Friday, 26 June 2015


भविष्य का स्त्री विमर्श
ममता कालिया
जन्म: वृन्दावन, उत्तर प्रदेश। 1960 से लगातार लेखन में सक्रिय। कविता से आरम्भ कर कहानी, उपन्यास और नाटक में भी प्रयोग किये।
आजीविका के लिए दिल्ली तथा एस.एन.डी.टी., मुम्बई के महाविद्यालयों में अंग्रेजी की प्राध्यापिका रहीं। 1973 से 2001 तक इलाहाबाद के एक डिग्री कॉलेज में प्राचार्या। अन्ततः पूर्णकालिक रचनाकार।
पुरस्कार व सम्मान: उ. प्र. हिन्दी संस्थान का महादेवी स्मृति पुरस्कार एवं यशपाल स्मृति सम्मान; अभिनव भारती कलकत्ता का रचना सम्मान; सावित्री बाई फुले सम्मान। हिन्दी साहित्य परिषद सम्मान; हिन्दी साहित्य सम्मेलन का अमृत सम्मान।
अन्य रचनाएँ: बेघर, नरक दर नरक, प्रेम कहानी, लड़कियाँ, एक पत्नी के नोट्स, दौड़ (उपन्यास); यहाँ रोना मना है, आप न बदलेंगे (एकांकी संग्रह); कितने प्रश्न करूँ (काव्य-संग्रह); ‘Tribute to Papa other poems’, ‘Poems78’(अंग्रेजी काव्य-संग्रह)।
अनेक राष्ट्रीय व अन्तरराष्ट्रीय काव्य तथा कहानी संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित।
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वरिष्ठ लेखिका ममता कालिया की स्त्री विमर्श पर आधारित यह पुस्तक आज के समय में स्त्री के लिए कई नयी चुनौतियाँ लेकर आयी है। ऐसा लगता है वर्तमान समय प्रागैतिहासिक काल से भी ज्यादा पिछड़ा हुआ तथा स्त्री के प्रति आक्रामक है। आधुनिक तालिबान हमारे आचरण, विचरण, वस्त्र विन्यास और प्रसाधन के नियम गढ़ रहे हैं। इन्हें हमारी आज़ादी से भय लग रहा है। उन्हें हमारे अस्तित्व, व्यक्तित्व और विकास पर सन्देह है। वे कन्या भ्रूण के प्रति हिंसक और आक्रामक रहकर स्त्री जाति का अस्तित्व ही नकारना चाहते हैं। मन होता है उन्हें 1931 में लिखा महादेवी वर्मा का यह उद्धरण पढ़ा दिया जाय, ‘हमें न किसी पर जय चाहिए न किसी से पराजय, न किसी पर प्रभुता चाहिए न किसी का प्रभुत्व; केवल अपना वह स्थान चाहिए, वह स्वत्व चाहिए जिसके बिना हम समाज का उपयोगी अंग नहीं बन सकेंगी।
स्वतन्त्रता की सीमा-रेखा का नाम है सुबुद्धि। यही सीमा किसी और ने तय की तो स्वाधीनता की अवधारणा नष्ट हो जायेगी। स्त्री अपने मन से जिये, सोचे, लिखे, बोले। परिवेश के प्राणी उसे सेंसर की निगाहों से न देखें और उस पर सन्देह कर उसका आचरण कुंठित न करें यही स्त्री की स्वाधीनता है।
भविष्य का स्त्री विमर्शलेखन का सूत्रापात उन सवालों के जवाब ढूँढ़ने से होता है जो अपनी स्थिति को लेकर पैदा होते हैं। पर स्थितियाँ एकांगी कहाँ होती हैं। जन्म से मृत्यु तक समाज हमसे नाभि-नाल सा चिपका रहता है। स्त्री के साथ तो सामान्य से कुछ अधिक। समाज, कभी रीढ़ बनकर तो कभी रूढ़ि बनकर स्त्री की चाल-ढाल, सोच-विचार, हर गतिविधि चालित करना चाहता है। ऐसे में महिला-लेखक अपने रचना-कर्म का प्रारम्भ अगर स्त्री-कोण से करती है तो इसमें कुछ भी पारम्परिक नहीं है। ऐसे ही अनेकानेक स्त्रीवादी स्वरों से रूबरू कराती है यह पुस्तक।
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