Thursday, 30 April 2015

Mere Bhai : Mere Dost / मेरे भाई : मेरे दोस्त


 Book - Mere Bhai : Mere Dost 

 Author - Daya Prakash Sinha

 Publisher - Vani Prakashan 

Total Pages : 84
ISBN : 978-93-5072-879-6 (PB)
Price :  Rs.200/- (PB)
Size (Inches) : 5.50"X8.50"
First Edition : 2015
Category  : Play

पुस्तक के संदर्भ में -

हिन्दू-मुस्लिम एकता और भारत-पाक द्वन्द्व के उलझे प्रश्नों से टकराता आज का साहित्यिक नाटक: कथानक की नवीनता, भाषा की रवानगी, संवादों की चुस्ती से मंडित लोकप्रिय श्रेष्ठ नाटक, दिल्ली, कोलकाता, लखनऊ, मुम्बई, जयपुर, पटना, चंडीगढ़ आदि देश के महानगरों एवं अन्य नगरों में अनेक नाट्य-संस्थाओं द्वारा अनगिनत मंच-प्रस्तुतियाँ। अपनी प्रथम प्रस्तुति (1971) से आज चालीस वर्ष बाद भी नाटक जीवित है, और रंगमंच पर जीवन्त है। इस नाटक से- डॉ. मिर्जा: जब लोग बीमार पड़ते हैं तो अच्छे से अच्छे डॉक्टर के पास जाते हैं, चाहे वो हिन्दू हो या मुसलमान। मुकदमा लड़ते हैं तो अच्छे से अच्छा वकील खोजते हैं- चाहे वो हिन्दू हो या मुसलमान। मोटर बनवाते हैं, तो अच्छे से अच्छे मिस्त्री के पास जाते हैं। तब कोई मज़हब नहीं देखता...। यासीन: जब से होश सँभाला, तब से यही सुना, हिन्दुस्तान में मुसलमानों के साथ जुल्म-ज्यादतियाँ होती हैं। उनके घर जला दिए जाते हैं। वे भूखे मरते हैं, और न जाने क्या-क्या। लेकिन आकर यहाँ देखा तो कुछ और ही है। यहाँ हिन्दू-मुसलमान भाई-भाई हैं। मुसलमान सुप्रीम-कोर्ट का चीफ़ जस्टिस और हिन्दुस्तान का प्रेसीडेंट होता है। उसे सब तरह की आज़ादी है। मेरे दिल ने सवाल किया- क्या जो कुछ सुना था, वह झूठ था...।

लेखक के संदर्भ में -
दया प्रकाश सिन्हा 

हिन्दी के लब्धप्रतिष्ठ नाटककार दया प्रकाश सिन्हा की रंगमंच के प्रति बहुआयामी प्रतिबद्धता है। पिछले चालीस वर्षों में अभिनेता, नाटककार, निर्देशक, नाट्य-अध्येता के रूप में भारतीय रंगविधा को उन्होंने विशिष्ट योगदान दिया है। दया प्रकाश सिन्हा अपने नाटकों के प्रकाशन के पूर्व, स्वयं उनको निर्देशित करके संशोधित/संवर्धित करते हैं। इसलिए उनके नाटक साहित्यगत/कलागत मूल्यों को सुरक्षित रखते हुए मंचीय भी होते हैं। दया प्रकाश सिन्हा के प्रकाशित नाटक हैं- मन के भँवर, इतिहास चक्र, ओह अमेरिका, मेरे भाई: मेरे दोस्त, कथा एक कंस की, सादर आपका, सीढ़ियाँ, अपने अपने दाँव, साँझ-सबेरा, पंचतंत्रा लघुनाटक (बाल नाटक), हास्य एकांकी (संग्रह), इतिहास, दुस्मन, रक्त-अभिषेक तथा सम्राट अशोक। दया प्रकाश सिन्हा नाटक-लेखन के लिए केन्द्रीय संगीत नाटक अकादमी, नयी दिल्ली के राष्ट्रीय ‘अकादमी अवार्ड’, उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के ‘अकादमी पुरस्कार’, हिन्दी अकादमी, दिल्ली के ‘साहित्य-सम्मान’, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के ‘साहित्य भूषण’ एवं ‘लोहिया सम्मान’, भुवनेश्वर शोध संस्थान के भुवनेश्वर सम्मान, आदर्श कला संगम, मुरादाबाद के ‘फ़िदा हुसैन नरसी पुरस्कार’, डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल स्मृति फाउंडेशन के ‘डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल स्मृति सम्मान’ तथा नाट्यायन, ग्वालियर के ‘भवभूति पुरस्कार’ से विभूषित हो चुके हैं। नाट्य-लेखन के अतिरिक्त दया प्रकाश सिन्हा की रुचि लोक कला, ललित कला, पुरातत्त्व, इतिहास और समसामयिक राजनीति में भी है। दया प्रकाश सिन्हा आई. ए. एस. से अवकाश-प्राप्ति के पश्चात् स्वतन्त्र लेखन और रंगमंच से सम्बद्ध हैं।

Monday, 27 April 2015

Mass Media Aur Samaj / मास मीडिया और समाज



Book - Mass Media Aur Samaj


 Author - Manohar Shyam Joshi


 Publisher - Vani Prakashan 

Total Pages : 124
ISBN : 978-93-5072-699-0(HB)
Price :  Rs.250/- (HB)
Size (Inches) : 5.50"X8.50"
First Edition : 2014
Category  : Media


पुस्तक के संदर्भ में -

मनोहर श्याम जोशी को हिन्दी के प्रमुख पत्रकार-सम्पादक के रूप में भी याद किया जाता है। करीब 16 साल तक उन्होंने ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ का सम्पादन किया और बीसवीं शताब्दी के सत्तर के दषक में उन्होंने हिन्दी-पत्रकारिता के नये मानक गढ़े। नब्बे के दशक के बाद जिस पत्रकारिता को ‘इन्फोटेनमेंट’ के नाम से जाना गया उसके बीज वास्तव में ‘साप्ताहिक हिन्दुस्तान’ में ही पड़े थे। इसके अलावा, उन्होंने रेडियो-टेलीविजन की पत्रकारिता भी प्रमुखता से की। वे एक तरह से पत्रकारिता के सभी माध्यमों के माहिर विशेषज्ञ थे। टी.वी. के आरम्भिक धारावाहिक-लेखक तो थे ही। ‘मास मीडिया और समाज’ पुस्तक एक ऐसे ही माहिर विशेषज्ञ की डायरी की तरह है। समय-समय पर उन्होंने इन माध्यमों को लेकर जो टिप्पणियाँ कीं, उसके भूत-भविश्य को लेकर जो टीपें दीं, उसके कार्यकलापों पर जो टिप्पणियाँ कीं, पुस्तक में उनको संकलित किया गया है। माध्यम-माध्यम उनकी दृष्टि उस माध्यम में हिन्दी की स्थिति पर रहती थी। पुस्तक में ऐसे लेख हैं जिनसे माध्यमों की हिन्दी पत्रकारिता की स्थिति का पता चलता है। एक लेख हिन्दी समाज में मास मीडिया के महत्त्व-अमहत्त्व को लेकर है। हर लिहाज से, पुस्तक अध्येताओं, शोधकर्ताओं, मीडिया विशेषज्ञों के लिए समान महत्त्व की है। मनोहर श्याम जोशी के अनुभव और सूझ का सुन्दर संयोग इस पुस्तक में बन पड़ा है। -प्रभात रंजन


लेखक के संदर्भ में -

 
मनोहर श्याम जोशी
 मनोहर श्याम जोशी 9 अगस्त, 1933 को अजमेर में जन्मे, लखनऊ विश्वविद्यालय के विज्ञान स्नातक मनोहर श्याम जोशी ‘कल के वैज्ञानिक’ की उपाधि पाने के बावजूद रोजी-रोटी की खातिर छात्रा जीवन से ही लेखक और पत्राकार बन गये। अमृतलाल नागर और अज्ञेय इन दो आचार्यों का आषीर्वाद उन्हें प्राप्त हुआ। स्कूल मास्टरी, क्लर्की और बेरोजगारी के अनुभव बटोरने के बाद अपने 21वें वर्श से वह पूरी तरह मसिजीवी बन गये। प्रेस, रेडियो, टी.वी., वष्त्तचित्रा, फिल्म, विज्ञापन-सम्प्रेशण का ऐसा कोई माध्यम नहीं जिसके लिए उन्होंने सफलतापूर्वक लेखन-कार्य न किया हो। खेल-कूद से लेकर दर्शनशास्त्र तक ऐसा कोई विशय नहीं जिस पर उन्होंने कलम न उठाई हो। आलसीपन और आत्मसंशय उन्हें रचनाएँ पूरी कर डालने और छपवाने से हमेशा रोकता चला आया है। पहली कहानी तब छपी थी जब वह अठारह वर्श के थे लेकिन पहली बड़ी साहित्यिक कृति प्रकाशित करवाई जब सैंतालीस वर्श के होने आये। केन्द्रीय सूचना सेवा और टाइम्स ऑफ इंडिया समूह से होते हुए सन् 1967 में हिन्दुस्तान टाइम्स प्रकाशन में साप्ताहिक हिन्दुस्तान के सम्पादक बने और वहीं एक अंग्रेजी साप्ताहिक का भी सम्पादन किया। टेलीविजन धारावाहिक ‘हम लोग’ लिखने के लिए सन् 1984 में सम्पादक की कुर्सी छोड़ दी और तब से स्वतन्त्रा लेखन करते रहे । निधन: 30 मार्च 2006।

Friday, 17 April 2015

प्रत्येक दिन एक नयी किताब : अदिति माहेश्वरी-गोयल

प्रत्येक दिन एक नयी किताब
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प्रिंट वीक 
पत्रिका में वाणी प्रकाशन की

अदिति माहेश्वरी-गोयल 
(निदेशक, कॉपीराइट व अनुवाद विभाग)

से हुआ पुस्तक प्रकाशन की दुनिया पर आधारित एक लम्बा और दिलचस्प साक्षात्कार आप सभी के समक्ष प्रस्तुत है। 

साभार – प्रिंट वीक पत्रिका, 10 अप्रैल 2015 
साभार –  दिब्याज्योति शर्मा तथा  राहुल कुमार  




Thursday, 16 April 2015

पुस्तक लोकार्पण : 'साहस और संकल्प : एक आत्मकथा'

आत्मकथा लेखन कठिन कार्य : जनरल वी. के. सिंह 
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वाणी प्रकाशन से प्रकाशित विदेश राज्यमंत्री एवं पूर्व सेना प्रमुख 
जनरल वी. के. सिंह
 की आत्मकथा 
‘साहस और संकल्प : एक आत्मकथा’
 का 14 अप्रैल 2015 को रायपुर के घसीदास संग्रहालय के सभागार में लोकार्पण समारोह सम्पन्न हुआ।

कार्यक्रम में प्रसिद्ध फिल्म कलाकार चन्द्र प्रकाश द्विवेदी, वाणी प्रकाशन के प्रबन्ध निदेशक अरुण माहेश्वरी, वरिष्ठ साहित्यकार विनोद कुमार शुक्ल, श्री विनोद कुमार, लेखक जनरल वी. के. सिंह व श्री अजित राय का सान्निध्य रहा।

कार्यक्रम की सूचना रायपुर के नई दुनिया, आज की जनधारा, हरिभूमि आदि समाचार पत्रों में प्रसारित की गयी है।

साभार : नई दुनिया, समाचार पत्र, 15 अप्रैल 2015
साभार : आज की जनधारा, समाचार पत्र, 15 अप्रैल 2015
साभार : हरिभूमि, समाचार पत्र, 15 अप्रैल 2015 









Tuesday, 14 April 2015

श्री ओम थानवी को वर्ष 2014 का बिहारी पुरस्कार

प्रसिद्द लेखक व वरिष्ठ पत्रकार 

श्री ओम थानवी 

को के. के. बिरला फाउंडेशन के 24वें 

'बिहारी पुरस्कार' 2014 

 से सम्मानित करने की घोषणा की गयी है। 

थानवी जी को यह पुरस्कार वाणी प्रकाशन से प्रकाशित उनके यात्रा-वृत्तांत

'मुअनजोदड़ो' 

के लिए प्रदान किया जायेगा। 

थानवी जी को इस पुरस्कार के लिए वाणी प्रकाशन परिवार की ओर हार्दिक बधाई। 

फोटो साभार - भरत तिवारी



'मुअनजोदड़ो' पुस्तक से कुछ कला कृतियाँ -




'मुअनजोदड़ो' पुस्तक के सन्दर्भ में -

सिन्धु घाटी सभ्यता के आख्यान में मोहनजोदड़ो-हड़प्पा हम सभी ने सुना है। यह 'मुअनजोदड़ो' क्या चीज है ? वहाँ के लोग मुअनजोदड़ो बोलते हैं, मुअनजोदड़ो मुआ यानी मृत और बहुवचन में मुअन मुआ का सिन्धी प्रयोग है। दड़ा यानी टीला/ मुअन-जो-दड़ो का आशय मुर्दों का टीला। 'मुअनजोदड़ो'बाद का नाम है। भारत-पाक का बंटवारा क़ुदरती नहीं, बनावटी है और सिन्धु घाटी सभ्यता दोनों की साझा सभ्यता-संस्कृति है।

"यात्राएँ जैसी भी हों, उनका अर्थ नहीं बदलता। इसलिए कि हर यात्रा में एक अर्थ निहित है, जो उसका स्थायी भाव है। कि किनारे नहीं जाना है। सूरते-हाल जो भी हो। वैसे भी पहुँचना कभी मक़सद नहीं हो सकता।  न यात्राओं का । न ज़िन्दगी का । यात्राएँ तो होती ही हैं पहुँची हुई। अपने हर क़दम पर उसी में सब हासिल-जमा। बशर्ते नज़र ठीक हो और नजरिया भी । ओम थानवी के पास दोनों की कमी नहीं है। बल्कि इफ़रात है। नतीजतन, यात्रा के अलावा पढ़ाकू फ़ुरसतों के साथ उन्होंने 'मुअनजोदड़ो'में अपने रंग भर दिए हैं।उनका यह नज़रिया ही किताब का असली हासिल है।  

किसी देश या शहर के ऊपर से उड़ान भरते हुए उसके बारे में सब कुछ जान लेने वाले यात्रा वृत्तांतों से अलग, 'मुअनजोदड़ो'में नए क़रीने से चीजें देखने का सलीका है। गहराइयों में उतरता। टीलों की ऊँचाइयों तक ले जाता। वह आप पर कुछ लादता-थोपता नहीं। साथ चलता रहता है। बहैसियत एक ईमानदार दोस्त। 'मुअनजोदड़ो'की एक और ख़ास बात: वह यात्रा को रैखिक नहीं रहने देता।  बल्कि कई बार अहसास दिलाता है कि आप किसी बहुमंजिला इमारत की लिफ्ट में हैं और हर मंज़िल एक कथा है। हमारे पूर्वजों की अनवरत कथा, जो जारी है अनन्तिम है।

लेखक श्री ओम थानवी के सन्दर्भ में -

ओम थानवी साहित्य, कला, सिनेमा, रंगमंच, पुरातत्त्व और पर्यावरण में गहरी रुचि रखते हैं। देश-विदेश में भ्रमण कर चुके हैं। बहुचर्चित यात्रा-वृत्तान्त मुअनजोडड़ो के लेखक हैं। अपने अपने अज्ञेय पुस्तक का मूलत: उद्देश्य सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' को श्रदांजलि अर्पित करना है। अज्ञेय के साथ ओम थानवी के पारिवारिक सम्बन्ध भी रहे हैं, थानवी जी अज्ञेय से मिलते रहते थे। एक लगाव से वह अज्ञेय को कितना समझ पाए और अज्ञेय के बारे में कितना संकलन कर पाए। इन्होंने इसका सही रूप 'अपने अपने अज्ञेय' पुस्तक के माध्यम से प्रस्तुत किया है।


'मुअनजोदड़ो' पुस्तक फ्लिपकार्ट, इंफीबीम और वाणी प्रकाशन की वेबसाइट पर उपलब्ध है-
अपनी प्रति आज ही आर्डर करें





प्रसिद्द लेखक व वरिष्ठ पत्रकार श्री ओम थानवी को के. के. बिरला फाउंडेशन के 24वें 'बिहारी पुरस्कार' से सम्मानित करने के सूचना निम्नलिखित वेबसाइट पर प्रसारित की गयी है -

शब्दांकन डॉट कॉम (साभार - भरत तिवारी)   

वेबदुनिया डॉट कॉम
Business Standard

Tuesday, 7 April 2015

दैनिक जागरण (झंकार) : अंदाज़ शायराना मिजाज़ फ़कीराना


दैनिक जागरण (झंकार) : 
अंदाज़ शायराना मिजाज़ फ़कीराना 
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रेडियो पर किस्सागोई को नयी पहचान देने वाले भारत के चहेते किस्सागो 
नीलेश मिसरा
 से हुआ एक दिलचस्प 
साक्षात्कार 
सभी प्रशंसकों व पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है।

साभार : स्मिता सिंह
साभार : दैनिक जागरण, समाचार पत्र, 5 अप्रैल 2015

नाइन बुक्स द्वारा प्रकाशित व नीलेश मिसरा द्वारा सम्पादित इश्क़ की कहानियों का संकलन 
‘बस, इतनी सी थी ये कहानी...’ 



हरिभूमि : काव्यात्मक कोलाज 'रक्तचाप और अन्य कविताएँ'

हरिभूमि : काव्यात्मक कोलाज 'रक्तचाप और अन्य कविताएँ'
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वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित 
श्री पंकज चतुर्वेदी 
के नवीन काव्य-संग्रह 
'रक्तचाप और अन्य कविताएँ' 
की समीक्षा हरिभूमि समाचार पत्र में प्रकाशित की गयी है।

साभार : हरिभूमि समाचार पत्र, 5 अप्रैल 2015, पृष्ठ सं. 2

‘रक्तचाप और अन्य कविताएँ’ पुस्तक वाणी प्रकाशन की वेबसाइट पर उपलब्ध -




Monday, 6 April 2015

जनसत्ता : स्त्री विमर्श का नया कोण 'कितने कठघरे'


जनसत्ता : स्त्री विमर्श का नया कोण 'कितने कठघरे'
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वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित चर्चित लेखिका 
सुश्री रजनी गुप्त
 के नवीन उपन्यास
'कितने कठघरे'
 की वरिष्ठ पत्रकार 
अनंत विजय 
द्वारा की गयी समीक्षा जनसत्ता में प्रकाशित की गयी है।

साभार : श्री अनंत विजय (समीक्षक) 
साभार : जनसत्ता समाचार पत्र, 5 अप्रैल 2015, पृष्ठ सं. 6


Saturday, 4 April 2015

माखनलाल चतुर्वेदी को सादर नमन / Tribute to Makhanlal Chaturvedi

भारत के लब्धप्रतिष्ठित साहित्यकार 
  श्री माखनलाल चतुर्वेदी  
 के 126 वें जन्मदिन पर वाणी प्रकाशन परिवार की ओर सादर नमन!


‘अन्तरंगता की भीतरी परतें’ की समीक्षा / Review of 'Antrangta Ki Bheetari Parten'

वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित लेखिका 
डॉ. जसविन्दर कौर बिन्द्रा 
द्वारा संकलित व अनुवादित पंजाबी कहानियों के संग्रह 
‘अन्तरंगता की भीतरी परतें’ 
परतें की समीक्षा व अंश 
नवां ज़माना 
पंजाबी समाचार पत्र में प्रकाशित की गयी है।


साभार : नवां ज़माना, समाचार पत्र ( 15 मार्च 2015)
साभार : बलबीर परवाना (समीक्षक)

साभार : नवां ज़माना, समाचार पत्र (29 मार्च 2015)



Wednesday, 1 April 2015

जनसत्ता : इतिहास में वर्तमान की पैठ

इतिहास में वर्तमान की पैठ 
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वाणी प्रकाशन से प्रकाशित प्रसिद्द लेखक 

राजेन्द्र मोहन भटनागर 

के चन्द्रगुप्त मौर्य-चाणक्य पर आधारित ऐतिहासिक उपन्यास

'मौर्य सम्राट'

 की समीक्षा जनसत्ता में प्रसारित की गयी है।

साभार : श्री सर्वदमन मिश्र (समीक्षक) 
साभार : जनसत्ता, समाचार पत्र (15 मार्च 2015)


पुस्तक के सन्दर्भ में अधिक जानकारी पाने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें -