Saturday, 21 June 2014

सफ़ेद जंगली कबूतर


Book - SAFED JANGALI KABOOTAR
Author - MUNAWWAR RANA
Publisher - VANI PRAKASHAN

Total Pages : 134
ISBN :978-93-5072-544-3(HB)
ISBN : 978-93-5072-545-0(PB)
Price :  Rs. 300/- (HB)/  Rs. 175/- (PB)
Size (Inches) : 5.50x8.50
First Edition : 2013
Category  : Memoirs


पुस्तक के संदर्भ में - 
ज़िन्दगी को शायरी बनाना बहुत मुश्किल होता है, बिल्कुल जैसे टूटे हुए मिट्टी के खिलौनों को जोड़ना। ऐसे हालात में घबराये और परेशान हुए बग़ैर जो काम कुम्हार करता है वही शायर को भी करना चाहिए। मिर्ज़ा ग़ालिब जब ग़ज़ल के संगरेज़ों (पत्थरों) को चुनते-चुनते लहूलुहान हो जाते थे और झुँझलाते हुए यहाँ तक कह देते थे कि - 'कुछ और चाहिए वुसअत (फैलाव) मेरे बयां के लिए' लेकिन फिर एक कमज़ोर और थके हुए कुम्हार की तरह शब्दों की मिट्टी को दोबारा गूँधकर एक नयी शक्ल देते हुए दोस्तों को ख़त लिखने लगते थे लेकिन वह ख़त कहाँ थे ग़ालिब के! ग़ालिब को ख़त लिखने की फ़ुर्सत कहाँ थी! वह तो अपने लहज़े की तलवार को और धारदार बनाने के लिए शब्दों को अपने ही दुख-दर्द के पत्थर पर घिसने लगते थे। दिन, ज़माने और मौसम की तब्दीलियों का असर सबसे ज़्यादा शायरी और उसके बाद लेखन पर आता है। मुनव्वर राना भी अपने आपको इस कैफ़ियत से नहीं बचा सके। उन्होंने बहुत सी नयी तस्वीरों में पुराना रंग और पुरानी शराब में नये महुए की शराब मिलाने की कोशिश की है। उम्मीद है कि उनकी यह कोशिश बेकार नहीं जाएगी। मुनव्वर राना को पढ़ने वाले और उनसे मोहब्बत करने वाले उनकी इस कला की दाद ज़रूर देंगे।

लेखक के संदर्भ में - 
मुनव्वर राना का जन्म 26 नवम्बर, 1952 को रायबरेली, उत्तर प्रदेश में हुआ था। सैयद मुनव्वर अली राना यूँ तो बी. कॉम. तक ही पढ़ पाये किन्तु ज़िन्दगी के हालात ने उन्हें ज्यादा पढ़ाया भी उन्होंने खूब पढ़ा भी। माँ, ग़ज़ल गाँव, पीपल छाँव, मोर पाँव, सब उसके लिए, बदन सराय, घर अकेला हो गया, मुहाजिरनामा, सुखन सराय, शहदाबा, सफ़ेद जंगली कबूतर, फुन्नक ताल, बग़ैर नक़्शे का मकान, ढलान से उतरते हुए और मुनव्वर राना की सौ ग़ज़लें हिन्दी व उर्दू में प्रकाशित हुईं। कई किताबों का बांग्ला व अन्य भाषाओं में अनुवाद भी हुआ।

Friday, 20 June 2014

फुन्नक ताल


Book - BAGHAIR NAQSHE KA MAKAN
Author - MUNAWWAR RANA
Publisher - VANI PRAKASHAN

Total Pages : 128
ISBN :978-93-5072-546-7(HB)
ISBN : 978-93-5072-547-4(PB)
Price :  Rs. 300/- (HB)/  Rs. 175/- (PB)
Size (Inches) : 5.50x8.50
First Edition : 2013
Category  : Memoirs


पुस्तक के संदर्भ में - 
फुन्नक तालमुनव्वर राना के इंशाइयों और ख़ाकों की ताज़ा तरीन किताब है। उनकी क़लम की रौशनाई और तहरीर दोनों की कँपकँपाहट चुग़लखोरी कर रही है लेकिन उनकी पेशानी पर उनके किरदार का नूर अभी तक मौजूद है क्योंकि उन्होंने अपनी क़लम से कभी बद दियानती नहीं की, अपनी तहरीरों से नाजाएज़ फ़ायदा नहीं उठाया। मुनव्वर राना ने यक़ीनन बहुत बड़ा अदब तख़लीक़ नहीं किया लेकिन जो कुछ लिखा, जितना लिखा वह पूरी ईमानदारी और ज़िम्मेदारी के साथ लिखा है। कहीं-कहीं पर उनकी क़लम बे राह रवी का शिकार हुई है, लेकिन अदब और समाज में बैठे हुए खराब लोगों को देखकर शायद उनसे यह जुर्म सरज़द हुआ हो क्योंकि बचपन से ही शायद नाइंसाफियों और ज़ालिमाना रविश से उन्हें नफरत रही है। यही सबब है कि उनकी शायरी में हुस्नो इश्क की कहानियाँ या शराब व शबाब के क़िस्से बिल्कुल नहीं हैं। उन्होंने अपनी क़लम को वही लिखने की इजाज़त दी, जिसे उनका ज़मीर कुबूल करता है। फुन्नक तालमें संग्रहीत निबन्ध उनके अन्दर के उस नौजवान के देखे हुए ख़्वाब हैं, जिसकी आँखें आज तक ताबीर के इन्तिज़ार में भटक रही हैं।

लेखक के संदर्भ में - 
मुनव्वर राना का जन्म 26 नवम्बर, 1952 को रायबरेली, उत्तर प्रदेश में हुआ था। सैयद मुनव्वर अली राना यूँ तो बी. कॉम. तक ही पढ़ पाये किन्तु ज़िन्दगी के हालात ने उन्हें ज्यादा पढ़ाया भी उन्होंने खूब पढ़ा भी। माँ, ग़ज़ल गाँव, पीपल छाँव, मोर पाँव, सब उसके लिए, बदन सराय, घर अकेला हो गया, मुहाजिरनामा, सुखन सराय, शहदाबा, सफ़ेद जंगली कबूतर, फुन्नक ताल, बग़ैर नक़्शे का मकान, ढलान से उतरते हुए और मुनव्वर राना की सौ ग़ज़लें हिन्दी व उर्दू में प्रकाशित हुईं। कई किताबों का बांग्ला व अन्य भाषाओं में अनुवाद भी हुआ।

Wednesday, 18 June 2014

बग़ैर नक़्शे का मकान


Book - BAGHAIR NAQSHE KA MAKAN
Author - MUNAWWAR RANA
Publisher - VANI PRAKASHAN

Total Pages : 182
ISBN :978-93-5072-548-1(HB)
ISBN : 978-93-5072-549-8(PB)
Price :  Rs. 300/- (HB)/  Rs. 175/- (PB)
Size (Inches) : 5.50x8.50
First Edition : 2013
Category  : Memoirs


पुस्तक के संदर्भ में - 

मुनव्वर राना को अपने क़द को नापने की अभी तक फ़ुर्सत ही नहीं मिली। उन्हें अपनी साहित्यिक उपलब्धियाँ गिनवाने का कभी ख़ब्त सवार नहीं हुआ। वह जानते हैं कि उनका लिखा हुआ उनके काम तो नहीं आया लेकिन साहित्य के काम हमेशा आता रहेगा। बहुत कम लोग इस बात से परिचित होंगे कि शायरी शुरू करने से पहले मुनव्वर राना कहानियाँ, अफ़साने और ड्रामे लिखते रहे हैं। उनके उस वक़्त के साथी उन्हें एक ड्रामानिगार की हैसियत से ही जानते थे। उनकी बहुत सी कहानियाँ और अफ़साने उस ज़माने में कलकत्ते के अख़बारों और उर्दू रिसालों में छपे भी। लेकिन कुछ नौजवान दोस्तों और शायरों की ज़िद पर उन्होंने गद्य का मैदान छोड़कर शायरी की तरफ़ तवज्जो देना शुरू कर दिया और उम्र का एक बड़ा हिस्सा काफ़िया और रदीफ़ की भूलभुलैया में गुज़ार दिया। मुनव्वर राना को यह लिखने में कोई संकोच नहीं कि जो इज़्ज़तें और शोहरतें उन्हें हासिल हैं वह उनका नसीब है, उनकी शायरी का मेहनताना हरगिज़ नहीं। संस्मरणात्मक लेखों का यह संग्रह अपने आप में अद्भुत और पठनीय है।

लेखक के संदर्भ में - 
मुनव्वर राना का जन्म 26 नवम्बर, 1952 को रायबरेली, उत्तर प्रदेश में हुआ था। सैयद मुनव्वर अली राना यूँ तो बी. कॉम. तक ही पढ़ पाये किन्तु ज़िन्दगी के हालात ने उन्हें ज्यादा पढ़ाया भी उन्होंने खूब पढ़ा भी। माँ, ग़ज़ल गाँव, पीपल छाँव, मोर पाँव, सब उसके लिए, बदन सराय, घर अकेला हो गया, मुहाजिरनामा, सुखन सराय, शहदाबा, सफ़ेद जंगली कबूतर, फुन्नक ताल, बग़ैर नक़्शे का मकान, ढलान से उतरते हुए और मुनव्वर राना की सौ ग़ज़लें हिन्दी व उर्दू में प्रकाशित हुईं। कई किताबों का बांग्ला व अन्य भाषाओं में अनुवाद भी हुआ।

Tuesday, 17 June 2014

तीन सौ तीस कहावती कहानियाँ


BOOK - TEEN SAU TEES KAHAVATI KAHANIYAN

AUTHOR - VIJAYDAAN DETHA

Publisher : Vani Prakashan

Total Pages : 472
ISBN : 978-93-5000-903-1(HB)
Price :  Rs. 595
Size (Inches) : 5.50x8.50
First Edition : 2014
Category  : Collection of Proverbs Stories



पुस्तक के सन्दर्भ में -
सेठां! थांरी छुरी हेटै पड़गीके डोफा आ तौ कलम है के म्हारै गळै तौ आ इज फिरी। सेठजी! आपकी छुरी नीचे गिर गयी कि बेवकूफ यह तो कलम है कि मेरे गले पर तो यही फिरी थी। इसकी सन्दर्भ-कथा छोटी होते हुए भी बहुत मार्मिक है। एक बनिया बगल में बही दबाये और कान में कलम खोंसे हुए अपनी हाट पर जा रहा था। पीली पगड़ी। नीची मूँछें। एक भुक्त-भोगी असामी उसके पीछे नंगे पाँव चल रहा था। फटी धोती और चिंदी-चिंदी मैले-कुचैले साफे के अलावा उसके शरीर पर कुछ भी बेकार कपड़ा नहीं था। सिर और अंग की लाज ढकना जरूरी था। अचानक किसी चीज के गिरने की हलकी-सी भनक उसके कानों में पड़ी। उसने अपनी नैतिक जिम्मेदारी का निबाह करते हुए सेठजी को आवाज देकर कहा, ‘सेठजी! आपकी छुरी नीचे गिर गयी।’ सेठ ने चौंककर पीछे देखा। आश्चर्य से दोहराया, ‘छुरीकैसी छुरीमुझे छुरी से क्या वास्ता?’

तब निरीह असामी ने सहज भाव से इशारा करते हुए कहा, ‘यह पड़ी है?’ अब कहीं सेठ को उस गँवार की बेवकूफी नजर आयी। व्यंग्य में मुस्कराते कहा, ‘मूर्ख कहीं कायह तो मेरी कलम हैकलम!
मूर्ख असामी ने रुँधे गले से कहा, ‘लेकिन मेरे गले पर तो यही चली थी।’ सेठ ने कुछ भी जवाब नहीं देकर चुपचाप अपनी कलम उठाईकान में खोंसी और खँखारकर अपनी राह पकड़ी। जाने कितनी अर्थच्छटाएँ इस कहावत में सन्निहित हैं। श्रेष्ठ वस्तु भी यदि बुरे काम में आये तो वह बुरी ही है। बोहरे की कलम भी किसी आततायी की तलवार से कम नहीं होती। शोषण करने के अपने-अपने हथियार होते हैं और अपने-अपने तरीके। और हर तरीके की अपनी-अपनी हिंस्त्र-बर्बरता होती है।

एक बार दो मित्र चाँदनी रात में नदी के किनारे घूम रहे थे। एक मित्र को अचानक पानी के बहाव में काला-स्याह एक कम्बल तैरता नजर आया तो वह धीरज नहीं रख सका। लालची भी कुछ जरूरत से ज्यादा था। कपड़ों सहित नदी में छलाँग मारी और कम्बल को बायें हाथ से पकड़ लिया। पर आश्चर्य कि दूसरे ही क्षण कम्बल उसे अपनी ओर खींचने लगा तो वह जोर-जोर से चिल्लायारीछ...रीछ...रीछ। मित्र ने किनारे पर खड़े-खड़े ही सलाह दी - छोड़ दे...छोड़ दे। तब मित्र ने हताश होकर कहा, ‘म्हैं तौ छोडूँ पण कांबळ नीं छोड़ै।’ वह तो छोड़ने को तैयार थालेकिन कम्बल उसे नहीं छोड़ रहा था। लालच में फँसने के बाद छुटकारा पाना आसान नहीं है। अपनी विकास यात्रा के दौरान मनुष्य ने ज्ञान-विज्ञानधर्मदर्शन,सम्प्रदाय और जाति-रिश्तों को आवश्यकतानुसार ईजाद कियापर एक बार अस्तित्व में आने के बाद मनुष्य की तमाम सृष्टि ने कम्बल की नाईं उसे ही जकड़ लिया। वह छोड़ना चाहे तब भी कम्बल उसे नहीं छोड़ेगाउसे नोच-नोचकर निगल जाएगा। मनुष्य अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए कोई भी पेशा चुनता हैकिन्तु कुछ समय बीतने के बाद वह पेशा ही उसे अपने नागपाश में आबद्ध कर लेता है।

आधुनिक सभ्यता के नाम पर मनुष्य ने क्या-क्या करतब नहीं रचे! पर साथ-ही-साथ उसने विध्वंसक हथियारों की होड़ में भी कोई कसर नहीं रखी। मनुष्य ही समूचे विकास का नियंता है और वही समूचे विनाश का एकमात्रा कारण बनेगा। म्हे ई खेल्या अर म्हे ई ढाया। हम ही खेले और हमने ही बिखेरे। हमने ही घरौंदे बनाये और हमने ही ढहाये। यह कहावत समष्टि के लिए भी उपयुक्त है और व्यष्टि के लिए भी कि मनुष्य बचपन और युवा अवस्था में कई नये-नये खेल खेलता है और उन्हें भूलता रहता है।



लेखक के सन्दर्भ में - 
विजयदान देथाजिन्हें उनके मित्र प्यार से बिज्जी कहते हैंराजस्थानी के प्रमुख लेखक हैं। वे हिन्दी में भी लिखते रहे हैं। देथा ने आठ सौ से अधिक कहानियाँ लिखी हैंजिनमें से अनेक का अनुवाद हिन्दीअंग्रेजी तथा अन्य भाषाओं में हो चुका है। राजस्थान की लोक कथाओं और कहावतों के संग्रह एवं पुनर्लेखन के क्षेत्रा में विजयदान देथा का योगदान विश्व स्तर पर समादृत है। उनकी कहानियों पर आधारित तीन हिन्दी फिल्में -  दुविधापहेली और परिणीता -  बन चुकी हैं और चरनदास चोर सहित अनेक नाटक लिखे और मंचित हो चुके हैं। साहित्य अकादेमी तथा अन्य अनेक पुरस्कारों से सम्मानित।

कुछ प्रमुख कृतियाँ: बातारी फुलवारी (13 खण्ड)रूँखदुविधा और अन्य कहानियाँउलझनसपनप्रिया,अन्तराल तथा राजस्थानी-हिन्दी कहावत कोश। राजस्थानी लोक गीत (भाग) का संकलन-सम्पादन।

Monday, 16 June 2014

वाणी प्रकाशन समाचार - जून 2014


























निर्वासन


BOOK - NIRVASAN
AUTHOR - TASLIMA NASRIN
Publisher : Vani Prakashan
Total Pages : 256
ISBN : 978-93-5072-592-4(HB)
ISBN : 978-93-5072-599-3(PB)
Price :  Rs. 395(HB)/  Rs. 200(PB)
Size (Inches) : 5.75x8.75
First Edition : 2014
Category  : Autobiography



पुस्तक के संदर्भ में - 

तसलीमा नसरीन की निर्वासनएक स्त्री का दिल दहला देने वाला ऐसा सच्चा बयान है जिसमें वह खुद को अपने घर बंग्लादेश, फिर कलकत्ता (पश्चिम बंगाल) और बाद में भारत से ही निर्वासित कर दिए जाने पर, दिल में वापसी की उम्मीद लिए पश्चिमी दुनिया के देशों में एक यायावर की तरह भटकते हुए अपना जीवन बिताने के लिए मजबूर कर दिए जाने की कहानी कहती है। इसमें उन दिनों में लेखिका के दर्द, घुटन और कशमकश के साथ धर्म, राजनीति और साहित्य की दुनिया की आपसी मिली भगत का कच्चा चिट्ठा सामने आता है। कई तथाकथित संभ्रान्त चेहरे बेनकाब होते हैं।


बंग्लादेश में जन्मी लेखिका तसलीमा नसरीन, जो मत प्रकाश करने के अधिकार के पक्ष में पूरे विश्व में एक आन्दोलन का नाम हैं और जो अपने लेखन की शुरुआत से ही मानवतावाद, मानवाधिकार, नारी-स्वाधीनता और नास्तिकता जैसे मुद्दे उठाने के कारण धार्मिक कट्टरपंथियों का विरोध झेलती रही हैं, की आत्मकथा के तीसरे खण्ड -द्विखण्डतोपर केवल इस आशंका से की इससे एक सम्प्रदाय विशेष के लोगों की धार्मिक भावनाएँ आहत हो सकती हैं, पश्चिम बंगाल की सरकार ने प्रतिबन्ध लगा दिया। पूरे एक साल नौ महीने छब्बीस दिन निषिद्ध रहने के बाद, हाईकोर्ट के फैसले पर यह पुस्तक इस प्रतिबन्ध से मुक्त हो सकी। पश्चिम बंगाल और बंग्लादेश में अलग-अलग नामों से प्रकाशित इस पुस्तक के विरोध में उनके समकालीन लेखकों ने कुल इक्कीस करोड़ रुपए का दावा पेश किया। पर यह सब कुछ तसलीमा को सच बोलने और नारी के पक्ष में खड़ा होने के अपने फैसले से डिगा नहीं सका। निर्वासनभी इसी की एक बानगी है।



तसलीमा नसरीन
लेखक के संदर्भ में - 
तसलीमा नसरीन ने अनगिनत पुरस्कार और सम्मान अर्जित किए हैं, जिनमें शामिल हैं - मुक्त चिन्तन के लिए यूरोपीय संसद द्वारा प्रदत्त - सखारव पुरस्कार; सहिष्णुता और शान्ति प्रचार के लिए यूनेस्को पुरस्कार; फ्रांस सरकार द्वारा मानवाधिकार पुरस्कार; धाखमक आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष के लिए फ्रांस का एडिट द नान्त पुरस्कार’; स्वीडन लेखक संघ का टूखोलस्की पुरस्कार; जर्मनी की मानववादी संस्था का अर्विन फिशर पुरस्कार; संयुक्त राष्ट्र का फ्रीडम फ़्राम रिलिजन फाउण्डेशन से फ्री थॉट हीरोइन पुरस्कार और बेल्जियम के मेंट विश्वविद्यालय से सम्मानित डॉक्टरेट! वे अमेरिका की ह्युमैनिस्ट अकादमी की ह्युमैनिस्ट लॉरिएट हैं। भारत में दो बार, अपने निर्वाचित कलामऔर मेरे बचपन के दिनके लिए वे आनन्द पुरस्कारसे सम्मानित। तसलीमा की पुस्तकें अंग्रेजी, फ्रेंच, इतालवी, स्पैनिश, जर्मन समेत दुनिया की तीस भाषाओं में अनूदित हुई हैं। मानववाद, मानवाधिकार, नारी-स्वाधीनता और नास्तिकता जैसे विषयों पर दुनिया के अनगिनत विश्वविद्यालयों के अलावा, इन्होंने विश्वस्तरीय मंचों पर अपने बयान जारी किए हैं। अभिव्यक्ति के अधिकारके समर्थन में, वे समूची दुनिया में, एक आन्दोलन का नाम बन चुकी हैं।

Friday, 6 June 2014

हिंदी-आधुनिकता : एक पुनर्विचार (तीन खंड)




Book : Hindi-Adhunikta : Ek Punarvichar (I,II,III Vol)
Editor : Abhay Kumar Dubey
Publisher : Vani Prakashan
Total Pages : ​845 ​
ISBN : 978-93-5072-622-8​(HB)
Price : ​Rs. 2000​/- (I,II,III VOL)
Size (Inches) : 6.50x9.75
First Edition : 2014
Category  : Social Science


पुस्तक के सन्दर्भ में - 

हिंदी भाषा का सामाजिक, राजनीतिक, भौगोलिक, सांस्कृतिक और वैचारिक विन्यास पिछले पचास सालों में काफी-कुछ बदला है। आज की हिंदी विविध उद्देश्यों को पूरा कर सकने वाली और समाज के विविध तबकों की बौद्धिक व रचनात्मक आवश्यकताएँ व्यक्त कर सकने वाली एक ऐसी संभावनाशील भाषा है जो अपनी प्रचुर आंतरिक बहुलता और विभिन्न प्रभाव जज़्ब करने की क्षमता के लिए जानी जाती है। देशी जड़ों वाली एक मात्र अखिल भारतीय सम्पर्क भाषा के रूप में हिंदी की ग्राहकता में उल्लेखनीय उछाल आया है, और वह अंग्रेज़ी की तत्संबंधित दावेदारियों को गंभीर चुनौती देने की स्थिति में है। ज़ाहिर है कि हिंदी वह नहीं रह गई है जो वह थी। मात्रात्मक और गुणात्मक तब्दीलियों का यह सिलसिला लगातार जारी है। इन्हीं सब कारणों से हिंदी की प्रचलित जीवनी पर पड़ी तारीख बहुत पुरानी लगने लगी है। यह भाषा अपने नए जीवनीकारों की तलाश कर रही है। २३ सितम्बर से २९ सितम्बर, २००९ के बीच शिमला के भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान में हुए वर्क शॉप में हिंदी से संबंधित उन प्रश्नों पर दुबारा गौर किया गया जिन्हें आज से चालीस-पैंतालीस साल पहले अंतिम रूप से तय मान लिया गया था। सत्ताईस विद्वानों के बीच सात दिन तक अहर्निश चले बहस-मुबाहिसे के एक-एक शब्द को टेप किया गया। करीब एक हज़ार पृष्ठों में फैले इस टेक्स्ट को सम्पादित करने की स्वाभाविक दिक्कतों के बावजूद पूरी कोशिश की गई कि मुद्रित पाठ को हर तरह से पठनीय बना कर, दोहराव और अस्पष्टताएँ निकाल कर उनके मानीखेज़ कथनों को उभारा जाए। वर्कशॉप की बहस को इस शैली में प्रस्तुत करने का यह उदाहरण हिंदी के लिए संभवत: पूरी तरह से नया है। इस अध्ययन-सप्ताह की शुरुआत इतिहासकार सुधीर चंद्र द्वारा दिए गए बीज-वक्तव्य से हुई। दलित-विमर्श और स्त्री-विमर्श हिंदी की अपेक्षाकृत दो नई धाराएँ हैं जिन्होंने इस भाषा की आधुनिकता के स्थापित रूपों को प्रश्नांकित करने की भूमिका निभाई है। दलितों और स्त्रियों द्वारा पैदा की गई बेचैनियों को स्वर देने का काम ओमप्रकाश वाल्मीकि, अजय नावरिया, विमल थोराट, अनामिका, सविता सिंह और रोहिणी अग्रवाल ने किया। स्त्री-विमर्श में आनुषंगिक भूमिका निभाते हुए उर्दू साहित्य के विद्वान चौधरी मुहम्मद नईम ने यह सवाल पूछा कि क्या स्त्रियों की ज़ुबान मर्दों के मुकाबले अधिक मुहावरेदार होती है। वर्कशॉप में हिंदी को ज्ञान की भाषा बनाने के उद्यम से जुड़ी समस्याओं और ऐतिहासि• उलझनों की पड़ताल आदित्य निगम और पंकज पुष्कर ने की। बद्री नारायण ने हिंदी साहित्य के भीतर आधुनिकतावादी और देशज प्रभावों के बीच चल रही जद्दोजहद का खुलासा किया। दूसरी तरफ राजीव रंजन गिरि ने हिंदी और जनपदीय भाषाओं के समस्याग्रस्त रिश्तों को कुरेदा। तीसरी तरफ सुधीश पचौरी ने हिंदी पर पड़ रहे अंग्रेज़ी के प्रभाव की क्षतिपूर्ण के सिद्धांत की रोशनी में विशद व्याख्या की। नवीन चंद्र ने साठ के दशक में चले अंग्रेज़ी विरोधी आंदोलन की पेचीदगियों का आख्यान प्रस्तुत किया। अभय कुमार दुबे ने हिंदी को सम्पर्क-भाषा बनाने के संदर्भ में गैर-हिंदीभाषियों के हिंदी संबंधी विचारों का विश्लेषण पेश किया। वैभव सिंह ने सरकारी हिंदी बनाने की परियोजना के विफल परिणामों को रेखांकित किया। अमरेंद्र कुमार शर्मा ने बताया कि आपातकाल के राजनीतिक संकट ने हिंदी के साहित्यिक और पत्रकारीय बुद्धिजीवियों की लोकतंत्र के प्रति निष्ठाओं को किस तरह संकटग्रस्त किया था। स्त्री और दलित विमर्श के उभार से पहले हिंदी की दुनिया राष्ट्रवादी और माक्र्सवादी विमर्श से निर्देशित होती रही है। इन दोनों विमर्शों की प्रभुत्वशाली भूमिका की आंतरिक जाँच-पड़ताल का काम सदन झा, प्रमोद कुमार, अपूर्वानंद और संजीव कुमार ने किया। शीबा असलम फहमी की प्रस्तुति में हिंदी और बहुसंख्यकवादी विमर्श के बीच संबंधों की संरचनात्मक प्रकृति का उद्घाटन किया गया। अविनाश कुमार ने राधेश्याम कथावाचक पर किए गए अनुसंधान के ज़रिए दिखाया कि साहित्य के रूप में परिभाषित होने वाली सामग्री कैसे वाचिक और लोकप्रिय के ऊपर प्रतिष्ठित हो जाती है। रविकांत ने सिनेमा और भाषा के बीच संबंधों के इतिहास को उकेरा, प्रमोद कुमार ने मीडिया में हाशियाग्रस्त समुदायों की भागीदारी का प्रश्न उठाया, राकेश कुमार सिंह ने चिट्ठाकारी (ब्लॉङ्क्षगग) के हिंदी संबंधी अध्याय की जानकारी दी और विनीत कुमार ने उस विशिष्ट प्रक्रिया को रेखांकित किया जिसके तहत टीवी की हिंदी बन रही है।


लेखक के सन्दर्भ में - 
अभय कुमार दुबे 

अभय कुमार दुबे विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) में $फेलो और भारतीय भाषा कार्यक्रम के निदेशक। पिछले दस साल से हिंदी-रचनाशीलता और आधुनिक विचारों की अन्योन्यक्रिया का अध्ययन। साहित्यिक रचनाओं को समाजवैज्ञानिक दृष्टि से परखने का प्रयास। समाज-विज्ञान को हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में लाने की परियोजना के तहत पंद्रह ग्रंथों का सम्पादन और प्रस्तुति। कई विख्यात विद्वानों की रचनाओं के अनुवाद। समाज-विज्ञान और मानविकी की पूर्व-समीक्षित पत्रिका प्रतिमान समय समाज संस्कृति के सम्पादक। पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर लेखन और टीवी चैनलों पर होने वाली चर्चाओं में नियमित भागीदारी।