Friday, 10 January 2014

'प्रार्थना के बाहर और अन्य कहानियाँ' की समीक्षा

 वाणी प्रकाशन से प्रकाशित वरिष्ठ पत्रकार व चर्चित स्त्रीवादी लेखिका गीताश्री के कहानी-संग्रह 'प्रार्थना के बाहर और अन्य कहानियाँ' की समीक्षा प्रथम प्रवक्ता (मासिक पत्रिका) के दिसम्बर 2013 के अंक में प्रकाशित।  




समीक्षा-प्रार्थना के बाहर और अन्य कहानियां

समीक्षक-प्रज्ञा पांडेय

दिनाँक - 12 मई 2014 

वे एक ओर लहरें तो दूसरी ओर चट्टान सी

महीन रेशों से बुंनी हुई  गीताश्री की कहानियां सतरंगी हैं। प्रार्थना के बाहर एवं अन्य कहानियां संभवतः लेखिका का पहला कहानी संग्रह है जिसमें १३ कहानियां हैं। हर कहानी हर रंग की है।  इनकी कहानियो की कई विशेषतायें हैँ। इनकी कहानियों के अपने वातावरण मे उनके ही  गढ़े हुए शब्द हैँ , उनके अपने  अर्थ  है,  और  उनके रंग हैं. कहानियों की देह  है और उनपर ज़िंदगी के निशान हैं.  दर्दों मे सने  उनके सुन्दर स्वरुप  हैँ। गीताश्री की कहानियाँ  यथार्थ की कहानियां होकर भी स्वप्न की लगती हैं या कल्पना  की या  रँगों की, कहना मुश्किल है।

इनकी कहानियों में जबर्दस्त किस्सागोई है। जैसे बुनकर कपडे बुनता है ठीक उसी तरह गीताश्री  कहानी बुनती हैं।पूरी लगन से, ध्यान से, भावना से और समर्पण  से।रंगीन, रेशमी  धागों से फूल पत्ती काढती हैं उनपर।  लहरों के बीच डुबाकर देख परख लेती हैं कहीं कोइ रंग कच्चा तो नही तब रचनाकार बनकर उन्हें कोरें सफ़ेद कागजो पर  स्याही मे उतारती हैं  .कहानियों के  कैसे कैसे नाम धरती हैं सोनमछरी , लबरी, बह गयी बैगिन ,दो लब्जो की एक कहानी , ताप ,एक रात जिंदगी   दो बर्ड , चौपाल , रुकी हुई पृथ्वी और इसी तरह के कई नाम।

इनकी कहानियों  के केन्द्र मे स्त्री है, निःसंदेह वह पारम्परिक भी  है परन्तु  केवल भेष-भूषा और लोक व्यवहार मे दिखायी देती है! किसी भी नतीजे तक  आते आते उसके  भीतर की  आदिम स्त्री  जीवित हो उठती है इनकी किस्सागोई  की नोक छुआते ही अपने दुख दर्द लिये उठ कर खड़ी हो  जाती है। लेखिका  ज़िंदगी की  तलाश मे तलछट मे जीती हुई स्त्री को उसके स्त्रीपन के भीतर ही निखारती हैं। उनकी  स्त्रियों में उद्दाम आवेग है जो  कभी हाशिये के अँजाम तक नहीं जाता है बल्कि हाशिये से किसी न किसी रूप मे वापस जीवन की ओर लौटता है। इनकी  स्त्रियां जब खुलती हैं तो परम्परा के आवरण  से निकलकर वेगवती नदी की तेज़ धारा  सी बहती  हैँ और चारों ओर रोशनी और हवा के वृत्त  रचतीं हैं।  दुखों  की श्रृंखलाओं से हज़ारों रास्ते फूटते हैं। गीताश्री  की कहानियां में आशावादिता  समय की तटस्थता को तोड़ती है। एक निरंतर संघर्ष , और उस सँघर्ष का उजाला   इन की  कहानियॉं  मे बल-बल जलता है  बहुत सी आंधियां के बीच जैसे दिया हो।    

बह गयी बैगिन वर्तमान में प्रशासन और मीडिआ की वास्तविकता पर चोट  करती हुई  कहानी है। नदी पर बाँध, प्रशांसन और मीडिया पर केंद्रित कहानी नीरस हो सकती  थी लेकिन  लेखिका की  कहने  की कला ने इसमेँ प्राण भर दिये हैं तभी  तो  'सांवरी  मिट्टी से सनी हुई मांसल स्त्रीं " सुगा गाती है 'तू उगती जुघईयां रात राजा कैसे आये " और धुर्वे  सुनता है।यह कहानी सरकार पर  एक गहरा कटाक्ष है।

लबरी एक प्रेम  कहानी है  जो खिलंदड़ी अँदाज मे लिखी जाने के बावज़ूद प्रेम के अदेखे दंशों से बींधी हुईं लगती है।  तभी तो भोला- भाला  चुन्नू लबरा और तेज़ प्रतिभाशाली माला लबरी  बन जाते  हैँ।'  इस कहानी में गांव की मिट्टी की गंध है.' दस साल के लबरा लबारी भागे जा रहे हैँ गाछी की ओर लबरी  को टिकौला खाना है लबरा उसके लिये निमक और बिलेड का आधा टुकङा जेबी मे खोंसे हुए भागा जा रहा है।कहानी में कनिया चाची हैँ और है तेतरी। गांव से लाकर कहानियों मे ज्यौं के त्यों रख दिये गये  ये किरदार खालिस  गवयीं अँदाज में बतियाते हैँ.कहानी गॉंव की  धूसर धूल  में लिपट जाती है।  जैसे गांव की आन्ही-पानी की धूल-धक्कड़ मे पूरे गॉंव की महक समायी होती है वैसे ही लबरी कहानी  मे पूरा पूरा गांव समाया है। 

रुकी हुई पृथ्वी दाम्पत्य जीवन पर  छोटी सी  पर मर्मस्पर्शी कहानी है। एक रात ज़िंदगी की शाइस्ता। ऊफ अपने ही दर्दों से नाबस्ता जानबुझकर स्त्री कहीं अपने छोटे आज के सुख के लिये लिये खुश होने  भ्रम  नहीं पलती। कहानी स्त्री जीवन के गंभीर विमर्श की  कहानी कहती है।  वेदनाओं की सरगोशियों में शाइस्ता का खो जाना जानते हुए भी न जानकार खुद को हार जाना है और तब दो स्त्रियों का  रुदन जिसका शोर समुद्र से आती हुई हवाओं के शोर से  भी अधिक हाहाकारी है। गीताश्री की यह  कहानी स्त्री को सचेत करती हुई कहानी है। गंगा किनारे बसे धुलियाँन गाँव  कुछ झोपड़ों मे निचाट गरीबी मे भी  गुनगुनाती जिन्दगी  की कहानी सोनमछरी  की रुम्पा शंकर के  प्रेम मे है डूबती है भाग्य से पराजित होती है दुबारा जीवन को ज़ोड़  कर फिर खड़ी होती है। वह  दोराहे पर खड़ी होकर   निर्णायक फ़ैसला  लेती है।अद्भुत है इस कहानी की  भाषा  और उसका लोकगीतीय प्रवाह।   
  
मर्दों की दुनिया की कहानी है फ्री बर्ड। "जीने और उड़ने की चाहत से भरपूर स्त्री। …। कुछ -कुछ बनारसी सिल्क  सी महीन "। छोटी सी कहानी बड़ी बात कह जाती है।"मूंछ  और दाढ़ी ने असली चेहरा छुपा रखा है। इनके पीछे पता कैसी शक्ल होगी और भी तमाम तरह के ………। "स्त्री फ्री बर्ड है कहाँ  ! दो पन्ने वाली औरत  की असावरी  हों या रंजना ,चोपाल की शिवांगी या  ताप कहानी की शालू और   माँ"   प्रार्थना के बाहर की प्रार्थना या  गोरिल्ला प्यार की अर्पिता। स्त्री के अनंत रूप गीताश्री की कहनियों मे डंके की चोट पर अपनी बात  कहते सुनायी देती हैं गीताश्री की कहानियों  की स्त्रियां  बहुत बातूनी है वे चुप नही रहतीं।  वे आदिम हैं.वे एक ओर लहरें हैं तो दूसरी ओर चट्टान सी हैं ।उनसे पार पाना आसान नहीं है न ही उन्हेँ भूल पाना।





 समीक्षा - प्रार्थना के बाहर और अन्य कहानियाँ 
समीक्षक - कलावंती, आवास स0 टी 32 बी , नॉर्थ रेल्वे कॉलोनी , रांची 834001, झारखंड. मो 9771484961.
दिनाँक - 27 अगस्त 2014 







वाणी प्रकाशन से प्रकाशित प्रसिद्ध लेखिका गीताश्री का स्त्री-विमर्श पर आधारित कहानी संग्रह 
'प्रार्थना के बाहर और अन्य कहानियाँ' 
फेमिना पत्रिका के बुक क्लब में चयनित। 
फेमिना पत्रिका के सितम्बर 2014 के अंक में प्रकाशित खबर पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है। 


'सेप्पुकु' की समीक्षा


जयपुर डेली न्यूज़ पत्रिका में वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित प्रसिद्ध पत्रकार, कला समीक्षक व कहानीकार विनोद भारद्वाज के नये उपन्यास 'सेप्पुकु' की समीक्षा।  



 हिन्दुस्तान अख़बार (8 दिसम्बर 2013) के अंक में वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित प्रसिद्ध पत्रकार, कला समीक्षक व कहानीकार विनोद भारद्वाज के नये उपन्यास 'सेप्पुकु' की समीक्षा।  


शुक्रवार पत्रिका (8 दिसम्बर 2013) अंक में वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित प्रसिद्ध पत्रकार, कला समीक्षक व कहानीकार विनोद भारद्वाज के नये उपन्यास 'सेप्पुकु'  की समीक्षा।  



साहित्य जगत के सुप्रसिद्ध कवि, कथाकार, पत्रकार और फिल्मकार उदय प्रकाश कला समीक्षक विनोद भारद्वाज के नये उपन्यास 'सेप्पुकु' पर "साल 2013 की हिन्दी किताबें, कथाकारों की पसंद" में अपने विचार प्रकट करते हुये: