Thursday, 25 August 2016

तसलीमा नसरीन : स्त्रियों के हक़ में मुक्ति की आवाज़



-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
  तसलीमा नसरीन : स्त्रियों के हक़ में मुक्ति की आवाज़  
--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------



तसलीमा नसरीन का जीवन संघर्षों का एक अनन्त सिलसिला है और उनका साहित्य उन तमाम संघर्षों की एक अन्तहीन दास्तान। अपने लेखन के जरिये उन्होंने संघर्ष, विद्रोह और मुक्ति की पुकार को एकाकार कर दिया है।

जीवन में जो कुछ भी वर्जित, घृणित और उपेक्षित है, तसलीमा अपने साहित्य में उन सबको एक उदात्त आयाम देकर प्रस्तुत करती हैं। तसलीमा को पढने के बाद पाठक अपने आप को एक वीभत्स यथार्थ के सामने पाता है और उसका नजरिया बदलने लगता है। तसलीमा फेमिनिज्म के बने-बनाए ढाँचों को तोड़कर हमारे सामने उसका एक अलग पाठ प्रस्तुत करती हैं।

तसलीमा के समूचे कथा-साहित्य और आत्मकथा-साहित्य में एक आवेग है और एक त्वरा है। चाहे वह 'लज्जा' हो, 'फेरा' हो, 'मेरे बचपन के दिन', 'उत्ताल हवा' या 'द्विखंडित' हो। तसलीमा औरत के हक़ में कुछ गद्य, कुछ पद्य भी लिखती हैं और कहती हैं कि 'औरत का कोई देश नहीं' होता। तसलीमा का लेखन एक हमेशा धधकते रहने वाली एक मशाल की तरह है जिसकी चिंगारियाँ स्त्री-मुक्ति की राहों को रौशन करती रहती हैं।
समस्त वाणी प्रकाशन परिवार की ओर से Tasleema Nasreen जी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ!

_________________________________________
__________________________________________