Monday, 24 April 2017

दाई : टेकचन्द



वाणी प्रकाशन से प्रकाशित
युवा लेखक टेकचन्द
की नवीनतम कृति 
दाई 
 दलित स्त्री की महागाथा 

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आई.एस.बी.एन: 978-93-7229-600-2 (हार्ड कवर)
 विषय: उपन्यास   
 संस्करण: प्रथम 
वर्ष: 2017   
 मूल्य: 195/-  हार्ड कवर
 पृष्ठ संख्या: 195 
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 पुस्तक के बारे में 

रेशम बुआ जैसे एक नहीं थीं। अनेक मर्दऔरतेंकलाकार और रूप-रंग उनके अन्दर समाए हुए थे। कमेरीघर बसावाहँसोड़नुस्ख़ेबाहुनरमन्दअनुभवी इत्यादि कितने ही किरदार उनके रेशे-रेशे मेंबसकर उन्हें रेशम बनाये हुए थे।
एक और बड़ा किरदार उन्हें निभाना थादाई का किरदार। अपना जीवन तो जी भर जियाअभी औरों को भी जीवन देना था।दाई! जीवन देने वालीजीवन जगाने वालीदुनिया में आये इंसान को पहली इंसानी छुअन देने वाली,इंसानी अहसास से रूबरू करवाने वाली दाई।
हर गाँव में एक दाई होती थी। यह एक सामाजिक नियम था जो अब प्राकृतिक-सा हो चला था। एकदम ऐसे जैसे बिम्ब प्रतीक का रूप ले लेता है। दाई दलित समाज सेविशेषकर वाल्मीकि समाज से होती थी।

अथक परिश्रमधैर्यजीवन के प्रति संवेदनातमाम विषमताओं के बीच से जीवन कमल को निकाल लानासास्वच्छ जीवन्त दृष्टि। यह कोई दलित ही कर सकता है वह भी स्त्री। जो स्वयं भी सिरजनहार होती है। शिव की वंशज। सारा हलाहल स्वयं पी औरों को जीवन देना। यह दाई ही कर सकती है। वो जिसने अपना जीवन भी विद्रूपताओं से निकालकर अदम्य जिजीविषा से सींच दिया हो।


टेकचन्द

जन्म: 10 जनवरी 1975शिक्षा: एम. फिल.पीएच.डी. (हिन्दी)दिल्ली विश्वविद्यालय।प्रकाशन: अज्ञेय : एक समग्र अवलोकन (आलोचना)मोर का पंख तथा अन्य कहानियाँदौड़ तथा अन्य कहानियाँ (कहानी संग्रह)भाषा साहित्य और सर्जनात्मकता (सह-सम्पादन)।

सम्पादन: अपेक्षा’ और युद्धरत आम आदमी’ त्रौमासिक पत्रिका में सम्पादन में सहयोग।सम्मान: हरियाणा दलित साहित्य अकादमी द्वारा डॉ. अम्बेडकर विशिष्ट सेवा सम्मान, 2006; राजेन्द्र यादव हंस कथा सम्मान, 2014 'मोर का पंख कहानी' के लिए।



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