Saturday, 10 September 2016

'दर्दजा' की लेखिका जयश्री रॉय को "स्पंदन कृति पुरस्कार"


'दर्दजा' की लेखिका जयश्री रॉय को "स्पंदन कृति पुरस्कार"
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हिन्दी कथा की दुनिया में नयी लीक की रचनाकार जयश्री रॉय के उपन्यास 'दर्दजा' को भोपाल की संस्था 'स्पंदन' के द्वारा वर्ष 2016 के "स्पंदन कृति पुरस्कार" के लिए चुना गया है। इस उपलब्धि के लिए समस्त वाणी प्रकाशन परिवार की ओर से Joyshree Roy को बधाइयाँ!

वाणी प्रकाशन से प्रकाशित 'दर्दजा' लेखिका का नवीनतम उपन्यास है जिसमें अफ्ऱीका समेत लगभग आधी दुनिया में फ़ीमेल जेनिटल मयूटिलेशन या औरतों की सुन्नत की कुप्रथा के खि़लाफ़ हमारी आधी आबादी का दर्दनाक संघर्ष दर्ज़ किया गया है। हिन्दी में इस थीम पर यह पहली किताब है।

दर्दजाके पृष्ठों पर एक ऐसे संघर्ष की ख़ून और तकलीफ़ में डूबी हुई गाथा दर्ज है जो अफ्रिका के 28 देशों के साथ-साथ मध्य-पूर्व के कुछ देशों और मध्य व दक्षिण अमेरिका के कुछ जातीय समुदायों की करोड़ों स्त्रियों द्वारा फ़ीमेल  जेनिटल म्यूटिलेशन (एफ़जीए  या औरतों की सुन्नत) की कुप्रथा के ख़िलाफ़ किया जा रहा है। स्त्री की सुन्नत का मतलब है उसके यौनांग के बाहरी हिस्से (भगनासा समेत उसके बाहरी ओष्ठ) को काट कर सिल देना, ताकि उसकी नैसर्गिक कामेच्छा को पूरी तरह से नियन्त्रित करके उसे महज़ बच्चा पैदा करने वाली मशीन में बदला जा सके। धर्म, परम्परा और सेक्शुअलिटी के जटिल धरातल पर चल रही इस लड़ाई में विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनेस्को जैसी विश्व-संस्थाओं की सक्रिय हिस्सेदारी तो है ही, सत्तर के दशक में प्रकाशित होस्किन रिपोर्ट के बाद से नारीवादी आन्दोलन और उसके रैडिकल विमर्श ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई है।

अपनी समाज-वैज्ञानिक विषय-वस्तु के बावजूद प्रथम पुरुष में रची गयी जयश्री रॉय की कलात्मक आख्यानधर्मिता ने स्त्री  की इस ज़द्दोज़हद  को प्रकृति के ऊपर किये जा रहे अत्याचार के विरुद्ध विद्रोह का रूप दे दिया है। सुन्नत की भीषण यातना से गुज़र  चुकी माहरा अपनी बेटी मासा को उसी तरह की त्रासदी से बचाने के लिए पितृसत्ता द्वारा थोपी गयी सभी सीमाओं का उल्लंघन करती है। अफ़्रीका के जंगलों और रेगिस्तानों की बेरहम ज़मीन र सदियों से दौड़ते हुए माहरा और मासा के अवज्ञाकारी क़द  अपने पीछे मुक्ति के निशान छोड़ते चले जाते हैं। माहरा की बग़ावती चीख़ एक बेलिबास रूह केक़लाम की तरह है। हमारे कानों में गूँजते हुए वह एक ऐसे समय तक पहुँचने का उपक्रम करती है जिसमें कैक्टस अपने खिलने के लिए माक़ूल  मौसम का मोहताज़  हीं रहता।

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