Friday, 29 September 2017

कोंच (उत्तर प्रदेश) में खेली जाती हैं भारत की सबसे अद्भुत रामलीला


कोंच की रामलीला



उत्तर भारत की प्राचीन पारम्परिक रामलीलाओं में कोंच (उत्तर प्रदेश) की रामलीला का अपना वैशिष्ट्य है। यह विलुप्तोन्मुख पारसी-नाट्य शैली का सुन्दर उदाहरण है। इसमें, मैदानी, जुलूसी तथा मंचीय रामलीला का समन्वित स्वरूप है। सन् 1851 ई. में स्थापित इस रामलीला का विकास पीढ़ी-दर-पीढ़ी नित नूतन प्रयोगों के साथ हुआ है। अभिनय, शृंगार, दृश्यनिर्माण, नगरभ्रमण आदि में पाँच-छह पीढ़ियों से सभी धर्मावलम्बी स्थानीय नागरिक पीढ़ी-दर-पीढ़ी इसे पोषित करने में अपना सक्रिय योगदान, बिना परिश्रमिक के निःस्वार्थ भाव से दे रहे हैं। बिना किसी शासकीय अनुदान के यह जनपोषित उत्सवमयी, आध्यात्मिक अनुष्ठान, कला-साधना तथा लोकरंजन का सच्चा जनोत्सवहै। 1857 की क्रान्ति में क्रान्तिकारियों के मिलने-जुलने तथा लोकजागरण का माध्यम रही है।


सीनरी निर्माण विभाग (सरयूपार के लिए नौका का )

कोंच में रामलीला का इतिहास लगभग एक सौ साठ वर्ष प्राचीन है। पुराने रामलीला भवन में लगे एक शिलालेख के अनुसार इसकी स्थापना विक्रम संवत् 1908 तदनुसार 1850-1851 ई. में हुई थी। 2000 ई. तक इसका स्थापना वर्ष अनुमानों के अनुसार 1860 ई. माना जा रहा था। किन्तु पुरातत्वविद् डॉ. जगदीश प्रसाद गुप्त द्वारा खोज निकाले गये उक्त शिलालेख के पश्चात् अटकलों पर विराम लग गया है।

यहाँ के हिन्दू मन्दिरों तथा मुस्लिम सम्प्रदाय 
के तकियों में संगीत कार्यक्रमों की परम्परा रही है। 
कोंच नगर कई शताब्दियों से 
सांस्कृतिक चेतना का नगर रहा है। कविशायरसंगीतकारख्याल-लावनी गायक
कब्बाल आदि वहाँ पर्याप्त संख्या में थे। 
उनके सहयोग से रुचि-अनुरूप 
व्यक्तियों को जोड़कर रामलीला
 का साहित्य तैयार किया गया। 

जनश्रुतियों के अनुसार कोंच में एक जमींदार थे, चौधरी पं. बिहारी लाल गौड़। वह मूलतः जालौन नगर के निवासी थे। एक समृद्ध जमींदारी परिवार से जुड़े थे तथा उनके परिवार की शाखाएँ, जमींदारी के सिलसिले में अनेक कस्बों में रहने लगी थीं। उनका एक आवास कोंच तथा पिरटौना में भी था। वहाँ उनके आवास को हवेलीकहते थे। ऊँचे दरवाजे तथा कलात्मक निर्माण की इस हवेली में अनेक तहखाने भी थे। दीवालों पर पौराणिक भित्तिचित्र बने थे। लोक संस्कृति की एक विधा ख्याल-लावनीके शौकीन तथा उसके पारम्परिक कलाकार पं. बिहारी लाल गौड़ की रंगमंच, अभिनय तथा संगीत में विशेष अभिरुचि थी। कोंच में हलवाई संघने उनकी विशेष प्रतिष्ठा के कारण उन्हें अपनी चौधराहट सौंपी थी। इससे उनके परिवार को चौधरीकी उपाधि प्राप्त हो गयी थी। पूरा नाम चौधरी पं. बिहारी लाल गौड़ कहा जाता था। चौधरी की यह उपाधि विरासत के रूप में उनके पुत्र सुप्रसिद्ध ख्याल लावनीकार चौधरी पं. मन्नूलाल, पौत्र चौधरी पं. महादेव प्रसाद तथा प्रपौत्र चौधरी अतुल चतुर्वेदी को मिली। चौधरी बिहारीलाल जी, अपनी सांस्कृतिक रुचि के अनुरूप, आसपास के गाँवों/कस्बों में रामलीला, कृष्णलीला (रासलीला), ख्याल-लावनी, कवि सम्मेलनों आदि के कार्यक्रमों में जाते रहते थे।

कोंच से लगभग 3 किलोमीटर दूर
कोंच-उरई मार्ग पर स्थित एक 
ग्राम पड़री में रामलीला का 
अच्छा आयोजन होता था। 

उसकी ख्याति के कारण चौ. बिहारी लाल रामलीला देखने प्रतिवर्ष वहाँ जाते थे। एक वर्ष वहाँ रामलीला के आयोजन पर कुछ विवाद हो गया तथा भविष्य में रामलीला न कराने का निर्णय किया गया। बिहारी लाल जी तथा कोंच के राजा दिलीप सिंह वहाँ उपस्थित थे, वहाँ उन्होंने आयोजकों के समक्ष प्रस्ताव रखा कि वह उस रामलीलाके आयोजन को कोंच ले जाना चाहते हैं। कलाकारों तथा मंचीय सामग्री सहित वह रामलीला कोंच ले आये। मूर्तियों (कलाकारों) ने इस यात्रा के दौरान पाँच पड़ावों पर विश्राम किया। अन्ततः चौ. बिहारी लाल ने अपनी हवेली के तहखाने के एकान्त एवं शान्तिपूर्ण वातावरण में मूर्तियों के ठहरने की व्यवस्था की। अगले ही दिन नगर के प्रमुख धार्मिक सांस्कृतिक रुचि सम्पन्न प्रतिष्ठित नागरिकों, व्यापारियों को आमंत्रित करके रामलीला के आयोजन की रूपरेखा बनाई गयी।

सीनरी विभाग -सैट तैयार कर रहे शिल्पी 

उस बैठक में तय किया गया कि रामलीला इस प्रकार आयोजित हो कि सम्पूर्ण नगर उससे जुड़े, विभिन्न रमणीक स्थानों तथा नागरिकों की सहभागिता हो। कोंच नगर के चारों ओर सीमाओं पर स्थानीय धनी-सम्पन्न प्रतिष्ठित-जनों के बगीचे, देवालय तथा तालाब थे। लीला की दृश्यावली के अनुरूप, उन बाग-बगीचों में लीला-मंचन का निर्णय लिया गया। बगीचा स्वामियों ने अपने-अपने बगीचों में मुक्ताकाशी मंच बनाने, लीलाओं की आवश्यकतानुसार सामग्री उपलब्ध कराने तथा मूर्तियों का रात्रि भोज कराने पर सहमति दे दी। उन्हें इस बात पर गर्व होता था कि उनके बगीचे में आज भगवान लीला करेंगे, भगवान ने आज उनके यहाँ भोजन किया। वह अपने पूरे परिवार, रिश्तेदारों तथा इष्टमित्रों को विशेष रूप से आमंत्रित करते थे।



यह भी तय हुआ कि मूर्तियाँ जब लीला के उपरान्त चौधरी बिहारी लाल की हवेली लौटेंगी, तो उस मार्ग के नागरिकगण आते-जाते उस मार्ग की सजावट, स्वागत, प्रकाश-व्यवस्था करेंगे तथा अपने-अपने द्वार पर आरती करके कुछ श्रद्धा निधि समर्पण करेंगे। भले ही प्रतीक रूप में एक रुपये से हल्दी का टीका हो। टीका के बाद स्वागती-परिवार को भगवान का प्रसाददिया जायगा। हलवाइयों के चौधरी बिहारी लाल की प्रेरणा से यह प्रसाद खोवा (मावा) के पेड़ा के रूप में प्रारम्भ में हलवाई-संघ ने प्रायोजित किया। टीका से प्राप्त धनराशि से रामलीला की अन्य व्यवस्थाएँ की गयीं। मूर्तियों के आवास-भोजन-सेवा का दायित्व चौधरी साहब ने स्वयं ले लिया।


यहाँ के हिन्दू मन्दिरों तथा मुस्लिम सम्प्रदाय के तकियों में संगीत कार्यक्रमों की परम्परा रही है। कोंच नगर कई शताब्दियों से सांस्कृतिक चेतना का नगर रहा है। कवि, शायर, संगीतकार, ख्याल-लावनी गायक, कब्बाल आदि वहाँ पर्याप्त संख्या में थे। उनके सहयोग से रुचि-अनुरूप व्यक्तियों को जोड़कर रामलीला का साहित्य तैयार किया गया। तय किया गया कि कोई भी पात्र बाहर से नहीं बुलाया जायगा और न किराया अथवा पारिश्रमिक देकर उससे अभिनय कराया जायेगा। मूर्तियों (राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, सीता) का चयन किशोर वय के ब्राह्मण-कुमारों में से उनका स्वर-परीक्षण एवं अभिनय क्षमता परीक्षण करके किया जायगा तथा उन्हें रामलीला-समिति (अनिबंधित) द्वारा ही प्रशिक्षित किया जायगा। पूरी रामलीला सम्पन्न होने के पश्चात् उनकी भूमिका के आधार पर उन्हें कुछ विदाई भेंट दी जायगी।

यह भी निश्चय किया गया कि सम्पूर्ण कार्यक्रम अनुष्ठानपूर्वक, ज्योतिषीय गणना के आधार पर शोधित मुहूर्तों में सम्पन्न होगा। पात्र-मूर्तियों का चयन तथा उनमें देवत्व की प्राण-प्रतिष्ठा का कार्यक्रम रामलीला के आयोजन के पूर्व पुष्य-नक्षत्र में होगा तथा लीला का शुभारम्भ पताका स्थापन से होगा।

धनुताल के निकट जिस स्थान को वीर विजयी हनुमानके रूप में चिह्नित किया गया, शोधित मुहूर्त में समिति के सभी लोग वहाँ जायेंगे तथा विधि-विधान पूर्वक पताका लेकर रामगंज मठिया स्थल पर स्थापित करेंगे तथा वहाँ से प्रतिदिन लीला के विभिन्न स्थलों पर ले जायेंगे। लगभग 1930 ई. में इस स्थान पर सेठ बद्रीप्रसाद सिकरी वाले ने लंकेश्वर हनुमान मन्दिर का निर्माण एक ऊँची पीठिका पर करा दिया। कुछ दिनों पूर्व तक वहाँ उनके नाम का शिलालेख भी लगा था जो एक दशक पूर्व हुए जीर्णोद्धार के बाद नहीं लगाया गया।

यह भी तय हुआ कि मूर्तियाँ चौधरी साहब की हवेली से प्रतिदिन, पताका, अखाड़ा तथा गाजे-बाजे के साथ लीला स्थल (बाग-बगीचे) तक रथ अथवा विमान से जायेंगी तथा लीला के उपरान्त उस मार्ग का गश्त करते हुए पुनः हवेली में लौटकर विश्राम करेंगी।

इस प्रकार सम्पूर्ण कोंच नगर रामलीला की लीलाभूमि बनाई गयी। प्रत्येक दिशा में रंगमंच बनाये गये तथा हर गली-मुहल्ले में मूर्तियों का स्वागत-वन्दन-टीका इस प्रकार होने लगा मानो साक्षात् भगवान स्वागती के घर-द्वार आ गये हों। स्वागत की इस परम्परा में न हिन्दू, मुस्लिम का भेदभाव था, न जाति-बिरादरी का, न विधवा-सधवा का। भगवान के द्वार सभी के लिए खोल दिये गये। हर वर्ग ने भगवान का स्वागत किया। जिस मुहल्ले में भगवान का विमान लीला के लिए जाता था, उसमें सड़क-गली के दोनों ओर चूना-कलई का रेखांकन, किनारे-किनारे ऊपर कागज की झंडियों, पताकाओं, लता-पत्रों के वन्दनवार-तोरण तथा रात्रि के अन्धकार को दूर करने के लिए हंडे तथा गैस की लालटेनों की व्यवस्था की जाती थी। बाद में म्युनिसिपल बोर्ड गठन के बाद उस सम्पूर्ण गश्त-मार्ग पर लालटेन-स्टैण्ड बना दिये गये थे, जिनमें लोहे के पाइप के ऊपर काँच के चौखटे में लालटेनें जलाई जाती थीं। जब भगवान का विमान चलता था, उसके आगे हण्डा, गैस की लालटेनों तथा स्थानीय आतिशबाजों द्वारा मेहताबकी रोशनी की जाती थी। इस वातावरण से लगभग तीन सप्ताह तक पूरा कोंच नगर राममयहो जाता था। एक अद्भुत धार्मिक, संगीतमय, उल्लासमय वातावरण का निर्माण हो जाता था। रामलीला के आयोजन की तिथियाँ लगभग एक माह पूर्व घोषित होकर उसकी मुनादी सार्वजनिक स्थानों पर पर्चे-वितरण करके दे दी जाती थी। इतनी सूचना पर ही दर्शक उस दिशा में लीला देखने मुड़ जाते थे।

सन् 1910 ई. के बाद... 

यह परम्परा लगभग साठ वर्षों तक चली। सन् 1910 ई. के आसपास पं. लक्ष्मण प्रसाद पाठक स्थानीय नगर पालिका के अध्यक्ष चुने गये तथा पं. मजबूत सिंह तिवारी रईस-जमींदार रामलीला के प्रबन्धक बनाये गये। उस वर्ष रामलीला की हीरक जयन्ती मनायी गयी। यह भी तय किया गया कि रामलीला किसी केन्द्रीय स्थान पर बाँस-बल्ली-तख्तों का मंच बनाकर हो तथा मूर्तियाँ प्रतीक रूप में लीला के दिन उस बगीचे तक जाएँ। प्रतीक लीला, हवन-प्रसाद गश्त के बाद लीला मंच पर ही हो। मंच की दृष्टि से स्थान कोंच के मणिहार-चौक (वर्तमान मानिक चौक) को चुना गया। वहाँ धनुष यज्ञ तथा अंगद-रावण संवाद लीला तखत का मंच बनाकर पहले से ही होती थी।

मणिहार चौक चारों ओर पक्की दुकानों से घिरा एक वर्गाकार प्रांगण था। उसमें सर्राफों तथा मणिहारों (रत्न, मणियाँ आदि गूँथकर माला बनाने वाले पटवासमुदाय) की दुकानें थीं। कुछ बिसातखाने की दुकानें अस्थायी छप्परों में लगती थीं। जो प्रतिदिन तहबाजारी शुल्क स्थानीय निकाय को अदा करके वहाँ बैठते थे। नगर पालिका अध्यक्ष श्री पाठक जी के प्रयास से वे सभी दुकानदार इस बात पर सहमत हो गये कि अपनी छप्पर/टट्टर वाली दुकानें वह लीला-अवधिमें हटा लेंगे। सादा फर्श पर दिन में दुकान चलाकर, शाम के पूर्व मैदान दर्शकों के लिए खाली कर देंगे। इस प्रकार मणिहार चौक के पश्चिमी भाग में बाँस-बल्ली-तखत पर बने पूर्वाभिमुखी मंच पर लीला मंचित होने लगी। दर्शक मैदान में तथा तीन ओर बनी दुकानों के सामने बने बरामदों/टिन शेड में बैठकर रामलीला देखते थे। वह दर्शक दीर्घाएँ बन जाती थीं। भीड़ अधिक होने पर दर्शक दुकानों की छतों पर भी बैठ जाते थे।

1927 ई. का ऐतिहासिक मोड़... 

1927 ई. में रामलीला के इतिहास में एक विशेष मोड़ आया। रामलीला की बढ़ती वित्तीय आवश्यकताओं तथा सीमित टीका-राशि की प्राप्तियों के कारण, आर्थिक संसाधनों की तलाश की गयी। कोंच गल्ला व्यापारियों की बड़ी मण्डी थी। कोंच का आर्थिक ढाँचा मुख्यतः गल्ला व्यापार पर टिका है। गल्ला व्यापारी इस बात पर सहमत हो गये कि वे मण्डी में माल की खरीद के समय एक मामूली प्रतिशत धनराशि धार्मिक-कार्यों हेतु काटकर कटौती की राशि को धर्मादा-निधिबनाकर धर्म की रक्षा करेंगे। इस निमित्त 1927 में नगर के गण्यमान्य नागरिकों, गल्ला व्यापारियों तथा रामलीला-समिति की राय से धर्मादा रक्षिणी सभाकी स्थापना की गयी। उसके अन्तर्गत दो वैष्णव मन्दिरों श्री कल्याण राय तथा बल्दाऊ जी महाराज की मन्दिर-व्यवस्था, धर्मशाला निर्माण, संस्कृत पाठशाला भवन-निर्माण तथा रामलीला संचालन को संचालित करने हेतु पाँच उपसमितियों के गठन का निर्णय लिया गया। इस प्रकार धर्मादा रक्षिणी सभा की आय का आंशिक विभाजन उक्त पाँच संस्थाओं को किया जाने लगा।

इस प्रकार कोंच की रामलीला 1927 ई. से धर्मादा रक्षिणी सभा की उपसमिति के रूप में कार्य कर रही है। उक्त सभा प्रतिवर्ष रामलीला समिति के मंत्री का निर्वाचन कराती है तथा रामलीला की सम्पत्ति का प्रभार रामलीला-मंत्री को सौंप दिया जाता है। इस प्रभार में सोने-चाँदी के आभूषण, विमान, सिंहासन तथा रामलीला भवन की चाबी सहित अन्य सामग्री सम्मिलित है। रामलीला सम्पन्न होने के पश्चात् वह सम्पत्ति पुनः धर्मादा रक्षिणी सभा के संरक्षण में चली जाती है। उदाहरणार्थ 1992 के एक प्रभार-पत्र की छायाप्रति परिशिष्ट एक में दी जा रही है। इससे रामलीला समिति की ठोस चल-सम्पत्तियों का अनुमान किया जा सकता है।

1951 ई. में कोंच रामलीला का शताब्दी समारोह तत्कालीन मंत्री रामलीला समिति श्री रामनारायण लाल अग्रवाल (दशा) के संयोजन में मनाया गया। इस अवसर पर यह आवश्यकता महसूस की गयी कि रामलीला का अपना भवन तथा रंगमंच होना चाहिए। भूमि की तथा दानदाताओं की तलाश उतनी कठिन नहीं थी, जितनी एक ऐसे कर्मठ व्यक्ति की जो अपना जीवन-ध्येय इस कार्य को बनाकर घर-परिवार के दायित्व छोड़कर कमर कसकर जुट जाए। अन्त में समस्या सुलझ गयी। रामलीला के समर्पित कार्यकर्ता, लोकप्रिय अभिनेता पं. रामनारायण वैद (तिवारी) को ईश्वरीय प्रेरणा हुई। वह इस कार्य हेतु सहर्ष आगे आये। वह गल्ला-तिलहन की दलाली का कार्य करके जीवन-यापन करते थे। गल्ला व्यापारियों तथा समृद्ध परिवारों से उनका घनिष्ठ सम्पर्क दिन-प्रतिदिन का था। उन्होंने अपने साथ दो अन्य कर्मठ कार्यकर्ताओं स्व. रामदयाल अग्रवाल (सर्राफ) तथा चौधरी मुखन लाल अग्रवाल को तैयार कर लिया और भवन निर्माण के स्वप्न का ताना-बाना बुना जाने लगा। उन्होंने अपने प्रभाव से श्री बालमुकुन्द सेठ, जिनकी भूमि पर रामलीला का मंच तखत पर बनता था, को उस भूमि को श्री रामलीला समिति को दान स्वरूप देने को तैयार कर लिया।

कोंच की रामलीला के एक वरिष्ठ कलाकार पं. शारदा प्रसाद उदैनियाँ ने बताया कि शताब्दी आयोजन के उपलक्ष्य में उस वर्ष प्रत्येक मूर्ति की विदाई, एक सौ एक रुपया दी गयी थी। तब सोने का भाव एक सौ रुपये प्रति तोले से भी कम था। यानी एक कलाकार को एक स्वर्णमुद्रा से अधिक मानदेय! श्री उदैनियाँ जी ने उस वर्ष श्रीराम का अभिनय किया था जिसकी श्रेष्ठता की चर्चा अभी भी वरिष्ठ जन करते हैं।
इस रामलीला की अनेक विशेषताएँ काशी की असी की रामलीलासे मिलती-जुलती हैं। ज्ञातव्य है कि असी की रामलीला गोस्वामी तुलसीदास जी ने प्रारम्भ की थी। जिस प्रकार असी की रामलीला में लंका के दृश्यों व अभिनय-स्थल को लंकानाम से पुकारते-पुकारते उस मुहल्ले का नाम ही लंका हो गया, उसी प्रकार कोंच में किष्किन्धा के दृश्य-मंचन वाला एक टीला तथा उसके चारों ओर का इलाका जनता द्वारा किष्किन्धाकहा जाने लगा, उस स्थान का नाम ही अब किष्किन्धा हो गया। जिस प्रकार असी की रामलीला में गंगापार लीला का मंचन दुर्गाकुण्ड में होता है, उसी प्रकार कोंच की रामलीला का मंचन, नगर के बीचों-बीच बने विशाल सरोवर सागर तालाबमें होता है। यह तालाब चारों ओर पक्के घाटों तथा सीढ़ियों से घिरा है। इसकी प्रत्येक भुजा 200 गज (600 फुट) है, चारों कोनों पर चार मठियाँ बनी हैं। गंगापार लीला के दिन मूर्तियाँ पश्चिमी घाट पर पहुँचती हैं। वहाँ निषाद से संवाद होने के पश्चात् नौका पर बैठकर पूर्वी घाट पर पहुँचते हैं दर्शक चारों ओर सीढ़ियों पर बैठ जाते हैं। गंगा-पार का स्वाभाविक दृश्य बड़ा मनोरम होता है। जिस प्रकार असी की रामलीला में खरदूषण की सवारी निकलती है, उसी शैली में राम बारात का भव्य जुलूस, हाथी, घोड़ा, ऊँट, रथ, विमान तथा देवी-देवताओं, ऋषियों-मुनियों की झाँकियों तथा अखाड़ों के साथ निकलता है। जिस प्रकार असी की रामलीला में गोस्वामी तुलसीदास जी ने विभिन्न जातियों को जोड़ने के लिए अलग-अलग कार्य आवंटन किये, जो कार्य आज भी उन्हीं जातियों द्वारा सम्पादित होते हैं, उसी प्रकार कोंच की रामलीला में सर्व-जाति समन्वय की दृष्टि से अनेक कार्य आवंटित किये गये। एक सौ साठ वर्ष तक वह कार्य उसी परिवार के सदस्यों द्वारा पीढ़ियों दर पीढ़ियों सम्पादित किये जा रहे हैं। 

उदाहरणार्थ-

(1) रावण, मेघनाद, जटायु के डील बनाने का काम 160 वर्षों से एक मुस्लिम परिवार की पाँच-छह पीढ़ियों द्वारा किया जा रहा है। इनका क्रम है खुशाली मंगली-करीम बक्स-वहीद अहमद- सलीम अहमद शफीक अहमद पुत्र हबीब अहमद। वर्तमान में सलीम अहमद (बारह वर्ष की आयु से सेवारत) तथा उनके पुत्रगण शफीक, हबीब कोंच के अलावा दमोह, झाँसी, जसवंतनगर, औरय्या में भी डील बनाने जाते हैं।

(2) श्रीराम के तीर तथा रावण, मेघनाद के गढ़ला बनाने का काम 160 वर्षों से एक पांचाल परिवार द्वारा किया जाता है, वर्तमान में उनके वंशज श्री बप्पी लहरी पांचाल हैं।

रामलीला भवन के निर्माता स्व. रामनारायण वैद्य तथा रामदयाल अग्रवाल (सर्राफ)

(3) मारीच का कंचन-मृगस्वरूप कुशवाहा परिवार द्वारा प्रदत्त सींगों द्वारा आज भी परम्परागत ढंग से बनाया जा रहा है। उसके वर्तमान वंशज श्री छोटे कुशवाहा हैं।

(4) श्री रामेश्वरम् स्थापना के लिए पुष्प एक माली परिवार लाता रहा है। आज तक 160 वर्षों से उसी परिवार के उत्तराधिकारी लाते हैं।

(5) दशहरा के मेले में विमान तथा रथ कहारोंद्वारा खींचा जाता है। आज भी परम्परा से उसी जाति के लोग विमान तथा रथ खींचते हैं।

इस रामलीला में सरकस की तर्ज पर एक हथिनी को करतब दिखाने के लिए प्रशिक्षित किया गया था, जो विभिन्न लीलाओं तथा मेले में करतब दिखाती थी। यह हथिनी कोंच के निकट भेड़ के जमींदार भैया साहबने दान में दी थी। उसकी खुराक के लिए एक खेत भी दान में मिला था। बाद में वह हथिनी मर गयी और परम्परा आगे नहीं चल सकी।

इस रामलीला की विभिन्न समितियों के कर्ता-धर्ताओं को पारम्परिक रंग-कर्म तथा लीला-मर्यादा दोनों की समझ है। रामलीला में मूर्तियों तथा पात्रों का चयन अनुकूलता तथा अनुभव पर आधारित है। मूर्तियों (पात्रों) के स्वरूप, सौन्दर्य तथा स्वर पर विशेष ध्यान दिया जाता है। उनकी वेशभूषा आदि की समुचित व्यवस्था उनकी माप की होती है। रामकथा की घटनाओं और कथा-सूत्र का समुचित संयोजन तुलसी की रामचरितमानस पर आधारित है किन्तु रामकथा के प्रत्यक्षदर्शी वाल्मीकि की रामायण से भी कथा-सूत्र पियोये गये हैं। अभिनय पारसी थियेटर शैली से प्रभावित है, वह संगीत तथा संवादों से समन्वित, समाजी द्वारा दृश्य की पृष्ठभूमि उद्घाटित तथा कथा-वाचन से बँधी है। दृश्य विधान सुन्दर, आकर्षक, प्रसंगानुकूल तथा नित नये प्रयोगों से समन्वित है। अश्लील नृत्य आदि की प्रस्तुति अनुमन्य नहीं है। मंच पर धूम्रपान, मद्यपान आदि निषिद्ध है। मूर्ति-परिसर में जूते पहनकर जाना भी निषिद्ध है।

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इस प्रकार कोंच की रामलीला आनुष्ठानिक, पारम्परिक, अनेक जातियों के समन्वय पर आधारित है। उसका एक सौ साठ वर्षों का इतिहास आज भी इन विशेषताओं का साक्षी है।

इस पुस्तक का  निर्माण अयोध्या शोध संसथान के संरक्षण में हुआ है। 





कोंच की रामलीला
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