Saturday, 3 September 2016

Book Launch - Media Ki Bhasha Leela by Ravikant


  ऑक्सफोर्ड बुक स्टोर में 'भाषा की मीडिया लीला


रविकान्त की पुस्तक 'मीडिया की भाषा-लीला' पर आयोजित परिचर्चा की कुछ तस्वीरें:



पुस्तक का विमोचन करते हुए रविकान्त, मिहिर पंड्या, अरुण माहेश्वरी और डॉ. संजीव




पुस्तक के साथ रविकान्त, अदिति माहेश्वरी-गोयल, डॉ.संजीव और मिहिर पंड्या




वाणी प्रकाशन से छपी पुस्तक 'मीडिया की भाषा-लीला' वैल्यू एडेड संस्करण है- रविकान्त



"इस किताब में रविकान्त जी ने अछूती पगडंडियों को पकड़ने की कोशिश की है 
और पहले से बनी हुई सोच को प्रश्नांकित किया है" -मिहिर पंड्या



'मीडिया की भाषा-लीला' में पिछले कुछ दशकों में सिनेमा की बदलती हुई 
भाषा का संतुलित अध्ययन किया गया है - डॉ. संजीव 



कार्यक्रम में उपस्थित श्रोतागण




   मीडिया की भाषा-लीला  

आई.एस.बी.एन: 978-93-5229-511-1
आई.एस.बी.एन: 978-93-5072-835-2
 विषय:  समाजविज्ञान
 संस्करण:  प्रथम 
वर्ष: 2016
 मूल्य: 895/-(हार्ड कवरपेपर बॅक - 395/-
 पृष्ठ संख्या: 180 
 पुस्तक अंश  


मीडिया की भाषालीला जन-माध्यम के आर-पार अध्ययन की एक दलील हैचूँकि उनकी परस्पर निर्भरता ऐतिहासिक तौर पर लाजि़मी साबित होती है। यह सही है कि राष्ट्र के बदलते भूगोल के साथ-साथ संस्कृति को देखने-परखने के नज़रिए में बदलाव आते हैंलेकिन आधुनिक मीडिया-तकनीक और बाज़ार लोकप्रिय संस्कृतियों की आवाजाही के ऐसे साधन मुहैया कराते हैंजिन पर राष्ट्रीय भूगोल की फौरी संकीर्णता हावी नहीं हो पाती। सरहदों के आर-पार लेन-देन चलता रहता हैचाहे वे सरहदें भाषा की होंक्षेत्र-विशेष कीराष्ट्र कीया फिर मीडिया की अपनी गढ़ हुई। छापाखाना लोकप्रिय सिनेमा के लिए कितना अहम हैयह सिने-पत्रकारिता के इतिहास से ज़ाहिर हैठीक उसी तरह जैसे कि दक्षिण एशिया में सिनेमा को 'सुनने का तगड़ा रिवाज़ रहा हैजिसके चलते सिनेमा के इतिहास को रेडियो के इतिहास से जोड़कर देखना नैसर्गिक लगता है। साहित्य-आधारित सिनेमा पर बातें करने की रिवायत पुरानी हैलेकिन यह देखने का व$ञ्चत आ गया है कि सिनेमा ने साहित्य की शैलीउसकी भाषा पर कौन से असरात छोड़े। और अपने आरंभिक दौर में वैश्विक इंटरनेट का हिंदी आभासी जगत कैसा लगता थाऐसे ही कुछ सवालों और खयालों को कुरेदता है यह संकलनजिसके केंद्र में हमारी-आपकी भाषा है।

रविकान्त


इतिहासकारलेखक और अनुवादकदिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहासकार पढऩे-पढ़ाने के बाद सन् 2000 से सीएसडीएस मेंसेंटर के सराय और भारतीय भाषा कार्यक्रम से नज़दीकी जुड़ाव. सह-संपादित पुस्तकें : ट्रांस्लेटिंग पार्टीशन (तरुण सेंट के साथकथा, 2001), दीवान-ए-सराय 01 : मीडिया विमर्श//हिंदी जनपद (2002) और दीवान-ए-सराय 02 : शहरनामा  (2005, संजय शर्मा के साथवाणी प्रकाशन). प्रतिमानकथादेशलोकमत समाचारऔर  नया पथ जैसी पत्र-पत्रिकाओं में छपे हालिया लेख गद्यकोश,काफ़िलाजानकी पुलरचनाकारएकेडेमिया. इडूीयू आदि वेबसाइटों पर मौजूद


'मीडिया की भाषा-लीला' के लिए इस लिंक पर क्लिक करें :


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