Tuesday, 9 May 2017

Fresh Arrival : 'Bombay Meri Jaan' by Jayanti Rangnathan


रग-रग में दौड़ता हुआ शहर 

 बॉम्बे मेरी जान 

जयंती रंगनाथन 

350 /- | 978-93-5229-636-1 | संस्मरण 


 पुस्तक अंश 

हर मुम्बईकर का इस मायानगरी से अपनी तरह का अलग रिश्ता बनता है। मैंने अपने ही परिवार के ऐसे भी कुछ लोग देखे हैं जो पिछले पाँच दशक से इस शहर में रहते हुए भी इस शहर को जीने के बजायरोते हैं। मुम्बई एक शहर भर नहीं है। ज़िन्दगी जीने और अपने आपको समझने का एक गेटवे भी है।

धीरे-से और बहुत चुपके से यह शहर कब आपके अन्दर बसने लगता है और कब आपकी रगों में यह उल्लास और गति बनकर दौड़ने लगता है आपको पता ही नहीं चलता। पहली बार वड़ा पाव का स्वाद आपको अजीब-सा लग सकता है। सड़क किनारे पाव-भाजी के खोमचों पर भारी भीड़ देख आप चौंक सकते हैं। लेकिन बहुत जल्द आप भी उस भीड़ का हिस्सा बनने लगते हैं। बड़े-से तवे पर कलछुल की झनाझन मार...लहसुन की चटनी की तीखी गन्ध आपकी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का हिस्सा बन जाते हैं।

एक बार जब आप इस मायानगरी के रंग में रंग जाते हैंतो रात-दिन की भाग-दौड़आसपास की भीड़ में भी अपनेपन का अहसास होने लगता है। हर दिन दफ्तर आते-जाते मुम्बई की लोकल ट्रेन में आपको नये किरदार देखने-बुनने को मिलते हैं। ना जाने कितनी कहानियाँ हर वक़्त आपके आसपास तैरती रहती हैं। मुम्बई को अगर जानना हैतो ख़ुद एक कहानी बनना होगा।

पन्द्रह साल मुम्बई में रहने के बाद जब मैं दिल्ली आयीतो सालों तक वहाँ की तेजीरवानगीप्रोफेशनलिज़्म और हल्ला-गुल्ला मिस करती रही। आज भी करती हूँ। मेरे सपने में आज भी मुम्बई जागता हैमुझे बुलाता है। आज भी दिल के अन्दर कहीं ना कहीं एक मासूम सी ख़्वाहिश है...एक दिन...

 मैं जयंती रंगनाथन... 


तो? ...अपना परिचय देने से पहले कुछ तो बताना पड़ेगा ना अपने बारे में। अप्पा की ज़िद थी कि तीसरी बेटी का नाम जयंती रखा जाये। अम्मा क्या ज़िद करतींवो तो ख़ुद ही ज़िद्दी थीं। हर समय अपना पेट जुमला सुना-सुना कर मुझे वो बना दियाजो मैं आज बनने की राह पर हूँ।

तान पादिदैवम पादि...तमिल के इस जुमले का मतलब है आधे आपआधे देव। बहुत कुछ नहीं मिला था विरासत मेंअम्मा ने कहा था जो नहीं मिला उसकी शिकायत मत करो। अपना बाकी आधा ख़ुद पूरा करो।

अगर ऐसा ना करतीतो एक मध्यमवर्ग तमिल परिवार में एक बैंकर बनीसिर पर फूलों का गजरा लगाएबालों में तेल चुपड़ कोई दूसरी ही ज़िन्दगी जी रही होती। अम्मा की बात सुनी भीगुनी भीतो बचपन से उस भाषा में लिखना शुरू किया जिससे मुझे अजीम मोहब्बत है।

पढ़ाई की थी बैंकर बनने के लिए। मुम्बई में एम. कॉम. के बाद जब टाइम्स ऑफ इंडिया की प्रतिष्ठित पत्रिका धर्मयुग’ में काम करने का मौका मिला तो लगा यही मेरा शौक भी है और पेशा भी। दस साल वहाँ काम करने के बाद कुछ वर्षों तक सोनी एंटरटेनमेंट टेलीविजन’ से जुड़ी। दिल्ली आयी वनिता’ पत्रिका शुरू करने। अमर उजाला’ से होते हुए पिछले छह सालों से दैनिक हिन्दुस्तान’ में हूँ। फीचर के अलावा नन्दन’ की सम्पादक भी हूँ।

चार सीरियलतीन उपन्यास और एक कहानी-संग्रह के बाद मौका मिला है अपने प्रिय महानगर मुम्बई को तहेदिल से शुक्रिया अदा करने का। लव यू बॉम्बे...जान तो बस तुम ही हो सकती हो!


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