Friday, 1 May 2015

Apne Apne Agyey (2 Vol. Set) / अपने अपने अज्ञेय (दो खण्ड)



Book - Apne Apne Agyey (2 Vol. Set) 

 Editor - Om Thanvi

 Publisher - Vani Prakashan 


Total Pages : 1054 (2 Vol. set)
ISBN : 978-93-5000-916-1 (Vol.-1) (HB)
ISBN : 978-93-5000-917-8 (Vol.-2) (HB)
Price :  Rs.1500/- (2 Vol. set)
Size (Inches) : 9.50"X6.50"
First Edition : 2011
Category  : Memoirs

पुस्तक के संदर्भ में -

अज्ञेय ने लिखा है समय कहीं ठहरता है तो स्मृति में ठहरता है। स्मृति के झरोखे में काफी कुछ छन जाता है। लेकिन इसी स्मृति को फिर से रचने की संभावनायें खड़ी होती हैं। झरोखों से छनती धूप की तरह वह स्मृति हमें गुनगुना ताप और उजास देती है। ऐसा लगता है मानो हम उस दौर से गुज़र रहे हों। पुस्तक के माध्यम से अपने-अपने अज्ञेय ऐसे ही संस्मरणों का संकलन है । व्यक्तिपरक संस्मरणों में जितना वह व्यक्ति मौजूद रहता है जिसके बारे में संस्मरण है, उतना ही संस्मरण का लेखक भी । यों तो कोई वर्णन या विवेचन शायद पूर्णतः निष्पक्ष नहीं होत, पर ऐसे संस्मरण तो हर हाल में व्यक्तित्व और उसके कृतित्व का विशिष्ट निरूपण ही करते हैं। संस्मरण समय की मुट्ठी खोल जरूर देते हैं, लेकिन कौन जनता है किसने समय को किस नजर से देखा और कहाँ, कैसे पकड़ा ! जैसी हथेली, वैसी पकड़ । लेकिन सौ लेखकों के संस्मरण एक जगह जमा हों तो ? क्या वे एक लेखक के व्यक्तित्व  और उसके रचनाकर्म की संश्लिष्टता को समझने में मददगार होंगे ? इस सवाल के सकारात्मक जवाब की सम्भावना में प्रस्तुत उद्यम किया गया है। इस संकलन में ‘हिन्दी साहित्य की सबसे पेचीदा शख्सियत’ करार दिए गये सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ की जन्मशती के मौके पर सौ लेखकों के संस्मरण शामिल हैं। हर लेखक ने अज्ञेय को अपने रंग में देखा है। विविध रंगों से गुजरने के बाद, पूरी उम्मीद है, पाठक खुद अज्ञेय की स्वतन्त्र छवि बनाने – या बनी छवि को जाँच सकने – में सक्षम होंगे। इन संस्मरणों में अज्ञेय की ज्यादातर वृत्तियों की छाया आपको मिलेगी ।  अलग-अलग कोण से।  अनेक संस्मरणों में ऐसी जानकारियाँ और अनुभव हैं, जो शायद पहले कभी सामने नहीं आये। हर लेखक हमारे सामने अपने देखे अज्ञेय को प्रस्तुत करता है और ये अपने अपने अज्ञेय  जोड़ में हमें ऐसे लेखक और उसके जीवन से रूबरू कराते हैं, जिसे प्रायः टुकड़ो में–  और कई बार गलत– समझ गया – भूमिका से 

सम्पादक के संदर्भ में -
ओम थानवी
ओम थानवी साहित्य, कला, सिनेमा, रंगमंच, पुरातत्त्व और पर्यावरण में गहरी रुचि रखते हैं। देश-विदेश में भ्रमण कर चुके हैं। बहुचर्चित यात्रा-वृत्तान्त मुअनजोडड़ो के लेखक हैं। अपने अपने अज्ञेय पुस्तक का मूलत: उद्देश्य सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' को श्रदांजलि अर्पित करना है। अज्ञेय के साथ ओम थानवी के पारिवारिक सम्बन्ध भी रहे हैं, थानवी जी अज्ञेय से मिलते रहते थे। एक लगाव से वह अज्ञेय को कितना समझ पाए और अज्ञेय के बारे में कितना संकलन कर पाए। इन्होंने इसका सही रूप 'अपने अपने अज्ञेय' पुस्तक के माध्यम से प्रस्तुत किया है।

‘फाँस’ उपन्यास के अंश



 लेखक संजीव

वरिष्ठ कथाकार संजीव का उपन्यास ‘फाँस’ वाणी प्रकाशन से 15 मई 2015 को प्रकाशित हो रहा है।

यह उपन्यास समर्पित है : 
सबका पेट भरने और तन ढकने वाले देश के लाखों किसानों और उनके परिवारों को जिनकी हत्या या आत्महत्या को हम रोक नहीं पा रहे हैं।

दरअसल ‘फाँस’ उपन्यास लेखक संजीव द्वारा लिखे गये विषय किसान आत्महत्या पर केन्द्रित अनेक वर्षों के शोध का परिणाम है।

‘फाँस’ खतरे की घंटी भी है और आत्महत्या के विरुद्ध दृढ़ आत्मबल प्रदान करने वाली चेतना और जमीनी संजीवनी का संकल्प भी।

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इंडिया टुडे ग्रुप डिजिटल 
की वेबसाइट पर 'फाँस' पुस्तक का प्रकाशित एक अंश आप सभी के समक्ष प्रस्तुत है -

साभार - नंदलाल शर्मा (समीक्षक)
साभार - इंडिया टुडे ग्रुप डिजिटल, 30 अप्रैल 2015


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अमर भारती समाचार पत्र 
में 'फाँस' पुस्तक का प्रकाशित एक और अंश आप सभी के समक्ष प्रस्तुत है - साभार - अमर भारती समाचार पत्र, 1 मई 2015






Samrat Ashok / सम्राट अशोक



 Book - Samrat Ashok 

 Author - Daya Prakash Sinha

 Publisher - Vani Prakashan 


Total Pages : 136
ISBN : 978-93-5072-873-4 (PB)
Price :  Rs.250/- (PB)
Size (Inches) : 5.50"X8.50"
First Edition : 2015
Category  : Play

पुस्तक के संदर्भ में -

नाटककार ने सम्राट अशोक को जिन रूप-रंग और छवियों में उकेरा है कि वह सुदूर अतीत का अशोक न हो कर, आज के किसी भी राजनीतिज्ञ, प्रशासक, अथवा शासक का सहज ही प्रतिबिम्ब जान पड़ने लगता है- इस दृष्टि से नाटक सर्वथा, सार्थक, समकालिक और सर्वकालीन रहेगा। देवेन्द्र राज अंकुर पूर्व निदेशक, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नयी दिल्ली ‘सम्राट अशोक’- अशोक के जीवन की घटनाओं का मात्रा संकलन नहीं है। नाटककार ने अशोक के माध्यम से जीवन की निरर्थकता और असंगतता को रेखांकित किया है, जो अन्ततः सार्वभौतिक सत्य है, और जिसने सिद्धार्थ नामक एक राजकुमार को बुद्ध बनाया था। इस परिप्रेक्ष्य में नाटक साहित्यगत मूल्यों से भरपूर एक उत्कृष्ट रचना है, जो हर दृष्टि से सफल नाट्य कृति है। डॉ. सूर्य प्रसाद दीक्षित पूर्व अध्यक्ष, हिन्दी विभाग लखनऊ विश्वविद्यालय

लेखक के संदर्भ में -
दया प्रकाश सिन्हा 

हिन्दी के लब्धप्रतिष्ठ नाटककार दया प्रकाश सिन्हा की रंगमंच के प्रति बहुआयामी प्रतिबद्धता है। पिछले चालीस वर्षों में अभिनेता, नाटककार, निर्देशक, नाट्य-अध्येता के रूप में भारतीय रंगविधा को उन्होंने विशिष्ट योगदान दिया है। दया प्रकाश सिन्हा अपने नाटकों के प्रकाशन के पूर्व, स्वयं उनको निर्देशित करके संशोधित/संवर्धित करते हैं। इसलिए उनके नाटक साहित्यगत/कलागत मूल्यों को सुरक्षित रखते हुए मंचीय भी होते हैं। दया प्रकाश सिन्हा के प्रकाशित नाटक हैं- मन के भँवर, इतिहास चक्र, ओह अमेरिका, मेरे भाई: मेरे दोस्त, कथा एक कंस की, सादर आपका, सीढ़ियाँ, अपने अपने दाँव, साँझ-सबेरा, पंचतंत्रा लघुनाटक (बाल नाटक), हास्य एकांकी (संग्रह), इतिहास, दुस्मन, रक्त-अभिषेक तथा सम्राट अशोक। दया प्रकाश सिन्हा नाटक-लेखन के लिए केन्द्रीय संगीत नाटक अकादमी, नयी दिल्ली के राष्ट्रीय ‘अकादमी अवार्ड’, उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के ‘अकादमी पुरस्कार’, हिन्दी अकादमी, दिल्ली के ‘साहित्य-सम्मान’, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के ‘साहित्य भूषण’ एवं ‘लोहिया सम्मान’, भुवनेश्वर शोध संस्थान के भुवनेश्वर सम्मान, आदर्श कला संगम, मुरादाबाद के ‘फ़िदा हुसैन नरसी पुरस्कार’, डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल स्मृति फाउंडेशन के ‘डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल स्मृति सम्मान’ तथा नाट्यायन, ग्वालियर के ‘भवभूति पुरस्कार’ से विभूषित हो चुके हैं। नाट्य-लेखन के अतिरिक्त दया प्रकाश सिन्हा की रुचि लोक कला, ललित कला, पुरातत्त्व, इतिहास और समसामयिक राजनीति में भी है। दया प्रकाश सिन्हा आई. ए. एस. से अवकाश-प्राप्ति के पश्चात् स्वतन्त्र लेखन और रंगमंच से सम्बद्ध हैं।