Saturday, 21 June 2014

सफ़ेद जंगली कबूतर


Book - SAFED JANGALI KABOOTAR
Author - MUNAWWAR RANA
Publisher - VANI PRAKASHAN

Total Pages : 134
ISBN :978-93-5072-544-3(HB)
ISBN : 978-93-5072-545-0(PB)
Price :  Rs. 300/- (HB)/  Rs. 175/- (PB)
Size (Inches) : 5.50x8.50
First Edition : 2013
Category  : Memoirs


पुस्तक के संदर्भ में - 
ज़िन्दगी को शायरी बनाना बहुत मुश्किल होता है, बिल्कुल जैसे टूटे हुए मिट्टी के खिलौनों को जोड़ना। ऐसे हालात में घबराये और परेशान हुए बग़ैर जो काम कुम्हार करता है वही शायर को भी करना चाहिए। मिर्ज़ा ग़ालिब जब ग़ज़ल के संगरेज़ों (पत्थरों) को चुनते-चुनते लहूलुहान हो जाते थे और झुँझलाते हुए यहाँ तक कह देते थे कि - 'कुछ और चाहिए वुसअत (फैलाव) मेरे बयां के लिए' लेकिन फिर एक कमज़ोर और थके हुए कुम्हार की तरह शब्दों की मिट्टी को दोबारा गूँधकर एक नयी शक्ल देते हुए दोस्तों को ख़त लिखने लगते थे लेकिन वह ख़त कहाँ थे ग़ालिब के! ग़ालिब को ख़त लिखने की फ़ुर्सत कहाँ थी! वह तो अपने लहज़े की तलवार को और धारदार बनाने के लिए शब्दों को अपने ही दुख-दर्द के पत्थर पर घिसने लगते थे। दिन, ज़माने और मौसम की तब्दीलियों का असर सबसे ज़्यादा शायरी और उसके बाद लेखन पर आता है। मुनव्वर राना भी अपने आपको इस कैफ़ियत से नहीं बचा सके। उन्होंने बहुत सी नयी तस्वीरों में पुराना रंग और पुरानी शराब में नये महुए की शराब मिलाने की कोशिश की है। उम्मीद है कि उनकी यह कोशिश बेकार नहीं जाएगी। मुनव्वर राना को पढ़ने वाले और उनसे मोहब्बत करने वाले उनकी इस कला की दाद ज़रूर देंगे।

लेखक के संदर्भ में - 
मुनव्वर राना का जन्म 26 नवम्बर, 1952 को रायबरेली, उत्तर प्रदेश में हुआ था। सैयद मुनव्वर अली राना यूँ तो बी. कॉम. तक ही पढ़ पाये किन्तु ज़िन्दगी के हालात ने उन्हें ज्यादा पढ़ाया भी उन्होंने खूब पढ़ा भी। माँ, ग़ज़ल गाँव, पीपल छाँव, मोर पाँव, सब उसके लिए, बदन सराय, घर अकेला हो गया, मुहाजिरनामा, सुखन सराय, शहदाबा, सफ़ेद जंगली कबूतर, फुन्नक ताल, बग़ैर नक़्शे का मकान, ढलान से उतरते हुए और मुनव्वर राना की सौ ग़ज़लें हिन्दी व उर्दू में प्रकाशित हुईं। कई किताबों का बांग्ला व अन्य भाषाओं में अनुवाद भी हुआ।