Wednesday, 15 March 2017

विशिष्ट : वाणी प्रकाशन से प्रकाशित होगा 'हिन्दी साहित्य ज्ञानकोश'



हिन्दी साहित्य ज्ञानकोश
भारत की सांस्कृतिक निधियों का आलोक स्तम्भ


डॉ. कुसुम खेमानी वाणी प्रकाशन के प्रबन्ध निदेशक अरुण माहेश्वरी को
 'हिन्दी साहित्य ज्ञानकोश' 
की सीडी सौंपते हुए, साथ में वरिष्ठ कवी केदारनाथ सिंह,
 प्रधान सम्पादक शंभुनाथ और मन्त्री  नन्दलाल शाह। 

भारतीय भाषा परिषद् द्वारा प्रख्यात आलोचक और विद्वान प्रो. शंभुनाथ के नेतृत्व में तीन वर्षों के अथक प्रयास से तैयार किया जा रहा हिन्दी साहित्य ज्ञानकोश अब प्रकाशन के लिए तैयार है। भारतीय भाषा परिषद् की ओर से मन्त्री नन्दलाल शाह और वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली की ओर से अरुण माहेश्वरी ने कोलकाता में कुसुम खेमानी की उपस्थिति में इसके निमित्त एक समझौते पर हस्ताक्षर किये। वाणी प्रकाशन इसका मुख्य वितरक है। आधुनिक पद्धति से बना हिन्दी साहित्य ज्ञानकोश 5000 से अधिक पृष्ठों का है और यह दस खण्डों में प्रकाशित होगा। इसमें लगभग 1500 चित्र भी होंगे। इसे तैयार करने, प्रकाशित करने और देश के विभिन्न शहरों में प्रमोशन पर आने वाला कुल खर्च लगभग एक करोड़ पच्चीस लाख तक अनुमानित है। 

भारतीय भाषा परिषद् और वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली के बीच हुए समझौते के अवसर पर सुप्रसिद्ध कवि केदारनाथ सिंह ने कहा कि कोलकाता से आधुनिक हिन्दी और पत्रकारिता की शुरुआत हुई थी। आजादी के बाद कोलकाता एक बार फिर इस ऐतिहासिक और महत्त्वपूर्ण कार्य का केन्द्र बना है। भारतीय भाषा परिषद् ने यह ऐतिहासिक कार्य कराया है। हिन्दी साहित्य ज्ञानकोशके कई संस्करण होंगे। यह कई पीढ़ियों के लिए आलोक स्तम्भ का काम करेगा। इस अवसर पर वाणी प्रकाशन के अरुण माहेश्वरी ने देश के विभिन्न शहरों में विभिन्न संस्थाओं के सहयोग से इसके लोकार्पण और प्रमोशन की घोषणा की। उम्मीद की जाती है कि छह महीनों के भीतर हिन्दी साहित्य ज्ञानकोशछप कर तैयार होगा। 


कोश के पहले संस्करण के कुल 3000 सेट प्रकाशित होंगे। दस खण्डों का पेपरबैक संस्करण भी विद्यार्थियों को विशेष छूट पर उपलब्ध होगा। 

हिन्दी में पहला विश्वकोश नगेन्द्रनाथ बसु ने 24 खण्डों में 1916 से 1931 बीच प्रकाशित किया था। इससे पहले वे बांग्ला विश्वकोश का काम शुरू कर चुके थे और हिन्दी विश्वकोश उसकी छाया था। लम्बे समय तक यही हिन्दी विश्वकोश चलन में रहा। फिर 1958 में धीरेन्द्र वर्मा के सम्पादन में हिन्दी साहित्य कोश आया। इसका पहला संस्करण मुख्यतः पारिभाषिक शब्दावलियों पर केन्द्रित था। 1965 के दूसरे संस्करण में नामावली का खण्ड जुड़ा। अन्तिम रूप से यह 1970 में संशोधित-परिवर्धित हुआ था, पर छप पाया 1985 में। पिछले लगभग 45-50 सालों से यही कोश उपलब्ध था। यह एक विडम्बनाजनक स्थिति कही जाएगी, क्योंकि कोई भाषा तब तक दरिद्र है जब तक उसमें एक अद्यतन, तथ्यपूर्ण, समावेशी और सारवान ज्ञानकोश न हो।

हिन्दी साहित्य ज्ञानकोशमें साहित्य से सम्बन्धित विषयों- साहित्येतिहास, साहित्य के सिद्धान्त, भाषाविज्ञान आदि के अलावा हिन्दी की लोकभाषाओं, हिन्दी-उर्दू अन्तःसम्बन्ध, बहुलतावादी भारतीय संस्कृति, कलाओं, धर्म, दर्शन, समाज विज्ञान, इतिहास, मीडिया, अनुवाद, मानवाधिकार, पर्यावरण, पश्चिमी सिद्धान्तकार, राजनैतिक व्यक्तित्व, पौराणिक चरित्र, लोकसंस्कृति, वैश्वीकरण, उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श, सभी राष्ट्रीय भाषाओं, प्रबन्धन आदि 33 विषयों से सम्बन्धित 2640 प्रविष्टियाँ हैं। 

ये प्रविष्टियाँ 300 से अधिक विद्वानों द्वारा लिखी गई हैं। पिछले दशकों से साहित्य का अर्थ व्यापक हुआ है। यह जितना स्थानीय और राष्ट्रीय मामला है, उतना ही हर देश में वैश्विक प्रभाव से भी जुड़ा है। इसलिए स्वाभाविक है कि हिन्दी साहित्य ज्ञानकोशमें भारतीय जीवन की समस्याओं से जुड़े विविध विषयों का समावेश किया गया है।

हिन्दी की प्रकृति और भूमिका अन्य भारतीय भाषाओं से कुछ विशिष्ट है। इसलिए यह कोश हिन्दी प्रदेशों के अलावा दक्षिण भारत, उत्तर-पूर्व और अन्य भारतीय क्षेत्रों की भाषाओं, संस्कृतियों, दर्शनों, सिद्धान्तों और महान कृतियों से भी साक्षात्कार कराएगा। इतना ही नहीं, यह हिन्दी क्षेत्र की 48 लोकभाषाओं, भाषाओं और इनकी कलाओं-संस्कृतियों की भी छवियाँ प्रस्तुत करेगा। 


 ज्ञानकोश : एक नज़र में 

·         पिछले 50 सालों में दुनिया में ज्ञान का जो नया विस्फोट हुआ, उसका कोई
प्रतिबिम्ब हिन्दी के पिछले ज्ञानकोशों में नहीं है, जबकि प्रस्तुत ज्ञानकोश में
अद्यतन सूचनाएँ और विश्लेषण हैं ।

·         हिन्दी साहित्य ज्ञानकोश की 2640 प्रविष्टियाँ संख्या ही नहीं, गुण की दृष्टि
से भी पाठकों को आकर्षित करेंगी क्योंकि ये सम्पादक मण्डल के विद्धनों द्वारा  प्री-रिव्यूड हैं और बहुत जाँच-परख कर शामिल की गयी हैं

·         हिन्दी साहित्य ज्ञानकोश में साहित्यिक विषय तो हैं ही, ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों से संबन्धित प्रविष्टियाँ भी हैं जो अब तक और किसी विश्वकोश में नहीं हैं।

·         यह ज्ञानकोश साहित्य के विद्यार्थियों के अलावा आम पाठकों और जिज्ञासुके लिए भी एक धरोहर का काम करेगा जो, देश समाज संस्कृतियों और दुनिया को समझना चाहते हैं।

·         इस ज्ञानकोश के निर्माण में बासी कढ़ी में उबाल को भी पसन्द नहीं किया गया है।




आज का पाठक किसी कोश से बहुत सारी चीजों के बारे में जानना चाहता है। कोई कोश पाठक की सारी जिज्ञासाओं का समाधान नहीं कर सकता, पर एक सार्थक कोश उसकी जिज्ञासाओं को तीव्र जरूर करता है। यह प्रसन्नता की बात है कि देश भर से वरिष्ठ और नयी पीढ़ी के लगभग 300 लेखकों द्वारा मूल रूप से हिन्दी में लिखी गयी प्रविष्टियों के व्यापक सहयोग से यह हिन्दी साहित्य ज्ञानकोशतैयार हुआ है। 

यह हिन्दी पर केन्द्रित होते हुए भी भारत के हजारों साल के चिन्तन और विविध उपलब्धियों का निचोड़ है, ताकि हिन्दी की विशिष्टता के साथ अखण्डता भी नजर आए। ज्ञानकोश का अर्थ महज सूचनाओं का गोदाम नहीं है। इसलिए हिन्दी साहित्य ज्ञानकोशसूचनापरक होने के साथ पठनीय और व्यापक विजन से भरापूरा है। यह सम्पूर्ण देश और हिन्दी की एक सामूहिक उपलब्धि है। इसका निर्माण साहित्य और संस्कृति के एक बेहद कठिन समय में कई चुनौतियों से गुजरते हुए हुआ है।

हिन्दी साहित्य ज्ञानकोशके सम्पादक मंडल में देश के विभिन्न राज्यों के जानमाने विद्वान शामिल हैं- राधावल्लभ त्रिपाठी, जबरीमल्ल पारख, अवधेश प्रधान, अवधेश कुमार सिंह और अवधेश प्रसाद सिंह और अन्य गणमान्य विद्वान इसके सदस्य हैं।। प्रसिद्ध पत्रकार राजकिशोर ज्ञानकोश के भाषा सम्पादक हैं। हिन्दी साहित्य ज्ञानकोशके प्रधान सम्पादक हैं प्रसिद्ध शिक्षाविद् और आलोचक शंभुनाथ, जिन्होंने तीन साल के अथक परिश्रम से हिन्दी के एक बड़े सपने को मूर्त रूप प्रदान किया है।

हिन्दी साहित्य ज्ञानकोशनिस्संदेह ही भारत की मूल्यवान सांस्कृतिक निधियों का दर्पण होगा। यह पूरे हिन्दी क्षेत्रा की बौद्धिक चेतना को जोड़ने का काम करेगा और ज्ञान के नये उजास से हिन्दी पाठकों को आलोकित करेगा।

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