Wednesday, 15 March 2017

विनोद भारद्वाज को वाणी प्रकाशन लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड



विनोद भारद्वाज को वाणी प्रकाशन लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड


विनोद भारद्वाज को लाइफ अचीवमेंट अवार्ड  प्रदान  करते हुए बायें से अयोध्या शोध संस्थान के निदेशक डॉ. योगेन्द्र  प्रताप सिंह, प्रो.  हरीश त्रिवेदी, विख्यात कथाकार उदय प्रकाश (पीछे ), प्रो. सुधीश पचौरी और वाणी प्रकाशन के प्रबन्ध  निदेशक अरुण  माहेश्वरी  

वाणी फ़ाउंडेशन और इन्द्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय के संयुक्त तत्त्वावधान में आयोजित हिन्दी महोत्सव के दूसरे दिन (4 मार्च 2017) इन्द्रप्रस्थ कॉलेज के कॉन्फ्रेंस रूम में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में वाणी प्रकाशन के सम्पादकीय विभाग से जुड़े वरिष्ठ प्रूफ़ संशोधक श्री विनोद भारद्वाज को वाणी प्रकाशन लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड प्रदान किया गया। विख्यात आलोचक प्रो. सुधीश पचौरी और ख्यातिप्राप्त विद्वान प्रो. हरीश त्रिवेदी के हाथों श्री भारद्वाज को सम्मानित किया गया। सम्मान के तौर पर उन्हें वाणी प्रकाशन का प्रतीक चिह्न (माँ सरस्वती की प्रतिमा), शॉल एवं 11,000 रुपये की राशि भेंट की गयी। इस अवसर पर विख्यात लेखक उदय प्रकाश, वरिष्ठ मीडियाकर्मी प्रियदर्शन, भाषाशास्त्राी प्रो. अन्विता अब्बी, अयोध्या शोध संस्थान के निदेशक डॉ. योगेन्द्र प्रताप सिंह, वाणी फ़ाउंडेशन के चेयरमैन अरुण माहेश्वरी एवं फ़ाउंडेशन की मैनेजिंग ट्रस्टी और हिन्दी महोत्सव की फेस्टिवल डायरेक्टर अदिति माहेश्वरी-गोयल भी मंच पर उपस्थित थीं। विनोद भारद्वाज को लगभग तीन दशकों तक वाणी प्रकाशन से जुड़े रहकर अपनी ईमानदार सेवा, निष्ठा और कर्मठता के लिए यह सम्मान प्रदान किया गया। 

श्री भारद्वाज का जन्म 1964 में अलीगढ़ के गौमत गाँव में हुआ। आरम्भिक शिक्षा के बाद उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में स्नातक, सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्राी और महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय (रोहतक) से बी.एड. की उपाधियाँ प्राप्त कीं। अस्सी के दशक में उन्होंने हिन्दी प्रकाशन की दुनिया में कदम रखा और एक कुशल प्रूफ़ संशोधक के रूप में जल्दी ही ख्याति प्राप्त करने लगे। शुरुआत के कुछ वर्षों में उन्होंने हिन्दी के कई प्रतिष्ठित प्रकाशकों के लिए प्रूफ़ संशोधन का काम किया और तत्पश्चात 27 वर्षों से वाणी प्रकाशन से जुड़े हैं और वर्तमान में वरिष्ठ प्रूफ़ संशोधक के पद पर आसीन हैं। तीन दशक के अपने कॅरियर में उन्होंने प्रूफ़ संशोधन के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान किया और लेखक समुदाय का ध्यान खींचा, ख्याति के साथ-साथ उन सबका विश्वास भी अर्जित किया। 

उनका मानना है कि आजकल जो पाण्डुलिपियाँ आती हैं वे भाषाई दृष्टि से बहुत अस्त-व्यस्त होती हैं। आज कम्प्यूटर के नये-नये फॉण्ट हैं। लेखक-अनुवादक-सम्पादक किसी पाण्डुलिपि को पूरी तरह दुरुस्त करके नहीं भेजते। अपने सम्बोधन में उन्होंने वाणी फ़ाउंडेशन और वाणी प्रकाशन परिवार का आभार व्यक्त किया और उन सभी विद्वानों, दोस्तों और वाणी प्रकाशन के सभी कर्मचारियों के प्रति आभार व्यक्त किया जो समय-समय पर उनके कार्य को प्रोत्साहित करते रहे। इस अवसर पर प्रो. सुधीश पचौरी ने कहा कि जब कोई पाण्डुलिपि विनोद जी की मेज़ से होकर गुजरती है तो लेखक आश्वस्त हो जाता है कि अब उसकी पुस्तक बिल्कुल त्राुटिहीन छपेगी। 


 (वाणी प्रकाशन समाचार के मार्च 2017 अंक में प्रकाशित)