Wednesday, 10 September 2014

Sachcha Jhooth / सच्चा झूठ : Review / समीक्षा



Book - Sachcha Jhooth

Author - Vinod Bhardwaj

Publisher : Vani Prakashan

Total Pages : 110 
ISBN : 978-93-5072-776-8(HB)
Price :  Rs. 250/-
Size (Inches) : 5.75x8.75
First Edition : 2014
Category  : Novel  

पुस्तक के संदर्भ में - 

विनोद भारद्वाज ने भारतीय आधुनिक कला की दुनिया के ग्लैमर और अँधेरे को लेकर अपना पहला हिन्दी उपन्यास ‘सेप्पुकु’ (वाणी प्रकाशन) लिखा, तो हिन्दी की दुनिया में उसकी पर्याप्त चर्चा हुई। अब उसका अँग्रेजी अनुवाद भी छप रहा है। विनोद भारद्वाज का नया उपन्यास ‘सच्चा झूठ’ पाठक को हिन्दी पत्रकारिता की विचित्र दुनिया में ले जाता है। सत्तर के दशक के प्रारम्भ में हिन्दी के  श्रेष्ठ साहित्यकार पत्रकारिता में सक्रिय हुए, तो छोटे शहरों से असंख्य युवा लेखक मुम्बई और दिल्ली सरीखे महानगरों में पत्रकारिता में कुछ सार्थक करने के  इरादे से आ गये। धीरे-धीरे जब बड़े संस्थानों ने सम्पादकों से अधिक ब्रांड मैनेजरों की बात सुननी शुरू कर दी, तो पत्रकारिता की दुनिया में महत्त्वपूर्ण बदलाव आये। साहित्यकारों का मोहभंग होना शुरू हुआ। रंगीन टेलीविजन ने भी पत्रकारिता को नष्ट-भ्रष्ट किया। ‘सच्चा झूठ’ का नायक सुधीर ऐसा ही एक प्रतिभाशाली युवा लेखक है जो फाफामऊ में जन्मा, लखनऊ में पला-बढ़ा और मुम्बई और दिल्ली की आधुनिक दुनिया में पत्रकारिता और लेखन के बड़े सपने लेकर आया। बचपन में हुए पुरुष बलात्कार की त्रासद स्मृतियों से जूझ रहा सुधीर जीवन भर स्त्रियों से भी जटिल सम्बन्धों के एक विचित्र सच्चे झूठ की भूलभुलैया में फँसा रहा। यह उपन्यास दो स्तरों पर कहानी को आगे बढ़ाता है-एक ओर पत्रकारिता की निरन्तर बदलती दुनिया है और दूसरी ओर स्त्रियों से जटिल सम्बन्धों की दुनिया है। वास्तविक घटनाओं और स्थितियों से दूर जाकर पन्द्रह सालों की चुप्पी के बाद सुधीर आत्मस्वीकृति के अँधेरे और रोशनी में अपने जीवन की एक बेरहम जाँच शुरू करता है। ‘सेप्पुक’ की शैली में ही लिखा गया उपन्यास ‘सच्चा झूठ’ हिन्दी पत्रकारिता और स्त्री-पुरुष सम्बन्धों की एक निर्मम और निष्पक्ष जाँच भी है। 

लेखक के संदर्भ में -

विनोद भारद्वाज
जन्म: 1948, लखनऊ
लखनऊ विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान में एम.ए. करने से पहले कविता-कला की चर्चित लघु पत्रिका ‘आरम्भ’ का सम्पादन। 1973 में टाइम्स ऑफ इंडिया के हिन्दी प्रकाशनों से जुड़कर 25 सालों तक धर्मयुग, दिनमान और दैनिक नवभारत टाइम्स में विभिन्न पदों पर काम किया। नवभारत टाइम्स, दिल्ली में फीचर सम्पादक के रूप में कुछ साल काम करने के बाद स्वतन्त्र लेखन। 1981 में कविता के लिए भारतभूषण अग्रवाल स्मृति पुरस्कार और 1982 में श्रेष्ठ सर्जनात्मक लेखन के  लिए संस्कृति पुरस्कार। 1981 में लेनिनग्राद (अब सेंट पीटर्सबर्ग) के  पहले गैर कथाफिल्म अन्तरराष्ट्रीय फिल्म समारोह की ज्यूरी के सदस्य चुने गये। कला और फिल्म पर एक दर्जन से भी अधिक पुस्तकों प्रकाशित जिनमें वृहद् आधुनिक कला कोश, सिनेमा: कल आज कल, कला के सवाल, कला-चित्रकला, प्रकृति और प्रकृतिस्थ, कला का रास्ता, नया सिनेमा आदि शामिल हैं। जलता मकान और होशियारपुर (कविता संग्रह), चितेरी (कहानी संग्रह), सेप्पुकु (उपन्यास) अन्य चर्चित पुस्तकें। कविताओं का अंग्रेजी, जर्मन, रूसी, बंगला, मराठी आदि भाषाओं में अनुवाद। ‘सेप्पुकु’ का अँग्रेजी अनुवाद हार्परकॉलिंस से प्रकाशित हो रहा है। आर्ट क्यूरेटर और कला फिल्मों के निर्देशक के रूप में भी उल्लेखनीय काम।
दिल्ली में रहते हैं। दूरदर्शन के लिए एक सीरियल ‘मछलीघर’ (नायिका: मीता वशिष्ठ) और चेखव की कहानी ‘ग्रीफ’ (नायक: वीरेंद्र सक्सेना) पर टेलीफिल्म भी लिख चुके हैं।

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वाणी प्रकाशन से प्रकाशित चर्चित लेखक व कला समीक्षक श्री विनोद भारद्वाज के उपन्यास 'सच्चा झूठ' की समीक्षा आज तक डॉट इन की वेबसाइट पर प्रसारित। 
पुस्तक की समीक्षा पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है।