Monday, 17 April 2017

रीतिकाल : सेक्सुअलिटी का समारोह - सुधीश पचौरी


             
रीतिकाल : सेक्सुअलिटी का समारोह
(रीतिकाल में फूको विचरण)

सुधीश पचौरी


495 | 978-93-5229-644-6(हार्ड कवर)
250 | 978-93-5229-646-0 (पेपरबैक) 
आलोचना | पृष्ठ संख्या -184 

सुधीश पचौरी की यह किताब आलोचना की जड़ता पर प्रहार है।

 - दैनिक ट्रिब्यून में पुस्तक की समीक्षा करते हुए  
वरिष्ठ पत्रकार अनंत विजय  

पुस्तक अंश  
  • यह एक झकझोर देने वाली किताब है!
  • यह अब तक लिखे गये हिन्दी साहित्य के इतिहास के निष्कर्षों का रिवर्सल रती है और रीतिकाल का उद्धार करती है। यह सप्रमाण सिद्ध करती है कि रीतिकाल के कवि पहले फ्रीलांसर और प्रोफेशनल कवि थेजो कविशिक्षा दिया करते थे और जोे हिन्दी के पहले रूपवादी और सेकुलर कवि थे।
  • यहाँरीतिकाल की कविता अश्लील या निन्दनीय न होकर सेक्सुअलिटी का समारोह है जिसमेंउस दौर में सचमुच जिन्दा और प्रोफेशनल स्त्रियाँ अपनी देह सत्ता’ और देह इतिहास’ को रचती हैं। ये नायिकाएँ अपनी सेक्सुअलिटी के प्रति बेहद सजग - हैं। कविता में उनकी जबर्दस्त दृश्यमानता उनको इस कदर ‘ऐंपावर’ करती है कि उसे देखकर हिन्दी साहित्य के इतिहास लिखने वाले बड़े-बड़े आचार्याें को अपना ब्रह्मचर्य डोलता दिखा है और बदले में वे इन स्त्रियों को शाप देते आये हैं!
  • यह किताब नव्य इतिहासवादी’, ‘उत्तर आधुनिकतावादी’, ‘उत्तर-संरचनावादी’ और सांस्कृतिक भौतिकतावादी’ नजरिए से हिन्दी साहित्य के नैतिकतावादी दरोगाओं द्वारा रीतिकाल की इन चिर निन्दित स्त्रियों के सम्मान को बहाल करती हैरीतिकाल के कुपाठियों की वैचारिक राजनीति को सप्रमाण ध्वस्त करती है और रीतिकाल को नये सिर से पढ़ने को विवश करती है!

सुधीश पचौरी
पूर्व अध्यक्ष, हिन्दी विभाग; पूर्व डीन ऑफ़ कॉलेजेज एवं पूर्व प्रोवासचांसलर,
दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली।

जन्मः 29 दिसम्बर 1948जनपद अलीगढ़।
शिक्षाः एम.ए. (हिन्दी) (आगरा विश्वविद्यालय)पीएच.डी. एवं पोस्ट डॉक्टरोल शोध (हिन्दी)दिल्ली विश्वविद्यालय,दिल्ली।

मार्क्सवादी समीक्षकप्रख्यात स्तम्भकारमीडिया विशेषज्ञ।

चर्चित पुस्तकेः नयी कविता का वैचारिक आधारकविता का अन्तदूरदर्शन की भूमिकादूरदर्शनः स्वायत्तता और स्वतन्त्रता(सं.)उत्तर-आधुनिक परिदृश्यउत्तर-आधुनिकता और उत्तर संरचनावादनवसाम्राज्यवाद और संस्कृतिनामवर के विमर्श (सं.)उत्तर-आधुनिक साहित्य विमर्शदूरदर्शनः विकास से बाज़ार तकउत्तर-आधुनिक साहित्यिक-विमर्शदेरिदा का विखण्डन और विखण्डन में कामायनी’; मीडिया और साहित्यटीवी टाइम्ससाहित्य का उत्तरकाण्डअशोक वाजपेयी पाठ कुपाठ (सं.)प्रसार भारती और प्रसारण-परिदृश्यदूरदर्शनः सम्प्रेषण और संस्कृतिस्त्री देह के विमर्शआलोचना से आगेमीडियाजनतन्त्र और आतंकवादनिर्मल वर्मा और उत्तर-उपनिवेशवादविभक्ति और विखण्डनहिन्दुत्व और उत्तर-आधुनिकतामीडिया की परखपॉपूलर कल्चरभूमण्डलीकरणबाज़ार और हिन्दीटेलीविजन समीक्षाः सिद्धान्त और व्यवहार;उत्तर-आधुनिक मीडिया विमर्शविंदास बाबू की डायरीफासीवादी संस्कृति और पॉप-संस्कृति।

सम्मानः मध्यप्रदेश साहित्य परिषद् का रामचन्द्र शुक्ल सम्मान (देरिदा का विखण्डन और विखण्डन में कामायनी’); भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार से सम्मानितदिल्ली हिन्दी अकादमी द्वारा साहित्यकार’ का सम्मानशमशेर सम्मान एवं केन्द्रीय हिन्दी संस्थान का सुब्रह्मण्यम भारती सम्मान। 

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