Saturday, 15 October 2016

ग़ज़लों का कारवाँ ।। नज़्मों का गुलिस्ताँ




।। ग़ज़लों का कारवाँ ।। नज़्मों का गुलिस्ताँ ।।

'दास्ताँ-कहते कहते' शृंखला की चार किताबें अब जल्द ही आपके हाथों में...



'मैं जो हूँ जॉन एलिया हूँ' -जॉन एलिया

'देर कर देता हूँ मैं' - मुनीर नियाज़ी

'ख़्वाबों की हँसी' - हरिओम

'इतवार छोटा पड़ गया' - प्रताप सोमवंशी 



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लखनऊ पुस्तक मेला में 'ख़्वाबों की हँसी'



अदीब शायरी का शौक़ निभाने निकले
हम अपने वक़्त का आईना सजाने निकले (हरिओम)
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लखनऊ पुस्तक मेला में 'ख़्वाबों की हँसी'

'ख़्वाबों की हँसी' का लोकार्पण करते हुए अरुण माहेश्वरी, मालविका जी, 
हरिओम, नरेश सक्सेना, अनवर जलालपुरी और यतीन्द्र मिश्र

वाणी प्रकाशन के स्टाल पर 'ख़्वाबों की हँसी' के इर्द-गिर्द

कार्यक्रम में उपस्थित श्रोतागण

14वें राष्ट्रीय पुस्तक मेला में आज का ख़ास आकर्षण। 
'दास्ताँ कहते-कहते' शृंखला की पहली किताब 'ख़्वाबों की हँसी' का लोकार्पण।
लोकार्पण के अवसर पर उपस्थित गणमान्य अतिथियों ने 'ख़्वाबों की हँसी' के बहाने हरिओम की रचना-यात्रा पर बेहतरीन चर्चा की। हरिओम जी की पत्नी मालविका जी ने एक अधिकारी लेखक के उस दर्द को बयाँ किया जो अपना बेशकीमती समय निकालकर कुछ रचने की जिजीविषा का सबब बनता है।

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