Friday, 28 October 2016

'दास्ताँ कहते-कहते' शृंखला की चार बेहतरीन पुस्तकें...



।। ग़ज़लों का कारवाँ ।। नज़्मों का गुलिस्ताँ ।।

'दास्ताँ कहते-कहते'

 शृंखला की चार बेहतरीन पुस्तकें...




 मैं जो हूँ जॉन एलिया हूँ - जॉन एलिया

मैं जो हूँ जॉन एलिया हूँ जनाब
मेरा बेहद लिहाज़ कीजिएगा।

ये जो जॉन एलिया के कहने की खुद्दारी है कि मैं एक अलग फ्रेम का कवि हूँ
यह परम्परागत शायरी में बहुत कम ही देखने को मिलती है। जैसे-

साल हा साल और इक लम्हा,
कोई भी तो  इनमें बल आया
 ख़ुद ही इक दर पे मैंने दस्तक दी,
ख़ुद ही लड़का सा मैं निकल आया

जॉन से पहले कहन का ये तरीका नहीं देखा गया था। जॉन एक खूबसूरत जंगल हैंजिसमें झरबेरियाँ हैं, 
काँटे हैं उगती हुई  बेतरतीब झाड़ियाँ हैंखिलते हुए बनफूल हैंबड़े-बड़े देवदारु हैंशीशम हैं, 
चारों तरफ़ कूदते हुए हिरन हैंकहीं शेर भी हैंमगरमच्छ भी हैं उनकी तुलना में आप  यह कह सकते हैं  
कि बाक़ी सब शायर एक उपवन हैं, जिनमें सलीके से बनी हुई और करीने से सजी हुई क्यारियाँ हैं  
इसलिए जॉन की शायरी में  प्रवेश करना ख़तरनाक भी है। लेकिन अगर आप थोड़े से एडवेंचरस हैं   
और आप फ्रेम से बाहर  कर कुछ रना चाहते हैं तो जॉन की दुनिया आपके  लिए है।


देर कर देता हूँ मैं - मुनीर नियाज़ी

मुनीर नियाज़ी की शायरी सूफ़ीवाद से एकदम अलग तरहा की शायरी है। ‘मुनीर’ की शायरी में बनावट और बुनावट नहींसीधे-सीधे एहसास को अलफाज़ और जज़्बे को ज़बान देने का अमल है। उनकी शायरी का ग्राफ़ बाहर से अन्दर और अन्दर से अन्दर की तरफ़ बढ़ता चला जाता है। एक ऐसी तलाश, जो परेशान भी करती है और प्राप्य पर हैरान भी। जो हर सच्चे और अच्छे शायर का मुकद्दर है।  

ख़्वाबों की हँसी - हरिओम

सन 2002 में जब हरिओम की ग़ज़लों की पहली किताब धूप का परचम’ आयी तो हिन्दी-उर्दू ज़बान की सियासीग़ैर-वाज़िब बहसों के बाहर जाकर ग़ज़ल प्रेमियों ने उसे खूब सराहाख़ासकर ग़ज़लों के मज़मून और बात कहने के तेवर को लेकर। तमाम समीक्षकों ने उस किताब पर दुष्यन्त कुमार का असर देखा। स्वयं शायर को भी इस बात से इनकार नहीं है और वह मानता है कि हिंदी ग़ज़लों में दुष्यन्त कुमार एक मेयार हैं। इलाहाबाद में रहते हुए वहाँ की रचनात्मक विरासत का एक हिस्सा जाने-अनजाने उसके भीतर भी उतर आया है और इस विरासत में दुष्यन्त तो हैं हीइलाहाबाद की संवेदनात्मक और वैचारिक परम्परा भी है। 
धूप का परचम’ के तकरीबन पन्द्रह बरस बाद ग़ज़लों की यह दूसरी किताब ख़्वाबों की हँसी’ पाठकों के सामने है। ख़्वाबों की हँसी’ में संवेदन और विचार के स्तर पर वैसा उतावलापन और आवेग नहीं है जैसा कि पहले संग्रह में था। यहाँ शायरी में थोड़ा ठहरावसंजीदगीसब्र और सादगी दिखेगी। हालाँकि इस बीच हरिओम ग़ज़लों के अलावा लगातार कहानियाँ और कविताएँ लिखते रहे लेकिन ग़ज़लें उनके तसव्वुर के दायरे से कभी बाहर नहीं जा सकीं। उसकी एक वजह यह भी थी कि उनके भीतर एक गायकऔर वह भी ग़ज़ल गायकग़ज़लों-नज़्मों और शेरो-शायरी की हमारी परम्परा से गहरी वाबस्तगी बनाये हुए था।

इतवार छोटा पड़ गया - प्रताप सोमवंशी 

इतिहास जब वर्तमान से सन्दर्भ ग्रहण करता है तो एक ऐसा शे`र होता हैजो अपने समय का मुहावरा बन जाता है। प्रताप सोमवंशी का यह शे`र कुछ उसी तरह का आम-अवाम का हो चुका है। प्रताप के कुछ और अश्आर को सामने रखकर देखें कि हमारा कवि हमें अपने निजी अनुभवों में कहाँ तक शरीक कर पता है। उनके शे`र पहली ही नज़र में आँख के रास्ते दिल में उतार जाते हैं।  

'दास्ताँ कहते-कहते'
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