Wednesday, 25 March 2015

'ख़ुद पर निगरानी का वक़्त'- चन्द्रकान्त देवताले




ख़ुद पर निगरानी का वक़्त
(काव्य संग्रह)
2015
चन्द्रकान्त देवताले 

सजिल्द संस्करण:
ISBN: 978-93-5072-919-9
मूल्य: INR 350 

पेपरबैक संस्करण 
ISBN: 978-93-5072-963-2
मूल्य: INR 150 


     "यह संग्रह इस बात के लिए भी याद रखा जायेगा कि हताशा किस तरह एक सचमुच की उम्मीद पैदा करती है।"
-मंगलेश डबराल 

विता लिखने की पाँच दशक से भी लम्बी यात्रा में संवेदना और विवेक के अनेक पड़ावों से होते हुए चन्द्रकान्त देवताले अब भाषा’ की उस धरती’ पर आ पहुँचे हैं जहाँ से वे अपने आसपास से लेकर दूर-दूर तक की समकालीन दुनिया की दशा-दिशा पर पैनी नज़र गड़ाये रखने के साथ-साथ ख़ुद पर भी निगरानी’ रखे हुए हैं और एक बेहद सजग कवि के रूप में कभी खामोशी में दुबके हुए/औरतों-बच्चों और नदियों के आँसुओं का अनुवाद’ कर रहे हैं तो कभीअन्तिम साँस तक डोंडी पीटने’ की ज़िमेदारी निभा रहे हैं। भूमंडलीकरण और आवारा पूँजी के साम्राज्यवाद के सामने यह देवताले की कविता का नया आयाम और उसकी नयी भूमिका है। एक दौर में जिस कवि ने चन्द्रमा को गिटार की तरह बजाने’ और आकाश के एक टुकड़े को टोपी की तरह पहनने’ की ख़्वाहिश की होउसकी कविता की आवा पिछले कुछ वर्षों में ज्यादा प्रत्यक्ष-बेबाकज्यादा सामाजिक और ज्यादा राजनीतिक हुई है और यह संग्रह उसी का एक गुणात्मक विस्तार है। यहाँ समकालीन समय के सियासी-समाजी हादसोंअन्यायों और दुखों की गहरी शिनाख़्त तो हैसत्ता और शक्ति की विभिन्न आक्रामक संरचनाओं के विरुद्ध चीखते रहने’ की कवि-नियति का सहर्ष स्वीकार भी है।
हमारे वक़्त की जो छवियाँ इन कविताओं में दिखलाई पड़ती हैंवे काफी विरूपअँधेरी और डरावनी हैं और देश के अन्नदाता’ किसानों की आत्महत्या से लेकर हवाई जहाज़ों से विदेश सौदा करने जाते देश के तथाकथित सारथियों तक फैली हुई हैं। कवि एक ऐसी दुनिया में है जहाँ ताक़तवर दैत्यों का चहूँतरफ हमला’ और विनाश के शिलान्यास का महापर्व’ है, ‘नदियाँ वेंटिलेटर पर पड़ी हैं’, ‘यकीनों के जंगल धू-धू कर’ जल रहे हैं और अच्छाई का अपहरण’ हो रहा है। कविताओं में जगह-जगह हमारी दुनिया की इस दुरवस्था और बदनसीबी का खाका मिलता हैलेकिन खास बात यह है कि देवताले लगातार यह भी पूछते चलते हैं कि आखिर ऐसा क्यों हुआ और इसके परदे में कौन सी ताकतें हैं। बहुत सी कविताएँ इसीलिए सम्बोधनपरक बन गयी हैं जिनमें कवि देश और दुनिया के हुक्मरानोंश्रीमन्तों-महामहिमों-महाप्रभुओं-पन्तप्रधानों से दोटूक सवाल करता है तो कभी सीधे उन्हें ललकारता- झकझोरताउनसे जिरह करता है और यह भी घोषित करता है कि ताकत के तन्त्रों द्वारा पेश की जा रही उम्मीद’ भी एक मुहावरा है/गुमराह करने को।’ यह कविता अपने समय से इस क़दर संत्रस्त और हताश है और जानती है कि उसकी भाषा हाँफ रही है और छातीकुट्टा’ कर रही है। गौरतलब यह है कि देवताले इसे ख़ुद पर निगरानी का वक़त’ भी मानते हैं और आगाह करते चलते हैं कि चुटकी-भर अमरता-खातिर/ विश्वासघात न हो जाये/अपनी भाषाधरती और लोगों के साथ।’ अपने दुश्मन की पहचान और उसके प्रतिरोध के साथ-साथ आत्मनिरीक्षण का यह आग्रह उनकी कविता का एक नया विस्तार है। लेकिन यह संग्रह इस बात के लिए भी याद रखा जायेगा कि हताशा किस तरह एक सचमुच की उम्मीद पैदा करती है। देवताले को एक उम्मीद तो कविता के चीखने और छातीकुट्टा करनेउसकी आवा के ऊँची और बेकाबू होनेउसके डोंडी पीटने से हैऔर दूसरी उम्मीद उन लोगों से हैजो कवि के अपने लोग हैं, ‘जिन्हें दुनिया को बचाना है’ और मीन में गड़ी जिनकी आँखें/देखती हैं आकाश के  सपने।
चन्द्रकान्त देवताले की कविता का पुराना परिचित आत्मीय स्वर और मानवीय प्रेम का गाढ़ा रंग भी इस संग्रह की कुछ कविताओं में बरक़रार है। तुकाराम,क़बूल फ़िदा हुसेनसुदीप बनर्जी और स्मिता पाटील की स्मृति को समर्पित या सूर्यसमुद्रबारिश और पेड़ का गुणगान करनेवाली कविताएँ संवेदना की निर्मलता और उन्मुक्तता का विरल उदाहरण हैं। परिशिष्ट के तौर पर दी गयीं तीन पुरानी और अब तक कवि के किसी संग्रह में अप्रकाशित कविताओं से भी इस संग्रह की सार्थकता और बढ़ गयी है क्योंकि ये कविताएँ निराला और मुक्तिबोध जैसे बड़े कवियों के जीवन के दारुण प्रसंगों पर केन्द्रित हैं और इन दोनों कवियों से सम्बोधित होते हुए देवताले उनकी विरासत के एक शानदार वंशज के रूप में अपने काव्य-दायित्व को भी पहचानते दिखते हैं।
-मंगलेश डबराल

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