Saturday, 23 July 2016

हिन्दी के शिखर आलोचक मैनेजर पाण्डेय का आलोचना-संसार



वाणी प्रकाशन प्रस्तुत करता है

      हिन्दी के शिखर आलोचक      

     मैनेजर पाण्डेय का आलोचना-संसार     




मैनेजर पाण्डेय की आलोचना : सामाजिकता और प्रतिबद्धता का पर्याय

मैनेजर पाण्डेय हिन्दी के शीर्षस्थ मार्क्सवादी आलोचक हैं । पिछले लगभग साढ़े तीन दशकों से तमाम राजनीतिक और वैचारिक उथल-उथल के बीच भी उनमें किसी प्रकार का वैचारिक या सैद्धांतिक विचलन नहीं दिखा है । सस्ती लोकप्रियता के लिए उन्होंने कभी भी लोकप्रिय नुस्खे नहीं अपनाए । आज हिन्दी आलोचना में उनकी उपस्थिति उन सभी लोगों के लिए एक भरोसे का विषय है, जो आलोचना के लोकतन्त्र में विश्वास रखने के साथ-साथ उससे गहरी सामाजिक सम्बद्धता की माँग करते हैं । मैनेजर पाण्डेय का अब तक का पूरा लेखन इस बात का प्रमाण है कि उन्होंने सामाजिकता के जिस प्रश्न को रचनात्मक साहित्य के मूल्यांकन का प्रमुख आधार बनाया है, उसी प्रश्न को आलोचना और चिन्तन के मूल्यांकन का आधार बनाने से भी वे कभी नहीं चूके हैं । उनका लेखन एक ऐसे तेजस्वी चिन्तक का लेखन है, जो किसी रचना के रूप पक्ष से ही अघा नहीं जाता, बल्कि रचना के रेशे-रेशे में कौन से विचार हैं, इसकी सूक्ष्म पड़ताल भी करता है । 




मैनेजर पाण्डेय की आलोचना अन्ध समर्थन नहीं करती है

पूर्व में रामचन्द्र शुक्ल, हज़ारीप्रसाद द्विवेदी, रामविलास शर्मा तथा बाद में नामवर सिंह की आलोचना दृष्टि का मूल्यांकन करते हुए भी उनकी यही मूल्यांकन दृष्टि काम करती रही है । पाण्डेय जी के मूल्यांकन की एक और विशेषता है—अन्ध समर्थक होने से बचना । रचनाकार अथवा चिन्तक-आलोचक चाहे जितना यशस्वी और मेधावी हो, पाण्डेय जी बिना किसी भय के अपने आलोचनात्मक औजारों के साथ उसकी रचना या आलोचना संसार में प्रवेश करते हैं । यहाँ महत्त्वपूर्ण यह है कि वे आलोच्य रचनाकार अथवा आलोचक के विषय में किसी भी प्रकार के पूर्व निष्कर्षों से बिना प्रभावित हुए गहन संवाद स्थापित करते हैं 

। यदि आज हिन्दी भाषी समाज के साथ-साथ गैर हिन्दी भाषा-भाषी क्षेत्रों के अध्येता भी पाण्डेय जी के लिखे निबन्धों को बहुत गम्भीरता से पढ़ते-गुनते हैं तो इसके पीछे उनकी अपनी आलोचना की सामाजिकता ही है ।  

 मैनेजर पाण्डेय 


सुप्रसिद्ध आलोचक मैनेजर पाण्डेय का जन्म 23 सितम्बर, 1941 को बिहार प्रान्त के वर्तमान गोपालगंज जनपद के गाँव लोहटी’ में हुआ। पाण्डेय जी गत साढे़ तीन दशकों से हिन्दी आलोचना में सक्रिय हैं। उन्हें गम्भीर और विचारोत्तेजक आलोचनात्मक लेखन के लिए पूरे देश में जाना-पहचाना जाता है। उनकी अब तक प्रकाशित पुस्तकें हैं: शब्द और कर्मसाहित्य और इतिहास-दृष्टिसाहित्य के समाजशास्त्र की भूमिकाभक्ति आन्दोलन और सूरदास का काव्यअनभै साँचाआलोचना की सामाजिकतासंकट के बावजूद (अनुवादचयन और सम्पादन)देश की बात (सखाराम गणेश देउस्कर की प्रसिद्ध बांग्ला पुस्तक देशेर कथा’ के हिन्दी अनुवाद की लम्बी भूमिका के साथ प्रस्तुति)मुक्ति की पुकार, सम्पादनसीवान की कविता (सम्पादन)। पाण्डेय जी के साक्षात्कारों के भी दो संग्रह प्रकाशित हैं: मेरे साक्षात्कारमैं भी मुँह में जबान रखता हूँ। आलोचनात्मक लेखन के लिए कई पुरस्कारों से सम्मानितजिनमें प्रमुख हैं: हिन्दी अकादमी द्वारा दिल्ली का साहित्यकार सम्मानराष्ट्रीय दिनकर सम्मानरामचन्द्र शुक्ल शोध संस्थानवाराणसी का गोकुल चन्द्र शुक्ल पुरस्कार और दक्षिण भारत प्रचार सभा का सुब्रह्मण्य भारती सम्मान। जीविका के लिए अध्यापन का मार्ग चुनने वाले मैनेजर पाण्डेय जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के भाषा संस्थान के भारतीय भाषा केन्द्र में हिन्दी के प्रोफेसर रहे हैं। इसके पूर्व बरेली कॉलेजबरेली और जोधपुर विश्वविद्यालय में भी प्राध्यापक रहे। 



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