Tuesday, 14 April 2015

श्री ओम थानवी को वर्ष 2014 का बिहारी पुरस्कार

प्रसिद्द लेखक व वरिष्ठ पत्रकार 

श्री ओम थानवी 

को के. के. बिरला फाउंडेशन के 24वें 

'बिहारी पुरस्कार' 2014 

 से सम्मानित करने की घोषणा की गयी है। 

थानवी जी को यह पुरस्कार वाणी प्रकाशन से प्रकाशित उनके यात्रा-वृत्तांत

'मुअनजोदड़ो' 

के लिए प्रदान किया जायेगा। 

थानवी जी को इस पुरस्कार के लिए वाणी प्रकाशन परिवार की ओर हार्दिक बधाई। 

फोटो साभार - भरत तिवारी



'मुअनजोदड़ो' पुस्तक से कुछ कला कृतियाँ -




'मुअनजोदड़ो' पुस्तक के सन्दर्भ में -

सिन्धु घाटी सभ्यता के आख्यान में मोहनजोदड़ो-हड़प्पा हम सभी ने सुना है। यह 'मुअनजोदड़ो' क्या चीज है ? वहाँ के लोग मुअनजोदड़ो बोलते हैं, मुअनजोदड़ो मुआ यानी मृत और बहुवचन में मुअन मुआ का सिन्धी प्रयोग है। दड़ा यानी टीला/ मुअन-जो-दड़ो का आशय मुर्दों का टीला। 'मुअनजोदड़ो'बाद का नाम है। भारत-पाक का बंटवारा क़ुदरती नहीं, बनावटी है और सिन्धु घाटी सभ्यता दोनों की साझा सभ्यता-संस्कृति है।

"यात्राएँ जैसी भी हों, उनका अर्थ नहीं बदलता। इसलिए कि हर यात्रा में एक अर्थ निहित है, जो उसका स्थायी भाव है। कि किनारे नहीं जाना है। सूरते-हाल जो भी हो। वैसे भी पहुँचना कभी मक़सद नहीं हो सकता।  न यात्राओं का । न ज़िन्दगी का । यात्राएँ तो होती ही हैं पहुँची हुई। अपने हर क़दम पर उसी में सब हासिल-जमा। बशर्ते नज़र ठीक हो और नजरिया भी । ओम थानवी के पास दोनों की कमी नहीं है। बल्कि इफ़रात है। नतीजतन, यात्रा के अलावा पढ़ाकू फ़ुरसतों के साथ उन्होंने 'मुअनजोदड़ो'में अपने रंग भर दिए हैं।उनका यह नज़रिया ही किताब का असली हासिल है।  

किसी देश या शहर के ऊपर से उड़ान भरते हुए उसके बारे में सब कुछ जान लेने वाले यात्रा वृत्तांतों से अलग, 'मुअनजोदड़ो'में नए क़रीने से चीजें देखने का सलीका है। गहराइयों में उतरता। टीलों की ऊँचाइयों तक ले जाता। वह आप पर कुछ लादता-थोपता नहीं। साथ चलता रहता है। बहैसियत एक ईमानदार दोस्त। 'मुअनजोदड़ो'की एक और ख़ास बात: वह यात्रा को रैखिक नहीं रहने देता।  बल्कि कई बार अहसास दिलाता है कि आप किसी बहुमंजिला इमारत की लिफ्ट में हैं और हर मंज़िल एक कथा है। हमारे पूर्वजों की अनवरत कथा, जो जारी है अनन्तिम है।

लेखक श्री ओम थानवी के सन्दर्भ में -

ओम थानवी साहित्य, कला, सिनेमा, रंगमंच, पुरातत्त्व और पर्यावरण में गहरी रुचि रखते हैं। देश-विदेश में भ्रमण कर चुके हैं। बहुचर्चित यात्रा-वृत्तान्त मुअनजोडड़ो के लेखक हैं। अपने अपने अज्ञेय पुस्तक का मूलत: उद्देश्य सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' को श्रदांजलि अर्पित करना है। अज्ञेय के साथ ओम थानवी के पारिवारिक सम्बन्ध भी रहे हैं, थानवी जी अज्ञेय से मिलते रहते थे। एक लगाव से वह अज्ञेय को कितना समझ पाए और अज्ञेय के बारे में कितना संकलन कर पाए। इन्होंने इसका सही रूप 'अपने अपने अज्ञेय' पुस्तक के माध्यम से प्रस्तुत किया है।


'मुअनजोदड़ो' पुस्तक फ्लिपकार्ट, इंफीबीम और वाणी प्रकाशन की वेबसाइट पर उपलब्ध है-
अपनी प्रति आज ही आर्डर करें





प्रसिद्द लेखक व वरिष्ठ पत्रकार श्री ओम थानवी को के. के. बिरला फाउंडेशन के 24वें 'बिहारी पुरस्कार' से सम्मानित करने के सूचना निम्नलिखित वेबसाइट पर प्रसारित की गयी है -

शब्दांकन डॉट कॉम (साभार - भरत तिवारी)   

वेबदुनिया डॉट कॉम
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