Friday, 19 June 2015

'कोठागोई' पुस्तक पर मालिनी अवस्थी की रोचक टिप्पणी

'कोठागोई'
पुस्तक पर 
प्रसिद्द लोकगीत गायिका 
मालिनी अवस्थी 
की रोचक टिप्पणी  

चतुर्भुज स्थान के उत्थान-पतन की रोचक  किस्सागोई!
-मालिनी अवस्थी
(लोकप्रिय गीतकार)
आज से चार बरस पहले...अगस्त का महीना। फोन घनघना उठा। आयोजक थे, मुजफ्फरपुर बिहार से। मुजफ्फरपुर यानी चतुर्भुज स्थान! सुनते ही मन बेचैन हो उठा। यह एक संयोग ही था कि पटना, बेगूसराय, आरा, मोतिहारी, दरभंगा यहाँ तक कि सीतामढ़ी भी हो आयी थी, लेकिन मुजफ्फरपुर कभी जाना नहीं हुआ। मन में कहीं न कहीं इस बात को लेकर एक गाँठ थी। तुरन्त हामी भरते हुए मैं मन ही मन आयोजकों की अहसानमन्द हो गयी जिनकी वजह से मैं अब मुजफ्फरपुर जाकर अपनी आँखों से उस जगह को देख सकूँगी जहाँ सदियों का सुरीला लेकिन अभिशप्त इतिहास दबा पड़ा है। पटना से मुजफ्फरपुर तक की सड़क-यात्रा इसी बेचैनी से बीती।
गोधूलि वेला हुई और मैं चतुर्भुज स्थान के सामने खड़ी थी।

एक शानदार इतिहास का सृजन इसी चतुर्भुज स्थान के गर्भ से हुआ था। पंछी मुंडेर पर सर झुकाये बैठे थे। ख़ामोशी पसरी हुई थी। सामने एक रंगबिरंगा बोर्ड दिखा ‘चम्पारानी संगीत की दुकान’, मैंने ठिठक कर अगलबगल देखा। आमन्त्रित करते चित्र-चित्र बोर्ड लगी कोठरियाँ मानो चतुर्भुज स्थान के रंगीन गौरव का मखौल उड़ा रही थीं। उस सन्नाटे में भी मैं सुन पा रही थी, देख पा रही थी। यह कौन गा रहा था? यह कबकी बात है। शायद बरसों पुरानी आवाज...
‘काले भँवरे ने कली चटकाई
रस लूटा तमाम’
रस में भीगी सुरलहरियों की खनक, हारमोनियम पर मचलती उँगलियाँ, सरगम के पलटों का रियाज मारती कई आवाज़ें  एक साथ...हिदायतें-शिकायतें एक साथ। कहीं नखरे तो कहीं फिकरे, फिर दिखा अरमानों-वायदों का टूटता सिलसिला तो कहीं दम तोड़ता अदब-औ-तहजीब का सिलसिला।

चतुर्भुज स्थान की जड़ें अब सूख चुकी हैं। जैसे कोई सूखा पेड़, जो कभी पुराना घना दरख़्त हुआ करता था जिसकी छाया में कितने ही लोगों ने विश्राम किया, नया जीवन पाया।

कौन थे वो अनाम लोग जिनके रस के छींटे पाकर संगीत की अनेक विधाएँ अमरबेल बन गयीं ! क्या इतिहास ने उन गुमनाम ज़िन्दगियों के योगदान का कभी सही आकलन किया ? कभी नहीं, करता भी कैसे, इतिहास प्रायः ऐसी जगह पर मौन रहता है जहाँ समाज की प्रतिष्ठा उसे खतरे में पड़ती दिखाई देती है । लेकिन, लोकसंस्कृति की धारा इससे विपरीत है, वह निश्छल बहती है, अपना यात्रामार्ग स्वयं तय करती है, नित नये मोड़, नये कूल-कछार, नये विश्रामस्थलों का सृजन करती है। अतीत में छूटते और गन्तव्य में आने वाले तमाम अनाम शख्सियतों का हिसाब हमारी लोकधारा करती चलती है, किस्सागोई के रूप में, किंवदंतियों के रूप में, लोककथाओं के रूप में, गाथागायन के रूप में, लोकगीतों के रूप में। लोकसंस्कृति लिखित इतिहास की मोहताज नहीं। न जाने कितने किरदार बुजुर्गों की जुबान पर, लोककथाओं के रूप में, आज भी साँस ले रहे हैं । शुक्र है इस सशक्त लोकपरम्परा का, जिसने आज भी चतुर्भुज स्थान को स्मृतियों में जीवित रखा है और शुक्र है प्रभात रंजन जी का जिन्होंने कलम उठाई और पन्नाबाई, चन्दाबाई, भ्रमर गौहरजान जैसे नगीनों के जीवनवृत्त को संकलित करने के बहाने मुज़फ्फरपुर का संगीत में योगदान पर विस्तार से लिखने का सार्थक उद्यम किया। ऐसा न होता तो चतुर्भुज स्थान की अनकही कहानियाँ सिर्फ़  कहानियाँ ही बन के रह जातीं।
मैंने भी सुनी हैं कई कहानियाँ ! अपने उस्तादों से, बड़े बुजुर्गों से और गुणीजनों से। आगरा, फर्रुखाबाद, कानपुर, लखनऊ, बनारस से लेकर मुज़फ्फरपुर  तक की कहानियाँ । गायकी के उत्थान-पतन की कहानियाँ, तालीम और कठिन रियाज़  की कहानियाँ, मुहब्बत और फरेब की कहानियाँ, अपमान और जलालत की दुखद कहानियाँ। जगमगाती गलियों की अधूरी कामनाओं की अनकही कहानियाँ। कहानी कहीं की भी हो, किरदार तो सब एक से थे। ज़माने  भर की नफ़रत और निन्दा बर्दाश्त करते मुस्कुराते गुनगुनाते किरदा। तमाम दुनिया का रंज दिल में समेटे ऐसे किरदार जिनकी आवाज में इतनी ताब और कशिश थी कि किसी अजनबी का ग़म  भी उनकी आवाज की कशिश सोख ले। किनकी आवाज़ें  थीं ये। कौन थे ये लोग !

मुज़फ्फरपुर और चतुर्भुज स्थान की जगत प्रसिद्ध संगीत परम्परा की अनगिनत कहानियाँ बड़े बुजुर्ग कलाकार आज भी बड़े अदब से सुनाते हैं। सुनहली स्मृतियों को याद करते उनकी आवाज़ बदल जाती है। एक से बढ़कर एक हुनरमन्द बाईजी लोगों का डेरा बन गया था चतुर्भुज स्थान। सारंगी के एक नामचीन उस्ताद जिन्होंने वहाँ काफी लम्बा अरसा गुजारा, चतुर्भुज स्थान का जिक्र आने पर बहुत भावुक हो गये। मुझसे बोले, "बेटा, हम लोगों को घर में हमारे वालिद और उस्ताद ने हिदायत दी कि ठुमरी-दादरा में ‘बोल-काट’ का चलन यदि सीखना है, तो मुज़फ्फरपुर जाकर चतुर्भुज में कुछ बरस इन ‘बाईजी’ लोगों की सोहबत में गुजारो, वहाँ संगत कर ली तो फिर दुनिया में किसी भी कलाकार और कैसी भी गायकी के साथ संगत कर सकोगे।“ बीसवीं सदी संगीत की सभी विधाओं के उत्कर्ष का समय था। बनारस, लखनऊ, पटियाला, दिल्ली, रामपुर, बड़ौदा, बम्बई, पूना तो संगीत के मुख्य केन्द्र थे ही, इस बीच खामोशी से बिहार का मुज़फ्फरपुर तवायफों का बसेरा बन रहा था। बाईजी थीं तो जाहिर है उस्ताद भी एक से बढ़कर एक, कोई पटियाला घराने के तो कोई कलकत्ता से। गायिकाओं को शोहरत मिली और शोहरत बेशुमार धन दौलत का प्रलोभन साथ ले कर आयी। पचास और साठ के दशक में अनेक गुनी कलाकार दिल्ली, लखनऊ और बनारस छोड़ कर चतुर्भुज स्थान आकर यहाँ की गायिकाओं के साथ बजाने में फख्र महसूस करने लगे। उस दौर में पूरे देश में एक से बढ़कर एक गानेवालियाँ थीं और उनकी शोहरत बुलन्दियों को छू रही थी। यह उनकी खुशकिस्मती थी कि उनमें से कुछ को रियासतों और दरबारों ने इज्ज़त बख्शी, कुछ को कलामर्मज्ञ श्रोताओं का सान्निध्य मिला, और कुछ को नामचीन शायरों के कलाम । लेकिन चतुर्भुज स्थान की यह बदकिस्मती थी कि उन्हें सिर्फ और सिर्फ सौदागरों का बाजार मिला जहाँ हर चीज की बोली लगती थी फिर चाहे वह गायकी की हो या कुछ और!! मुजरे के लिए मशहूर इन गायिकाओं की गाई ठुमरी दादरा कजरी चैती झूमर ग़ज़लों की भी धूम थी लेकिन उन्हें वह इज्ज़त कभी न मिल सकी जो उनकी समकालीन गायिकाओं को मिली क्योंकि आमजनधारणा ने उन्हें पतिता जो माना था।

मुझे दिली सुकून है कि मुज़फ्फरपुर  की शापित गायिकाओं का गुमनाम इतिहास अब गुमनाम नहीं रहेगा। बीते वक़्त  की ज़िन्दगियों  का लेखाजोखा एकत्रा करना बहुत मुश्किल काम है लेकिन प्रभात जी ने यह कर दिखाया है। चतुर्भुज स्थान के उत्थान से पतन तक की कहानी रोचक किस्सागोई शैली में लिखी गयी है।
गौर से सुनिये, पन्नाबाई गाते हुए कुछ कह रही हैं-
बड़ी दुआएँ मिलेंगी बेटा...
‘तुम चाह करो हम चाह करें
क्यों रार करें क्यों आह भरें’