Tuesday, 10 October 2017

​वाणी प्रकाशन समाचार (वर्ष:11, अंक:125, अक्टूबर 2017)



|| वाणी प्रकाशन परिवार की ओर से सभी पाठकों को 

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ ||


प्रिय पाठकों,

प्रस्तुत है वाणी प्रकाशन समाचार 

  वर्ष :11, अंक : 125 , अक्टूबर  2017   












Thursday, 5 October 2017

'इकोनॉमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली' के हिन्दी में पहली बार प्रकाशित आलेख

भारतीय नीतियों का सामाजिक पक्ष

 सम्पादक : ज्याँ द्रेज 


 स्वास्थ्य  शिक्षा  खाद्य सुरक्षा  रोजगार गारंटी  पेंशन  नगद हस्तान्तरण  विषमता  सामाजिक बहिष्कार


भारतीय नीतियों का सामाजिक पक्ष और उससे जुड़े मुद्दों पर लिखे गये उन आलेखों का हिन्दी में पहला संग्रह हैजो पहले  इकोनॉमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली में प्रकाशित हो चुके हैं। पुस्तक के 18 अध्याय मुख्यतः इन बिन्दुओं के आसपास केन्द्रित हैं। प्रतिष्ठित विद्वानों द्वारा किये गये इन आलोचनात्मक मुद्दों के व्यापक विश्लेषण को पहली बार किसी एक पुस्तक में समाहित किया गया है। इन अध्ययनों में आँकड़ों की बहुलता है जो इस क्षेत्र में शोध करने वालों के लिए काफी उपयोगी साबित होगी। 


भारतीय नीतियों का सामाजिक पक्ष के सम्पादक ज्याँ द्रेज, वाणी प्रकाशन प्रबन्ध निदेशक अरुण माहेश्वरी(दायें) व निदेशक अदिति माहेश्वरी-गोयल (बायें )वाणी प्रकाशन के कार्यलय में। 

प्रस्तावना

हाल के वर्षों में, भारत में सामाजिक नीति की पहुँच में काफ़ी विस्तार हुआ है। प्रत्येक गाँव में स्कूल और आँगनबाड़ी एक स्वीकार्य मानक बन चुके हैं। स्वास्थ्य केन्द्र लोगों के घर के ज़्यादा दीक हैं और उनमें सुविधाएँ बढ़ रही हैं। अब पहले की तुलना में ज़्यादा लोगों को पोषक तत्त्व उपलब्ध कराने के कार्यक्रम, सार्वजनिक कार्य और सामाजिक सुरक्षा पेंशन कार्यक्रमों का लाभ मिल रहा है। इनमें से कुछ कार्यक्रम लागू करने योग्य कानूनी हकदारियों का रूप धारण कर चुके हैं। इसके बावजूद यह नहीं माना जा सकता है कि ये कार्यक्रम आदर्श रूप में लागू हो रहे हैं और इनमें से कई कार्यक्रमों का क्रियान्वयन कुछ हद तक विवादास्पद भी रहा है। अधिकांश भारतीय राज्यों को प्रभावकारी सामाजिक नीतियों को स्थापित करने और उन्हें प्रत्यक्ष रूप से वंचित लोगों के हितों, माँगों और अधिकारों से प्रत्यक्ष रूप से जोड़ने के लिए अभी एक लम्बी दूरी तय करनी है।

अकादमिक अनुसन्धान में इन घटनाक्रमों से पीछे रह जाने की प्रवृत्ति रही है। मसलन, भ्रष्टाचार से सम्बन्धित आर्थिक साहित्य सूचना के अधिकार अधिनियम की कल्पना (प्रस्तावना) नहीं कर सके। इसी तरह, राष्ट्रीय ग्रामीण रोगार गारंटी अधिनियम के लागू हो जाने के पाँच वर्षों के बाद इस विषय पर आर्थिक अनुसन्धान की एक गम्भीर और सार्थक धारा का उभार हुआ। बहरहाल, अब भारत में सामाजिक नीति पर, काफ़ी बड़ी संख्या में अन्तर्दृष्टि से परिपूर्ण अनुसन्धान उपलब्ध हैं। इस प्रकार का अधिकांश साहित्य भारत में समाज विज्ञान के प्रमुख जर्नल इकोनॉमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली में प्रकाशित होता रहा है। इस पुस्तक में सामाजिक नीति से जुड़े विषयों पर प्रकाशित कुछ प्रमुख लेखों का संकलन प्रस्तुत किया गया है।

स्वास्थ्य

जीवन की गुणवत्ता के लिए स्वास्थ्य से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण कुछ भी नहीं है, किन्तु फिर भी भारत की मुख्यधारा की मीडिया और लोकतान्त्रिक राजनीति में इसके बारे में कोई खास चर्चा नहीं होती है। इस अन्तर्विरोधी स्थिति की प्रतिक्रिया के रूप में,  इस किताब में सबसे पहले स्वास्थ्य से जुड़े विषयों को स्थान दिया गया है। इस मामले में एक दम आगे बढ़ते हुए इस किताब की शुरुआत सार्वजनिक स्वास्थ्य से सम्बन्धित एक लेख से की गयी है, जो कि स्वास्थ्य नीति का सबसे महत्त्वपूर्ण किन्तु सर्वाधिक उपेक्षित आयाम है (यह भी अपने-आप में एक विडम्बना ही है)। जैसा कि मोनिका दास गुप्ता ने काफ़ी शक्त तरीके से यह दर्शाया है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य ने बहुत से विकसित देशों के इतिहास में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है, जिसमें अमेरिका जैसे वे देश भी सम्मिलित हैं जिन्होंने आम तौर पर सक्रिय सामाजिक नीतियों पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया है। भारत विकास में सार्वजनिक स्वास्थ्य की उपेक्षा की भारी कीमत चुका रहा है, जो सिर्फ़ ऐतिहासिक अनुभव से ही नहीं बल्कि आर्थिक सिद्धान्त से भी स्पष्ट है।

जहाँ स्वास्थ्य के मामले में बाज़ार की नाकामी अच्छी तरह समझ ली गयी है, और सिद्धान्त रूप में, बड़े पैमाने पर सार्वजनिक हस्तक्षेप पर बल दिया जाने लगा है, वहीं भारत को इस क्षेत्र में भयंकर सरकारी नाकामियोंसे भी जूझना है। प्रसिद्ध जनसांख्यिकीविद् आशीष बोस के अनुसार, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों की स्थिति भारतीय राज्य की सबसे बड़ी नाकामीहै: ‘‘यहाँ कोई डॉक्टर, नर्स और चिकित्सा उपकरण नहीं होता है, और लोग दोयम दर्जे के इलाज के लिए मीलों चलकर आते हैं।’’ वर्ष 2007 में उन्होंने यह भी तर्क दिया कि आज़ादी के बाद से इसमें कोई खास बदलाव नहीं आया है।

अभिजीत बनर्जी, एंगस डेटन और एस्थर डुफलो ने ग्रामीण राजस्थान में स्वास्थ्य वितरणसे सम्बन्धित अपने अध्ययन में इस नाकामी का विवरण दिया है। लेखकों ने यह पाया कि स्वास्थ्य उपकेन्द्रों पर 45% और बड़े स्वास्थ्य केन्द्रों पर 36% चिकित्साकर्मी अनुपस्थित रहते थे। इन केन्द्रों पर डॉक्टर और नर्स अनियमित रूप से आते हैं, जिससे ग़रीबों के लिए इन केन्द्रों तक आना-जाना काफ़ी ख़र्चीला बन गया और इलाज न हो पाने के चलते वे काफ़ी निराश भी हो जाते हैं। यहाँ मरीज़ों को अपनी अधिकांश दवाओं की कीमत खुद ही देनी पड़ती है, जो सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं के लाभ में कटौती करता है। इसका नतीजा यह हुआ है कि इस क्षेत्र में अधिकांश स्वास्थ्य सेवा पारम्परिक भोपा (झाड़-फूँक करने वाले और वैद्य आदि) द्वारा की जाती है। इन पर किसी तरह का नियन्त्रण नहीं होता है और यह अमूमन अप्रशिक्षित होते हैं।

यदि इस शोध-आलेख को पढ़ते वक़्त किसी के मन में निराशा और बदलाव की सम्भावना के बारे में सन्देह पैदा होता है, तो उसे माफ़ किया जा सकता है। हालाँकि यह भी सच है कि पिछले दस वर्षों में बहुत से राज्यों में स्वास्थ्य सेवाओं में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, इसमें कुछ ऐसे राज्य (मसलन, बिहार) भी सम्मिलित हैं जहाँ तीव्र प्रगति होना असम्भव-सा लगता था। राजस्थान में भी इस शोध-पत्र से सम्बन्धित सर्वेक्षणों के समय की तुलना में कई मामलों में स्थिति काफ़ी अच्छी हुई है। मसलन, तमिलनाडु के पदचिन्हों पर चलते हुए, राजस्थान ने भी सार्वजनिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर सामान्य दवाओं के मुफ़्त वितरण की सुविधा में काफ़ी विस्तार किया है। साथ ही, एक एम्बुलेंस सेवा भी स्थापित की गयी है। ज़्यादा महत्त्वपूर्ण बात यह है कि सेवाओं में सुधार के चलते अब लोग ज़्यादा बड़ी संख्या में सरकारी स्वास्थ्य केन्द्रों का उपयोग करने लगे हैं। हालाँकि अभी भी इन्हें बहुत सीमित और प्रयोगात्मक क़दम ही माना जा सकता है, लेकिन इसमें कोई सन्देह नहीं है कि राजस्थान (या फिर बिहार) के स्वास्थ्य केन्द्र तमिलनाडु या राजस्थान के स्वास्थ्य केन्द्रों जैसे कार्यकुशल हो सकते हैं।


यह भी गौरतलब है कि स्वास्थ्य सेवाओं में हुए सुधार अब आँकड़ों में भी स्पष्ट रूप से नज़र आने लगे हैं। मिसाल के तौर पर, हाल ही में हुए रैपिड सर्वे ऑन चिल्ड्रेन’ (निश्चित रूप से इसका आधार काफ़ी सीमित है) में यह तथ्य सामने आया कि बिहार और राजस्थान में ज़्यादा संख्या में बच्चे रोगों के प्रतिरक्षण दायरे में  आये हैं और इससे सम्बन्धित इनके स्वास्थ्य संकेतकों में भी काफ़ी सुधार हुआ है। यहाँ कुछ बिन्दुओं पर विचार करने की आवश्यकता है : आज बिहार में बच्चों के परिरक्षण का दर तमिलनाडु में 1990 के दशक के आरम्भ में बच्चों के परिरक्षण दर के बराबर है; और जैसा कि सारणी 1 से स्पष्ट है कि यही बात शिशु विकास के अन्य संकेतकों पर भी लागू होती है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि इस क्षेत्र में बिहार तमिलनाडु से 20 वर्ष पीछे है। लेकिन यह भी सच है कि पिछले दस वर्षों में बिहार और तमिलनाडु के बीच का अन्तराल कम होता गया है, तो इससे यह भी पता चलता है कि शिशु विकास के सन्दर्भ में तकरीबन बीस वर्षों के भीतर बिहार की स्थिति वर्तमान तमिलनाडु जैसी हो जायेगी। बेशक, यह एक सुखद अहसास देने वाला विचार है। और यदि बिहार ऐसा कर सकता है तो बाकी राज्य ऐसा क्यों नहीं कर सकते हैं।

सारणी 1: तमिलनाडु (1992-93) और बिहार (2013-14) में शिशु विकास

 1992-93

 तमिलनाडु
2013-14

 बिहार

पूरी तरह से परिरक्षित 12-23 माह के बच्चों का अनुपात (प्रतिशत में)

65





60


10-14 वर्ष के बीच, महिला साक्षरता दर (प्रतिशत में)





 81


 81


स्वास्थ्य परीक्षण के बाद होने वाले जन्म का अनुपात (प्रतिशत में)



94





85




5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों का अनुपात जिनका कम-वन नहीं है (प्रतिशत में)



52


(63)

स्रोत: द्रेज और खेड़ा (2015ग), यह सारणी नैशनल फैमिली हेल्थ सर्वेके पहले और तीसरे चरण के आँकड़ों पर आधारित है।

भारत में स्वास्थ्य की स्थिति सफलता और विफलता का घालमेल है। भारत के लोग आज़ादी के समय की तुलना में आज ज़्यादा स्वस्थ हैं और उन्हें बेहतर पोषक आहार मिल रहा है। एंगस डेटॉन (2013) के मुताबिक बीसवीं सदी के दूसरे भाग में लोगों के जीवनस्तर में अभूतपूर्व सुधार हुआ, और भारत में भी इसी तरह का भूख से महान बचावहुआ। बहरहाल, तुलनात्मक रूप से देखने पर यह नहीं कहा जा सकता है कि भारत का प्रदर्शन काफ़ी अच्छा है। दरअसल, अन्य दक्षिण एशियाई देशों की, जिनमें पाकिस्तान भी शामिल है, स्वास्थ्य संकेतकों के बहुत से आयामों में भारत से अच्छी स्थिति है। यह इसलिए भी आश्चर्यजनक है क्योंकि इनमें से कुछ (बांग्लादेश और नेपाल) भारत की तुलना में ज़्यादा ग़रीब हैं। जहाँ इस बात के संकेत हैं कि हाल के वर्षों में भारत और इसके पड़ोसियों के बीच स्वास्थ्य अन्तराल में कमी आयी है, फिर भी भारत में बांग्लादेश की तरह परिरक्षण दर या की नेपाल की भाँति स्वच्छता दर हासिल करने के लिए अभी एक लम्बी दूरी तय करनी है।

इसके अलावा, इस प्रकार के विशिष्ट स्वास्थ्य लक्ष्योंको हासिल करने के अलावा, भारत एक सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा की कार्यात्मक व्यवस्था स्थापित करने की ज़्यादा बड़ी चुनौती का सामना भी कर रहा है। 1946 में ही भोरे समिति ने अपनी रिपोर्ट में यह किया स्पष्ट था कि सार्वभौमिक स्वास्थ्य व्यवस्था का बुनियादी सिद्धान्त यह है कि ‘‘समुदाय के प्रत्येक सदस्य को अच्छी गुणवत्ता वाली स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराई जाये, भले ही वे इसके लिए पैसा देने में समर्थ हों या न हों।’’ अब समृद्ध देशों में सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा के सिद्धान्त को पूरी तरह स्वीकार कर लिया गया है, हालाँकि संयुक्त राज्य अमेरिका इसका एक प्रमुख अपवाद है। हाल के वर्षों में बहुत से विकासशील देशों (जिसमें ब्राजील, चीन, मैक्सिको और थाईलैण्ड शामिल हैं) ने भी सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा की दिशा में महत्त्वपूर्ण क़दम बढ़ाये हैं। असल में, सब-सहारा अफ्रीका के बाहर दुनिया की तकरीबन आधी जनसंख्या एक ऐसे देश में रहती है जहाँ सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा पर आधारित स्वास्थ्य व्यवस्था है। किन्तु अभी भारत में यह लक्ष्य हासिल करने के लिए बहुत किया जाना बाकी है। ऐसा सिर्फ़ इसलिए नहीं है कि यहाँ स्वास्थ्य व्यवस्था अत्यन्त व्यावसायिक है, बल्कि इसलिए भी क्योंकि सार्वजनिक नीति सम्बन्धी वाद-विवाद में सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा के विचार को मज़बूती से स्थापित नहीं किया गया है। इस पुस्तक में गीता सेन का शोध-आलेख सम्मिलित है जिसमें उन्होंने हाई लेवल एक्सपर्ट ग्रुप रिपोर्ट ऑन यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज फॉर इण्डिया’ (गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया 2011) के रिपोर्ट की विवेचना की है। दरअसल, यह सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा सम्बन्धी वाद-विवाद में एक महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप है। वर्तमान भारत में सामाजिक नीति की एक बड़ी चुनौती यह दिखाना है कि सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।

शिक्षा

पिछले बीस वर्षों में भारत की स्कूल शिक्षा में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है, और प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर अब यह सार्वभौमिक रूप हासिल करने के करीब है। यह एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। फिर भी, स्कूली शिक्षा के बारे में हाल में मिले प्रमाण अत्यन्त भयावह तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। पढ़ने और लिखने के बारे में बच्चों की उपलब्धियाँ अत्यन्त निम्न हैं, और एक निश्चित समयावधि के बाद उनमें सुधार का कोई चिन्ह भी नहीं दिखता है। यह भी उल्लेखनीय है कि जिन स्कूलों में वंचित तबकों के बच्चे जाते हैं,  उनकी शिक्षा की गुणवत्ता ज़्यादा ख़राब है।

भारत में स्कूली शिक्षा का निम्न स्तर एक भयंकर अन्याय है। समुचित शिक्षा के अभाव में लाखों बच्चे, जो डॉक्टर, इंजीनियर या कलाकार बन सकते थे आखि़रकार ईंट बनाने या रिक्शा चलाने जैसे काम करने के लिए मजबूर हो जाते हैं। स्वास्थ्य की तरह ही, इस समस्या की गहनता भी इसलिए बढ़ जाती है क्योंकि सार्वजनिक जीवन में इसके बारे में अत्यधिक उदासीनता है। सम्पन्न वर्गों के लिए यह कोई मुद्दा नहीं है क्योंकि वे अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में भेज देते हैं। इस मामले में ग़रीब माता-पिता बेबस होते हैं। इसके चलते सरकारी स्कूलों में कक्षा में गतिविधियों के अभाव की गम्भीर समस्या सामने आती है। 1996 में उत्तर भारत के 200 स्कूलों के सर्वेक्षण में यह पाया गया कि जाँचकर्त्ताओं के आकस्मिक निरीक्षण के दौरान आधे सैम्पल स्कूलों में शिक्षण की कोई गतिविधि नहीं हो रही थी (प्रोब टीम 1999)। दस साल बाद जब फिर से इन स्कूलों का सर्वेक्षण किया गया तो स्थिति ज्यों की त्यों थी : तकरीबन आधे स्कूलों में कोई शिक्षण गतिविधि नहीं हो रही थी (डे और अन्य 2006)

बहुत से राज्यों में अनुबन्ध शिक्षकों’ (कॉन्ट्रैक्ट टीचर्स) की नियुक्ति द्वारा इस समस्या को हल करने का प्रयास किया गया है। शिक्षकों पर होने वाले ख़र्च को कम करने के सन्दर्भ में भी इस व्यवस्था की तरदारी की जाती रही है। हाल के वर्षों में अनुबन्ध शिक्षकों के नकारात्मक और सकारात्मक पक्ष के बारे में ज़ोरदार बहस होती रही है। गीता गाँधी किंगडन और वंदना सिपाहीमलानी-राव ने इस किताब में संकलित अपने शोध-आलेख में इस वाद-विवाद के विविध पहलुओं का विश्लेषण प्रस्तुत किया है। वे यह बताती हैं कि अनुबन्ध शिक्षकों को स्थायी शिक्षकों की तुलना में काफ़ी कम वेतन मिलता है किन्तु बच्चों को सिखाने सम्बन्धी उपलब्धियों के सन्दर्भ में उनके प्रदर्शन को स्थायी शिक्षकों की तुलना में बुरा (या अच्छा) नहीं माना जा सकता है। निश्चित रूप से, इसे अनुबन्ध व्यवस्था के सर्वोत्तम होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता है क्योंकि स्थायी शिक्षकों को सक्रिय करने के अन्य तरीके भी हो सकते हैं, या फिर स्कूली शिक्षकों की सेवा-शर्तों को वैकल्पिक रूप से तैयार किया जा सकता है। बहरहाल, इससे कम-से-कम यह स्पष्ट है कि शिक्षक प्रबन्धन की मौजूदा व्यवस्था गहरे स्तर पर अतार्किक है।

स्कूली शिक्षा के सन्दर्भ में वाद-विवाद का एक जीवन्त मुद्दा यह है कि क्या निजी स्कूलों को सरकारी स्कूलों का विकल्प माना जा सकता है। दरअसल, यह द्विभाजन ही पूरी तरह गलत है क्योंकि इसमें मुनाफे के लिए संचालित होने वाले निजी स्कूलों और मुनाफा-रहित निजी स्कूलों के बीच अन्तर नहीं किया जाता है। पूरी दुनिया में मुनाफा-रहित निजी स्कूलों (जिन्हें, मिसाल के तौर पर, नागरिक संगठनों या सार्वजनिक भावना रखने वाले नागरिकों द्वारा संचालित किया जाता है) ने स्कूली व्यवस्था में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। भारत में भी, विशेष रूप से महाराष्ट्र और केरल जैसे राज्यों में, शिक्षा के क्षेत्र में स्वैच्छिक कार्रवाई का एक समृद्ध इतिहास रहा है। हालाँकि, हाल के वर्षों में मुनाफे के लिए संचालित होने वाले निजी स्कूलों की संख्या में काफ़ी वृद्धि हुई है, जिसने मुनाफा-रहित निजी स्कूलों के क्षेत्र को प्रभावहीन बना दिया है। इसलिए, मुख्य वाद-विवाद सरकारी और मुनाफे के लिए संचालित होने वाले निजी स्कूलों के बीच है।

इस वाद-विवाद में बहुत से विद्वानों ने अलग-अलग तरह के विचार प्रस्तुत किये हैं। इस पुस्तक में संकलित डी. डी. कारोपैडी का शोध-आलेख आश्चर्यजनक और अनपेक्षित निष्कर्ष प्रस्तुत करता है। इसमें आन्ध्र प्रदेश में रैण्डम नियन्त्रित परीक्षणका निष्कर्ष प्रस्तुत किया गया है। इस अध्ययन में रैण्डम सलेक्शन के आधार पर बच्चों को अपने (या अपने माता-पिता) पसन्दीदा निजी स्कूल में पढ़ने के लिए वजीफा प्रदान किया गया। चूँकि बच्चों का चयन रैण्डम तरीके से किया गया, इसलिए उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि और अन्य विशेषताएँ नियन्त्रण समूह के बच्चों की तरह ही थीं (इन्हें भी रैण्डम तरीके से चुना गया था)। फिर भी, परीक्षा में अंकों तथा सीखने सम्बन्धी उपलब्धियों के सन्दर्भ में इनका प्रदर्शन सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के प्रदर्शन से अच्छा नहीं था। दरअसल, यह नतीजा व्यापक रूप से प्रचलित इस धारणा के खिलाफ़ है कि आमतौर पर, भारतीय बच्चे सरकारी स्कूलों की तुलना में निजी स्कूलों में ज़्यादा सीखते हैं। यह एक परेशान करने वाला प्रश्न भी खड़ा करता है : यदि सरकारी स्कूल भी उतना ही अच्छा प्रदर्शन करते हैं तो माता-पिता निजी स्कूल में अपने बच्चों का नामांकन कराने के लिए पैसा ख़र्च क्यों करते हैं? निश्चित रूप से, कारोपैडी का अध्ययन इस मसले पर अन्तिम निष्कर्ष नहीं है। अन्य अध्ययनों में भिन्न निष्कर्ष भी सामने आये हैं। फिर भी, यह अध्ययन इस उपयोगी तथ्य की ओर ध्यान दिलाता है कि इन मसलों पर किसी भी एक दावे को पूरा सच नहीं माना जा सकता है।

भारत में स्कूली व्यवस्था में सार्वजनिक (या सरकारी) तथा निजी स्कूलों के बीच द्विभाजन है, और ऐसे बहुत से स्तर हैं जो स्कूली व्यवस्था के दोनों स्तरों को विभाजित करते हैं। इसके साथ ही, किसी खास स्कूल में भी लड़कों और लड़कियों तथा मेधावी और कमज़ोर माने जाने वाले छात्रों के बीच भेदभाव होता है। अधिकांश मौक़ो पर भिन्न जातियों और वर्गों के बच्चों के साथ भी अलग-अलग बर्ताव किया जाता है। इस पुस्तक में संकलित विमला रामचन्द्रन और तारामणि नारोयम के शोध-आलेख में दिखाया गया है कि दलित और आदिवासी बच्चों को विविध स्तरों पर बुरे बरताव का सामना करना पड़ता है- उनके अलग बैठने की व्यवस्था की जाती है और उनसे शौचालय या शिक्षक का लंच बॉक्ससाफ़ करने जैसे शारीरिक श्रम वाले काम कराये जाते हैं। इसके विपरीत, जिन बच्चों को सबसे अच्छा और सबसे मेधावी माना जाता है- उनमें से अधिकांश विशेषाधिकार-प्राप्त जातियों के बच्चे ही होते हैं- उनसे पुस्तकालय में किताबों को सही तरीके से रखने या क्लास मॉनीटरकी भूमिका अदा करने को कहा जाता है।

अन्तर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में विचार करने पर विखण्डन और असमानता से ग्रस्त भारत की स्कूल व्यवस्था अत्यन्त दोषपूर्ण लगती है। यूनेस्को के आँकड़ों के अनुसार, पूरी दुनिया में प्राथमिक स्तर पर निजी स्कूलों में जाने वाले बच्चों का अनुपात 12% है और विकसित देशोंमें यह अनुपात सिर्फ़ 6% ही है। भारत में यह अनुपात 30% से ज़्यादा है, और हर साल इसमें बढ़ोतरी हो रही है (एएसईआर, 2015)। सार्वजनिक और निजी स्कूलों के बीच और इनके भीतर मौजूद बहुस्तरीय पद-सोपानों के चलते निजी और सार्वजनिक स्कूलों के बीच बुनियादी विभाजन में बढ़ोतरी हुई है। इन सबके चलते सामाजिक समानता लाने वाले साधन के रूप में स्कूली व्यवस्था की महत्त्वपूर्ण भूमिका काफ़ी कमज़ोर हुई है। इसके चलते, वंचित तबकों के बच्चों को सबसे अप्रेरणादायी माहौल में पढ़ाई करनी पड़ती है। इस स्थिति में बदलाव करने के लिए यह आवश्यक है कि स्कूल शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर पहल की जाये। इसके लिए शिक्षकों के प्रबन्धन (अर्थात् शिक्षकों के चयन, प्रशिक्षण, पदोन्नति, प्रोत्साहन और कार्य संस्कृति), विद्यार्थियों के मूल्यांकन की पद्धति और माता-पिता की भूमिका के बारे में गम्भीरता से पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। स्कूल शिक्षा की व्यवस्था ने यह दिखाया है कि उसमें बहुत से क्षेत्रों में सकारात्मक बदलाव करने का सामर्थ्य है। इसने स्कूल में भागीदारी, आधारभूत संरचना के विकास और स्कूल में प्रोत्साहन हेतु प्रभावकारी व्यवस्था करने के सन्दर्भ में बेहतर प्रदर्शन किया है (इसमें दोपहर के भोजन से लेकर मुफ्त साइकिल जैसी व्यवस्था सम्मिलित की जा सकती है)। शिक्षा की गुणवत्ता के सन्दर्भ में भी इसी तरह से कार्य करने की आवश्यकता है। यह एक गम्भीर चुनौती है तथा भारतीय स्कूल व्यवस्था या तो सफलतापूर्वक इसका सामना करेगी या फिर इसमें पूरी तरह नाकाम हो जायेगी।
रोज़गार गारंटी

स्वास्थ्य और शिक्षा के अतिरिक्त पूरी दुनिया में सामाजिक नीति से सम्बन्धित वाद-विवाद में सामाजिक सुरक्षा का मसला भी एक तीसरे महत्त्वपूर्ण मुद्दे के रूप में सामने आता है। समृद्ध देशों में बेरोगारी बीमा, सामाजिक सहायता, पेंशन और इससे जुड़े कार्यक्रमों के रूप में सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने का प्रयास किया जाता है। भारत में बेरोगारी बीमा को लागू करना इसलिए कठिन है क्योंकि यहाँ श्रम शक्ति का एक बड़ा भाग (90% से ज़्यादा) अनौपचारिक क्षेत्र में है, जहाँ बेरोगारी को सही तरह से परिभाषित नहीं किया गया है। राष्ट्रीय ग्रामीण रोगार गारंटी अधिनियम (नरेगा) को सामाजिक सुरक्षा के एक वैकल्पिक साधन के रूप में देखा जा सकता है। निश्चित रूप से, इसके सहायक के रूप में एक ऐसे कार्यक्रम के संचालन की आवश्यकता है, जिसमें काम करने में असमर्थ लोगों को सामाजिक सहायता प्राप्त हो।

इस विकल्प को स्व-चयन के सिद्धान्त के आधार पर सम्भव बनाया गया है- काम करने की इच्छा इसकी योग्यता की कसौटी है। इसके लिए व्यक्ति की योग्यता के परीक्षण या लक्ष्य निर्धारण के संयन्त्र की आवश्यकता ख़त्म हो जाती है। इसके अतिरिक्त, सामाजिक सुरक्षा के सार्वजनिक कार्य दृष्टिकोण का एक अन्य लाभ है- यह आय के साथ-साथ सम्पदा निर्माण या कम-से-कम सम्भावित सम्पदा निर्माण को जोड़ता है।

विशेष रूप से,  भारत के पश्चिमी क्षेत्र- राजस्थान,  गुजरात और महाराष्ट्र में, सूखे के सन्दर्भ में यह तुलनात्मक रूप से पहले ही समझ लिया गया था। राष्ट्रीय ग्रामीण रोगार गारंटी अधिनियम, 1970 के दशक में महाराष्ट्र में बने ऐसे ही कानून से प्रेरित है; यह राहत कार्यों को स्थायी हस्तक्षेप में बदलने का प्रयास करता है। इसके अलावा, यह सार्वजनिक कार्य को न्याययोग्य अधिकारों की रूपरेखा में अवस्थित करता है- इसमें सिर्फ़ माँग के आधार पर काम का अधिकार ही शामिल नहीं है, बल्कि न्यूनतम वेतन, 15 दिनों के भीतर वेतन अदायगी, कार्यस्थल पर बुनियादी सुविधाओं जैसे अन्य अधिकार भी सम्मिलित हैं। अधिकार दृष्टिकोण का बुनियादी उद्देश्य मदूरों की सौदेबाजी की शक्ति को बढ़ाना और सरकार को उनके प्रति जवाबदेह बनाना है।

अधिकार दृष्टिकोण का एक अन्य महत्त्वपूर्ण प्रभाव हुआ है जिसने सार्वजनिक कार्यों को एक शक्तिशाली संगठक यन्त्र में बदल दिया है। यदि सार्वजनिक कार्यों को सरकार के विशेषाधिकार के आधार पर तय किया जाता है, तो श्रमिकों के पास पहल के लिए ज़्यादा कुछ नहीं बचता। इसके विपरीत, रोगार गारंटी के बुनियादी सिद्धान्त के आस-पास निर्मित अधिकारों का समूह नागरिकों को सामूहिक कार्रवाई का आधार उपलब्ध कराता है। जैसा कि मिहिर शाह ने इस किताब में संकलित अपने लेख में बताया है कि नागरिक समाज संगठनों को सृजनात्मक रूप से सम्मिलित करने से इस प्रक्रिया में मदद मिल सकती है और यह ज़्यादा प्रभावकारी तरीके से लागू हो सकती है।

व्यवहार में, इस कार्यक्रम को विविध बाधाओं का सामना करना पड़ा, जो काफ़ी हद तक भारतीय प्रशासन के वर्ग चरित्र से सम्बद्ध हैं। केन्द्र और राज्य सरकारों ने प्रत्येक क़दम पर इस जवाबदेही का विरोध किया है, और उन्हें कुछ हद तक सफलता भी मिली है। मिसाल के तौर पर, उन्होंने बेरोज़गारी भत्ता,  देर से रकम अदायगी के लिए  मुआवज़ा और अपने कर्त्तव्य को पूरा करने में नाकाम रहने वाले कर्मचारियों को सजा देने जैसे इस अधिनियम में मौजूद जवाबदेही के महत्त्वपूर्ण प्रावधानों की लगातार अवहेलना की है। नरेगा मज़दूरों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए कानूनी व्यवस्था अपर्याप्त साबित हुई है (इसका आंशिक कारण यह है कि यह व्यवस्था काम नहीं करती, और अधिकांश मामलों में यह मज़दूरों की पहुँच से बाहर है), जो जवाबदेही की पूरी प्रक्रिया को और ज़्यादा प्रभावहीन बना देती है। इसके चलते, नरेगा मज़दूरों के अधिकारों को वास्तविक रूप से लागू नहीं किया जा सका है, और इनमें से अधिकांश अधिकार स्थानीय अधिकारियों की दया पर निर्भर हैं। हालाँकि जिन क्षेत्रों में नरेगा श्रमिक ज़्यादा संगठित हैं, वहाँ स्थिति ज़्यादा उत्साहवर्धक है। किन्तु सौदेबाजी या लेन-देन की वास्तविक क्षमता न होने के चलते सांगठनिक प्रक्रिया अपने-आप में अत्यन्त कठिन है। 

हालाँकि इस विपरीत स्थिति में भी रोज़गार गारंटी अधिनियम से एक सार्थक उद्देश्य पूरा हुआ है। एक बात तो यह है कि यह प्रत्येक ग्रामीण परिवार में एक-चौथाई अनुपूरक आय का स्रोत रहा है। इससे हर वर्ष तकरीबन 20 करोड़ लोगों को रोज़गार मिलता है। इसके अतिरिक्त, जैसा कि बहुत से अध्ययनों से पता चला है कि इनमें से अधिकांश परिवार समाज के वंचित तबकों से सम्बन्धित होते हैं। मसलन, कुल नरेगा मज़दूरों में आधे से ज़्यादा अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों से सम्बद्ध होते हैं। इनमें से बहुतों के लिए नरेगा एक मुक्तिदायी अनुभव रहा है क्योंकि इससे ऊँची जाति के भूमिपतियों और रोज़गारदाताओं पर इनकी निर्भरता कम हुई है।

जैसा कि इस किताब में संकलित अपने शोध-आलेख में रीतिका खेड़ा और नन्दिनी नायक ने दिखाया है, इस कार्यक्रम ने महिलाओं के सशक्तीकरण में भी योगदान दिया है। नरेगा कार्य में महिलाओं की भागीदारी (कुल व्यक्ति-दिन के सन्दर्भ में) कार्यक्रम के आरम्भिक दिनों में ही 50% के आस-पास पहुँच चुकी थी और बाद के वर्षों में इसमें लगातार बढ़ोतरी हुई है और अब यह तकरीबन 58% है। यह आँकड़ा सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था में उपलब्ध रोज़गार में महिलाओं के अनुपात से ज़्यादा है। इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में महिलाओं को कार्यस्थल पर्यवेक्षकों, ग्राम रोज़गार सेवकों, कार्यक्रम अधिकारी, आँकड़ा संकलन कर्मचारी, तकनीकी सहायक, सामाजिक लेखा परीक्षक आदि के रूप में रोज़गार मिला है। यह एक ऐसे देश के लिए छोटी उपलब्धि नहीं है जहाँ ग्रामीण औरतों के पास गरिमायुक्त वेतन रोज़गार का अवसर काफ़ी कम होता है; बल्कि कई क्षेत्रों में तो उनके पास केवल दोहपर का खाना बनाने, आँगनबाड़ी कार्यकर्ता या स्वास्थ्य कार्यकर्ता की ही भूमिका होती है। खेड़ा और नायक ने अपने शोध-आलेख में यह विवेचना भी की है कि नरेगा से कुछ स्पष्ट फायदे और अन्य अवसर प्राप्त हुए हैं, जिन्हें महिलाएँ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण मानती हैं (मसलन, एक बैंक खाता होना या ग्राम-सभा में भागीदारी करना)। अभी तक नरेगा के इस आयाम पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया गया है किन्तु यह अपने-आप में एक बड़ी उपलब्धि है।

इसी प्रकार, नरेगा काम के उत्पादक मूल्य को भी अपर्याप्त मान्यता मिली है। बार-बार दुहराकर (मुख्य रूप से कॉरपोरेट प्रायोजित मीडिया द्वारा) एक मिथक बना दिया गया है कि गड्ढा खोदना और उसे भरना शामिल है-एक टीकाकार ने इसे कीचड़ के साथ खिलवाड़की संज्ञा दी। बहरहाल, जैसा कि क्रुश्ना रनावरे और उनके अन्य सहकर्मियों के शोध-आलेख से स्पष्ट होता है कि नरेगा में काम पाने वाले मज़दूर या इससे बनने वाले तालाब, कुओं, सड़कों या खेती योग्य ज़मीन से लाभ पाने वाले किसानों की धारणा ऐसी नहीं है। नरेगा द्वारा निर्मित सम्पदा के उत्पादक मूल्य के बारे में लोगों की धारणाओं से सम्बन्धित पहले के अध्ययनों में भी ऐसा ही निष्कर्ष सामने आया। कुछ अध्ययनों में नरेगा सम्पदाओं की आर्थिक उत्पादकता के वस्तुनिष्ठ मापन पर भी गौर किया गया है और इनमें पारम्परिक सन्दर्भ वापसी के दर पर विचार किया गया है। मिसाल के तौर पर, हाल के एक अध्ययन में नरेगा के अन्तर्गत निर्मित कुओं को सिर्फ़ खेती की उत्पादकता पर प्रभाव के आधार बनाते हुए यह अनुमान लगाया गया है कि झारखण्ड में वित्तीय वापसी दर 6% है (भास्कर और यादव 2015)। यह वापसी की बहुत ही सम्मानजनक दर है, जो बहुत से औद्योगिक उत्पादनों के बराबर है। इसके अलावा, सामान्य तौर पर नरेगा कार्यों के उत्पादक मूल्य के स्पष्ट निर्धारण के लिए प्रमाण की आवश्यकता है, लेकिन मौजूदा तथ्यों के आधार पर यह बेझिझक कहा जा सकता है कि नरेगा कार्यों के अनुत्पादक होने का दावा आधारहीन है।

यह नरेगा का एकमात्र ऐसा आयाम नहीं है जिसमें अनुसन्धान के निष्कर्षों और मीडिया रिपोर्टों में स्पष्ट भिन्नता है। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि भारतीय मीडिया ने नरेगा की नाकामियों और घोटालों पर ज़्यादा ध्यान केन्द्रित किया है। यह कमियों की ओर ध्यान दिलाने की इसकी भूमिका का एक बुनियादी भाग है, लेकिन कई मरतबा इससे सम्पूर्ण वास्तविक तस्वीर सामने नहीं आ पाती है। बिजनेस मीडिया अमूमन सामाजिक ख़र्च वाले तथा मज़दूरों का वेतन और उनके लेन-देन (या सौदेबाजी) की शक्ति बढ़ाने वाले कार्यक्रमों की आलोचना करती रही है। इसके द्वारा नरेगा के नकारात्मक पहलुओं पर ज़रूरत से ज़्यादा बल देने को इसी प्रवृत्ति का भाग माना जाना चाहिए। विद्वत्तापूर्ण अनुसन्धानों में ज़्यादा सकारात्मक तस्वीर सामने आयी है और इनमें नरेगा की कुछ प्रमुख कमियों को भी रेखांकित किया गया है। इनमें नरेगा में वेतन मिलने में देरी, काम पर अत्यधिक नियन्त्रण, अपर्याप्त उत्तरदायित्व और भ्रष्टाचार की सम्भावना (हालाँकि इसमें गिरावट आयी है) को इसकी कुछ प्रमुख कमियों के रूप में उल्लेखित किया गया है। यह उम्मीद की जा सकती है कि आने वाले समय में होने वाले अनुसन्धानों के माध्यम से हमें नरेगा की सफलताओं और सीमाओं की ज़्यादा गहन जानकारी मिलेगी।
खाद्य सुरक्षा

भारत को भूख और अकाल की भूमि माना जाता था। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद के दौर में देश ने इस हालत में सुधार करने की दिशा में कुछ प्रगति की है। अकाल की परिघटना पूरी तरह ख़त्म हो चुकी है और लोगों के भूखे पेट रहने की स्थिति में भी पहले की तुलना में काफ़ी कमी आयी है। किन्तु भारत में अभी भी लोग बड़ी संख्या में अल्प-पोषण के शिकार हैं। इससे न सिर्फ़ लोगों की ज़िन्दगी बर्बाद हो रही है, बल्कि देश की प्रगति में भी बाधा उत्पन्न हो रही है। आज भी, दुनिया के सिर्फ़ कुछ देशों के अलावा भारत में ही कुपोषित और कम वज़न वाले बच्चों की संख्या सबसे ज़्यादा है।

पिछले तकरीबन पन्द्रह वर्षों से कम-से-कम इस मुद्दे पर ज़्यादा ध्यान दिया जाने लगा है और यह समय-समय पर एक जीवन्त राजनीतिक मुद्दा भी बनता रहा है। मिसाल के तौर पर, हाल ही में मध्य प्रदेश के मुख्यमन्त्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने शाकाहारी भावनाओंके आधार पर आँगनबाड़ियों में अण्डे देने पर रोक लगाने की घोषणा की (हालाँकि उन्होंने तीन आदिवासी ज़िलों में ही ऐसा किया)। उनकी इस घोषणा ने राष्ट्रीय स्तर पर एक विवाद को जन्म दिया और मोटे तौर पर, जनमत अल्पपोषित बच्चों के पक्ष में गोलबन्द हो गया। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 पर भी कई वर्षों तक गहन सार्वजनिक वाद-विवाद होता रहा। इस किताब मेँ संकलित लोकतन्त्र और भोजन का अधिकारशीर्षक शोध-आलेख में यह तर्क दिया गया है कि सार्वजनिक नीति में वंचित तबकों के हितों की हिफाजत के लिए सभी लोकतान्त्रिक साधनों (चुनाव अभियान, कानूनी कार्रवाई, जन-संचार माध्यम, कार्रवाई केन्द्रित अनुसन्धान, सड़क कार्रवाई इत्यादि) के उपयोग की सम्भावना पर गौर किया जाना चाहिए। लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को इस व्यापक अर्थ में अपनाने के चलते ही हाल के वर्षों में भूख और पोषण के मुद्दों को ज़्यादा राजनीतिक महत्त्व मिला है।

इस तरह के आन्दोलनों को काफ़ी असमान व्यावहारिक सफलता मिली है, लेकिन कम-से-कम कुछ क्षेत्रों में महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ हासिल हुई हैं। इसका एक उदाहरण भारत की मध्याहन भोजन योजना (मीड डे मील स्कीम) है, जिसमें हर रोज़ 100 मिलियन से भी ज़्यादा बच्चों को गरम और उसी वक़्त बना हुआ भोजन उपलब्ध कराया जाता है। वर्ष 2002 में यह योजना धीमी और अनिश्चित तरीके से आरम्भ हुई और अधिकांश राज्यों में अत्यन्त किफायती भोजन उपलब्ध कराया गया। शुरुआती दौर में बच्चों को अमूमन गीला चावल या घुघरी दिया गया। हालाँकि बाद के वर्षों में सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी और नियन्त्रण में दोपहर के भोजन में लगातार सुधार हुआ-रसोई की समुचित व्यवस्था की गयी, रसोइयों को प्रशिक्षित किया गया, इसके वित्तीय आबंटन में वृद्धि की गयी तथा इसके भोजन को ज़्यादा पोषक बनाया गया। गौरतलब है कि बहुत से शाकाहारी समूहों ने स्कूल के बच्चों पर अपने खान-पान के नियमों को थोपने का दबाव बनाया, किन्तु इसके बावजूद बहुत से राज्यों ने कम-से-कम सप्ताह में एक बार बच्चों को (दाल, सब्जियों और फलों के अतिरिक्त) अण्डा खिलाना आरम्भ किया। यह उल्लेखनीय है कि तमिलनाडु में बच्चों को हफ्ते में पाँच दिन अण्डा दिया जाता है। यह एक बड़ी कामयाबी है क्योंकि अण्डे में सबसे बुनियादी पोषक तत्त्व होते हैं।

दोपहर के भोजन में लगातार सुधार के साथ-ही-साथ यह भी आवश्यक है कि छह वर्ष से कम उम्र के बच्चों तथा गर्भवती और प्रसवकालीन स्त्रियों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं तथा पोषक तत्त्व उपलब्ध कराने पर ध्यान दिया जाये। समेकित बाल विकास सेवा (इंटिग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट सर्विसेज-आईसीडीएस) का यही उद्देश्य है। दीपा सिन्हा ने इस किताब में संकलित अपने शोध-आलेख में इस योजना की विवेचना की है। हाल के वर्षों में दोपहर के भोजन कार्यक्रम की तरह ही यह कार्यक्रम भी सार्वजनिक कार्रवाई का केन्द्र रहा है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय के मज़बूत आदेशों ने सहयोगी भूमिका अदा की है (मसलन, अपने एक आदेश में इसने यह कहा है कि छह वर्ष की उम्र के सभी बच्चों को आईसीडीएस योजना का लाभ मिलना चाहिए। हालाँकि मध्याहन भोजन कार्यक्रम की सफलता की तुलना में आईसीडीएस कार्यक्रम के विस्तार और गुणवत्ता को सुनिश्चित करना ज़्यादा कठिन साबित हुआ है। इसका एक कारण तो यह है कि मध्याहन भोजन की तुलना में यह एक ज़्यादा पेचीदा कार्यक्रम है। दस वर्ष पहले फोकस ऑन चिल्ड्रेन अंडर सिक्स’ (फोकस) द्वारा छह राज्यों के आँगनबाड़ियों के अध्ययन से यह बात सामने आयी थी कि अधिकांश राज्यों में यह कार्यक्रम काफ़ी ख़राब हालत में था। इसके अतिरिक्त, आईसीडीएस को किसी प्रकार की राजनीतिक प्राथमिकता में बदलना भी अत्यन्त मुश्किल रहा है। सिर्फ़ कुछ राज्यों (मसलन, तमिलनाडु और केरल) में ही महिलाएँ इतनी मुखर और सूचनाओं से लैस हैं कि वे सरकार पर यह कार्यक्रम लागू करने के लिए मज़बूती से दबाव डाल पायें।

फिर भी, पिछले दस वर्ष की तुलना में आज आईसीडीएस ज़्यादा जीवन्त अवस्था में है। पहले की तुलना में अब इस कार्यक्रम का दायरा काफ़ी बड़ा हो गया है। अधिकांश गाँवों में आँगनबाड़ी है जिसके पास अपना भवन और अन्य बुनियादी सुविधाएँ हैं। इस दौर में सिर्फ़ इस कार्यक्रम के दायरे का ही विस्तार नहीं हुआ है, बल्कि इसकी गुणवत्ता में सुधार के प्रमाण भी मिले हैं। फोकस राज्यों के पुनर्सर्वेक्षण में यह एक महत्त्वपूर्ण तथ्य के रूप में सामने आया है (सिन्हा और कपूर, 2015)। मसलन, शुरुआती फोकस सर्वेक्षण में जिन दो राज्यों (छत्तीसगढ़ और राजस्थान) की शिथिल राज्योंके रूप में पहचान की गयी थी, 2014 में यह पाया गया कि वहाँ आईसीडीएस कार्यक्रम काफ़ी सक्रिय है। कुल मिलाकर, यदि सभी छह राज्यों पर विचार किया जाये तो यह सुधार (अर्थात् भोजन के तत्त्वों की मात्रा और गुणवत्ता, संवृद्धि चार्ट को कायम रखने, बच्चों की निरन्तर उपस्थिति आदि के सन्दर्भ में) काफ़ी कम प्रतीत होता है। फिर भी, यह तथ्य अपने-आप में उत्साहजनक है कि इस कार्यक्रम के मात्रात्मक विस्तार के चरण के दौरान इसकी गुणवत्ता में भी सुधार हुआ। चूँकि अब काफ़ी हद तक मात्रात्मक विस्तार हो चुका है, इसलिए यह उम्मीद है कि निकट भविष्य में गुणात्मक सुधारों पर ज़्यादा ध्यान दिया जायेगा।

इस किताब के खाद्य सुरक्षा से सम्बन्धित भाग के आखि़र में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पब्लिक डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम-पीडीएस) के बारे में रीतिका खेड़ा का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत किया गया है। अपने इस शोध-आलेख में लेखिका ने नौ राज्यों में फैले 110 गाँवों के सर्वेक्षण के आधार पर यह प्रमाण प्रस्तुत किया है कि हाल के वर्षों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली में पुर्नउभार हुआ है। यह निष्कर्ष वर्ष 2004-5 और 2011-12 के बीच किये गये नैशनल सैम्पल सर्वे से प्राप्त स्वतन्त्रा प्रमाणों से सुसंगत है, जिसमें यह बताया गया है कि इस व्यवस्था के क्षेत्र में विस्तार हुआ है, लोग इसका ज़्यादा उपयोग कर रहे हैं और इसमें होने वाले रिसाव (लीकेज) में भी कमी आयी है। ओडिशा और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में यह सुधार ज़्यादा स्पष्ट रूप से सामने आया जहाँ इसमें ठोस सुधारों की शुरुआत की गयी थी।

दरअसल यह एक बड़ी घटना है क्योंकि दस वर्ष पूर्व तक बहुत कम पर्यवेक्षक (विशेष रूप से अत्यन्त कम अर्थशास्त्री) यह मानते थे कि भारत में पीडीएस सफलतापूर्वक काम कर सकता है। हाल में हुए अनुसन्धान सकारात्मक बदलाव के पहले के निष्कर्ष को और ज़्यादा मज़बूती प्रदान करते हैं। गौरतलब है कि बिहार और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली तकरीबन ठप्प हो चुकी थी, किन्तु वहाँ भी अब इस प्रणाली में सकारात्मक बदलाव दिखते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रत्येक राज्य इस प्रणाली को सक्रिय रूप से लागू करने में समर्थ है, किन्तु शर्त यह है कि उसमें व्यवस्था को खोखला करने वाले भ्रष्ट तत्त्वों का सामना करने की राजनीतिक इच्छा-शक्ति हो। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (नैशनल फूड सेक्योरिटी ऐक्ट) 2013, पूरे देश में सार्वजनिक वितरण प्रणाली की व्यवस्था में सुधार करने और सम्पूर्ण अवस्था को एक मज़बूत आधार देने का महत्त्वपूर्ण अवसर उपलब्ध कराता है। हालाँकि इसके क्रियान्वयन में भी गम्भीर बाधाएँ हैं (विशेष रूप से, योग्य घरों की पहचान), और सिर्फ़ समय ही यह बतायेगा कि इस अवसर का लाभ उठाया जा सका या नहीं।

खाद्य सुरक्षा के इन विभिन्न कार्यक्रमों की एक वैध आलोचना यह है कि ये अत्यन्त अनाज केन्द्रित हैं। हालाँकि अब इसमें बदलाव भी हो रहा है। मसलनपहले आईसीडीएस कार्यक्रम के तहत दिये जाने वाले भोजन की तुलना में अब मध्याहन भोजन योजना में विविध प्रकार का पोषक पदार्थ दिया जा रहा है। आईसीडीएस कार्यक्रम के तहत सिर्फ़ बच्चों को पोषणयुक्त भोजन उपलब्ध कराना ही सम्भव नहीं है, बल्कि इसके द्वारा बच्चों के टीकाकरण, माता द्वारा स्तनपान और स्वच्छता को बढ़ावा देने जैसे अन्य स्वास्थ्यप्रद कार्यों को भी प्रोत्साहन दिया जा रहा है। यहाँ तक कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली में भी केवल अनाजों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है, बल्कि कुछ राज्यों में खाद्य तेल और दालें भी उपलब्ध कराई जा रही हैं। पिछले तकरीबन दस वर्षों की सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि यह है कि देश के दूर-दराज के भागों में बच्चों तक पोषक-तत्त्व पहुँचाने के लिए आधारभूत संरचना का निर्माण हुआ है। निकट भविष्य में इस योजना के व्यापक और बेहतर उपयोग के लिए कई अवसर सामने आयेंगे।

पेंशन और नकद हस्तान्तरण

जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है कि एक प्रभावकारी सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था के लिए यह आवश्यक है कि उन लोगों के लिए विशेष प्रावधान हो, जो काम करने में असमर्थ हैं। इस सन्दर्भ में भारत के सामाजिक सुरक्षा पेंशनों का तुलनात्मक रूप से अच्छा रेकार्ड रहा है। यहाँ सामाजिक सुरक्षा पेंशन शब्द का उपयोग विधवाओं, बुजुर्गों, और शारीरिक असमर्थता से पीड़ित लोगों के लिए योगदान-रहित पेंशन के सन्दर्भ में किया गया है। पिछले कुछ वर्षों में इन पेंशन योजनाओं के बारे में कम-से-कम आधा दर्जन से ज़्यादा अध्ययन सामने आये हैं, और इनके निष्कर्ष काफ़ी हद तक मिलते-जुलते हैं : सामाजिक सुरक्षा पेंशन ग्रामीण भारत के सबसे कमज़ोर लोगों में से कुछ के लिए महत्त्वपूर्ण आर्थिक समर्थन उपलब्ध कराते हैं, और यह तुलनात्मक रूप से कम लागत पर और बिना किसी बड़े रिसाव (लीकेज) के ऐसा करते हैं। इस तरह के दो अध्ययनों को इस किताब में शामिल किया गया है, जिनमें से एक सलोनी चोपड़ा और सलोनी पुडूसेरी द्वारा किया गया है और दूसरा श्रयाना भट्टाचार्य और सहकर्मियों द्वारा।

सकारात्मक निष्कर्षों के साथ-ही-साथ, इन अध्ययनों में पेंशन योजनाओं की विविध कमियों को भी रेखांकित किया गया है। बहुत से राज्यों में पेंशन की सुविधा सिर्फ़ गरीबी रेखा के नीचे’ (बीपीएल) परिवारों को ही प्राप्त है। गौरतलब है कि बीपीएल श्रेणी के बारे में यह कुख्यात है कि ये पूरी तरह से अविश्वसनीय और पुराने होते हैं। पेंशन की आवेदन प्रक्रिया काफ़ी बोझिल होती है और पेंशन की छोटी सी राशि के लिए आवेदक को कई वर्षों तक भाग-दौड़ करनी पड़ती है। पेंशन की राशि अत्यन्त कम है और पिछले दस वर्षों से वृद्धावस्था पेंशन में केन्द्र सरकार का योगदान 200 रुपये तक ही सिमटा हुआ है। किन्तु बहुत से राज्य अपनी ओर से राशि जोड़कर पेंशन की कुल राशि में बढ़ोतरी करते हैं। कुछ राज्यों में पेंशन के रूप में मिलने वाली राशि भी काफ़ीनियमित रूप से मिलती है। पेंशन के लिए आवेदन करने वालों को कई महीनों तक अपने पेंशन के लिए इन्तज़ार करना पड़ता है और अक्सर उन्हें यह अंदाज़ा नहीं होता है कि उनके पेंशन की अगली किस्त कब मिलेगी।

अन्त में, पेंशन की रकम नियमित रूप से मिलने पर भी गाँव के बुजुर्ग लोगों के लिए पेंशन की राशि पाना काफ़ी मुश्किल होता है क्योंकि वे इस राशि को हासिल करने के लिए ज़्यादा भाग-दौड़ करने में असमर्थ होते हैं, शिक्षा की दृष्टि से कमतर होने के कारण वे इस प्रक्रिया की जटिलताओं को नहीं समझ पाते हैं और तुलनात्मक रूप से शक्तिहीन होने के चलते वे इस राशि को पाने के लिए आवश्यक दोज़हद करने में असमर्थ होते हैं। यद्यपि अक्सर डाक-खाना नज़दीक होता है किन्तु वहाँ इनका सामना भ्रष्ट कर्मचारियों से होता है जो पेंशन की राशि के बदले घूस की माँग करते हैं। बिजनेस कॉरेसपॉन्डेस (पत्राचार) और नकद हस्तान्तरण जैसे विकल्पों की अपनी समस्याएँ हैं। हालाँकि कुछ राज्यों को तुलनात्मक रूप से पेंशन की अदायगी की प्रभावकारी व्यवस्था तैयार करने में सफलता मिली है। इस सन्दर्भ में ओडिशा में ग्राम पंचायत कार्यालय द्वारा मासिक पेंशन राशि अदा करने की व्यवस्था और तमिलनाडु में पेंशन अदा करने के लिए पोस्टल मनी ऑर्डर के उपयोग का विशेष उल्लेख किया जा सकता है।

जैसा कि इन अनुभवों से स्पष्ट होता है कि पेंशन योजनाओं में मुख्य रूप से व्यवहारगत कमियाँ हैं और इन्हें दृढ़-इच्छा शक्ति होने पर ठीक किया जा सकता है। अमूमन इन कमियों का लम्बे समय से इसलिए वर्चस्व रहा है क्योंकि व्यवस्था में पीड़ितों की आवाज़ हमेशा ही दबी-कुचली रही है। किन्तु इस स्थिति में बदलाव हो रहा है : विधवाओं और बुजुर्ग लोगों ने अपने अधिकारों के लिए आन्दोलन करना आरम्भ कर दिया है, जिसमें उन्हें एकल नारी शक्ति संगठन और पेंशन परिषद् जैसे संगठनों से भी थोड़ी-बहुत मदद मिली है। सार्वजनिक दबाव या अन्य कारणों से बहुत से राज्यों ने पेंशन योजनाओं में सुधार करने और उनका विस्तार करने पर ध्यान केन्द्रित किया है। इन राज्यों में ओडिशा, तमिलनाडु, राजस्थान, आन्ध्र प्रदेश का विशेष रूप से उल्लेख किया जा सकता है। यहाँ तक कि इन मसलों में काफ़ी पीछे रहने वाले बिहार और झारखण्ड जैसे राज्यों में भी पेंशन योजनाओं में गम्भीर रुचि का विकास हो रहा है।

हालाँकि खेद की बात यह है कि केन्द्र सरकार विपरीत दिशा में जा रही है। जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है कि वर्ष 2006 से ही वृद्धावस्था पेंशन में केन्द्र सरकार द्वारा दी जाने वाली राशि 200 रुपये प्रति माह है। साथ ही, केन्द्र सरकार ने इन गैर-अनुदान वाले पेंशनों की जगह एक नयी योजना (प्रधानमन्त्री अटल पेंशन योजना) लागू की है। इसमें प्रत्येक लाभार्थी को खुद योगदान देना होता है और यह मोटे तौर पर स्व-वित्तीय सहायता पर आधारित है। इस योजना के अन्तर्गत न्यूनतम बीस वर्षों तक एक निश्चित राशि देने का प्रावधान है और यदि आज किसी व्यक्ति की उम्र 40 वर्ष है, तो उसे बीस वर्षों तक 291 रुपये प्रति माह जमा करने होंगे। ऐसा करने पर, बीस साल बाद वह प्रति माह 1,000 रुपये वेतन पाने का हकदार हो जायेगा। प्रति माह 291 रुपये का योगदान एक बैंक खाते के माध्यम से अदा किया जाना चाहिए। अर्थात् इस योजना के लाभ पाने के इच्छुक व्यक्ति के बैंक खाते से प्रत्येक माह स्वतः ही 291 रुपया कटता चला जायेगा। इस योजना के साथ जैसी शर्तें जुड़ी हुई हैं, उससे यह उन लोगों को आकर्षित कर सकती है जिनके पास प्रत्येक माह एक नियमित न्यूनतम आय आती है। लेकिन अपनी जीविका के लिए संघर्षरत लोगों के लिए इसका अत्यन्त कम उपयोग है। निश्चित रूप से, सरकार के लिए यह एक फायदे का सौदा है क्योंकि यह बिना किसी बोझ के अगले बीस वर्षों तक पेंशन की राशि संग्रहित कर सकती है।

एक अन्य परिप्रेक्ष्य से भी सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम पर विचार किया जा सकता है--इन्हें नकद हस्तान्तरणके आरम्भिक प्रयोगों के तौर पर देखा जा सकता है। हाल के वर्षों में, भारत में नकद हस्तान्तरण पर काफ़ी वाद-विवाद हुआ है। लेकिन जैसा कि सुधा नारायणन ने इस किताब में संकलित अपने ज्ञानवर्द्धक शोध-आलेख में बताया है, इस सम्पूर्ण वाद-विवाद पर एक नयी रूपरेखा के अन्तर्गत विचार करने की आवश्यकता है। अभी मोटे तौर पर, नकद हस्तान्तरण के पक्ष या विरोधमें सरल तर्क प्रस्तुत किये जाते हैं। इसके बजाय, यह आवश्यक है कि उन परिस्थितियों और व्यवस्थाओं की बेहतर समझ कायम की जाये, जिनमें नकद हस्तान्तरण आवश्यक हो जाता है। भारत में दोपहर के भोजन जैसे वस्तु हस्तान्तरण के कुछ अत्यधिक सफल कार्यक्रम रहे हैं। साथ ही, सामाजिक सुरक्षा पेंशन के रूप में, प्रभावकारी नकद हस्तान्तरण कार्यक्रम भी लागू किये गये हैं। निश्चित रूप से, यहाँ नकद हस्तान्तरण के व्यापक उपयोग की कुछ सम्भावना मौजूद है- इस सन्दर्भ में मात्तृक हकदारियों का पहले ही उल्लेख किया जा चुका है। हालाँकि सुधा नारायणन ने काफ़ी बल देकर यह दिखाया है कि भविष्य में सामाजिक नीति के सभी उद्देश्यों के लिए नकद हस्तान्तरण को सर्वोत्तम उपाय मानना गलत होगा। इसका एक कारण यह है कि यह पूरी तरह से सन्दर्भ और लक्ष्य पर निर्भर करता है कि नकद हस्तान्तरण वस्तु हस्तान्तरण से ज़्यादा प्रभावकारी हो सकता है या नहीं। और दूसरा कारण यह है कि नकद हस्तान्तरण को प्रभावकारी सार्वजनिक सेवाओं का विकल्प नहीं माना जा सकता है, और इन्हें ज़्यादा-से-ज़्यादा अनुपूरक के रूप में माना जा सकता है (विशेष रूप से, इनके सशर्तस्वरूप में) अर्थात् इन्हें यह कहा जा सकता है कि ये लोगों को, आमतौर पर सार्वजनिक संस्थाओं द्वारा सर्वोत्तम तरीके से उपलब्ध कराये जाने वाली सेवाओं और सुविधाओं का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। यह भी याद रखने की ज़रूरत है कि प्रभावकारी नकद हस्तान्तरण के लिए बेंकिंग आधारभूत सरंचना की आवश्यकता है, लेकिन अभी भारत के अधिकांश भागों में इसका अभाव है।

इन पहलुओं के चलते इन दावों पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है कि नकद हस्तान्तरण सार्वजनिक वितरण व्यवस्था का अच्छा विकल्प है। अक्सर यह माना जाता है कि भोजन वितरण की तुलना में लोगों की आर्थिक सहायता के लिए नकद हस्तान्तरण ज़्यादा सस्ता, सरल और प्रभावकारी है। लेकिन व्यवहार में, नकद और वस्तु हस्तान्तरण पर विचार करने पर कई मुद्दे सामने आते हैं। मसलन पोषण और स्थानीय खाद्य बाज़ारे कार्य पर इनका प्रभाव आधारभूत बेंकिंग संरचना की तैयारी, हस्तान्तरण के उचित समय जैसे मसले ऐसे ही बुनियादी विषय हैं। इसके साथ राजनीतिक अर्थशास्त्र के मुद्दे भी जुड़े हुए हैं। मसलन, नकद हस्तान्तरण में ऐसी विविध योग्यता शर्ते हो सकती हैं, जिससे लोगों के लिए इसका लाभ उठाना अत्यन्त दुष्कर हो जाये; या फिर इसमें मिलने वाली राशि और बाज़ार में वस्तुओ की कीमतों के बीच कोई तारतम्य न हो, जिसके चलते लोग इससे मिलने वाली राशि का समुचित उपयोग करने में असमर्थ हो सकते हैं। इसलिए, जहाँ अभी तक सार्वजनिक वाद-विवाद में नकद हस्तान्तरण के पक्ष या विपक्षमें तर्क दिया गया है, वहीं यह आवश्यक है कि उन स्थितियों पर ध्यान केन्द्रित किया जाये जिनमें नकद हस्तान्तरण की व्यवस्था उपयोगी साबित हो सकती है।

असमानता

इस किताब के आखि़री भाग में आर्थिक और सामाजिक असमानता पर तीन शोध-आलेख सम्मिलित हैं। सुखदेव थोराट और जोयल ली ने मध्याहन भोजन कार्यक्रम और सार्वजनिक वितरण व्यवस्था जैसे भोजन सुरक्षा कार्यक्रमों में नियमित रूप से मौजूद जातिगत भेदभाव पर प्रकाश डाला है। रविन्दर कौर ने अपने शोध-आलेख में (सिर्फ़ भारत ही नहीं, बल्कि चीन में भी) जेण्डर असन्तुलन के सामाजिक नतीजों की विवेचना की है। लिंग के आधार पर गर्भपात कराने के चलते हाल के समय में यह असन्तुलन और भी ज़्यादा गहरा हुआ है। अन्त में, रामचन्द्र गुहा यह तर्क देते हैं कि स्वतन्त्र भारत में आदिवासी दोहरी विडम्बना का शिकार हुए हैं : राज्य ने इनकी उपेक्षा की है या कई मामलों में खुद ही इनकी स्थिति को दुर्बल करने का काम किया है, तथा माओवादियों ने भी इन्हें निरर्थक क्रान्तिकारी युद्ध में अपनी पैदल सेना के रूप में इस्तेमाल किया है।

असल में, इन भागों को किताब में शामिल करना मूल योजना का हिस्सा नहीं था। बाद में, इसे किताब में सम्मिलित करने का फ़ैसला किया गया। दरअसल, शुरुआत में इसकी आवश्यकता की ओर ध्यान न जाना अपने-आप में काफ़ी कुछ उजागर करता है। यह दिखाता है कि हम सामाजिक नीति को समानता और सामाजिक न्याय के मुद्दों से जोड़ने में नाकाम रहे हैं। आज केरल और तमिलनाडु में इसलिए सक्रिय सामाजिक नीतियाँ हैं क्योंकि वहाँ पहले ही इस प्रकार का जुड़ाव स्थापित कर लिया गया था। इन राज्यों में वंचित समूहों ने सामाजिक न्याय के अपने संघर्ष के अभिन्न भाग के रूप में इस माँग को अपना लिया था कि सार्वजनिक या लोक सेवाओं तक उनकी प्रभावकारी और समान पहुँच होनी चाहिए। आज इस तरह के जुड़ाव का अभाव दिखता है, और शायद इसी के चलते वामपन्थी दलों की सामाजिक नीति के मामले में काफ़ी कम रुचि है (इसका एक नतीजा पश्चिम बंगाल में सार्वजनिक सेवाओं की बुरी स्थिति के रूप में सामने आया है)। चूँकि अलग कारणों के चलते दक्षिणपन्थ भी इसमें कम रुचि दिखाता है, इसलिए सामाजिक नीतियों में राजनीतिक उदासीनता का शिकार होने की प्रवृत्ति रही है।

सामाजिक नीति और सामाजिक समानता के बीच द्वि-पक्षीय सम्बन्ध है। एक ओर, बहुत-सी सामाजिक नीतियों का एक वैध लक्ष्य असमानता में कटौती करना है (दरअसल, इसमें इनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका भी है), और इनमें से कई नीतियों का इस किताब में परीक्षण किया गया है। सामाजिक और आर्थिक असमानताओं की बुनियाद काफ़ी गहरी है और इन्हें नियन्त्रित करने का एक तरीका यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक व्यक्ति के पास गुणवत्तायुक्त शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सेवा और आय हो।

इस जुड़ाव का अन्य पक्ष यह है कि वर्ग, जाति और जेण्डर के विभाजनों के चलते यह सुनिश्चित करना अत्यन्त कठिन होता है कि प्रत्येक बच्चा स्कूल जाये, सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवा प्राप्त करे और सार्वजनिक वितरण प्रणाली सही तरीके से काम करे। सामाजिक असमानताएँ इन लक्ष्यों के रास्ते में कई मुश्किलें खड़ी करती हैं, मसलन, लोग आपस में सहयोग करके काम नहीं कर पाते हैं सार्वजनिक नीति की प्राथमिकताएँ विरूपित हो जाती हैं, भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है, डॉक्टर और मरीज़ के बीच की दूरी बढ़ जाती है, कक्षा में दलित बच्चों का हाशियाकरण होता है, तथा परिवार और समाज में महिलाओं की एजेंसी का दमन होता है। यह भारत के लिए एक बड़ा मुद्दा है, जहाँ दुनिया के किसी भी अन्य भाग की तुलना में वर्ग, जाति और जेण्डर की असमानताएँ काफ़ी प्रभावकारी तरीके से एक-दूसरे को बढ़ावा दे रही हैं और समाज को दुर्बल बना रही हैं।

इन असमानताओं की मनमानी प्रकृति के चलते इनके प्रभाव में अत्यन्त वृद्धि हुई है। यह पूरी तरह से संयोग की बात है कि हमारा जन्म पुरुष के रूप में हुआ है या महिला के रूप में। इसी प्रकार, किसी व्यक्ति को एक खास जाति में जन्म लेने के लिए ज़िमेदार नहीं ठहराया जा सकता है। आर्थिक विशेषाधिकार का भी व्यक्तिगत प्रतिभा से बहुत कम सम्बन्ध होता है। हमारे रुझान, हमारी सेहत, हमारी विरासत और अन्य आर्थिक सम्पदाएँ, कमोबेश ऐसी बहुत-सी बाहरी आकस्मिकताओं पर निर्भर करती हैं, जिन पर हमारा कोई नियन्त्राण नहीं होता है। यहाँ तक कि हमारी शिक्षा भी हमारे अपने प्रयासों की तुलना में विरासत में मिले विशेषाधिकार और हमारे माता-पिता तथा शिक्षकों के प्रयासों को ज़्यादा प्रदर्शित करती है। यदि हमारी नियति व्यक्तिगत प्रतिभा से ज़्यादा संयोग पर निर्भर है, तो निश्चित रूप से, विशेष स्थिति वाले लोगों की पीछे छूट गये लोगों के प्रति एक ज़िम्मेदारी बनती है। दरअसल, यही भारत में सक्रिय सामाजिक नीति के पक्ष में सबसे मज़बूत तर्क है।


निष्कर्ष

2015-16 के संघीय बजट में बहुत से सामाजिक कार्यक्रमों के केन्द्रीय आबंटन में बड़े पैमाने पर कटौती की गयी (आईसीडीएस सहित कुछ मामलों में 50% से भी ज़्यादा)। इस फ़ैसला के पक्ष में यह दलील दी गयी कि चौदहवें वित्त आयोग की अनुशंसाओं के अनुरूप करों का एक बड़ा हिस्सा राज्य सरकारों के पास जाता है। हालाँकि वित्त आयोग ने यह अनुशंसा भी नहीं की थी कि राज्यों को करों का बड़ा हिस्सा देने पर केन्द्र द्वारा प्रायोजित योजनाओं के बजट में कटौती की जानी चाहिए। इसके विपरीत, इसने यह अनुशंसा की कि ‘‘शिक्षा, स्वास्थ्य, जल आपूर्ति और स्वच्छता, बच्चों के पोषण’’ जैसे कुछ महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में केन्द्रीय सहायता जारी रहनी चाहिए। ऐसा प्रतीत होता है कि केन्द्र सरकार ने बिना किसी सुविचारित योजना के यह फ़ैसला किया है कि सामाजिक नीति का बोझ राज्यों पर ही डाल दिया है। इससे इन कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में कम-से-कम अल्पकालिक बाधा अवश्य उत्पन्न होगी।

दीर्घकालिक दृष्टिकोण से विचार करने पर यह स्पष्ट होता है कि भारत में विस्तृत और प्रभावकारी सामाजिक नीति की आवश्यकता है और इसके सफल होने की भी पूरी सम्भावना है। यदि आने वाले बीस वर्षों तक भारत में 6% प्रति वर्ष की दर से प्रति व्यक्ति जीडीपी में वृद्धि होती रही (यह एक आशावादी उम्मीद है, किन्तु पूरी तरह असम्भव नहीं है), और यदि इसी अवधि में जीडीपी में सामाजिक ख़र्च की हिस्सेदारी 50% तक बढ़ जाती है (जो कि एक मामूली प्रस्ताव है), तो सामाजिक क्षेत्र के लिए आज की तुलना में प्रति व्यक्ति पाँच गुणा ज़्यादा राशि उपलब्ध होगी। यदि हाल में अर्जित अनुभवों को आधार बनाते हुए इन संसाधनों का अच्छी तरह उपयोग किया जाता है, तो औसत भारतीय को आने वाले समय में वर्तमान केरल और तमिलनाडु की तुलना में कहीं ज़्यादा बेहतर सार्वजनिक सेवाएँ और बुनियादी सुविधाएँ मिलेंगी।

सामाजिक ख़र्च के सही उपयोग के लिए यह आवश्यक है कि स्कूल, स्वास्थ्य केन्द्रों, ग्राम पंचायत कार्यालयों और सामान्य रूप से सार्वजनिक क्षेत्र में एक बेहतर कार्य संस्कृति की आवश्यकता है। यह एक सुहावने सपने की तरह लग सकता है किन्तु अल्प लोकतन्त्र वाले देश में इसे एक स्वाभाविक विकास के रूप में देखा जा सकता है। दरअसल, सार्वजनिक क्षेत्र में अनुपस्थितिवाद, आम-जन को बेबस करने वाले शोषण और भ्रष्टाचार और इस तरह के व्यवहारों को मूक-दर्शक बनकर देखने की प्रवृत्ति स्वीकार नहीं की जा सकती है। जैसे-जैसे लोकतान्त्रिक जुड़ाव और भागीदारी में बढ़ोतरी होती है, और लोग ज़्यादा खुलकर अपनी बातें कहने लगते हैं और सार्वजनिक अधिकारियों की गतिविधियों पर नज़र रखने लगते हैं, तो इन व्यवहारों का कायम रहना मुश्किल हो जाता है। इससे लोकतान्त्रिक व्यवहारों के सामाजिक मानक सामने आते हैं। निश्चित रूप से, सार्वजनिक क्षेत्र में ज़्यादा जवाबदेही हासिल करने के लिए हमें केवल इस पर ही निर्भर नहीं रहना चाहिए। इसके लिए प्रोत्साहन और जवाबदेही की बेहतर व्यवस्था की भी आवश्यकता है। लेकिन इन उपायों को लोकतान्त्रिक व्यवहार द्वारा सार्वजनिक कार्य-संस्कृति में बदलाव की व्यापक आवश्यकता का भाग माना जा सकता है। यह भारतीय लोकतन्त्र की कठिन परीक्षा है कि आने वाले समय में किस सीमा तक ये बदलाव हो पाते हैं।

इस किताब में सम्मिलित शोध-आलेख सामाजिक नीति के कुछ चुनिन्दा आयामों का ही विश्लेषण करते हैं। लेकिन मुझे यह उम्मीद है कि इससे सामाजिक नीति के विभिन्न पहुलओं पर होने वाले गम्भीर अनुसन्धान की एक तस्वीर सामने आयेगी। इकोनॉमिकऐंड पॉलिटिकल वीकली ने इस प्रकार के अनुसन्धान को बढ़ावा देने और उसे फैलाने में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है। आशा है कि भारत में सामाजिक नीति से सम्बन्धित विद्वत्तापूर्ण साहित्य के क्षेत्र और गुणवत्ता में ऐसे ही बढ़ोतरी होती रहेगी। ऐसे बहुत कम विषय हैं जो भारतीय अर्थव्यवस्था और समाज के भविष्य के लिए इतने ज़्यादा महत्त्वपूर्ण हैं। 



प्रमुख अनुवादक 



ज्याँ द्रेज ने यूनिवर्सिटी ऑफ एसेक्स से गणितीय अर्थशास्त्र का अध्ययन किया है और इंडियन स्टेटिस्टिकल इंस्टीट्यूटनयी दिल्ली से पीएच. डी. की उपाधि प्राप्त की है। उन्होंने लन्दन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स और डेल्ही स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में अध्यापन किया है और वर्तमान में राँची विश्वविद्यालय में विजिटिंग प्रोफ़ेसर और दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में मानद प्रोफ़ेसर हैं। विकास अर्थशास्त्र और सार्वजनिक नीतियोंविशेषकर उनके भारतीय सन्दर्भों में उन्होंने बहुमुखी योगदान दिया है। ग्रामीण विकाससामाजिक असमानताप्राथमिक शिक्षाशिशु पोषणस्वास्थ्य सेवाएँ और खाद्य सुरक्षा उनके शोध के प्रमुख विषय हैं। ज्याँ द्रेज ने अमर्त्य सेन के साथ हंगर एंड पब्लिक एक्शन (ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1989) और एन अनसर्टेन ग्लोरी: इंडिया एंड इट्स कंट्राडिक्शंस (ओयूपी, 2002) का सह-सम्पादन किया है और पब्लिक रिपोर्ट ऑन बेसिक एजुकेशन इन इंडिया के लेखक-मंडल से भी जुड़े हैं जो प्रोब (PROBE) रिपोर्ट के नाम से जाना जाता है।

 सह-सम्पादक : कमल नयन चौबे 

पुस्तक खरीदने हेतु इस लिंक पर क्लिक करें-