Tuesday, 17 June 2014

तीन सौ तीस कहावती कहानियाँ


BOOK - TEEN SAU TEES KAHAVATI KAHANIYAN

AUTHOR - VIJAYDAAN DETHA

Publisher : Vani Prakashan

Total Pages : 472
ISBN : 978-93-5000-903-1(HB)
Price :  Rs. 595
Size (Inches) : 5.50x8.50
First Edition : 2014
Category  : Collection of Proverbs Stories



पुस्तक के सन्दर्भ में -
सेठां! थांरी छुरी हेटै पड़गीके डोफा आ तौ कलम है के म्हारै गळै तौ आ इज फिरी। सेठजी! आपकी छुरी नीचे गिर गयी कि बेवकूफ यह तो कलम है कि मेरे गले पर तो यही फिरी थी। इसकी सन्दर्भ-कथा छोटी होते हुए भी बहुत मार्मिक है। एक बनिया बगल में बही दबाये और कान में कलम खोंसे हुए अपनी हाट पर जा रहा था। पीली पगड़ी। नीची मूँछें। एक भुक्त-भोगी असामी उसके पीछे नंगे पाँव चल रहा था। फटी धोती और चिंदी-चिंदी मैले-कुचैले साफे के अलावा उसके शरीर पर कुछ भी बेकार कपड़ा नहीं था। सिर और अंग की लाज ढकना जरूरी था। अचानक किसी चीज के गिरने की हलकी-सी भनक उसके कानों में पड़ी। उसने अपनी नैतिक जिम्मेदारी का निबाह करते हुए सेठजी को आवाज देकर कहा, ‘सेठजी! आपकी छुरी नीचे गिर गयी।’ सेठ ने चौंककर पीछे देखा। आश्चर्य से दोहराया, ‘छुरीकैसी छुरीमुझे छुरी से क्या वास्ता?’

तब निरीह असामी ने सहज भाव से इशारा करते हुए कहा, ‘यह पड़ी है?’ अब कहीं सेठ को उस गँवार की बेवकूफी नजर आयी। व्यंग्य में मुस्कराते कहा, ‘मूर्ख कहीं कायह तो मेरी कलम हैकलम!
मूर्ख असामी ने रुँधे गले से कहा, ‘लेकिन मेरे गले पर तो यही चली थी।’ सेठ ने कुछ भी जवाब नहीं देकर चुपचाप अपनी कलम उठाईकान में खोंसी और खँखारकर अपनी राह पकड़ी। जाने कितनी अर्थच्छटाएँ इस कहावत में सन्निहित हैं। श्रेष्ठ वस्तु भी यदि बुरे काम में आये तो वह बुरी ही है। बोहरे की कलम भी किसी आततायी की तलवार से कम नहीं होती। शोषण करने के अपने-अपने हथियार होते हैं और अपने-अपने तरीके। और हर तरीके की अपनी-अपनी हिंस्त्र-बर्बरता होती है।

एक बार दो मित्र चाँदनी रात में नदी के किनारे घूम रहे थे। एक मित्र को अचानक पानी के बहाव में काला-स्याह एक कम्बल तैरता नजर आया तो वह धीरज नहीं रख सका। लालची भी कुछ जरूरत से ज्यादा था। कपड़ों सहित नदी में छलाँग मारी और कम्बल को बायें हाथ से पकड़ लिया। पर आश्चर्य कि दूसरे ही क्षण कम्बल उसे अपनी ओर खींचने लगा तो वह जोर-जोर से चिल्लायारीछ...रीछ...रीछ। मित्र ने किनारे पर खड़े-खड़े ही सलाह दी - छोड़ दे...छोड़ दे। तब मित्र ने हताश होकर कहा, ‘म्हैं तौ छोडूँ पण कांबळ नीं छोड़ै।’ वह तो छोड़ने को तैयार थालेकिन कम्बल उसे नहीं छोड़ रहा था। लालच में फँसने के बाद छुटकारा पाना आसान नहीं है। अपनी विकास यात्रा के दौरान मनुष्य ने ज्ञान-विज्ञानधर्मदर्शन,सम्प्रदाय और जाति-रिश्तों को आवश्यकतानुसार ईजाद कियापर एक बार अस्तित्व में आने के बाद मनुष्य की तमाम सृष्टि ने कम्बल की नाईं उसे ही जकड़ लिया। वह छोड़ना चाहे तब भी कम्बल उसे नहीं छोड़ेगाउसे नोच-नोचकर निगल जाएगा। मनुष्य अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए कोई भी पेशा चुनता हैकिन्तु कुछ समय बीतने के बाद वह पेशा ही उसे अपने नागपाश में आबद्ध कर लेता है।

आधुनिक सभ्यता के नाम पर मनुष्य ने क्या-क्या करतब नहीं रचे! पर साथ-ही-साथ उसने विध्वंसक हथियारों की होड़ में भी कोई कसर नहीं रखी। मनुष्य ही समूचे विकास का नियंता है और वही समूचे विनाश का एकमात्रा कारण बनेगा। म्हे ई खेल्या अर म्हे ई ढाया। हम ही खेले और हमने ही बिखेरे। हमने ही घरौंदे बनाये और हमने ही ढहाये। यह कहावत समष्टि के लिए भी उपयुक्त है और व्यष्टि के लिए भी कि मनुष्य बचपन और युवा अवस्था में कई नये-नये खेल खेलता है और उन्हें भूलता रहता है।



लेखक के सन्दर्भ में - 
विजयदान देथाजिन्हें उनके मित्र प्यार से बिज्जी कहते हैंराजस्थानी के प्रमुख लेखक हैं। वे हिन्दी में भी लिखते रहे हैं। देथा ने आठ सौ से अधिक कहानियाँ लिखी हैंजिनमें से अनेक का अनुवाद हिन्दीअंग्रेजी तथा अन्य भाषाओं में हो चुका है। राजस्थान की लोक कथाओं और कहावतों के संग्रह एवं पुनर्लेखन के क्षेत्रा में विजयदान देथा का योगदान विश्व स्तर पर समादृत है। उनकी कहानियों पर आधारित तीन हिन्दी फिल्में -  दुविधापहेली और परिणीता -  बन चुकी हैं और चरनदास चोर सहित अनेक नाटक लिखे और मंचित हो चुके हैं। साहित्य अकादेमी तथा अन्य अनेक पुरस्कारों से सम्मानित।

कुछ प्रमुख कृतियाँ: बातारी फुलवारी (13 खण्ड)रूँखदुविधा और अन्य कहानियाँउलझनसपनप्रिया,अन्तराल तथा राजस्थानी-हिन्दी कहावत कोश। राजस्थानी लोक गीत (भाग) का संकलन-सम्पादन।