Thursday, 2 March 2017

हिंदी महोत्सव'17 के वक्तागण






हिंदी महोत्सव'17 के वक्तागण 




अभय कुमार दुबे विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) में फेलो और भारतीय भाषा कार्यक्रम के निदेशक हैं और पिछले दस वर्षों से हिन्दी-रचनाशीलता और आधुनिक विचारों की अन्योन्यक्रिया का अध्ययन कर रहे हैं। साहित्यिक रचनाओं के समाजवैज्ञानिक अध्ययन और मूल्यांकन में उनकी गहरी रुचि है। समाज-विज्ञान को हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं में लाने की व्यापक परियोजना के तहत इन्होंने अब तक पन्द्रह ग्रन्थों का लेखन एवं सम्पादन किया है। कई विख्यात विद्वानों की रचनाओं के अनुवाद भी किए हैं। समाज-विज्ञान और मानविकी की पूर्व-समीक्षित पत्रिका ‘प्रतिमान : समय समाज संस्कृति’ के प्रधान सम्पादक हैं। पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर लेखन और टीवी चैनलों पर होने वाली चर्चाओं में नियमित भागीदारी करते हैं। 
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आदित्य निगम सामाजिक और राजनीतिक सिद्धान्त के क्षेत्र में काम करने वाले लेखक-बुद्धिजीवी हैं। भारत के समकालीन राजनीतिक अनुभवों और गैर-पश्चिमी देशों में पूँजी के वैकल्पिक इतिहास के अध्ययन पर फोकस करते हुए वे पूँजी और लोकतन्त्र के मार्क्सवादी विवेचन के आलोक में संविधान की आर्थिक-राजनीतिक संरचनाओं का अध्ययन कर रहे हैं। सीएसडीएस के सहयोगियों के साथ मिलकर उन्होंने भारतीय भाषाओं की अवधारणा पर उल्लेखनीय कार्य किया है। वे इस सेंटर के भारतीय भाषा कार्यक्रम और ‘प्रतिमान’ पत्रिका से जुड़े हैं तथा काफिला डॉट ओआरजी पर लगातार राजनीतिक मुद्दों पर टिप्पणियाँ लिखते हैं। इसके अलावा वे ‘पोस्ट नेशन कंडीशन’ की अवधारणा पर काम करने वाले भारत, श्रीलंका और पाकिस्तान जैसे दक्षिण एशियाई देशों के विद्वानों से भी जुड़े रहे हैं। ‘इन्सरेक्शन ऑफ लिटिल सेल्व्स,’ ‘पॉवर एंड कॉन्टेस्टेशन’ (निवेदिता मेनन के साथ), ‘आफ्टर यूटोपिया’ तथा ‘डिजायर नेम्ड डेवलपमेंट’ उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं।

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अद्वैता काला पेशे से होटल व्यवसायी हैं जिन्होंने भारत और बाहर के देशों में अध्ययन और काम किया है। अपने काम और व्यवसाय से सिलसिले में उन्हें कई शहरों में घुमन्तू जीवन व्यतीत करना पड़ा है। वे खूब यात्राएँ करती हैं—हरेक महीने या कभी-कभी महीने में दो बार भी उन्हें शहर से बाहर रहना पड़ता है। वे भारतीय रेल को बहुत पसन्द करती हैं और मानती हैं कि इस विविधता से भरे देश को जानने-समझने के लिए इससे अच्छा और कोई जरिया नहीं हो सकता। वे लिखती भी हैं लेकिन इसे बहुत व्यक्तिगत और निजी मानती हैं। किताबों से बहुत लगाव है—ठीक उसी तरह जैसे कि दोस्तों और परिवार के सदस्यों से। उन्हें सस्पेंस या थ्रिलर राइटिंग, जीवनियाँ, इतिहास (ख़ासकर मुग़ल इतिहास) और ताजमहल के बारे में पढ़ने और जानने की बहुत दिलचस्पी है।
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दिल्ली के कोटला मुबारकपुर गाँव में जन्मे अजय नावरिया एक गम्भीर प्राध्यापक और जुझारू लेखक हैं। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से एम.ए. और पीएच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त की हैं। धर्मशास्त्र और दलित विमर्श उनकी विशेषज्ञता के मुख्य क्षेत्र हैं। उन्होंने ‘हंस’ पत्रिका के दलित विशेषांक (2004) और ‘नैतिकताओं का टकराव’ (2005) में राजेन्द्र यादव के साथ सम्पादन सहयोग किया है और ‘डॉ. उदित राज के लेख’ पुस्तक का स्वतन्त्र सम्पादन किया है। ‘पटकथा और अन्य कहानियाँ’ उनका प्रमुख कहानी संग्रह है। वे एन.सी.ई.आर.टी. की पाठ्यपुस्तक समिति में मानद सदस्य भी हैं। फिलहाल जामिया मिल्लिया इस्लामिया में अध्यापन और स्वतन्त्र लेखन कर रहे हैं।

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अजित राय देश के उन गिने-चुने साहित्यिक-सांस्कृतिक पत्रकारों में से एक हैं जिन्होंने पिछले 25 वर्षों में देश के लगभग सभी महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय अखबारों, पत्रिकाओं एवं रेडियो-टेलीविजन में साहित्यरंगमंचसिनेमासंस्कृति के अन्य रूपों एवं बौद्धिक विषयों पर लगातार लेखन किया है। हिंदी में उनके अब तक प्रकाशित बहुसंख्यक आलेखोंरिपोर्ताजोंरपटोंसमीक्षाओंसाक्षात्कारों एवं आवरण कथाओं में से अधिकतर देश की सांस्कृतिक पत्रकारिता में मील का पत्थर माने गए हैं। उनकी कई रपटों पर भारतीय संसद में सवाल पूछे गए हैं एवं बहसें हो चुकी हैं। अजित राय इस समय हिन्दी के विरल पत्रकार हैं जिन्हें सच्चे अर्थों में अंतरराष्ट्रीय कहा जा सकता है। उन्होंने पिछले दस वर्षों में दुनिया भर में हो रही साहित्यसंस्कृतिरंगमंच और सिनेमा की तमाम महत्त्वपूर्ण गतिविधियों को अपनी रिपोर्टिंग के माध्यम से हिंदी संसार को परिचित कराया है।

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अलिन्द माहेश्वरी राजकमल प्रकाशन समूह के मार्केटिंग और कॉपीराइट निदेशक हैं। एस.पी. जैन इंस्टिट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड रिसर्च, मुम्बई से पोस्ट-ग्रेजुएशन करने के बाद उन्होंने प्रकाशन समूह के लिए आधुनिक रिटेल, इ-कॉमर्स और ई-बुक सेक्शन की शुरुआत की। आज के बाज़ार में हिन्दी पुस्तकों के बेहतर प्रमोशन के लिए वे बाज़ार और गुणवत्ता के संतुलन को महत्त्व देते हैं। अलिन्द ने युवा और नये लोगों की एक टीम को प्रकाशन समूह से जोड़ा है और हिन्दी पुस्तकों की ओर नये पाठकों को आकर्षित किया है।

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डॉ. अनामिका ने अब तक विपुल लेखन किया है जिनमें आठ कविता संग्रह, पाँच कहानियाँ और आलोचना की कई पुस्तकें शामिल हैं स्त्रीवादी विचारधारा से युक्त इनका स्वर और रचनाएँ अंग्रेज़ी और हिन्दी के नवोदित लेखकों और कई पीढ़ियों के पाठकों को प्रेरित करती हैंडॉ. अनामिका ने अनेक विख्यात कृतियों का अनुवाद किया है डॉ. अनामिका अकादमिक रूप से दिल्ली में कार्यरत हैं और द्विभाषी लेखक के रूप में 20 से अधिक राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय रचनाओं का प्रकाशन कर चुकी हैं वे एक प्रशिक्षित शास्त्रीय नृत्यांगना भी हैं वर्तमान में वे दिल्ली विश्वविद्यालय के सत्यवती कॉलेज में अंग्रेज़ी की प्राध्यापिका के रूप में कार्यरत हैंडॉ. अनामिका को कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है जिनमें भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, गिरिजा कुमार माथुर सम्मान, साहित्यकार सम्मान, परम्परा सम्मान और केदार सम्मान शामिल हैं। अनुवाद कार्य में उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें जनवरी 2017 में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के दौरान जयपुर बुक मार्क के मंच से वाणी फ़ाउंडेशन का ‘डिस्टिंग्विश्ड ट्रांसलेटर अवार्ड’ प्रदान किया है।

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अनंत विजय प्रसिद्ध स्तंभकार और मीडिया विशेषज्ञ हैं। जमालपुर (बिहार) से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने भागलपुर विश्वविद्यालय से इतिहास विषय में स्नातक की उपाधि और बाद में दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता और बिजनेस मैनेजमेंट की शिक्षा पूरी की है। प्रसंगवश,’ तुमुल कोलाहल कलह में और बॉलीवुड सेल्फ़ी उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं। अपनी विषय-वस्तु और विश्लेषण के कारण बॉलीवुड सेल्फ़ी ने काफी चर्चा बटोरी है। अनंत विजय इस समय IBN7 में डिप्टी एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर के रूप में कार्यरत हैं।


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अनु सिंह चौधरी लेखन के अलावा पत्रकारिता और डॉक्यूमेंट्री निर्माण के क्षेत्र में लगातार सक्रिय हैं। इनका कहानी-संग्रह ‘नीला स्कार्फ’ काफी पसंद किया गया है। इन्होंने परिवार और परवरिश पर केन्द्रित एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक ‘मम्मा की डायरी’ लिखी है जो हिन्दी में अपने तरह की एकमात्र पुस्तक है। झारखण्ड के आदिवासी समुदाय पर आधारित इनकी डॉक्यूमेंट्री ‘लाइटनिंग अप द हिल्स’ काफी चर्चित रही है। अनु सिंह चौधरी को उनके योगदान के लिए ‘रामनाथ गोयनका अवार्ड फॉर एक्सलेंस इन जर्नलिज्म’ और ‘लाडली मीडिया एंड एडवरटाइजिंग अवार्ड’ से सम्मानित किया जा चुका है।

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अन्विता अब्बी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में भाषाशास्त्र की प्रोफेसर हैं। उन्होंने जनजातीय भाषाओं और दक्षिण एशिया की अन्य अल्पसंख्यक भाषाओं पर किए गए अपने अध्ययन और शोध के कारण दुनिया भर में ख्याति अर्जित की है। अंडमान निकोबार दीप समूह की लुप्तप्राय भाषा पर उनके विशिष्ट कार्य को देश और दुनिया भर में बहुत सराहा गया है। उन्हें भारत के एक नये भाषा परिवार की खोज करने का श्रेय है। वे लन्दन विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ ओरिएण्टल एंड अफ्रीकन स्टडीज (एसओएएस) के लिवरह्यूम प्रोफेसर अवार्ड से सम्मानित हैं। भारत की भाषाओं में उल्लेखनीय योगदान के लिए वे मैक्स प्लांक इंस्टिट्यूट ऑफ एवोल्यूशनरी एंथ्रोपोलॉजी (लैग्ज़िग, जर्मनी) में विजिटिंग साइंटिस्ट, कैर्न्स इंस्टिट्यूट (जेम्स कुक विश्वविद्यालय, ऑस्ट्रेलिया) में विसिटिंग प्रोफेसर और इंस्टिट्यूट फॉर एडवांस्ड स्टडी (ला ट्रोब यूनिवर्सिटी, मेलबोर्न, ऑस्ट्रेलिया) में डिस्टिंग्विश्ड फेलो रह चुकी हैंभारत की जनजातीय भाषाओं में उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें प्रतिष्ठित राष्ट्रीय लोकभाषा सम्मान मिल चुका है। प्रो. अन्विता अब्बी टेरालिंग्वा और यूनेस्को जैसी अनेक अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं में सलाहकार समिति की सदस्य हैं और इस समय लिंग्विस्टिक सोसाइटी ऑफ इंडिया की अध्यक्ष हैं। हाल ही में उन्हें भारत के राष्ट्रपति द्वारा पद्मश्री सम्मान प्रदान किया गया है। 

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