Thursday, 2 March 2017

हिंदी महोत्सव'17 के वक्तागण





हिंदी महोत्सव'17 के वक्तागण 


रक्षंदा जलील ने दिल्ली पब्लिक स्कूल से पढ़ाई करने के बाद मिरांडा हाउस (दिल्ली विश्वविद्यालय) से अग्रेज़ी साहित्य में स्नातक किया है। उन्होंने जामिया मिल्लिया इस्लामिया के थर्ड वर्ल्ड स्टडीज से ‘प्रोग्रेसिव राइटर्स मूवमेंट एज रिफ्लेक्टेड इन उर्दू लिटरेचर’ विषय पर डॉक्टोरेट की उपाधि प्राप्त की है। एक ख्याति प्राप्त आलोचक और साहित्य-इतिहासकार के रूप में रक्षंदा जलील के अब तक दो सम्पादित कहानी-संकलन, दिल्ली के अल्पज्ञात स्मारकों पर एक निबन्ध पुस्तक, एक स्त्रीवादी रचनाकार की जीवनी और अनुवाद पर आठ से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। वे हिन्दी-उर्दू साहित्य और संस्कृति को लोकप्रिय बनाने के लिए ‘हिन्दुस्तानी आवाज़’ नाम की संस्था और दो ब्लॉगों का भी संचालन करती हैं।

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रविन्दर सिंह भारत के एक बेस्टसेलर लेखक हैं। इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस, हैदराबाद के पूर्व-छात्र रहे रविन्दर माइक्रोसॉफ्ट में सीनियर प्रोग्राम मैनेजर के रूप में अपने 8 साल लम्बे आई टी करियर को छोड़कर एक पूर्णकालिक लेखक बन गए हैं। ‘आई हैड टू ए लव स्टोरी’ उनकी बेस्टसेलर किताब है जो उनकी ज़िन्दगी की सच्ची घटनाओं पर आधारित है। यह किताब कन्नड़ में भी प्रकाशित हो चुकी है। ‘कैन लव हैपेन ट्वाइस,’ ‘लव स्टोरीज दैट टच माय हार्ट,’ ‘लाइक इट हैपेंड यस्टरडे,’ ‘योर ड्रीम्स आर माइन नाउ,’ ‘टेल मी ए स्टोरी’ और ‘दिस लव दैट फील्स राईट’ उनकी अन्य कृतियाँ हैं। उन्होंने ब्लैक इंक नाम से एक प्रकाशन गृह भी शुरू किया है जिसके तहत वे नए लेखकों की पहली कृतियाँ प्रकाशित करते हैं

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ऋचा अनिरुद्ध हमारे समय की एक बेहद प्रतिभाशाली पत्रकार हैं। वे ख़ास तौर पर IBN7 की प्राइम टाइम प्रस्तुति के लिए जानी जाती हैं। उन्होंने IBN7 पर ‘ज़िन्दगी लाइव’ कार्यक्रम का भी संचालन किया है। पत्रकारिता के अलावा उनकी अकादमिक पृष्ठभूमि भी काफी ठोस रही है। उन्होंने दूरदर्शन से अपना व्यावसायिक करियर शुरू किया और बाद में IBN7 से प्राइम टाइम कार्यक्रम की प्रस्तोता के रूप में जुड़ गईं।

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सैफ़ महमूद दिल्ली में रहते हैं और पेशे से वकील हैं। वे एक साहित्य मर्मज्ञ, उद्घोषक और अनुवादक तो ही हैं, मानवाधिकारों के लिए संघर्ष करने वाले एक सक्रिय कार्यकर्ता भी हैं। वे साउथ एशियन अलाइंस फॉर लिटरेचर, आर्ट एंड कल्चर (SAALARC) के संस्थापक हैं। उर्दू में उपलब्ध उनके विपुल लेखन के अंग्रेज़ी अनुवाद हो चुके हैं जिन्हें विभिन्न प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित भी किया गया है। पूर्व में उन्होंने अपने पिता ताहिर महमूद के उर्दू तहरीर ‘दिल की हिकायतें’ नामक एक संकलन का सम्पादन किया है।
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प्रतिरोध का सिनेमाके राष्ट्रीय संयोजक संजय जोशी की पढ़ाई इलाहाबाद विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और जामिया मिल्लिया इस्लामिया से हुई। पिछले बारह वर्षों से वे हिन्दुस्तानी दस्तावेज़ी सिनेमा और महत्त्वपूर्ण नए सिने प्रयासों को आम दर्शकों के बीच लोकप्रिय बनाने की मुहिम में अपने साथियों के साथ जुटे हैं। गोरखपुर, इलाहाबाद, लखनऊ, भिलाई, पटना, नैनीताल, आजमगढ़, बलिया, देवरिया, उदयपुर, कोलकाता, हैदराबाद, रामनगर आदि शहरों में प्रतिरोध का सिनेमाअभियान व फ़िल्म सोसायटी आंदोलन की शुरुआत कराने में उनकी प्रमुख भूमिका रही है। संजय जोशी ने अमरकान्त,’ ‘टके सेर भाजी टके सेर खाजा,’ ‘सवाल की जरूरत,’ ‘कॉमरेड जिया उल हक़ जैसी डॉक्यूमेंट्री फ़िल्मों व पहाड़पुर के बच्चेनामक टेलीविजन धारावाहिक कथा का निर्देशन भी किया है। संजय जोशी प्रतिरोध के सिनेमाऔर जन संस्कृति मंचके पूर्णकालिक कार्यकर्त्ता हैं और नवारुण प्रकाशन का भी संचालन करते हैं।

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सरला महेश्वरी का जन्म दिल्ली में एक गुजराती परिवार में हुआ। इन्होंने हिन्दी से एम. ए. और पीएच. डी. की उपाधियाँ प्राप्त की हैं। 1979 से 1984 तक वे दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कॉलेज में प्राध्यापिका रही हैं। 1975 में वे दूरदर्शन में बच्चों से सम्बन्धित एक कार्यक्रम की प्रस्तुति से टीवी से जुडीं, पहले बच्चों के लिए स्क्रिप्ट लेखन और बाद में अनेक प्रस्तुतियाँ दीं। पाँच साल तक दूरदर्शन में अनाउंसर रहने के बाद जनवरी 1982 से दूरदर्शन पर समाचार वाचन शुरू किया। विवाहोपरान्त इंग्लैंड गईं और वहाँ बीबीसी से जुड़ीं। बीबीसी एक्सटर्नल सर्विसेस (लन्दन) और बीबीसी टीवी (बर्मिंघम) में अपनी सेवाएँ दीं। 1986 में भारत वापस लौटीं और दूरदर्शन पर दुबारा समाचार वाचन शुरू किया। उन्होंने डॉक्यूमेंट्री फ़िल्मों के लिए विकलांग, अनाथ और झोंपड़ी में रहने वाले बच्चों के अनेक इंटरव्यू लिए हैं और कई विशिष्ट अवसरों पर राष्ट्रपति भवन, विज्ञान भवन, लाल किला, राजपथ, नेशनल स्टेडिम और लन्दन के एल्बर्ट हाल में मंच संचालन भी किया है।  

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सविता सिंह इग्नू के स्कूल ऑफ जेंडर एंड डेवलपमेंट स्टडीज में प्रोफेसर हैं। उन्होंने 2009 से इस स्कूल में सेवाएँ आरम्भ कीं और इसकी पहली निदेशक बनीं। वे यहाँ जेंडर स्टडीज में एम.फिल. और पीएच.डी. पाठ्यक्रमों का समन्वयन करती हैं। एक संस्थापक निदेशक के तौर पर उन्होंने जेंडर और विकास अध्ययन के क्षेत्र में नयी दृष्टियों का विकास किया है। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से एम.ए और एम.फिल की उपाधि प्राप्त की और मैकगिल विश्वविद्यालय, मोंट्रेल से उच्च शिक्षा प्राप्त की जहाँ उन्होंने प्रो. चार्ल्स टेलर, जेम्स टुली और सैम नौमोफ के शोध सहयोगी के रूप में तीन वर्ष तक राजनीतिक सिद्धान्त का अध्यापन किया। बाद में दिल्ली विश्वविद्यालय से ‘डिस्कोर्स ऑफ़ मॉडर्निटी इन इंडिया : ए हरमेन्युटिकल स्टडी’ पर पीएच. डी. की उपाधि प्राप्त की। सविता सिंह राजनीतिक चिन्तन के अलावा कविता की विधा में भी निरन्तर लेखन करती हैं। ‘अपने जैसा जीवन’ और ‘स्वप्न समय’ उनके चर्चित कविता संग्रह हैं।

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इलेक्ट्रानिकी एवं संचारिकी में बी. टेक. शैलेश भरतवासी अपने आप को हिंदी काएकमात्र पूर्णकालिक ब्लॉगर कहना पसन्द करते हैं। 2007 में जब उन्होंने ब्लॉगिंग कीदुनिया में कदम रखा तो उस वक्त ऐसी कोई धारणा नहीं थी कि हिंदी ब्लॉगिंग को वे पूर्णकालिक प्रोफ़ेशन का रूप दे सकेंगे। शैलेश भरतवासी ने अपने ब्लॉगिंग प्रकल्प हिंद-युग्म’ के जरिए हिंदी ब्लॉगिंग को एक तरह से री-डिफ़ाइन किया है और ऐसी तमाम संभावनाएँ न केवल तलाशी हैं, बल्कि उसके कमर्शियल वायेबिलिटी की ओर भी पुख्ता कदम रखे हैं। ‘हिन्द युग्म’ के बैनर तले तमाम नायाब और बड़े काम हुए हैं और आगे बहुत सी नई योजनाएँ पाइपलाइन में हैं। हिंदी ब्लॉगिंग के उज्जवल भविष्य के प्रति शैलेश भरतवासी पूरी तरह आश्वस्त हैं और बताते हैं कि आने वाले समय में और भी बहुत से पूर्णकालिक ब्लॉगर आएँगे जो हिन्दी ब्लॉगिंग के जरिए अपनी आजीविका का साधनउपलब्ध कर सकेंगे।



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श्यौराज सिंह बेचैन हिन्दी के शीर्षस्थ दलित लेखक और चिन्तक हैं। इन्होंने हिन्दी साहित्य से एम.ए., पीएच.डी और डी.लिट्. की उपाधियाँ प्राप्त की हैं। अबतक इनकी लगभग बीस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें ‘मेरा बचपन मेरे कन्धों पर’ (आत्मकथा) सर्वाधिक चर्चित है। ‘तहलका’ पत्रिका में 35 किश्तों में इस कृति का अंग्रेज़ी अनुवाद प्रकाशित हो चुका है। इसके अलावा पंजाबी, जर्मन, मराठी, उर्दू, मलयालम और कन्नड़ में भी इसके अनुवाद जारी हैं। लेखक के तीन कविता-संग्रह, एक शोध-प्रबन्ध तथा दलित और स्त्री-विमर्श पर कुल 15 (लिखित और सम्पादित) पुस्तकें प्रकाशित हैं। इन्होंने फ्रांस, दक्षिण अफ्रीका, सूरीनाम, कनाडा, हॉलैंड और ग्रेट ब्रिटेन की साहित्यिक-सांस्कृतिक यात्राएँ की हैं। साहित्य में उल्लेखनीय योगदान के लिए इन्हें सुब्रह्मण्यम भारती सम्मान, साहित्य भूषण सम्मान तथा स्वामी अछूतानन्द अति विशिष्ट सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। ये भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान (शिमला) के पूर्व अध्येता रहे हैं और वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं।

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स्मिता परिख आकाशवाणी में उद्धघोषिका, अभिनेत्री, और मइप्र्र एंटरटेनमेंट की मुख्य प्रबन्धक स्मिता परिख ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा मध्य प्रदेश के इन्दौर शहर में की, कॉमर्स में स्नातकोत्तर की डिग्री राजस्थान के उदयपुर शहर में हासिल की। बचपन से ही कविताएँ और कहानियाँ लिखने की शौकीन स्मिता को कक्षा 11 वीं में मात्रा 15 वर्ष की उम्र में राजस्थान साहित्य अकादेमी से कहानी लेखन के लिए युवा साहित्यकार पुरस्कार प्राप्त हुआ, उसी साल महाराणा मेवाड़ फाउंडेशन से कविता लेखन के लिए, पुरस्कार प्रदान किया गया। आकाशवाणी उदयपुर और फिर आकाशवाणी मुम्बई से जुड़ाव रहा और स्मिता ने एफएम चैनल पर कई सफल कार्यक्रमों का संचालन किया, ‘अपने मेरे अपनेऔर जाएँ कहाँजैसे प्रसिद्ध टेलीविज़न कार्यक्रमों में मुख्य भूमिकाएँ निभायीं। दूरदर्शन के नैशनल चैनल पर कई सफल कार्यक्रमों जैसे -बायस्कोप’, ‘सिने सतरंगी’, ‘डीडी टॉप 10’ का संचालन किया। संगीत जगत के सभी दिग्गजों के साथ विश्व भर में भ्रमण किया और संचालन किया। मुम्बई में इनकी मइप्र्र एंटरटेनमेंट के नाम से एक कम्पनी है जो देश-विदेश में इवेंट्स करती है। मुम्बई का प्रसिद्ध साहित्यिक सम्मेलन -लिट्-ओ- फेस्ट मुम्बई का सम्पूर्ण निर्देशन स्मिता करती हैं। ये इस महोत्सव की प्रबन्धक हैं। देश भर से इस सम्मेलन में नामी साहित्यकार हिस्सा लेते हैं। हिन्दी भाषा को अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर लाने का ये एक अभियान है। मैं पन्थ निहारूँ...स्मिता का पहला कविता संग्रह है जो 2014 में प्रकाशित हुआ। नज़्मे इन्तजशर कीं...उन चुनी हुई नज़्मों का संकलन है... जिनमें प्रेम, क्षृंगार इन्त्ज़ार की सम्मिलित भावनाएँ देखी जा सकती हैं। स्मिता परिख ने हमेशा प्रेम की विभिन्न भावनाओं पर लिखा है, ये नज़्मों की किताब उसका एक अनूठा उदाहरण है

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