Saturday, 27 February 2016

साहित्य अकादेमी हम साहित्यकारों का एक घर है : रामदरश मिश्र




रामदरश मिश्र की साहित्यिक प्रतिभा बहुआयामी है। उन्होंने कविता, कहानी, उपन्यास, आलोचना और निबंध जैसी प्रमुख विधाओं में तो लिखा ही है, आत्मकथा- सहचर है समय, यात्रा वृत्तान्त तथा संस्मरण भी लिखे हैं। 16 फरवरी, 2016 को रामदरश मिश्र को साल 2015 के लिए देश के प्रतिष्ठित साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

प्रस्तुत है प्रो. रामदरश मिश्र से हुई बातचीत के अंश-
प्रो. रामदरश मिश्र
1 साहित्य अकादेमी पुरस्कार-2015 के बारे में आपकी राय?


यह पुरस्कार मुझे मेरे कविता संग्रह ‘आग की हँसी’ के लिए दिया गया है. पुस्तक का नाम ‘आग की हँसी’ का भाव यह है कि चूल्हे में जो आग होती है उससे रोटी बनती है. वही रोटी जब लोगों का रक्त में आती है तो हँसी  बन जाती है. लेकिन जो बड़े लोग हैं उनकी हँसी समाज में आग लगाती है. ये आग बड़े लोगों की हँसी से लगती है लेकिन कलंक होता है कि आग चूल्हे से लगी है. छोटे लोगों ने आग लगाई है. यही कविता का भाव है.

2 आपका नया कहानी संग्रह ‘इस बार होली’ में वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुई है, इसके बारे में क्या कहना चाहेंगे?

इसमें गाँव और शहर की कहानी है. ज्यादातर नई कहानियाँ हैं. एक-दो कहानियां ही पहले किसी संग्रह में आयी हैं.

लिंक-http://vaniprakashan.in/details.php?prod_id=7898

3 वर्तमान साहित्य जगत पर आपकी टिप्पणी?


आजकल कविता मुक्त छंद में लिखी जा रही है, ग़ज़लें लिखी जा रही हैं, दोहे लिखे जा रहे हैं. कई अच्छे उपन्यास और कहानियाँ लिखी गयी हैं. दलित लेखन हो रहा है जिसकी वजह से दलितों के जीवन की वास्तविकताएँ हमारे सामने आ रही हैं.  नारी लेखन के द्वारा नारी जीवन की वास्तविकता सामने आयी है.  तो एक व्यापक परिदृश्य है साहित्य का और यह अच्छा है. 
लिंक- http://vaniprakashan.in/details.php?prod_id=6909&title=ALOCHANA%20KA%20ADHUNIK%20BODH

4 लेखन में आपकी रुचि कब से रही है और यह यात्रा कैसी रही है?


कविता लेखन मैने बचपन में ही शुरू कर दिया था. दर्जा छ: में मैने पहली कविता लिखी. उसके बाद मैंने छंद और अलंकार का अभ्यास शुरू किया. ‘चाँद’ मेरी कविता थी जो सन् 1939 में छपी. उसके बाद सन् 1945 में जब मैं बनारस गया तो मुझे एक नयी दिशा मिली. मुझे वहीं पता चला कि नया साहित्य कहां जा रहा है, उसका परिदृश्य क्या है और उसकी भाषा कैसी है. मैं मानता हूं कि वही मेरी शुरुआत है. फिर 1960 के आसपास कविता के साथ-साथ मैंने कहानी भी लिखनी शुरू कर दी. उसके बाद सन् 1961 मेरा पहला उपन्यास आया ‘पानी के प्राचीर.’ फिर  कविता, कहानी और उपन्यास ये तीनों मेरी मुख्य विधाएँ हो गयी. इसके साथ ही मैंने  यात्रा-वृत्तान्त, डायरी, निबंध और आत्मकथा भी लिखी.
लिंक- http://vaniprakashan.in/details.php?prod_id=935&title=NAI%20SADI%20KE%20LIYE%20CHAYAN%20:%20PACHAS%20KAVITAYEN


 हाल में ही साहित्य अकादेमी सम्मान वापसी का एक दौर चला, उसके बाद आपको यह दिया जाने की घोषणा की गयी. कोई दबाव का अनुभव तो नहीं हुआ?
नहीं, मैंने तो इस सम्मान को वापस किये जाने का विरोध किया था. साहित्य आकादेमी सम्मान को वापस करना अनुचित है. यह एक दिखावा मात्र है. इससे कोई विरोध व्यक्त नहीं होता है. मुख्य बात तो यह है कि साहित्य अकादेमी ने तो कुछ किया नहीं है. लोगों के मारे जाने में तो इसकी कोई भूमिका नहीं है. साहित्य अकादेमी हम साहित्यकारों का एक घर है और उसने एक सम्मान दिया है तो उस सम्मान को वापस करना साहित्य अकादेमी का अपमान है.


वाणी प्रकाशन से अपने सम्बन्धों के बारे में क्या कहेंगे?

वाणी प्रकाशन से मेरा गहरा सम्बन्ध रहा है. अरुण माहेश्वरी मेरे शिष्य भी रहें है तो गुरु-शिष्य का सम्बन्ध भी रहा है. वाणी प्रकाशन जब कमला नगर में था उस समय से ही हमारे मधुर संबंध रहे हैं. इन्होंने बड़ा आदर और प्यार दिया है और मैं भी उनको प्यार करता हूं. इस बात की मैं तारीफ भी करूंगा कि वाणी प्रकाशन ने मेरी कविताएं तो छापी ही, मेरे ऊपर कई किताबें छापी हैं. जब मैं 75 साल का हुआ था तो वाणी ने ‘रामदरश मिश्र: व्यक्ति और आभिव्यक्ति’ नाम से एक किताब छापी थी और एक कार्यक्रम का आयोजन भी किया था. उन्होंने मेरी कई महत्वपूर्ण किताबें छापी हैं. वह मेरे मुख्य प्रकाशक हैं.




प्रो. रामदरश मिश्र की रचनाओं के बारे में अधिक जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर जायें- http://vaniprakashan.in/auth-details.php?wid=752