Tuesday, 10 March 2015

'Roushandaan' Released in Lit-O-Fest / लिट् ओ फेस्ट में ‘रौशनदान’ का लोकार्पण

मुम्बई में आयोजित लिट् ओ फेस्ट कार्यक्रम में वाणी प्रकाशन से प्रकाशित लेखक 
जावेद सिद्दीक़ी 
की पुस्तक
 ‘रौशनदान’ 
मशहूर गीतकार 
गुलज़ार साहिब
 के द्वारा लोकार्पित की गयी।
(28 फरवरी से 1 मार्च 2015)


विश्व पुस्तक मेला 2015 में हिन्दी किताबों की दुनिया में नई छटा

विश्व पुस्तक मेला 2015 में हिन्दी किताबों की दुनिया में नई छटा।
साभार : आकांक्षा पारे काशिव 
साभार : आउटलुक पत्रिका 16-28 फरवरी 2015 


Happy Women's Day / महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ

वाणी प्रकाशन परिवार की ओर से आप सभी को 
महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।


Shahar Mein Gaon / शहर में गाँव

वाणी प्रकाशन से प्रकाशित मशहूर शायर 
 निदा फ़ाज़ली 
की नवीन पुस्तक 
‘शहर में गाँव’ 
पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है।


Shahar Mein Gaon / शहर में गाँव


 Book - Shahar Mein Gaon 

 Author - Nida Fazali 

 Publisher - Vani Prakashan 

Total Pages : 554
ISBN : 978-93-5072-884-0(HB)
Price :  Rs.795/- (HB)
Size (Inches) : 5.50X8.50
First Edition : 2015
Category  : Collection of Poetry

पुस्तक के संदर्भ में -
निदा फ़ाजली चलती फिरती लेकिन लम्हा-ब-लम्हा बदलती ज़िन्दगी के शायर हैं। उनका कलाम मेहज़ ख़याल आराई या किताबी फलसफा तराज़ी नहीं है। वजूदी मुफ़िक्कर व अदीब कामियो ने कहा है। मेरे आगे न चलो, मैं तुम्हारी पैरवी नहीं कर सकता। मेरे पीछे न चलो मैं रहनुमाई नहीं कर सकता। मेरे साथ चलो... दोस्त की तरह। कामियो की ये बात निदा के अदबी रवैये पर सादिक़ आती है। उनकी शायरी क़ारी असास शायरी है। इसमें बहुत जल्द दोस्त बन जाने की सलाहियत है। इसमें नासेहाना बुलन्द आहंगी है, न बाग़ियाना तेवर हैं। उन्होंने लफ़्ज़ों के ज़रिये जो दुनिया बसाई है वो सीधी या यक रुख़ी नहीं है। उसके कई चेहरे हैं। ये कहीं मुस्कुराती है कहीं झल्लाती है। कहीं परिन्दा बन के चहचहाती है और कहीं बच्चा बन के मुस्कुराती है। उन्हीं के साथ जंग की तबाहकारी भी है। सियासत की अय्यारी भी है। इन सारे मनाज़िर को उन्होंने हमदर्दाना आँखों से देखा है और दोस्त की तरह बयान किया है। निदा की तख़लीक़ी ज़ेहानत की एक और ख़ुसूसियत की तरफ़ इशारा करना भी ज़रूरी है। इंसान और फ़ितरत के अदम तवाज़ुन को जो आज आलमी तशवीशनाक मसला है निदा ने निहायत दर्दमन्दी के साथ मौज़ू-ए-सुख़न बनाया है। जिस दौर में बढ़ती हुई आबादी के रद्दे अमल में, बस्तियों से परिन्दे रुख़्सत हो रहे हों, जंगलों से पेड़ और जानवर गशयब हो रहे हैं, समुन्दरों को पीछे हटाकर इमारतें बनाई जा रही हों। उस दौर में फ़ितरत की मासूम फिज़ाइयत और उसकी शनाख़्त के आहिस्ता आहिस्ता ख़त्म होने की अफ़सुर्दगी ने इनकी इंफ़ेरादियत में एक और नेहज का इज़ाफा किया है। सुना है अपने गाँव में रहा न अब वो नीम, जिसके आगे माँद थे सारे वैद हकीम।

निदा फ़ाज़ली आज के दौर के अहम और मोअतबर शायर हैं। वो उन चन्द ख़ुश क़िस्मत शायरों में हैं जो किताबों और रिसालों से बाहर भी लोगों के हाफ़जों में जगमगाते हैं। उनकी शायरी की ये ख़ूबी उन्हें 16वीं सदी के उन सन्त कवियों के करीब करती नजर आती है जिनके कलाम की ज़मीनी क़ुर्बतों, रूहानी बरकतों और तस्वीरी इबारतों को शुरू ही से उन्होंने अपने कलाम के लेसानी इज़हार का मेआर बनाया है। इर्दगिर्द के माहौल से जुड़ाव और फितरी मनाज़िर से लगाव उनकी शेअरी खुसूसियात हैं। रायज रिवायती ज़बान में मुक़ामी रंगों की हल्की गहरी शमूलियत से निदा फ़ाज़ली ने जो लब-ओ-लहजा तराशा है वो उन्हीं से मख़सूस है। उनके यहाँ शेअरी ज़बान न चेहरे पर दाढ़ी बढ़ाती है न माथे पर तिलक लगाती है। ये वो ज़बान है जो गली-कूचों में बोली जाती है और घर-आँगन में खनखनाती है। बोल चाल के लफ़्ज़ों में शेअरी आहंग पैदा करना उनकी इंफ़ेरादियत है।

लेखक के संदर्भ में -
निदा फ़ाजली का जन्म 12 अक्टूबर 1938 को दिल्ली में और प्रारंभिक जीवन ग्वालियर में गुजरा। ग्वालियर में रहते हुए उन्होंने उर्दू अदब में अपनी पहचान बना ली थी और बहुत जल्द वे उर्दू की साठोत्तरी पीढ़ी के एक महत्त्वपूर्ण कवि के रूप में पहचाने जाने लगे। निदा फ़ाजली की कविताओं का पहला संकलन ‘लफ़्ज़ों का पुल’ छपते ही उन्हें भारत और पाकिस्तान में जो ख्याति मिली वह बिरले ही कवियों को नसीब होती है। इससे पहले अपनी गद्य की किताब मुलाकातें के लिए वे काफी विवादास्पद और चर्चित रह चुके थे। ‘खोया हुआ सा कुछ’ उनकी शाइरी का एक और महत्त्वपूर्ण संग्रह है। सन 1999 का साहित्य अकादमी पुरस्कार ‘खोया हुआ सा कुछ’ पुस्तक पर दिया गया है। उनकी आत्मकथा का पहला खंड ‘दीवारों के बीच’ और दूसरा खंड ‘दीवारों के बाहर’ बेहद लोकप्रिय हुए हैं। फिलहाल: फिल्म उद्योग से सम्बद्ध। 


Mukhaute Ka Rajdharm / मुखौटे का राजधर्म


 Book - Mukhaute Ka Rajdharm 

 Author - Ashutosh 

 Publisher - Vani Prakashan 

Total Pages : 660
ISBN : 978-93-5072-958-8(HB)
Price :  Rs.1500/- (HB)
Size (Inches) : 5.50X8.50
First Edition : 2015
Category  : Politics/Journalism/Sociology

पुस्तक के संदर्भ में -
जब सदी करवट लेती है तो अरबों लोग उसके गवाह बनते हैं लेकिन उसमें से चन्द लोग ही उस बदलाव की आहट को महसूस करते हैं। जब वक़्त बदलता है तो बदलते वक़्त को पकड़ने और उसके हिसाब से फैसले लेने वाला ही अपनी अलग पहचान बनाता है क्योंकि बदलाव यकायक नहीं होता है, सालों लग जाते हैं। दिनकर ने कहा भी है कि विद्रोह क्रान्ति या बगावत कोई ऐसी चीज़ नहीं जिसका विस्फोट अचानक होता है। घाव भी फूटने के पहले अनेक काल तक पकते रहते हैं। एक पत्रकार के तौर पर आशुतोष ने देश की राजनीति और समाज में आ रहे बदलाव की आहट को ना केवल सुना बल्कि अपनी लेखनी के माध्यम से उसको देश के विशाल पाठक वर्ग के सामने भी रखा। बदलाव की आहट को भांपने और बदलते वक़्त की नब्ज़ को पकड़ने की आशुतोष की कोशिशों का ही नतीजा है - ‘मुखौटे का राजधर्म’। पत्रकार और सम्पादक के तौर पर आशुतोष ने बहुत बेबाकी और निर्भीकता के साथ अपनी राय रखी। लम्बे समय तक टेलीविज़न में काम करते हुए उनकी भाषा में जो रवानगी दिखाई देती है वह अद्भुत है। राजनीति के लेखों में विश्व सिनेमा से लेकर भारतीय मिथकों का प्रयोग हिन्दी में तो विरले ही दिखाई देता है। यह किताब पाठकों को इक्कीसवीं सदी के भारत के बदलाव को देखने और महसूस करने का अवसर देती है। 

लेखक के संदर्भ में -
        आशुतोष

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम.ए. और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से एम. फिल्. करने के बाद आशुतोष पत्रकारिता से जुड़े। अख़बार की दुनिया से होते हुए वह टीवी में पहुँचे और टीवी न्यूज में क्रान्तिकारी बदलाव लाने वाली आजतक की टीम के एक अहम सदस्य रहे। 2006 में आशुतोष ने बतौर मैनेजिंग एडिटर आईबीएन7 की कमान सँभाली। टीवी के निहायत चर्चित चेहरे होने के साथ देश के अति महत्त्वपूर्ण सम्पादकों में उनका शुमार होता था। इस दौरान उन्होंने लेखन से अपना रिश्ता बनाये रखा और नियमित रूप से लिखते रहे। इसमें दैनिक हिन्दुस्तान और दैनिक भास्कर के लिए लिखे गये उनके स्तम्भ लेख उल्लेखनीय हैं। 2014 में आशुतोष आम आदमी पार्टी से जुड़कर सक्रिय राजनीति का हिस्सा बने। उनकी पिछली किताब, ‘अन्ना क्रान्ति’ 2012 में प्रकाशित हुई थी। 





Munawwar Rana Awarded with 'Sahitya Akademi Award-2014' / मुनव्वर राना ‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार-2014’ से सम्मानित


प्रत्येक वर्ष की भाँति 9-14 मार्च, 2015, को ‘साहित्य अकादेमी’ के सालाना उत्सव ‘फेस्टिवल ऑफ़ लेटर्स’, भारत के समृद्ध और जीवंत साहित्य का उत्सव, ‘साहित्योत्सव’ में वाणी प्रकाशन के मशहूर शायर 

मुनव्वर राना साहिब 
9 मार्च 2015 को 
‘साहित्य अकादेमी पुरस्कार-2014’ 
से सम्मानित किये गये।



Hindi Kahani : Waqt Ki Shinakht Aur Srijan Ka Raag / हिन्दी कहानी : वक़्त की शिनाख्त और सृजन का राग

वाणी प्रकाशन से प्रकाशित चर्चित लेखिका 
रोहिणी अग्रवाल 
की नवीन आलोचनात्मक पुस्तक 
‘हिन्दी कहानी : वक़्त की शिनाख्त और सृजन का राग’ 
पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है।


Hindi Kahani : Waqt Ki Shinakht Aur Srijan Ka Raag / हिन्दी कहानी : वक़्त की शिनाख्त और सृजन का राग


Book - Hindi Kahani : Waqt Ki Shinakht Aur Srijan Ka Raag

Author - Rohini Aggarwal

Publisher - Vani Prakashan

Total Pages : 192
ISBN : 978-93-5072-926-7(HB)
Price :  Rs.395/- (HB)
Size (Inches) : 5X8
First Edition : 2015
Category  : Criticism

पुस्तक के संदर्भ में -
प्रतिष्ठित कथालोचक रोहिणी अग्रवाल आलोचना में सृजनात्मकता का नया आयाम जोड़ देने के कारण अपनी पाँत अलग बनाती हैं। कहानी, उनके लिए विश्लेषण की वस्तु नहीं, संवाद की ज़मीन है जहाँ बुनी गयी घटनाओं, पात्रों, चरित्रों और परिवेश के साथ एकमेक हो वे गहरी तल्लीनता से उनमें डूब भी जाती हैं और फिर एक निरासक्त आत्मपरकता से अपने वक़्त की शिनाख़्त भी कर जाती हैं। जाहिर है तब उनकी कथालोचना कथाकृति का आलोचनात्मक मूल्यांकन भर नहीं रहती, कथाकृति के समानान्तर रचा गया एक पूरक पाठ बन जाती है जहाँ वे आलोचक की हैसियत से भी उपस्थित हैं और एक कथा-पात्र की तरह कथा-समय और वर्तमान सत्य में हस्तक्षेप करती सर्जक कलाकार भी। पुस्तक ‘हिन्दी कहानी: वक़्त की शिनाख़्त और सृजन का राग’ चौदह लेखों का संग्रह है जिसमें पिछले पचास वर्ष की हिन्दी कहानी के जरिए समय और समाज में होने वाली हलचलों के साथ-साथ लेखकीय सरोकारों और कथा-शिल्प में आने वाले बदलावों को भी परखा गया है। भूमंडलीकरण और आर्थिक उदारीकरण ने अपने सम्मोहन-पाश में जकड़ कर व्यक्ति और व्यवस्था दोनों को जिस प्रकार असंवेदनशील और आत्मकेन्द्रित किया है, वह समय का तेजी से विघटन भी कर रहा है, और विघटन के भीतर छुपी सृजन की नयी सम्भावनाओं को हौले-हौले उकेर भी रहा है। रोहिणी अग्रवाल की खासियत है कि वे माइक्रो और मैक्रो दोनों स्तरों पर कहानी की अन्तस्संरचना में निहित तत्त्वों को पूरी तार्किकता एवं रागात्मकता से पकड़ती और जोड़ती हैं। वे मानती हैं कि प्रायः हर कथाकार अपने समय का अतिक्रमण कर चुप्पियों के बीच छुपी मुखरताओं को गुनते हुए वक़्त की पड़ताल का गुरु दायित्व निभाता है। मुक्तिबोध, ज्ञानरंजन और संजीव सरीखे कथाकार अपने समानधर्मी सरोकार - आत्मालोचन और यथार्थ को पुनर्सर्जित करते रोमानी आदर्शवाद के कारण जहाँ एक अलग कथा-दृष्टि के पैरोकार बनते हैं, वहीं हारनोट, अल्पना मिश्र, सत्यनारायण पटेल और कैलाश वानखेड़े जैसे अगली पीढ़ी के कहानीकार मनुष्य की निजता को सामूहिक चेतना में ढाल कर अस्मिता की रक्षा को मनुष्य के संगठित क्षेत्रा का दर्जा देते हैं। आलोचना को किसी एक सुनिश्चित साँचे में बाँध कर स्वयं को जकड़ने और आवृत्तिमूलक बना लेने की प्रवृत्ति का विरोध कर रोहिणी अग्रवाल अपने हर लेख में शिल्प का एक नया साँचा गढ़ती हैं। कहीं एक पूरी पीढ़ी के कथा-सरोकारों की जाँच में अतीत और वर्तमान के बीच निरन्तर आवाजाही है, कहीं एक कहानी के भीतर पैठ कर हर रग-रेशे की बेचैन पड़ताल में लेखक और युग के अन्तस् को थहाने की कोशिश है, तो कहीं उसके समूचे कृतित्व के जरिए उसकी विकास-यात्रा के उतार-चढ़ाव-मोड़ों को जानने का कौतूहल भी। जाहिर है इस पूरी प्रक्रिया में साहित्यालोचना धीर-गम्भीर समाजशास्त्रीय विमर्श भी बन जाता है और हर घेरे को तोड़ कर उन्मुक्त आकाश में विचरण करने की आकांक्षा भी। ‘हिन्दी कहानी: वक्श्त की शिनाख़्त और सृजन का राग’ एक ऐसी कृति है जिसे पढ़ते हुए पाठक बार-बार इस विश्वास को गुनता है कि आलोचना सृजनात्मक साहित्य के पाठ की दोयम विधा नहीं, युगीन विमर्शों-सवालों-मुद्दों पर किया गया सुचिन्तित रचनात्मक संलाप है।

लेखिका के संदर्भ में -
रोहिणी अग्रवाल - जन्म: 9 दिसम्बर 1959 शैक्षणिक योग्यता: एम. ए. हिन्दी एवं अंग्रेजी, पीएच.डी. हिन्दी; बैचलर इन जर्नलिज़्म एंड मास कम्युनिकेशन प्रकाशित कृतियाँ: हिन्दी उपन्यास में कामकाजी महिला, एक नज़र कृष्णा सोबती पर, इतिवृत्त की संरचना और संरूप (पन्द्रह वर्ष के प्रतिमानक उपन्यास), समकालीन कथा साहित्य: सरहदें और सरोकार (आलोचना); स्वप्न और संकल्प, साहित्य की ज़मीन और स्त्री-मन के उच्छ्वास, साहित्य का स्त्री-स्वर (स्त्री लेखन); घने बरगद तले, आओ माँ, हम परी हो जाएँ, कहानी यात्रा: सात (सम्पादित); मुक्तिबोध की प्रतिनिधि कहानियाँ (सम्पादित) (कहानी संग्रह)। पुरस्कार/सम्मान: हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा कहानी पुरस्कार, 1987 एवं 2003, हरियाणा साहित्य अकादमी द्वारा ‘समकालीन कथा साहित्य: सरहदें और सरोकार’ पुस्तक पर आलोचना पुरस्कार, 2008; स्पन्दन आलोचना पुरस्कार, 2010। सम्प्रति: डीन, मानविकी संकाय एवं अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय, रोहतक।