Thursday, 2 March 2017

हिंदी महोत्सव'17 के वक्तागण




हिंदी महोत्सव'17 के वक्तागण 



अपूर्वानंद हिन्दी के वरिष्ठ प्राध्यापक हैं लेकिन अध्यापक के अलावा एक सजग बुद्धिजीवी के रूप में भी वे विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर लगातार लिखते-बोलते रहे हैं।  हिन्दी की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में उनके अनेक लेख और समीक्षाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्होंने ‘धारा,’ ‘कसौटी’ (सह-सम्पादन) और ‘आलोचना’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं का सम्पादन किया है। अबतक आलोचना की उनकी दो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं—मार्क्सवादी सौन्दर्यशास्त्र पर केन्द्रित ‘सुन्दर का स्वप्न’ और ‘साहित्य का एकांत’। महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा से सम्बद्ध रहने के बाद आजकल वे दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में अध्यापन करते हैं।

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अपराजिता शर्मा तेजी से उभरती हुई इलस्ट्रेटर हैं। उन्होंने आधुनिक तकनीक की दुनिया में हिन्दी की एक बड़ी कमी को पूरा करते हुए 'हिमोजी' (हिन्दी इमोजी) की रचना की है। उन्होंने देवनागरी हिन्दी की पहली चैट स्टिकर एप ‘हिमोजी’ तैयार किया है, जो अपने लॉन्च के ठीक बाद से ही वर्चुअल दुनिया, सभी नैशनल न्यूज़ चैनल्स, समाचार-पत्र, रेडियो स्टेशन तथा छोटी-बड़ी साहित्यिक, ग़ैर साहित्यिक पत्रिकाओं में लगातार चर्चा में रहा है। अब तक ‘हिमोजी’ के चालीस हज़ार से अधिक एप डाउनलोड हो चुके हैं। साल 2016 में ‘हिमोजी’ के ऑफ़िशियल लॉन्च के साथ ही देश-विदेश के प्रमुख मंचों पर आयोजित चर्चाओं में भाग ले चुकी अपराजिता शर्मा नीलिमा चौहान की बेहद चर्चित पुस्तक ‘पतनशील पत्नियों के नोट्स' के साथ ही बुक इलस्ट्रेशन और कवर डिज़ाइनिंग की दुनिया में दखल दे चुकी हैं। अपराजिता शर्मा वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली के अत्यन्त प्रतिष्ठित वीमेन कॉलेज मिरांडा हाउस में हिंदी की प्राध्यापिका हैं।

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अरविन्द गौड़ मूलतः एक रंग निर्देशक हैं लेकिन उन्होंने पत्रकारिता से अपने करियर की शुरुआत की और प्रसिद्ध नाट्यमंडली ‘अस्मिता’ (दिल्ली) की स्थापना से कुछ समय पहले तक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के क्षेत्र में काम किया। उन्होंने स्टेनफोर्ड, हार्वर्ड, स्टोनी ब्रुक और स्मिथोनियन जैसे अनेक विश्वविख्यात विश्वविद्यालयों में रंग निर्देशन से सम्बन्धित कार्यशालाओं का संचालन किया है और कई प्रस्तुतियाँ भी दी हैं। पिछले लगातार 15 वर्षों से अरविन्द गौड़ ने 60 से भी अधिक नाटकों का निर्देशन किया है जिनमें ‘हानूश,’ ‘तुगलक,’ ‘रक्त कल्याण,’ ‘अंधा युग’ और ‘कोर्ट मार्शल’ प्रमुख हैं। ‘चुकायेंगे नहीं’ उनके द्वारा निर्देशित एक ऐसा नाटक है जिसमें सामाजिक संदेश के स्वर को प्रमुखता से उभारा गया है। 
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अशोक चक्रधर हिन्दी के वरिष्ठ कवि, लेखक और मीडियाकर्मी हैं। वे जामिया मिल्लिया इस्लामिया के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर और अध्यक्ष रहे हैं। 29 वर्ष तक काम करने के बाद उन्होंने हिन्दी भाषा और साहित्य के विकास के लिए स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली।2007 में वे दिल्ली विश्वविद्यालय के इंस्टिट्यूट ऑफ लाइफलॉन्ग लर्निंग (ILLL) में हिन्दी समन्वयक के रूप में जुड़े और 2009 में हिन्दी अकादमी (दिल्ली) के उपाध्यक्ष और मानव संसाधन विकास मन्त्रालय के केन्द्रीय हिन्दी शिक्षण मंडल के उपाध्यक्ष नियुक्त हुए। वे एक प्रतिष्ठित हास्य कवि हैं और कविताई की अपनी अनूठी शैली के लिए जाने जाते हैं। उन्हें भारत सरकार द्वारा वर्ष 2014 में पद्मश्री सम्मान और 2016 में उत्तर प्रदेश सरकार का यश भारती सम्मान मिल चुका है।

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अविनाश मिश्र एक युवा कवि और आलोचक के रूप में तेजी से अपनी पहचान बना रहे हैं। हिन्दी के प्रतिष्ठित प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक प्रकाशन माध्यमों पर उनकी रचनाएँ प्रकाशित और चर्चित हुई हैं। यदि उन्हीं के शब्दों में कहें तो अब तक ‘न कोई किताब’ प्रकाशित हुई है और ‘न कोई पुरस्कार’ ही मिला है। साहित्यिक पत्रिका ‘पाखी’ के सम्पादन से जुड़े रहे हैं और इस समय ‘दी लल्लनटॉप’ की टीम में शामिल हैं।
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बजरंग बिहारी तिवारी का जन्म पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक पारम्परिक किसान परिवार में हुआ 12वीं तक की शिक्षा गाँव में और उच्च शिक्षा इलाहाबाद और दिल्ली से पूरी हुई 1992 से 1997 के दौरान उन्हें साक्षरता आन्दोलन में भी भाग लेने का अवसर मिला बजरंग बिहारी तिवारी ने भारतीय दलित आन्दोलन और साहित्य के गम्भीर अध्येता और विश्लेषक के रूप में अपनी पहचान बनाई है। अब तक हिन्दी की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में उनके अनेक लेख प्रकाशित हो चुके हैं2004 से हिन्दी मासिक ‘कथादेश’ में ‘दलित प्रश्न’ शीर्षक से लगातार स्तम्भ लेखन कर रहे हैं। ‘जाति और जनतन्त्र : दलित उत्पीड़न पर केन्द्रित,’ ‘दलित साहित्य : एक अन्तर्यात्रा,’ ‘भारतीय दलित साहित्य : आंदोलन और चिंतन’ तथा ‘बांग्ला दलित साहित्य : सम्यक अनुशीलन’ इनकी प्रमुख आलोचनात्मक पुस्तकें हैंइसके अलावा इन्होंने ‘भारतीय साहित्य : एक परिचय’ और ‘यथास्थिति से टकराते हुए’ शृंखला के अंतर्गत दलित स्त्री से जुड़ी कहानियों, कविताओं और आलोचना का सम्पादन/सह-सम्पादन भी किया है इस समय दिल्ली विश्वविद्यालय के देशबन्धु महाविद्यालय में अध्यापन कर रहे हैं

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समकालीन साहित्यिक-सांस्कृतिक परिवेश में एक लेखक और बुद्धिजीवी के रूप में भगवानदास मोरवाल की सक्रिय उपस्थिति है। वाणी प्रकाशन से प्रकाशित उनकी नवीनतम कृति ‘पकी जेठ का गुलमोहर’ इन दिनों काफी चर्चित है। पिछले वर्ष प्रकाशित उनका एक और महत्त्वपूर्ण उपन्यास ‘हलाला’ मुस्लिम समुदाय में धर्म की आड़ में होने वाले स्त्री-शोषण को केन्द्र में रखकर लिखा गया है जो अपने विचारोत्तेजक कथ्य के कारण लगातार चर्चा और विमर्श का विषय बना हुआ है। भगवनदास मोरवाल ने पत्रकारिता में डिप्लोमा किया है और हिन्दी साहित्य से उच्च शिक्षा पूरी की है। अब तक उनके पाँच उपन्यास और छह कहानी-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। काला पहाड़ और हलाला जैसे उपन्यासों को पाठकों और बुद्धिजीवियों द्वारा खूब पसन्द किया गया है। कविता की दो पुस्तकों के अलावा उन्होंने वैचारिक गद्य की भी एक पुस्तक लिखी है। अबतक उन्हें कथाक्रम सम्मान, हिन्दी अकादमी (दिल्ली) के साहित्यिक कृति सम्मान के अलावा हरियाणा साहित्य अकादमी सम्मान, अंतर्राष्ट्रीय इन्दु शर्मा कथा सम्मान, कथा लन्दन (यू के) और शब्द साधक ज्यूरी जैसे प्रतिष्ठित सम्मान मिल चुके हैं। वर्ष 2008 में उन्होंने ट्यूरिन (इटली) में आयोजित भारतीय लेखक सम्मलेन में भी शिरकत भी की है।

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इन्‍द्रप्रस्‍थ महिला महाविद्यालय की प्राचार्या बाबली मोइत्रा सराफ कॉलेज के अंग्रेज़ी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर और मल्‍टी मीडिया एवं जनसंचार विभाग की विभागाध्‍यक्षा हैं। उन्‍होंने अंग्रेज़ी में एम.फिल. और समाज विज्ञान में पीएच.डी की डिग्री प्राप्‍त की है। वे बहुभाषाविद हैं और बहुभाषीय अनुवाद में पारंगत हैं। उन्होंने मारिया फेडरिका ओदेरा के साथ महाश्‍वेता देवी की कृतियों का इतालवी अनुवाद किया है। उनकी कृति ‘राजोरी रिमेम्‍बर्ड’ (2007) हिंदी, उर्दू और पंजाबी की वाचिक परम्परा और दस्‍तावेज़ों का अनुवाद है। डॉ. सराफ ने अनुवाद और निर्वचन अध्‍ययन पर अनेक लेख प्रकाशित किए हैं। वे ‘ट्रांसलेशन : ए इंटरडिसिप्लिनरी जर्नल’ और ‘सार-संसार’ पत्रिकाओं के संपादक मंडल में भी शामिल हैं। डॉ. मोइत्रा सराफ भारत-इतालवी सांस्‍कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रम के अंतर्गत छात्रवृत्तिधारी, फुलब्राइट-नेहरू इंटरनेशल एजुकेशन एडमिनिस्‍ट्रेटर प्रोग्राम के अंतर्गत अतिथि विद्वान, NIDA स्‍कूल ऑफ ट्रांसलेशन स्‍टडीज़ में रिसर्च एसोसिएट और विजिटंग फैकल्‍टी रही हैं। उन्‍हें दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय द्वारा विशिष्‍ट शिक्षक पुरस्‍कार, दि एमिटी वीमेन एचीवर इन एजुकेशन अवॉर्ड, 27वें डॉ. एस. राधाकृष्‍णन स्‍मृति राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार और सेंट स्‍टीफेंस कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) द्वारा उत्‍कृष्‍टता के लिए आजीवन प्रयास हेतु डिस्टिंग्विश्‍ड एलमनस अवॉर्ड से सम्‍मानित किया गया है।
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हर्षबाला शर्मा एक बेहद सजग अध्यापिका, वक्ता और विदुषी हैं। उन्होंने भाषा की औपनिवेशिक मानसिकता और इक्कीसवीं सदी में भाषा के प्रश्नों पर महत्त्वपूर्ण कार्य किया है और ‘समाज-मनो भाषा विज्ञान’ पर मेजर रिसर्च प्रोजेक्ट पूरा किया है। वे कहानियाँ भी लिखती हैं। ‘एक बदचलन गाना,’ ‘तवायफ,’ ‘कृष्णा मेनन उर्फ़ कथकली’ और ‘बिछिया’ जैसी कहानियाँ लमही, तहलका, समीक्षा, जनकृति, हिन्दी कुञ्ज आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। भाषा के दर्शन और भाषिक दर्शन के अलावा अनुवाद कार्य में उनकी विशेष रुचि है। भाषा और भारतीय साहित्य पर अब तक 3 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्होंने लौजैन विश्वविद्यालय, स्विट्जरलैंड में विजिटिंग प्रोफ़ेसर के रूप में कार्य किया है। हर्षबाला शर्मा को विशिष्ट शिक्षक सम्मान (2009) से सम्मानित किया गया है। शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य के लिए आगामी 4 मार्च 2017 को उन्हें वीनस अंतर्राष्ट्रीय स्त्री संघ (चेन्नई) द्वारा सम्मानित किया जा रहा है। वर्तमान में वे दिल्ली विश्वविद्यालय के अत्यन्त प्रतिष्ठित इन्द्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय में अध्यापन के साथ-साथ निरन्तर लेखन कर रही हैं।

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कृष्ण कुमार दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षा विभाग में ख्यातिप्राप्त प्रोफेसर रहे हैं। समाजशास्त्र के प्रमुख विषयों और शिक्षा के इतिहास-वर्तमान पर अपने विचारोत्तेजक लेखन के लिए चर्चित प्रो. कृष्ण कुमार ने विद्यालय पाठ्यक्रम को एक सामाजिक पड़ताल के रूप में विकसित करने का महत्त्वपूर्ण काम किया है। शिक्षा की शिक्षण प्रक्रिया को उन्होंने एक औपनिवेशिक समाज में आधुनिकता के साथ आलोचनात्मक संवाद के रूप में देखने की पेशकश की है। एक शिक्षक और प्रतिभाशाली लेखक के तौर पर उन्होंने शिक्षा और ज्ञान का एक ऐसा सौन्दर्यशास्त्र विकसित किया है जो इस क्षेत्र में व्याप्त उद्विग्नता और हिंसा को शान्त कर सके। अकादमिक लेखन के अलावा उन्होंने कहानियाँ और निबन्ध भी लिखे हैं तथा 2004 से लेकर 2010 तक लगातार बच्चों के लिए गुणात्मक लेखन किया है। उन्होंने राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसन्धान और प्रशिक्षण परिषद् (NCERT) के निदेशक के रूप में विद्यालयी पाठ्यक्रम में बुनियादी सुधार की दिशा में बेहद सराहनीय कार्य किया है।



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