Tuesday, 25 April 2017

'शहरनामा फैजाबाद' की समीक्षा का एक अंश, अहा ! ज़िन्दगी पत्रिका में |

'शहरनामा फैजाबाद

की समीक्षा का एक अंशअहा ! ज़िन्दगी पत्रिका में

 'शहरनामा फैजाबाद' अवध के नवाबी दौर की पहली राजधानी यानि फैजाबाद की बहुत से एंगल्स से बांची गयी एक रोचक दास्ताँ है| पुस्तक के पन्ने पलटते हुए लगता है जैसे शहर को पूरा का पूरा समेटकर कागज़ पर उतार दिया गया हो |

Monday, 24 April 2017

दाई : टेकचन्द



वाणी प्रकाशन से प्रकाशित
युवा लेखक टेकचन्द
की नवीनतम कृति 
दाई 
 दलित स्त्री की महागाथा 

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आई.एस.बी.एन: 978-93-7229-600-2 (हार्ड कवर)
 विषय: उपन्यास   
 संस्करण: प्रथम 
वर्ष: 2017   
 मूल्य: 195/-  हार्ड कवर
 पृष्ठ संख्या: 195 
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 पुस्तक के बारे में 

रेशम बुआ जैसे एक नहीं थीं। अनेक मर्दऔरतेंकलाकार और रूप-रंग उनके अन्दर समाए हुए थे। कमेरीघर बसावाहँसोड़नुस्ख़ेबाहुनरमन्दअनुभवी इत्यादि कितने ही किरदार उनके रेशे-रेशे मेंबसकर उन्हें रेशम बनाये हुए थे।
एक और बड़ा किरदार उन्हें निभाना थादाई का किरदार। अपना जीवन तो जी भर जियाअभी औरों को भी जीवन देना था।दाई! जीवन देने वालीजीवन जगाने वालीदुनिया में आये इंसान को पहली इंसानी छुअन देने वाली,इंसानी अहसास से रूबरू करवाने वाली दाई।
हर गाँव में एक दाई होती थी। यह एक सामाजिक नियम था जो अब प्राकृतिक-सा हो चला था। एकदम ऐसे जैसे बिम्ब प्रतीक का रूप ले लेता है। दाई दलित समाज सेविशेषकर वाल्मीकि समाज से होती थी।

अथक परिश्रमधैर्यजीवन के प्रति संवेदनातमाम विषमताओं के बीच से जीवन कमल को निकाल लानासास्वच्छ जीवन्त दृष्टि। यह कोई दलित ही कर सकता है वह भी स्त्री। जो स्वयं भी सिरजनहार होती है। शिव की वंशज। सारा हलाहल स्वयं पी औरों को जीवन देना। यह दाई ही कर सकती है। वो जिसने अपना जीवन भी विद्रूपताओं से निकालकर अदम्य जिजीविषा से सींच दिया हो।


टेकचन्द

जन्म: 10 जनवरी 1975शिक्षा: एम. फिल.पीएच.डी. (हिन्दी)दिल्ली विश्वविद्यालय।प्रकाशन: अज्ञेय : एक समग्र अवलोकन (आलोचना)मोर का पंख तथा अन्य कहानियाँदौड़ तथा अन्य कहानियाँ (कहानी संग्रह)भाषा साहित्य और सर्जनात्मकता (सह-सम्पादन)।

सम्पादन: अपेक्षा’ और युद्धरत आम आदमी’ त्रौमासिक पत्रिका में सम्पादन में सहयोग।सम्मान: हरियाणा दलित साहित्य अकादमी द्वारा डॉ. अम्बेडकर विशिष्ट सेवा सम्मान, 2006; राजेन्द्र यादव हंस कथा सम्मान, 2014 'मोर का पंख कहानी' के लिए।



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Thursday, 20 April 2017

वाणी प्रकाशन समाचार ( वर्ष :10, अंक : 119, अप्रैल 2017 )




प्रिय पाठकों,

प्रस्तुत है वाणी प्रकाशन समाचार 

 वर्ष :10, अंक : 119, अप्रैल  2017  

























'Is Paar Kabhi Us Paar' by Padmaja Ghorpare



  शब्दों की सीमा समाप्ति पर आरम्भ होती कविताएँ  

इस पार कभी उस पार

पद्मजा घोरपड़े
मूल्य 295/- | 978-93-5229-601-9 | कविता संग्रह 

पुस्तक अंश
पद्मजा घोरपड़े की कविताओं की विविध और बहुरंगी दुनिया में प्रवेश करने के लिए सबसे पहले उनकी इस प्रतिश्रुति को ध्यान में रखना चाहिए कि जहाँ शब्दों की सीमाएँ समाप्त होती हैं वहीं से कविता आरम्भ होती है।’ 
कविता को लेकर यह समझ कोई मामूली समझ नहीं है बल्कि बहुत ही मार्के की और दूरदृष्टि वाली समझ है। आज जहाँ काव्य रचना में शब्दों की स्फीति और वाग्जाल की अधिकता मिलती है वहीं पद्मजा घोरपड़े शब्दों की सीमा की बात करती हैं और इसे रचना की एक बुनियादी ज़रूरत के रूप में देखती हैं। इसे एक विरल काव्य बोध ही कहा जाएगा-अवधारणा की दृष्टि से और प्रस्थान-बिन्द की दृष्टि से भी। यदि गहराई से देखा जाय तो 'इस पार कभी उस पार' की कविताएँ इसी काव्य-बोध का निरन्तर विस्तार करती प्रतीत होती हैं। 

ईसप और पंचतन्त्र की नीति कथाओं से प्रेरणा ग्रहण करते हुएउनका एक आधुनिक संस्करण रचते हुए ‘कभी इस पार कभी उस पार’ में सूरजपहाड़नदीसागरसाहिलसावन और हवाओं पर लिखी कविताएँ भी मिलेंगी। इन कविताओं में नागफनी की झाड़ियाँ हैंसोते हुए जंगल हैंनींद ओढ़े हुए अफ़साने और ऊँघते हुए मकान भी हैं ,यहाँ बबूल उगाते खेत और सूखी आँखों वाले कुएँ हैं तो फुसफुसाती हुई हवाएँ और आँसुओं के कफ़न में लिपटी हुई खुशियाँ भी हैं और इन सबके बीच जीने की जद्दोजेहद करता हुआ एक अदना-सा अंकुर भी है जिसमें अपने चारों ओर की विषम परिस्थितियों से भी जीवन-रस को खींच लेने का माद्दा हैअपने अस्तित्व को पहचानने की कोशिश और कशिश है। और सबसे बड़ी बात यह कि इन कविताओं में समय का एक बेहद तीखा बोध भी हैउसकी नब्ज़ पकड़कर उसके पार और उससे परे जाने का एक दर्शन भी है।

संग्रह की कविताओं में मानवीय अनुभवों और उनके सूक्ष्मतम निहितार्थों के साथ-साथ मानव और प्राकृतिक दुनिया के अलग-अलग पड़ावों के मार्मिक अनुभवों-प्रसंगों को उभारने वाले बिम्ब हैं। मानवीय सरोकारों के निरन्तर फैलते हुए क्षितिज को रेखांकित करती हुई यह दुहरी बिम्ब-रचना उनकी कविताओं की एक दुर्लभ विशेषता बन गयी है। कठोर अनुभव और सच्चाइयों से लबरेज ये बिम्ब कविता में धीरे-धीरे ढलते और पिघलते हुए एक आन्तरिक संगीत की सृष्टि करते हैं। कविताओं में निहित प्रश्नाकुलतासंवादधर्मिताआश्चर्य-विस्मय और व्यंग्य की ख़ूबियाँ उन्हें बार-बार पढ़ने और सोचने पर मज़बूर करती हैं। 

पद्मजा घोरपड़े


एसोसिएट प्रोफ़ेसरहिन्दी विभागाध्यक्ष एवं भूतपूर्व प्रभारी प्राचार्यस.प. महाविद्यालयपुणे। प्रकाशित पुस्तकें: कुल 38; समीक्षाकविताकहानी, पत्रकारिताजीवनी तथा अनुवाद लेखन हेतु राष्ट्रीय स्तर के 5 पुरस्कार प्राप्त।

डॉ. पद्मजा घोरपड़े की कविता का अनुशीलन’ पर एम. फिल्. शोध प्रबन्ध (शिवाजी विद्यापीठकोल्हापुर)। राष्ट्रीय स्तर की पत्र-पत्रिकाओं में लगभग 80 शोधपरक और समीक्षात्मक लेख प्रकाशित। केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय द्वारा आयोजित नवलेखक शिविरों में मार्गदर्शक के रूप में भागीदारी(कोच्चीतिरुअनन्तपुरमपुणे आदि)। ग्योटिंगन विद्यापीठ (जर्मनी) के छात्रों के लिए हिन्दी अध्यापन (2003 से 2008 तक)।


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Monday, 17 April 2017

रीतिकाल : सेक्सुअलिटी का समारोह - सुधीश पचौरी


             
रीतिकाल : सेक्सुअलिटी का समारोह
(रीतिकाल में फूको विचरण)

सुधीश पचौरी


495 | 978-93-5229-644-6(हार्ड कवर)
250 | 978-93-5229-646-0 (पेपरबैक) 
आलोचना | पृष्ठ संख्या -184 

सुधीश पचौरी की यह किताब आलोचना की जड़ता पर प्रहार है।

 - दैनिक ट्रिब्यून में पुस्तक की समीक्षा करते हुए  
वरिष्ठ पत्रकार अनंत विजय  

पुस्तक अंश  
  • यह एक झकझोर देने वाली किताब है!
  • यह अब तक लिखे गये हिन्दी साहित्य के इतिहास के निष्कर्षों का रिवर्सल रती है और रीतिकाल का उद्धार करती है। यह सप्रमाण सिद्ध करती है कि रीतिकाल के कवि पहले फ्रीलांसर और प्रोफेशनल कवि थेजो कविशिक्षा दिया करते थे और जोे हिन्दी के पहले रूपवादी और सेकुलर कवि थे।
  • यहाँरीतिकाल की कविता अश्लील या निन्दनीय न होकर सेक्सुअलिटी का समारोह है जिसमेंउस दौर में सचमुच जिन्दा और प्रोफेशनल स्त्रियाँ अपनी देह सत्ता’ और देह इतिहास’ को रचती हैं। ये नायिकाएँ अपनी सेक्सुअलिटी के प्रति बेहद सजग - हैं। कविता में उनकी जबर्दस्त दृश्यमानता उनको इस कदर ‘ऐंपावर’ करती है कि उसे देखकर हिन्दी साहित्य के इतिहास लिखने वाले बड़े-बड़े आचार्याें को अपना ब्रह्मचर्य डोलता दिखा है और बदले में वे इन स्त्रियों को शाप देते आये हैं!
  • यह किताब नव्य इतिहासवादी’, ‘उत्तर आधुनिकतावादी’, ‘उत्तर-संरचनावादी’ और सांस्कृतिक भौतिकतावादी’ नजरिए से हिन्दी साहित्य के नैतिकतावादी दरोगाओं द्वारा रीतिकाल की इन चिर निन्दित स्त्रियों के सम्मान को बहाल करती हैरीतिकाल के कुपाठियों की वैचारिक राजनीति को सप्रमाण ध्वस्त करती है और रीतिकाल को नये सिर से पढ़ने को विवश करती है!

सुधीश पचौरी
पूर्व अध्यक्ष, हिन्दी विभाग; पूर्व डीन ऑफ़ कॉलेजेज एवं पूर्व प्रोवासचांसलर,
दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली।

जन्मः 29 दिसम्बर 1948जनपद अलीगढ़।
शिक्षाः एम.ए. (हिन्दी) (आगरा विश्वविद्यालय)पीएच.डी. एवं पोस्ट डॉक्टरोल शोध (हिन्दी)दिल्ली विश्वविद्यालय,दिल्ली।

मार्क्सवादी समीक्षकप्रख्यात स्तम्भकारमीडिया विशेषज्ञ।

चर्चित पुस्तकेः नयी कविता का वैचारिक आधारकविता का अन्तदूरदर्शन की भूमिकादूरदर्शनः स्वायत्तता और स्वतन्त्रता(सं.)उत्तर-आधुनिक परिदृश्यउत्तर-आधुनिकता और उत्तर संरचनावादनवसाम्राज्यवाद और संस्कृतिनामवर के विमर्श (सं.)उत्तर-आधुनिक साहित्य विमर्शदूरदर्शनः विकास से बाज़ार तकउत्तर-आधुनिक साहित्यिक-विमर्शदेरिदा का विखण्डन और विखण्डन में कामायनी’; मीडिया और साहित्यटीवी टाइम्ससाहित्य का उत्तरकाण्डअशोक वाजपेयी पाठ कुपाठ (सं.)प्रसार भारती और प्रसारण-परिदृश्यदूरदर्शनः सम्प्रेषण और संस्कृतिस्त्री देह के विमर्शआलोचना से आगेमीडियाजनतन्त्र और आतंकवादनिर्मल वर्मा और उत्तर-उपनिवेशवादविभक्ति और विखण्डनहिन्दुत्व और उत्तर-आधुनिकतामीडिया की परखपॉपूलर कल्चरभूमण्डलीकरणबाज़ार और हिन्दीटेलीविजन समीक्षाः सिद्धान्त और व्यवहार;उत्तर-आधुनिक मीडिया विमर्शविंदास बाबू की डायरीफासीवादी संस्कृति और पॉप-संस्कृति।

सम्मानः मध्यप्रदेश साहित्य परिषद् का रामचन्द्र शुक्ल सम्मान (देरिदा का विखण्डन और विखण्डन में कामायनी’); भारतेन्दु हरिश्चन्द्र पुरस्कार से सम्मानितदिल्ली हिन्दी अकादमी द्वारा साहित्यकार’ का सम्मानशमशेर सम्मान एवं केन्द्रीय हिन्दी संस्थान का सुब्रह्मण्यम भारती सम्मान। 

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