Friday, 26 June 2015

 भारतीय साहित्य की पहचान
डॉ. सियाराम तिवारी
जन्म: 5 दिसम्बर, सन् 1934 ई.।
स्थान: बिहार राज्य के वैशाली (तत्कालीन मुजफरपुर) जिलान्तर्गत नारायणपुर बुजुर्ग नामक ग्राम जो हाजीपुर-महुआ रोड पर हाजीपुर से लगभग दस किलोमीटर पर अवस्थित है।
शिक्षा: एम.ए. (बिहार विश्वविद्यालय, मुजफरपुर), पीएच.डी., डी.लिट्. (पटना विश्वविद्यालय)।
पूर्व कार्य: विश्वभारती, शान्तिनिकेतन (प.बं.) से हिन्दी-विभागाध्यक्ष एवं मानविकी तथा समाजविज्ञान संकायाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त; हैदराबाद विश्वविद्यालय, हैदराबाद में अतिथि आचार्य; हंगेरियन युनिवर्सिटी ऑफ ट्रैंसिलवेनिया (रोमानिया) में अतिथि आचार्य; नालन्दा खुला विश्वविद्यालय, पटना में भाषा-संकाय के मुख्य समन्वयक।
प्रकाशित कृतियाँ: हिन्दी के मध्यकालीन खंडकाव्य (1964); बज्जिका भाषा और साहित्य (1964); हलधरदासकृत सुदामाचरित्रा (1966); सिद्धान्त, अध्ययन और समस्याएँ (1967); काव्यभाषा (1976); साहित्यशास्त्रा और काव्यभाषा (1978); रेणु: कर्त्तृत्व और कृतियाँ (1983); तुलसीदास का आचार्यत्व (1985); पाठानुसन्धान (1987); नन्दलाल बोस (1991); साहित्य और हिन्दी-साहित्य (1992); मंझन (1998); जानकीवल्लभ शास्त्री: कर्त्तृत्व और कृतियाँ (1998); आनन्द शंकर माधवन की सारस्वत साधना (1999); चिन्तन की रेखाएँ (2003,); हिन्दी-साहित्य: भाषिक परिदृश्य (2005); सुनि आचरज करै जनि कोई (2008); भारतीय साहित्य की पहचान (2009); रोमानिया-यात्रा की डायरी (2009); पाटलिपुत्रा से शान्तिनिकेतन
सम्पर्क: एन-2, प्रोफेसर कॉलोनी, कंकड़बाग, पोस्ट- लोहिया नगर, पटना-800020
दूरभाष: 08809941431, 09431808456
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कोई भी भाषा अपने साहित्य की दृष्टि से ही अपने प्रति श्रद्धा आकर्षित कर सकती है। इस प्रकार का विशेष महत्त्व हिन्दी भाषा के साहित्य में यथेष्ट रूप में पाया जाता है। मध्ययुग के साधक कवियों ने हिन्दी भाषा में जिस भावधारा का ऐश्वर्य-विस्तार किया है उसमें असाधारण विशेषता पायी जाती है। वह विशेषता यही है कि उनकी रचनाओं में उच्च कोटि के साधक एवं कवियों का एकत्रा सम्मिश्रण हुआ है। इस प्रकार का सम्मिश्रण दुर्लभ है।
-रवीन्द्रनाथ ठाकुर
यूरोपीयन पंडित यह अनुमान नहीं कर सकते कि भारतीय साहित्य एक जीवित जाति की साधना है।
-हजारी प्रसाद द्विवेदी
वास्तव में, भारतीय साहित्य की धारणा का सीधा सम्बन्ध भारतीय संस्कृति और भारतीय राष्ट्र की धारणा के साथ जुड़ा हुआ है। जिस प्रकार सहस्त्राब्दियों से धर्म, जाति, भाषा आदि के वैविध्य के रहते हुए भी भारतीय संस्कृति में मूलभूत एकता रही है और भारतीय राष्ट्र आज जीवन्त सत्य के रूप में विद्यमान है, इसी प्रकार भारतीय साहित्य की मूलभूत एकता का निषेध भी नहीं किया जा सकता। तत्त्व रूप में, भारतीय साहित्य एक इकाई है, उसका समेकित अस्तित्व है जो भारतीय जीवन की अनेकता में अन्तर्व्याप्त एकता को अभिव्यक्त करता है।
-डॉ॰ नगेन्द्र
कीजै न जमील उर्दू का सिंगार,
अब ईरानी तलमीहों से,
पहनेगी विदेशी गहने क्यों यह बेटी
भारतमाता की?
-जमील मज़हरी
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आलोच्य ग्रंथ में आदि से लेकर अद्यतन भारतीय साहित्य का सम्पूर्ण परिचय मिल जाता है। इस ग्रन्थ के द्वारा भारतीय साहित्य का वैशिष्ट्य अपनी सम्पूर्णता में उद्घाटित हुआ है।
-विश्वभारती पत्रिका (शान्तिनिकेतन), खंड 50, अंक 1-2
इस ग्रंथ का महत्त्व एक सन्दर्भ ग्रन्थ के रूप में शोधार्थियों और पाठकों के लिए सदा उपयोगी बना रहेगा। इसकी विवेचन शैली सहज, प्रसन्न और पारदर्शी है।
-पुस्तक-वार्ता (वर्धा), अंक 35
यह पुस्तक भारतीय साहित्य की एक मुकम्मल तस्वीर पेश करती है और भारतीय साहित्य के सम्बन्ध में उत्पन्न होने वाले भ्रम का निवारण करती है। अलग-अलग भाषाओं के साहित्य में अन्तःसम्बन्ध को दिखाते हुए पाठकों को भारतीय साहित्य से परिचित कराने का जो काम तिवारी जी ने किया है, वह उनकी सम्पादन-कला की निपुणता का अद्भुत नमूना है।
-नूतन भाषा-सेतु (अहमदाबाद), अंक 10
भविष्य में इस विषय पर शोध करने वालों के लिए यह एक महत्त्वपूर्ण सामग्री साबित होगी। इस कार्य के लिए सम्पादक और प्रकाशक दोनों ही प्रशंसनीय हैं।
-समीक्षा (नयी दिल्ली), वर्ष 42, अंक 4
भारतीय साहित्य की पहचानअतिविशिष्ट ग्रन्थ है जिसका स्वागत हिन्दी साहित्य में होना चाहिए।
-आरोह-अवरोह (पटना), अगस्त 2009
भारतीय साहित्य की एकता को सिद्ध करने के लिए अद्यावधिक प्रयासों में डॉ. तिवारी का प्रयास विशिष्ट है जिसका अनुभव इस गंन्थ के पाठक को अवश्य होगा।
-गुर्जर राष्ट्रवीणा (अहमदाबाद), वर्ष 59, अंक 8
http://www.vaniprakashan.in/lpage.php?word=bhartiya+sahitya+ki+pahchan


भविष्य का स्त्री विमर्श
ममता कालिया
जन्म: वृन्दावन, उत्तर प्रदेश। 1960 से लगातार लेखन में सक्रिय। कविता से आरम्भ कर कहानी, उपन्यास और नाटक में भी प्रयोग किये।
आजीविका के लिए दिल्ली तथा एस.एन.डी.टी., मुम्बई के महाविद्यालयों में अंग्रेजी की प्राध्यापिका रहीं। 1973 से 2001 तक इलाहाबाद के एक डिग्री कॉलेज में प्राचार्या। अन्ततः पूर्णकालिक रचनाकार।
पुरस्कार व सम्मान: उ. प्र. हिन्दी संस्थान का महादेवी स्मृति पुरस्कार एवं यशपाल स्मृति सम्मान; अभिनव भारती कलकत्ता का रचना सम्मान; सावित्री बाई फुले सम्मान। हिन्दी साहित्य परिषद सम्मान; हिन्दी साहित्य सम्मेलन का अमृत सम्मान।
अन्य रचनाएँ: बेघर, नरक दर नरक, प्रेम कहानी, लड़कियाँ, एक पत्नी के नोट्स, दौड़ (उपन्यास); यहाँ रोना मना है, आप न बदलेंगे (एकांकी संग्रह); कितने प्रश्न करूँ (काव्य-संग्रह); ‘Tribute to Papa other poems’, ‘Poems78’(अंग्रेजी काव्य-संग्रह)।
अनेक राष्ट्रीय व अन्तरराष्ट्रीय काव्य तथा कहानी संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित।
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वरिष्ठ लेखिका ममता कालिया की स्त्री विमर्श पर आधारित यह पुस्तक आज के समय में स्त्री के लिए कई नयी चुनौतियाँ लेकर आयी है। ऐसा लगता है वर्तमान समय प्रागैतिहासिक काल से भी ज्यादा पिछड़ा हुआ तथा स्त्री के प्रति आक्रामक है। आधुनिक तालिबान हमारे आचरण, विचरण, वस्त्र विन्यास और प्रसाधन के नियम गढ़ रहे हैं। इन्हें हमारी आज़ादी से भय लग रहा है। उन्हें हमारे अस्तित्व, व्यक्तित्व और विकास पर सन्देह है। वे कन्या भ्रूण के प्रति हिंसक और आक्रामक रहकर स्त्री जाति का अस्तित्व ही नकारना चाहते हैं। मन होता है उन्हें 1931 में लिखा महादेवी वर्मा का यह उद्धरण पढ़ा दिया जाय, ‘हमें न किसी पर जय चाहिए न किसी से पराजय, न किसी पर प्रभुता चाहिए न किसी का प्रभुत्व; केवल अपना वह स्थान चाहिए, वह स्वत्व चाहिए जिसके बिना हम समाज का उपयोगी अंग नहीं बन सकेंगी।
स्वतन्त्रता की सीमा-रेखा का नाम है सुबुद्धि। यही सीमा किसी और ने तय की तो स्वाधीनता की अवधारणा नष्ट हो जायेगी। स्त्री अपने मन से जिये, सोचे, लिखे, बोले। परिवेश के प्राणी उसे सेंसर की निगाहों से न देखें और उस पर सन्देह कर उसका आचरण कुंठित न करें यही स्त्री की स्वाधीनता है।
भविष्य का स्त्री विमर्शलेखन का सूत्रापात उन सवालों के जवाब ढूँढ़ने से होता है जो अपनी स्थिति को लेकर पैदा होते हैं। पर स्थितियाँ एकांगी कहाँ होती हैं। जन्म से मृत्यु तक समाज हमसे नाभि-नाल सा चिपका रहता है। स्त्री के साथ तो सामान्य से कुछ अधिक। समाज, कभी रीढ़ बनकर तो कभी रूढ़ि बनकर स्त्री की चाल-ढाल, सोच-विचार, हर गतिविधि चालित करना चाहता है। ऐसे में महिला-लेखक अपने रचना-कर्म का प्रारम्भ अगर स्त्री-कोण से करती है तो इसमें कुछ भी पारम्परिक नहीं है। ऐसे ही अनेकानेक स्त्रीवादी स्वरों से रूबरू कराती है यह पुस्तक।
http://www.vaniprakashan.in/lpage.php?word=BHAVISHYA+KA+STRI+VIMARSH