदरी विलाप कर रही है। इस क्रम में वह जहाँ रावण के पराक्रम का बखान करती हैवहीं उसके अधमाचरण कोतन्वंगी सीता के अपहरण को उसकी मृत्यु का कारण बताती है। कहती हैउस पतिव्रता देवी की तपस्या से जलकर ही आप भस्म हो गये हैं।

मन्दोदरी इसी सन्दर्भ में यह भी कहती हैमैंने अनेक बार आपसे रघुनाथजी से बैर न करने का अनुरोध किया किन्तु आप माने नहीं। उसी का यह फल है कि मुझे वैधव्य का दुःख प्रदान करने वाली अन्तिम व्यवस्था प्राप्त हो गयी है। जिसके विषय में मैंने कभी सोचा तक नहीं था।

नारीत्व एवं पुरुषत्व, सृष्टि में व्याप्त तत्त्व है। स्त्री तथा पुरुष इस विशाल सृष्टि में परस्पर संगी ही नहीं, वरन् एक-दूसरे के पूरक भी हैं। शारीरिक संरचना की दृष्टि से नारी, पुरुष की अपेक्षा कम शक्तिशाली तथा स्वभाव से अधिक कोमल होती है। प्राकृतिक रूप में उसमें भावात्मकता अधिक पायी जाती है। प्रागैतिहासिक आदिम युग से, जबकि मानव घुमक्कड़ जीवन बिता रहे थे, नारी के स्वभाव और शक्ति के अनुरूप शिशुजन्म, उसका लालन-पालन, परिवार का निर्वाह आदि का दायित्व नारी वर्ग के कन्धों पर पड़ गये। इस प्रकार परिवार की नींव पर बल डालने वाली एवं पारिवारिक सम्बन्धों में आर्द्रता ले आने वाली आधार शक्ति नारी है। नारी अपने पतिव्रत तथा अन्य सद्गुणों की व्यक्तिगत योग्यताओं के आधार पर सम्मानित होती है। उसका पतिव्रत चिर प्रतिष्ठित सामाजिक आदर्श है। आजकल व्यक्तिगत योग्यताओं के आधार पर उनके सेवाओं के सामाजिक मूल्यों के अनुरूप कामकाजी नारियों को जो सामाजिक प्रतिष्ठा मिलने लगी है, उसमें नारी की सत्तात्मक पहचान निहित है।


वैदिक कालीन साहित्य में चर्चित नारी पराश्रिता नहीं थी। समाज के लिए उपयोगी कार्यों में उसका भी योग सम्मिलित था। उसके धार्मिक तथा साहित्यिक कार्य उसकी बौद्धिक योग्यता के प्रमाण हैं। उस काल की नारी सम्बन्धी मान्यताओं के आधार पर सीता, सावित्री जैसी व्यक्तिगत आदर्शपरक पात्रों की प्रतिष्ठा हुई। ये पात्र आज भी भारतीय समाज में नारी के लिए अनुकरणीय बन गयी हैं।

शूर्पणखा
राम कथा के नारी पात्र मानव स्वभाव की विविधताओं एवं जीवन की वास्तविकताओं तथा आदर्शों को प्रस्तुत करती हैं। इनमें कुछ पात्र, स्थान की दृष्टि से, कुछ अपने चरित्र बल के आधार पर, किसी विशेष आदर्श की स्थापना करने से किसी गर्ह्य तत्त्व की अवांछनीयता का प्रतिपादन करने का महत्त्व रखते हैं।

कथा के स्थान तथा चारित्रिक बल के आधार पर रामायण के नारी पात्रों में सीता का चरित्र सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। सीता के पश्चात् कथा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण नारी पात्र शूर्पणखा तथा कैकेयी हैं। अपने चारित्रिक बल के आधार पर महत्त्व रखने वाले नारी पात्र कौसल्या, सुमित्रा, मन्थरा, तारा, मन्दोदरी, शबरी, स्वयंप्रभा, त्रिजटा, अहल्या, ताड़का आदि हैं।

कथा-विकास में नया मोड़ ले जाने के कारण शूर्पणखा का स्थान रामायण में विशेष महत्त्व रखता है। इसी के कारण कथा में सीता को प्रमुखता मिलती है। नारी के निकृष्ट गुणों को प्रतिनिधित्व करने वाली शूर्पणखा के पात्र से यह शिक्षा मिलती है कि कैसे स्वेच्छाचारिणी, उच्छ्रंखल नारी समूचे कुल का विनाश करती है।

कामिल-बुलके राम कथा में (1950-68) बताते हैं कि तृणभद्र की राम कथा में शूर्पणखा सीता का मन जाँचने के लिए रावण के द्वारा भेजी जाती है। महावीर चरितमें अनर्ध राघव में शूर्पणखा का मन्थरा का रूप धारण करने का वर्णन हुआ है।

वाल्मीकि रामायण में शूर्पणखा राम तथा लक्ष्मण के सम्मुख अपने वास्तविक विकराल रूप में उपस्थित होकर अपने को उनके अनुरूप रूपवती बनाती है और सीता को विरूपी, असती, कराली आदि कहकर धिक्कारती है। सीता को खा जाने का उका प्रयत्न, उसके जन्मजात वर्गीय संस्कार, उसकी र्बबरता के साथ-साथ सीता के प्रति नारी-सुलभ ईर्ष्या को दिखाता है।

कम्ब रामायण तथा तुलसी रामायण में शूर्पणखा अपना रूप बदलकर एक सुन्दरी के रूप में राम-लक्ष्मण के सम्मुख उपस्थित होती है। वह रूप को अपना साधन बनाकर राम-लक्ष्मण को अपने वश में करने की चेष्टा करती है। यहाँ प्रसंग-प्रस्तुति में अधिक कलात्मकता आ गयी है और शूर्पणखा की स्वभावगत व्यवहारकुशलता प्रकट होती है। 


 भारतीय भाषाओं में रामकथा : तमिल भाषा  


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