Thursday, 2 March 2017

हिंदी महोत्सव'17 के वक्तागण




हिंदी महोत्सव'17 के वक्तागण 


1959 में दिल्ली में जन्मी गगन गिल मूलतः पत्रकार रही हैं हालाँकि आगे चलकर वे पत्रकारिता की जगह कविता में अधिक सक्रिय हो गयीं। ‘एक दिन लौटेगी लड़की,’ ‘अँधेरे में बुद्ध,’ ‘यह आकांक्षा समय नहीं’ और ‘थपक थपक दिल थपक थपक’ उनके प्रमुख कविता संग्रह हैं। उनकी अधिकांश कृतियों में बुद्ध की करुणा और उनके सत्यों को बिम्ब-प्रतिबिम्ब के रूप में रचा गया है। गगन गिल एक सफल अनुवादक भी हैं और अबतक उन्होंने 10 पुस्तकों का अनुवाद किया है। स्वयं उनकी कृतियों के भी अनेक भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित हो चुके हैं। कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर आधारित बेजोड़ गद्य कृति ‘अवाक्’ ने पाठकों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें अब तक द्विजदेव सम्मान, भारत भूषण अग्रवाल सम्मान, संस्कृति पुरस्कार और केदार सम्मान प्राप्त हो चुके हैं।

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गीताश्री का जन्म मुजफ्फरपुर ( बिहार ) में हुआ । सर्वश्रेष्ठ हिन्दी पत्रकार ( वर्ष 2008-2009) के लिए रामनाथ गोयनका पुरस्कार से सम्मानित वरिष्ठ पत्रकार गीताश्री पत्रकारिता के साथ-साथ साहित्य की दुनिया में सक्रिय हैं । सम्प्रति : आउटलुक (हिन्दी ) दिल्ली में सहायक संपादक!


इरा पांडे एक ख्याति प्राप्त सम्पादक हैं जो ‘सेमिनार,’ ‘बिब्लियो,’ ‘डॉर्लिंग किन्डर्सले’ और ‘रोली बुक्स’ से जुड़ी रही हैं इस समय वे आई. आई. सी. के सभी प्रकाशनों की प्रधान सम्पादक हैंउन्होंने ‘दीदी : माई मदर्स व्याइस’ पुस्तक का लेखन किया है और हाल में ही प्रसिद्ध साहित्यकार शिवानी की कृति ‘अपराधिनी’ का अनुवाद भी किया है

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लीलाधर मंडलोई जन्म: जन्माष्टमी। सही तिथि व साल अज्ञात। शिक्षा: बी.ए. बीएड. (अँग्रेज़ी) पत्रकारिता में स्नातक। एम.ए. (हिन्दी)। प्रसारण में उच्च-शिक्षा सी.आर.टी., लन्दन से। पदभार: दूरदर्शन, आकाशवाणी के महानिदेशक सहित कई राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय समितियों के साथ ही प्रसार भारती बोर्ड के सदस्य। कृतियाँ: घर-घर घूमा, रात बिरात, मगर एक आवाज़, काल बांका तिरछा, क्षमायाचना, लिखे में दुक्ख, एक बहुत कोमल तान, महज शरीर नहीं पहन रखा था उसने, उपस्थित है समुद्र (हिन्दी व रूसी में) (कविता-संग्रह); देखा-अदेखा, कवि ने कहा, हत्यारे उतर चुके हैं क्षीर सागर में, प्रतिनिधि कविताएँ, 21वीं सदी के लिए पचास कविताएँ (कविता चयन); कविता का तिर्यक (आलोचना); अर्थजल, दिल का किस्सा (निबन्ध); दाना-पानी, दिनन दिनन के फेर (डायरी); काला पानी (यात्रा-वृत्तान्त); बुन्देली लोकगीतों की किताब, अन्दमान निकोबार की लोककथाओं की दो किताबें; पेड़ भी चलते हैं, चाँद का धब्बा (बाल साहित्य)। सम्पादन: केदारनाथ सिंह संचयन, कविता के सौ बरस, स्त्री मुक्ति का स्वप्न, कवि एकादश, रचना समय, समय की कविता आदि। अनुवाद: पानियों पे नाम (शकेब जलाली की गज़्लो का लिप्यन्तरण मंजूर एहतेशाम के साथ)। माँ की मीठी आवाज़ (अनातोली पारपरा की रूसी कविताएँ, अनिल जनविजय के साथ)। फिल्म: कई रचनाकारों पर डाक्यूमेंट्री निर्माण, निर्देशन तथा पटकथा लेखन। कुछ धारावाहिकों में कार्यकारी निर्माता तथा संगीत व साहित्य के ऑडियो-वीडियो सीडी, वीसीडी के निर्माण में सक्रिय भूमिका। सम्प्रति: निदेशक, भारतीय ज्ञानपीठ, नयी दिल्ली और साहित्यिक पत्रिका नया ज्ञानोदयके सम्पादक।
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जन्म : 30 नवम्बर, 1944, अलीगढ़ जि़ले के सिकुर्रा गाँव में। आरम्भिक जीवन : जि़ला झाँसी के खिल्ली गाँव में। शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी साहित्य), बुंदेलखंड कॉलेज, झाँसी। कृतियाँ : चिन्हार, गोमा हँसती है, ललमुनिया तथा अन्य कहानियाँ, पियरी का सपना, प्रतिनिधि कहानियाँ, समग्र कहानियाँ (कहानी-संग्रह); बेतवा बहती रही, इदन्नमम, चाक, झूला नट, अल्मा कबूतरी, अगनपाखी, विजन, कही ईसुरी फाग, त्रिया हठ, गुनाह-बेगुनाह, फ़रिश्ते निकले (उपन्यास); कस्तूरी कुंडल बसै, गुड़िया भीतर गुड़िया (आत्मकथा); खुली खिड़कियाँ, सुनो मालिक सुनो, चर्चा हमारा, आवाज़, तब्दील निगाहें (स्त्री विमर्श); फाइटर की डायरी (रिपोर्ताज)। फैसला कहानी पर टेलीफिल्म वसुमती की चिट्ठी। प्रमुख सम्मान : सार्क लिट्रेरी अवार्ड, 'द हंगर प्रोजेक्ट’ (पंचायती राज) का सरोजिनी नायडू पुरस्कार, मंगला प्रसाद पारितोषिक, प्रेमचन्द सम्मान, हिन्दी अकादमी का साहित्यकार सम्मान, मध्यप्रदेश साहित्य परिषद का वीरसिंह जूदेव पुरस्कार, कथाक्रम सम्मान, शाश्वती सम्मान एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का महात्मा गांधी सम्मान। सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन और सामाजिक मुद्दों पर सक्रिय हस्तक्षेप।

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मंगलेश डबराल विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लम्बे समय तक काम करने के बाद वे तीन वर्ष तक नेशनल बुक ट्रस्ट के सलाहकार रहे। अब तक उनके पाँच कविता संग्रह, तीन गद्य संग्रह और साक्षात्कारों की एक पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है। उन्होंने अनेक शीर्ष विदेशी कवियों की कविताओं का अंग्रेज़ी से अनुवाद किया है तथा अनेक विशिष्ट साहित्यकारों पर केन्द्रित वृत्तचित्रों के लिए पटकथा लेखन भी किया है। वे निरन्तर समाज, संगीत, सिनेमा और कला पर समीक्षात्मक लेखन करते रहे हैं। लगभग सभी भारतीय भाषाओं के अलावा 12 विदेशी भाषाओं की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताओं के अनुवाद प्रकाशित हो चुके हैं। उनके कविता संग्रह ‘आवाज़ भी एक जगह है’ का इतालवी अनुवाद और ‘दिस नंबर डज नॉट एग्ज़िस्ट’ नाम से अंग्रेज़ी में अनुवादित एक पुस्तक प्रकाशित हो चुका है। उन्हें ओमप्रकाश स्मृति सम्मान, शमशेर सम्मान, पहल सम्मान, साहित्य अकादेमी सम्मान, हिंदी अकादेमी (दिल्ली) का साहित्यकार सम्मान और कुमार विकल स्मृति सम्मान जैसे महत्त्वपूर्ण सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। जन संस्कृति मंच से जुड़े मंगलेश डबराल आजीविका हेतु पत्रकारिता से सम्बद्ध हैं।
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मनीषा तनेजा दिल्ली विश्वविद्यालय में स्पेनिश की अध्यापिका हैं। इन्होंने एम.ए. और एम. फिल. की शिक्षा प्राप्त की है और अनुवाद अध्ययन में शोध किया है। प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों में उनके अनेक शोध लेख प्रकाशित हो चुके हैं। उन्होंने पाब्लो नेरूदा की कृति का हिन्दी अनुवाद ‘हाँ मैंने ज़िन्दगी जी है’ नाम से और अन्ना लोंगिनी की कृति का अंग्रेज़ी अनुवाद ‘द सिलहौटे : ऑन द बॉर्डर बिटवीन आर्ट एंड पॉलिटिक्स’ नाम से किया है। दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रो. विभा मौर्या के साथ उन्होंने ‘अ व्यू ऑफ द 1857 रिवोल्ट इन स्पेनिश प्रेस’ विषय पर शोध आलेख की प्रस्तुति भी की है।

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मीरा जौहरी हिन्दी की प्रकाशन संस्था राजपाल एंड संस की मुख्य साझीदार हैं। उन्होंने फैकल्टी ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज (दिल्ली विश्वविद्यालय) से एम.बी.ए. करने के बाद प्रमुख कम्पनियों में मार्केटिंग कंसल्टेंट के रूप में अपने करियर की शुरुआत की। पिछले 20 वर्षों से राजपाल एंड संस से जुड़ी रहकर उन्होंने बहुभाषीय शब्दकोशों की एक पूरी शृंखला तैयार करवाई है जिनमें आज देश भर में सबसे अधिक बिकने वाले शब्दकोश शामिल हैं। उन्होंने हिन्दी प्रकाशन के सीमित दायरे को बढ़ाते हुए अंग्रेज़ी में भी उल्लेखनीय प्रकाशन किया और एक ऐसी व्यवस्था विकसित की जिसके तहत भारत के क्षेत्रीय प्रकाशकों के साथ-साथ विदेशों में भी पुस्तकों के भाषा अधिकार बेचे जा सकें। देश और दुनिया के ख्याति प्राप्त लेखकों की कृतियों को सुलभ बनाने के लिए उन्होंने एक बेहद सक्रिय अनुवाद प्रकाशन कार्यक्रम की नींव रखी है।
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नीलिमा पेशे से शिक्षिका हैं और फ़िलवक़्त दिल्ली विश्वविद्यालय के ज़ाकिर हुसैन दिल्ली कॉलेज (सान्ध्य) में एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं। वे एक माँ, बेटी, पत्नी, दोस्त और लेखिका जैसी बेहद व्यवस्थित भूमिकाओं में भी हैं। गुत्थी ये है कि वे बोहेमियन, हिप्पी, बाइक गैंग की सरगना, स्लट-नेत्री क्यों नहीं हैं। दरअसल वे ख़ुद को अन्तर्मन की खोजी ज़्यादा मानती हैं। शब्द और चुप्पी की स्त्री-भाषा में जो कुछ अनकहा रह जाता है उसे ताड़ना और कह देना अपना असली काम समझती हैं। बाग़ी प्रेम-विवाहों के आख्यानों के सम्पादित संकलन के बाद वाणी प्रकाशन से प्रकाशित उनकी किताब पतनशील पत्नियों के नोट्सइन दिनों काफी चर्चित हो रही है।

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नीता गुप्ता जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल से सम्बद्ध जयपुर बुकमार्क की सह-निदेशक हैं जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अनुवाद के स्वत्वाधिकार के लिए काम करता है। वे यात्रा बुक्स की प्रकाशक हैं और भारतीय भाषाओं के बीच अनुवाद को बढ़ावा देने वाली गैर-लाभकारी संस्था भारतीय अनुवाद परिषद् में सम्पादक और संयुक्त सचिव हैं। 1996 से वे भारतीय भाषाओं के अनुवाद के विविध पक्षों पर काम कर रही हैं और पुस्तक प्रकाशन, ई-बुक और साहित्यिक पत्रिका के सम्पादन से जुड़ी रही हैं। हाल ही में उन्होंने ‘ट्रांसलेटिंग भारत, रीडिंग इंडिया’ नाम से निबन्धों का एक संकलन सम्पादित किया है।

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